Generated by All in One SEO v4.9.5.1, this is an llms.txt file, used by LLMs to index the site. # पद्यपंकज Teachers of Bihar- The Change Makers ## Sitemaps - [XML Sitemap](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sitemap.xml): Contains all public & indexable URLs for this website. ## Posts - [स्वतंत्रता-भवानंद सिंह ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swatantrata-bhavanand-singh/) - स्वतंत्रता के पावन, अवसर हम सब, उल्लास पूर्वक और खुशी से मनाते हैं। याद करेंगे बीरों को, जिसने दी कुर्बानी है, हम सब मिलकर, झंड़ा फहराते हैं। कभी मिटने न देंगे, देश की आन व शान, श्रद्धा और सम्मान से, वचन निभाते हैं। सबसे प्यारा अपना, हिन्दुस्तान हमारा है, देश पर मिटने की, प्रण दोहराते - [स्वाधीनता-एम० एस० हुसैन "कैमूरी"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swadhinta-m-s-husain-kaimuri/) - जब घोषणा हुई स्वाधीनता का हर मन प्रफुल्लित हो आया था । खुशियों से झूमे उठे भारतवासी सैकड़ों वर्षों बाद ये पल आया था । पराधीन था जब भारत अंग्रेजी जंजालों वीर सपूतों के खून ने उबाल आया था । गांधी , आजाद , बोस आदि के दंभ ने अंग्रेजों को भारत से मार भगाया - [फिर पन्द्रह अगस्त आया-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/fir-pandrah-august-aya-ruchika/) - फिर पन्द्रह अगस्त देश प्रेम का परचम लहराया। जय हिंद के नारों से गुंजयमान हुआ भारतवर्ष भारत देश महान कहलाया। केवल ध्वज फहराकर अपने कर्तव्यों के निर्वहन की बात हुई देश के हितों की बात कहाँ किसी को समझ आया। स्वार्थ की राजनीति में हर दल और हर नेता लगे हैं। कुर्सी के लिए कितने - [देश के युवक-रंजना कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/desh-ke-yuvak-ranjana-kumari/) - जागो देश की युवक, नई क्रांति का आगाज करो। नए भारत का सृजन , अब तुम्हारे हाथों में है, कुछ तो विचार करो। हे ,भारत के युवकों कुछ तो विचार करो, नई उमंग को फिर से अपने अंदर आगाज करो। विवेकानंद ने युवाओं में वायु सा वेग बहाकर, अपना परचम विदेश में लहराया था उनके - [पौधे ने माँगा पानी-उमेश कुमार सिन्हा " निर्देशक"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/paudhe-ne-manga-pani-umesh-kumar-sinha-nirdeshak/) - हवा रुक गई, ताप बढ़ गया, खेतों में दरार पड़ गया। कड़ी धूप देख मन घबराया, हरे पौधों ने आपस में बड़बड़ाया— “किसान भाई हम सभी को मानते नहीं, हमारे हाल देखने आते नहीं। कब से हम धूप में जल रहे हैं, जल-पान बिना हम मर रहे हैं।” एक पौधा था बड़ा ही जोकर, करता - [देश के वीर सपूत-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/desh-ke-veer-sapoot-ashish-ambar/) - राजगुरु , सुखदेव , भगतसिंह की बलिदानी, भारत के नवपीढी को , सुनानी है यह कहानी । जिसने अपने देश की खातिर दी अपनी कुर्बानी , जिनकी गाथा घर - घर में सुनी जाती है जुबानी । भारत माँ के लाल तूने फर्ज अपना अदा किया, जान हथेली पर लेकर , दुश्मन का सीना चीर - [तिरंगा-बेबी अर्चना](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tiranga-baby-archana/) - लहराता है तिरंगा धरा-गगन सुरक्षित है अब अपना चमन हवा नहीं, यह फौजी की साँसें बदौलत जिनके शांति-अमन है दीप्त भाल जिनका हिमालय कितनी सभ्यताओं का है आलय विविधताओं में एकता का संगम पुनीत धरा का कण-कण शिवालय धरा धाम का है कश्मीर सिरमौर यहाँ गंगा यमुना की धार चहुंओर है धन्य-धन्य हर जन की - [आजादी की वर्षगाँठ-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/azadi-ki-varshganth-ruchika/) - आजादी की 80वाँ वर्षगाँठ हम मना रहे हैं, स्वयं ही