पुरुष व्यथा -अमरनाथ त्रिवेदी-पद्यपंकज

पुरुष व्यथा -अमरनाथ त्रिवेदी

Amarnath Trivedi

हैं पुरुष विवश कैसे होते ?
जैसे मकड़ा स्वनिर्मित जाल में ।
मानव का यह आधा हिस्सा ,
पड़ जाता भव – जाल में ।

केवल एक पक्ष को लेकर ही ,
साहित्य सृजन भी चलता है ।
द्वेष राग से परिपूरित हो ,
बाबेला अधिक मचाता है ।

नारी की दुश्मन नारी ही ,
पुरुष पर दोषारोपण होता है ।
समग्र झंझावातों में केवल ,
प्रहार पुरुष पर होता है ।

गहराइयों में जाकर देखो हे मानव ,
कौन किसे सताता है ?
आन -बान -शान की कीमत से ,
कौन घायल कर जाता है ?

जीवन मे सच्चाई देखो ,
लो न पक्ष किसी का भाई ।
कहो वही जो उचित बन पड़े ,
जो सबके लिए हो सुखदाई ।
अमरनाथ त्रिवेदी , प्रधानाध्यापक , उत्क्रमित उच्च विद्यालय बैंगरा , प्रखंड बंदरा (मुज़फ़्फ़रपुर )

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