अपनी आजादी पर इठला रहे हैं। मगर क्या कभी सोचा है हमने इस बात पर, अपनी संकुचित सोच से क्या मुक्ति पा रहे हैं। धर्म और जाति के नाम पर हो रही है लड़ाई, अमीरी-गरीबी की बढ़ रही है देखो ये खाई, बेईमानी और भ्र्ष्टाचार - [स्वतंत्रता से प्यार-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swatantrata-se-pyar-ratna-priya/) - अखिल विश्व के हर प्राणी को , स्वतंत्रता से प्यार है , पराधीनता में सुख नहीं , यह जानता संसार है । स्वतंत्र हैं हम परतंत्र नहीं , हमारा गणतंत्र सही , जनतंत्र है तो गणतंत्र है , स्वराष्ट्र का मंत्र यही , पराधीनता का जीवन तो , निरर्थक है , बेकार है , अखिल - [झूला झूलें-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jhula-jhule-ratna-priya/) - सावन आया झूला झूलें, धरती से गगन को छू लें, काली बदरी नभ में छाई, रिम-झिम-रिम-झिम वर्षा आई, बच्चे समाते नहीं फूले । सावन आया झूला झूलें। इस झूले की पेंग बढ़ाना, प्यार से धक्का दे जाना, आगे-पीछे, पीछे आगे, खेल छोड़‌कर बच्चे भागे, गिनती करना हम तो भूलें । सावन आया झूला झूलें। फूलों - [आजादी का दिव्य पर्व महान-बेबी अर्चना ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/azadi-ka-divya-parv-mahan-baby-archana/) - है हिन्द-सिंध अपना हिय सनातन आजादी का यह दिव्य पर्व महान गुलामी- कलुषित- कालिमा का आज ही के दिन हुआ अवसान सदियों फैली पीड़ित मानवता गुलामी की बेड़ियों में थी जनता अंग्रेजी दमन से मिली तब मुक्ति एकजुट हुई जब भारत की जनता अखंड हो गया खंडित भारत मिली अपनी संपूर्ण पहचान गुलामी- कलुषित- कालिमा - [प्रणाम सर-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pranam-sir-kartik-kumar/) - प्रणाम सर! — खुश रहो बच्चा, जीवन में तुम आगे बढ़ना। पढ़ाई करो अच्छा-अच्छा, ज्ञान का दीपक सदा जलाना। काम करो तुम अच्छा-अच्छा, मेहनत से मत कभी घबराना। सुबह उठो जल्दी बच्चा, सूरज से पहले जग जाना। दाँत साफ कर, स्नान करो तुम, योग करो और स्वस्थ रहो तुम। माता-पिता का मान बढ़ाना, गुरुजनों का - [मोह का बंधन - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/moh-ka-bandhan-manu-kumari/) - बहुत प्रबल होता है सखे ये, मोह का नाज़ुक बंधन। इसमें बंधे चले जाते सब , धनी हो चाहे निर्धन।। राजा हो या रंक ऋषि- मुनि , अज्ञानी हो या ज्ञानी। त्रिदेव, सहित नारद से जुड़ी हैं ,मोह की सत्य कहानी।। मोह के बंधन में बंधकर सब, दुख को गले लगाया। माया के अधीन हो - [सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sarvashreshth-yah-bharat-apna-ram-kishor-pathak/) - विश्व-बोध नित लेकर सपना। सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना।। नाग-तुंग नभ छूकर कहते। देव-भूमि सुर आकर रहते।। दिव्य लोक सम दर्शन करते। नित्य धर्म-पथ चिंतन वरते।। कर्म-मार्ग पर वांछित तपना। सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना।।०१।। वीर-धीर जन रक्षक इसके। द्वेष-भाव उर भक्षक इसके।। श्रेष्ठ शौर्य रण-कौशल रखते। शत्रु-नाश सम तक्षक करते।। शीश काट रखते रिपु नपना। सर्वश्रेष्ठ - [सेवाभावी की अभिलाषा - उमेश कुमार सिन्हा ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sewabhavi-ki-abhilasha-umesh-kumar-sinha-2/) - नहीं चाहूँ स्वर्णिम वैभव का मुझ पर राजतिलक हो, नहीं चाहूँ यश का सूरज मेरे ही आँगन उदित हो। नहीं चाहूँ ऊँचे पद का क्षणभंगुर अभिमान मिले, दीन-हृदय की करुण पुकार से मेरा मन अनजान मिले। नहीं चाहूँ भीड़ पुकारे—"यही महान, यही श्रीमान!", यदि पीड़ित की आँखों में फिर जीवित न हो विश्वास-प्राण। बस इतनी - [बचपन की बारात - उमेश कुमार सिन्हा "निर्देशक"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bachpan-ki-barat-umesh-kumar-sinha-nirdeshak/) - एक-एक रुपया जोड़-जोड़कर गुल्लक अपनी भर लाई, दादी के घर बड़े जतन से मैंने एक गुड्डा बनवाई। नानी के घर जाकर फिर मैंने सुंदर-सी गुड़िया बनाई, लहँगा, चुनरी, राज-दुपट्टा— सारी पोशाक उसे पहनाई। गुड़िया मेरी बड़ी नखरीली, गुड्डा भी कम शहजादा नहीं, दोनों को जब आमने-सामने रख दूँ, फिर कोई झगड़ा साधारण नहीं! मैं तो - [ आध्यात्मिक दुखों का कोई सहारा नहीं  - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aadhyatmik-dukhon-ka-koi-sahara-nahi-kartik-kumar/) - आध्यात्मिक दुखों का कोई सहारा नहीं - कार्तिक कुमार मन के भीतर उठता दुख, बाहर इसका उपचार नहीं। आध्यात्मिक पीड़ा ऐसी, जिसका कोई सहारा नहीं। धन-दौलत सब पास रहे, फिर भी मन खुशहाल नहीं। महलों में भी शांति कहाँ, यदि अंतर में उजियारा नहीं। तन के दुख की दवा मिले, वैद्य करे उपचार कहीं। मन - [ मेरा प्यारा खिलौना - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mera-pyara-khilouna-kartik-kumar/) - मेरा प्यारा खिलौना - कार्तिक कुमार मेरा प्यारा खिलौना है, सबसे सुंदर, न्यारा है। लाल रंग की छोटी गाड़ी, चलती जैसे तेज सवारी। गुड़िया मेरी हँसती है, मुझसे बातें करती है। भालू उसका साथी प्यारा, लगता मुझको सबसे न्यारा। खेल-खेल में सीखूँ बातें, बाँटूँ सबके संग सौगातें। खिलौने से खुशियाँ आतीं, मन में नई उमंग - [ मेरी गुड़िया की शादी है - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/meri-guriya-ki-sadi-hai-kartik-kumar/) - मेरी गुड़िया की शादी है - कार्तिक कुमार मेरी गुड़िया की शादी है, घर में आज खुशी ज्यादा है। गुड़िया ने पहनी लाल चुनरिया, लगती प्यारी सुंदर दुल्हनिया। गुड़िया का दूल्हा आया है, साथ में खुशियाँ लाया है। मम्मी बोलीं—गीत सुनाएँ, मिलकर सबको नाच नचाएँ। पापा लाए मिठाई प्यारी, सबने खाई बारी-बारी। दादी ने आशीर्वाद - [सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना- चंद्रवर्त्म वर्णिक छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sarvshresth-yeh-bharat-apana-ram-kishor-pathak/) - सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना- चंद्रवर्त्म वर्णिक छंद गीत - राम किशोर पाठक विश्व-बोध नित लेकर सपना। सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना।। नाग-तुंग नभ छूकर कहते। देव-भूमि सुर आकर रहते।। दिव्य लोक सम दर्शन करते। नित्य धर्म-पथ चिंतन वरते।। कर्म-मार्ग पर वांछित तपना। सर्वश्रेष्ठ यह भारत अपना।।०१।। वीर-धीर जन रक्षक इसके। द्वेष-भाव उर भक्षक इसके।। श्रेष्ठ शौर्य - [मेरी माँ वसुंधरा -उमेश कुमार सिन्हा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/meri-maa-umesh-kumar/) - अपने आँचल में अथाह सागर समेटे, माथे पर शीतल चाँद सजाए। अपनी गोद में समस्त सृष्टि को बसाए, ओ! कोई नहीं—मेरी माँ वसुंधरा, मेरी माँ धरा॥ तेरी गोद में ऋषि, मुनि, संत, महात्मा पले, तेरी गोद में ही वीरों ने इतिहास रचे। हाँ, कभी-कभी दानव भी जन्म लेते हैं, किन्तु तेरी ममता के द्वार कभी - [हे मेरे शंभु ! हे भोलेनाथ !-बेबी अर्चना](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/he-mere-shambhu-he-bholenath-baby-archana/) - हे मेरे शंभु ! हे भोलेनाथ ! सर पे मेरे रख तू हाथ अपनी शरण रख ले मुझको , हर बाधा का उद्धार करो जटा से पावन गंगाजल से , हर दुख, पीड़ा का संहार करो । हे शिवशंभु ! हे भोलेनाथ ! दीन पुकारे बढ़ाओ हाथ अंधकार है जग में फैला, सृष्टि में अब - [स्वतंत्रता का अमर प्रण -उमेश कुमार सिन्हा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swatantrata-ka-amar-pran-umesh-kumar-sinha-2/) - स्वतंत्रता-दिवस आया है, हर आँगन उल्लास समाया है। केसरिया, श्वेत, हरा तिरंगा, गर्व से नभ में लहराया है। ज्यों ही यह पावन दिन आता, मन इतिहास में खो जाता। लहूलुहान उन वीरों का चेहरा, स्मृति-पटल पर छा जाता। त्याग, तपस्या, बलिदानों की अमर कहानी बोल उठी; भारत माँ की पावन मिट्टी वीरों की जय बोल - [हँसी के प्रकार-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hansi-ke-prakar-ratna-priya/) - आओ देखें यार, हँसी के प्रकार - शिशु के निश्चल हास्य में , ईश्वर का अहसास । कोमल मन की शुचिता का, पल-पल हो आभास । बालपन की खिलखिलाहट , हर चिन्ता से मुक्त । खाने-खेलने की उमर , भोलेपन से युक्त । प्रेम का मूल स्वरूप है , होठों की मुसकान । मन के - [समय की कीमत-बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/samay-ki-kimat-bindu-agarwal/) - समय बड़ा ही मूल्यवान है, इसे व्यर्थ न खोना, समय पर जगना तुम सीख लो और समय पर सोना। हर पल की कीमत समझो तुम, यह लौट कभी न आए, जो समय का सम्मान करे, वह जीवन में सुख पाए। आलस दूर भगाया जिसने, मेहनत को अपनाया जिसने, अपने सपनों की मंज़िल को,अपने कदमों में - [सावन गीत - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sawan-geet-ram-kishor-pathak/) - नेह आप नैना भरे, लखते साजन पास। प्रेम मुग्ध दोनों मिलें, बहकें सावन मास।। मेघ बूँद जैसी गिरी, बही धरा सम गाल। तेज पुंज आभा दिखी, क्षणप्रभा सम चाल।। मोद पुष्प पाया खिला, महका गंध सुवास। प्रेम मुग्ध दोनों मिलें, बहकें सावन मास।।०१।। अंक साज दोनों लगें, ओष्ठ मौन कर आज। तृप्ति प्यास को थी - [हर घर तिरंगा-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/har-ghar-tiranga-kartik-kumar/) - हर घर तिरंगा लहराए, भारत माँ मुस्काए, जन-जन के मन में देशभक्ति, दीप नया जल जाए। केसरिया त्याग सिखाए, साहस की पहचान, श्वेत रंग दे शांति-संदेश, सत्य बने सम्मान। हरा रंग खुशहाली लाए, धरती का श्रृंगार, नीला चक्र निरंतर बोले—चलते रहो अपार। सीमा पर जो वीर खड़े हैं, उनको नमन हमारा, उनके त्याग और बलिदानों - [अहंकार की दुर्गन्ध](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/अहंकार-की-दुर्गन्ध/) - अहंकार की दुर्गंध पैसा, पावर घूम-घूमकर, सबके माथे चूम रहा है. जिसे छू लिया इसने, उसका मन ही झूम रहा है। धीरे-धीरे तन में उसके, ऐसा ज़हर समा जाता है, मानव का सीधा-सादा चेहरा, अहंकारी बन जाता है। अहंकार की बू ऐसी है, दूर-दूर तक जाती है. इत्र नहीं, यह दुर्गंध है, इंसानियत खा जाती - [जन गण मन हम गाते हैं-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jan-gan-man-ham-gate-hai-nitu-rani/) - तिरंगा दिवस मनाएंँगे जय- जय कार लगाएँगे, इस झंडे के नीचे हम सब शीश झकाएँगे ऊपर तिरंगा फहराएँगे। तिरंगा दिवस --------२। 22 जुलाई 1947 ई० को तिरंगा को अपनाया गया, ऐतिहासिक प्रस्ताव उसी दिन नेहरू जी द्वारा पेश किया गया। पिंगली वेंकैया ने तिरंगा का खूबसूरत डिजाइन दिया, केसरिया, सफेद,हरा रंग से तिरंगा को क्या - [टीचर्स ऑफ बिहार :कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teachers-of-bihar-kartik-kumar/) - ज्ञान की ज्योति लेकर निकले, टीचर्स ऑफ बिहार।हर बच्चे के सपनों का बनते हैं आधार।गाँव-गाँव में दीप जलाकर, शिक्षा का मान बढ़ाते।अज्ञान के गहरे तम को, मिलकर दूर भगाते।चाक, किताब और कलम से, भविष्य नया सँवारें।मेहनत, सेवा और समर्पण से, जीवन में रंग उतारें।हर कक्षा में गूँज रही है, आशा की मधुर पुकार।टीचर्स ऑफ बिहार - [हुकूमत के साथ-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hukumat-ke-sath-manu-kumari/) - वक्त के इशारों पर मुड़ जाती हैं दिशाएँ भी, मौन हो जाती हैं कभी सच्ची सदाएँ भी, हुकूमत के साथ बदल जाती हैं वफाएँ भी। जनता से जो करते थे,सुख-शांति के वादे, दिखती नहीं उन्हें अब जरूरतमंदों की व्यथाएँ भी, हुकूमत के साथ बदल जाती हैं वफाएँ भी। करते थे जो पहले विरोध, भ्रष्टाचारियों के - ["एक आह" - स्मिता ठाकुर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-aah-smita-thakur/) - मन ने चाहा बस इतना, कोई अपना इतने पास रहे। दो मीठे से बोल कहे, थोड़ा-सा विश्वास रहे। लेकिन सूनी राहों ने, हर उम्मीद छुपा ली है.. अंतर्मन की बातों ने, कैसी ये सोच बना ली है जिसको अपना समझ लिया, वो भी चुप-सा रहता है। मेरे मन का हर मौसम, बिन बारिश ही बहता - [विद्यालय-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vidhyalaya-kartik-kumar/) - विद्यालय ज्ञान का मंदिर है, भारत का यह सुंदर घर है। यहीं खिलते सपनों के फूल, यहीं बनते बच्चे अनमोल। कक्षा-कक्षा दीप जलाती, शिक्षा नई दिशा दिखलाती। गुरु का स्नेह अमृत बनकर, जीवन पथ को करता उज्ज्वल। किताबें देती नई उड़ान, मेहनत बनती सच्ची पहचान। खेल, योग और विज्ञान संग, गूँज उठे विद्यालय का रंग। - [हाफ सैटरडे-रामपाल प्रसाद सिंह अनजान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/half-saturday-rampal-prasad-singh/) - दुख की खाई भर गई, सुख स्वागत का भोर। बंध गई है आज वह, थी टूटी जो डोर।। थी टूटी जो डोर, बड़ा नुकसान किया है। क्या शिक्षक क्या शिष्य, बुरा परिणाम दिया है।। कहते कवि "अनजान", कहानी फिर दोहराई। पढ़कर निर्गत पत्र, भरी है दुख की खाई।। रामपाल प्रसाद सिंह अनजान - [स्वतंत्रता का अमर प्रण - उमेश कुमार सिन्हा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swatantrata-ka-amar-pran-umesh-kumar-sinha/) - स्वतंत्रता-दिवस आया है, हर आँगन उल्लास समाया है। केसरिया, श्वेत, हरा तिरंगा, गर्व से नभ में लहराया है। ज्यों ही यह पावन दिन आता, मन इतिहास में खो जाता। लहूलुहान उन वीरों का चेहरा, स्मृति-पटल पर छा जाता। त्याग, तपस्या, बलिदानों की अमर कहानी बोल उठी; भारत माँ की पावन मिट्टी वीरों की जय बोल - ["ज्ञानी ककहरा "-संतोष कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gyani-kakahara-santosh-kumar/) - क से कबूतर हम पढ़ते हैं, ख से खरगोश है, उजला - उजला, ग से गमला में पौधे लगाना, घ से घंटी जोर से बजाना , ड‌़ करता आराम, क, ख, ग, घ बच्चों में भर देता है "ज्ञान" । च से चरखी गोल- गोल घूमता, छ से छतरी आसमान चूमता, ज से जंगल जीवों - [सेवाभावी की अभिलाषा -उमेश कुमार सिन्हा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sewabhavi-ki-abhilasha-umesh-kumar-sinha/) - नहीं चाहूँ स्वर्णिम वैभव का मुझ पर राजतिलक हो, नहीं चाहूँ यश का सूरज मेरे ही आँगन उदित हो। नहीं चाहूँ ऊँचे पद का क्षणभंगुर अभिमान मिले, दीन-हृदय की करुण पुकार से मेरा मन अनजान मिले। नहीं चाहूँ भीड़ पुकारे—"यही महान, यही श्रीमान!", यदि पीड़ित की आँखों में फिर जीवित न हो विश्वास-प्राण। बस इतनी - [टीचर्स आफ बिहार-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teachers-of-bihar-kartik-kumar-2/) - जय गुरु चरण, ज्ञान भंडारा। शिक्षक बढ़ावैं देश उजियारा॥ टीचर ऑफ बिहार अभियान। जागृत करता शिक्षा सम्मान॥ नवाचार की ज्योति जलावै। हर विद्यालय राह दिखावै॥ सीख-सिखावन नई चलावै। बाल मनोहर फूल खिलावै॥ टीएलएम सुंदर बनवावै। रोचक शिक्षा सबको भावै॥ डिजिटल शिक्षा आगे लावै। नव पीढ़ी को दक्ष बनावै॥ खेल, कला, विज्ञान बढ़ावै। प्रतिभा का सम्मान - [सप्ताह के सात दिवस-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/saptah-ke-sat-diwas-kartik-kumar/) - Sunday – रविवार संडे रविदिन भानु प्रकाशा। जीवन भर दे ज्ञान सुपाशा॥ Monday – सोमवार मंडे सोम शशि शीतल छाया। शिव कृपा सब दुःख हरि जाया॥ Tuesday – मंगलवार ट्यूज़डे मंगल वीर हनुमाना। साहस दे, मिटि सकल विघ्नाना॥ Wednesday – बुधवार वेडनेसडे बुध बुद्धि निधाना। विद्या दे, करि जीवन नाना॥ Thursday – गुरुवार थर्सडे गुरु - [हमारा तिरंगा -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamara-tiranga-ashish-ambar/) - सब मिलकर संकल्प करें, हर घर में तिरंगा लहराये । आन , बान और शान हमारी , चारों दिशाओं में यह फहराये । सबसे सुन्दर, सबसे अच्छा । दुनिया में सबसे न्यारा है । सब मिलकर संकल्प करें, घर - घर में तिरंगा लहराना है । भारत की यह गौरव गाया, हर दिल की ये - [राखी का त्योहार-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rakhi-ka-tyohar-ashish-ambar/) - देखो सावन आकर कहता, अनुपम है रिश्तों का प्यार । भाई - बहन के प्रेम के रिश्ते, कैसा है यह अद्भुत त्योहार । अमर प्रेम है भाई - बहन का, यह कई जन्मों का है सार । बहन नहीं है जिस भाई का, लगता सूना है घर - संसार । प्यार दोनों के है मन - [दोस्ती-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dosti-ram-kishor-pathak/) - रिश्तों में है एक निराला, दोस्त हमारा। संग हमेशा जिसका मुझको, लगता प्यारा।। जिससे करते हम अपनी है, बातें सारी। जिसके साथ नहीं चलती है, दुनियादारी।। जिसके आँखों में रहता हूँ, बनकर तारा। रिश्तों में है एक निराला, दोस्त हमारा।।०१।। जिससे मिलकर सुख दूना हो, वही दोस्त है। कष्टों को जो आधी कर दे, सही - [नित्य राष्ट्र-हित रक्त बहेगा-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitya-rashtra-hit-rakt-bahega-ram-kishor-pathak/) - सर्व श्रेष्ठ वह भक्ति लहेगा। नित्य राष्ट्र-हित रक्त बहेगा। शौर्य बोध अब गौन नहीं हो। वीर-धीर तुम मौन नहीं हो।। शत्रु शोध पर, कौन? नहीं हो। राष्ट्र-भक्ति कद बौन नहीं हो।। प्राण हान कर शीश ढहेगा। नित्य राष्ट्र-हित रक्त बहेगा।।०१।। मातृभूमि पर जान लुटाएँ। भेद-भाव सब शीघ्र भुलाएँ।। नींद त्याग कर शस्त्र उठाएँ। देश-द्रोह जड़ - [मित्रता-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mitrata-ashish-ambar/) - मित्रता है प्रकृति की अनमोल उपहार, पूरे जग ने भी किया है इसे स्वीकार । है यह सब रिश्तों से अजब - निराली, देता मिसाल यह दुनिया सारी । खुशहाल है वह जिसे मिला सच्चा मित्र , मानों ईश्वर का वरदान रूपी उसका चित्र । धूप में जो साए की तरह साथ निभाए, दुःखी चेहरे - [ तारे-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tare-ratna-priya/) - आसमां में कितने तारे , तारे कितने सारे , टिमटिमाकर हमें जगाते , जुग्नू लगते प्यारे । सप्तऋषियों का समूह है , दिव्य अलौकिक तारा , यशस्वी बन चमक रहा है , नभ में यह ध्रुवतारा । तारे , ग्रह और उपग्रह हैं , नीले नभ के सैनिक , सदा समय पर हैं चमकते , - [दोस्ती-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dosti-ruchika/) - दोस्ती नही कभी आजमायी जाती, ये तो बस आपस में निभाई जाती। ऊंच नीच का फर्क नही है दोस्ती में बिना भेद के दोस्ती अपनाई जाती। सवाल जबाब से परे रहती दोस्ती, विश्वास एक दूसरे पर कमाई जाती। दोस्त दूर या पास रहते सदैव खास, दूरियां दिलों की इसमें मिटाई जाती। मुश्किल में ढाल बन - [मित्र-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mitra-ruchika/) - दवा,दुआ,इल्तिज़ा में उठे जिसका हाथ है, वह मित्र है जो जुदा होकर भी साथ है। जो मन की भित्ति को बिना कुंजी खोले, जो बातों को समझे ,नही कभी उसे तौले, जो हँसी में साथ दें और दर्द में पुचकार दे जो साथ निभाये मौन नही कुछ भी बोलें। वह मित्र है जो जुदा होकर - [राधा होने की शर्त- उमेश कुमार सिन्हा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/radha-hone-ki-shart-umesh-kumar-sinha/) - कान्हा बोले— "मेरी राधा सदा सुखी रहे, जग चाहे जो कुछ कहे। दुनिया की बातों की मुझको परवाह नहीं, बस राधा के मुख पर मुस्कान रहे।" राधा मंद-मंद मुस्काईं, बोलीं— "श्याम! कहना बड़ा सरल है, पर सहना बड़ा कठिन। यदि तुम मेरी जगह होते, तब समझते प्रेम का धन।" कान्हा हँसकर बोले— "राधे! ऐसा क्या - [पावस आया-ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pawas-aya-brauty-kumari/) - अंबर में जलधर, अवनी पर पावस आया। बह रहा शीतल समीर, कॉप रही है काया। पयोधर की गर्जना, दामिनी का दमक, मार्तंड सा दीप्तिमान। धरा पर झर रहा जलबिंदु, चहुंओर पानी - पानी। पावस आया पावस आया, अवनी का प्यास बुझाया। कृषक को हर्षाया, धरा पर हरियाली छाया। दादुर का टर्र- टर्र, कर्ण में गुंजायमान। - [गुरु पद वंदन- सारवती छंद वर्णिक - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/guru-pad-vandan-sarvati-chand-ram-kishor-pathak/) - गुरु पद वंदन- सारवती छंद वर्णिक - राम किशोर पाठक २११-२११-२११-२ वेद पुराण सभी कहते। ज्ञान प्रकाश वही गहते।। जो गुरु वंदन है करते। शीश सदा पग में धरते।।०१ पुण्य प्रसून सदा खिलता। मार्ग निदान उसे मिलता।। ईश झुकें पग में जिसके। चंदन है रज में जिसके।।०२।। दूर करे असमंजस जो। नूर भरे उर अंतर - [गुरु- दोहा मुक्तक - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/guru-doha-miktak-ram-kishor-pathak/) - गुरु- दोहा मुक्तक - राम किशोर पाठक ज्ञान चक्षु जो खोलते, हरे तमस मन ताप। कर प्रशस्त पथ शिष्य का, निश्छल मन रख आप। सर्व श्रेष्ठ सह सत्य का, गुरु दिखलाते मार्ग- गुरु पद की कर वंदना, शिष्य बनें निष्पाप।।०१ अंधकार से ले चले, जो प्रकाश की ओर। जिसके हर सानिध्य से, आती है नव - [गुरु वंदना.. डॉ स्वराक्षी स्वरा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/guru-vandana-swara/) - आओ कर लें गुरुओं का गुणगानगुरुओं से है अपनी ये पहचान नादान थे,अंजान थे,दे शिक्षा किया जीवन को आसानगुरुओं से है....... (1) बाधाओं से पार निकाला है,कदम कदम पे हमको संभाला हैजब भी आई जीवन मे दुविधाचुटकी में उलझन से निकाला है।। आओ सभी, कर लें अभीइन गुरुओं का सम्मानशीश झुकाएं और करें प्रणामआओ कर - [गुरु वंदना-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/guru-vandana-kartik-kumar/) - गुरु हैं ज्ञान के उजियारे, जीवन के सच्चे पथ-दर्शक प्यारे। अज्ञान का तम जो हर लेते, सत्य का दीपक घर-घर देते। गुरु का ऋण न कोई चुका पाए, उनकी कृपा जीवन महकाए। संस्कारों का अमृत बरसाएँ, सदाचार की राह दिखाएँ। गुरु ही जीवन की पहचान, गुरु से बढ़ता देश का मान। शिक्षा, सेवा, प्रेम का - [पावस- नील/विशेषक/विश्वगति छंद गीत वर्णिक - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pavs-neel-chhand-geet-ram-kishor-pathak/) - पावस- नील/विशेषक/विश्वगति छंद गीत वर्णिक - राम किशोर पाठक पावस में जब बूंँद धरा पर है गिरती। तृप्ति सभी कण व्याकुल को सहसा मिलती।। आतप चैन चुरा सबको हलकान किया। सूरज की किरणें जब जीवन हान किया।। तो जलधार गिरा नभ जीवन है भरती। पावस में जब बूंँद धरा पर है गिरती।।०१।। तृप्ति सुधा रस - [अब उषा की, बात करनी है-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ab-usha-ki-baat-karni-hai-ram-kishor-pathak/) - अब उषा की, बात करनी है- रतिरूप मात्रिक छंद गीत २५ मात्रा - राम किशोर पाठक अनुराग मन में, प्रीति जन में, नित्य भरनी है। छोड़ो निशा की, अब उषा की, बात करनी है।। पाथेय पथ पर, दीप बनकर, नैन ज्योतिष हैं। रखते हृदय में, बोध भय में, सर्व किल्विष हैं।। सबको समझना, क्यों उलझना, - [सावन का संदेश.. उमेश कुमार सिन्हा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sawan-ka-sndesh-umesh-kumar-sinha/) - मौसम ने संदेश सुनाया है,सावन धरा पर आया है।मानव, पशु, पक्षी सबने मिल,हर्षित मन से गाया है।नव पल्लव, नव हरियाली देख,मन का संशय दूर हुआ।धरती माँ की हरित चुनरिया,देख प्रकृति भरपूर हुआ।मोर नाचते पंख पसारे,कोयल मधुरिम गान सुनाए।वन-उपवन पुलकित होकर,सावन का अभिनंदन गाए।बादल भी संकल्प लिए हैं,धरती का उपकार करेंगे।अमृत-सी वर्षा बरसाकर,सूखे मन में प्राण - [शिक्षा का महत्व - मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiksha-ka-mahatov-mritunjay-kumar/) - शिक्षा का महत्व - मृत्युंजय कुमार हम शिक्षक हैं, हाँ! हम शिक्षक हैं, बच्चों के सच्चे मार्गदर्शक हैं। ज्ञान की ज्योति से राह दिखाते, स्नेह से उनका हाथ थामे आगे बढ़ाते। पढ़-लिखकर ये बच्चे बनेंगे महान, माता-पिता का बढ़ाएँगे सम्मान। देश-दुनिया में अपना नाम करेंगे, अपने गुरुजनों का सदैव मान करेंगे। शिक्षा जीवन का अनमोल - [हम दिखला देंगे जीकर के... स्वरा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hum-dikhla-denge-jikar-ke-swara/) - गीत*हम दिखला देंगे जी कर के* कुछ बूंद गिरे हैं आंसू केकुछ दावानल भी फूट गयाये कैसी ठोकर खाई हैसपना आँखों का टूट गयाहम फिर भी हँसते जायेंगे -2टूटे दिल को सी कर के सागर की मौजों से पूछोकितनी प्यासे बांकी हैबाधाओं से पार निकलतीनदियों की जो झांकी हैजीवन रस का पान करेंगे-2हम गरलों को - [समय-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/samay-ratna-priya/) - आनंद हो या कठिन समय , हर क्षण बदलता जाता है , सुख-दुःख जीवन में आते हैं , समय निकलता जाता है । बचपन की फुलवारी आती , घर-आँगन महकाती है , सुकोमल मन की कुसुम कली , नूतन दुष्टि विकसाती है , स्नेह-छाँव में मातु-पिता के , शिशु हर पल मुसकाता है , - [देश हमारा-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dash-hamara-ashish-ambar/) - कितना सुन्दर - कितना प्यारा , भारत जो है देश हमारा । तिरंगा है जिसकी शान, हैं हमें जिस पर अभिमान । जग के सारे देशों से न्यारा , मेरा देश मुझे है जान से प्यारा । वन - उपवन में हरियाली है, डाल - डाल पर छाई लाली है । नदियों की निर्मल पावन - [सपनों की उड़ान-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sapno-ki-udan-ashish-ambar-2/) - हम तो आगे बढ़ चलें हैं, सपनों की एक लिए उड़ान । लक्ष्य हमारा हम साध लिए हैं, राह में आए आँधी या तूफान । हमारी कश्ती के हम हीं है कप्तान, थाम ली हाथों में अपनी कमान । हम तो नही हैं इतने भी गुणवान, पर ठाना है बनानी , खुद की पहचान । - [किशोरी छंद गीत - पदांत गुरु-गुरु अनिवार्य - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kishori-chhand-geet-ram-kishor-pathak/) - किशोरी छंद गीत - पदांत गुरु-गुरु अनिवार्य - राम किशोर पाठक प्रेम पुष्प से जीवन को नित, महकाओ। कभी किसी के पथ में काँटे, मत लाओ।। चार दिनों का ही जीवन है, यह प्यारे। क्योंकर होड़ लिए फिरते हो, तुम सारे।। सबसे समता भाव लिए तुम, रम जाओ। कभी किसी के पथ में काँटे, मत - [हम,चाची,दादी,नानी रे... नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hum-naani-daadi-re/) - अ साए अनार आ साए आम होय छैइ साए इमली खट्टा होयछै रे, नुनू रे ई साए होयछै ईख सेअ जैसे चीन्नी ,शक्कर बनै छै रे।उ साए होयछै उल्लू सेअ उल्लू केअ दिन में नै सुझै रे नुनू रे ऊ साए होयछै ऊन सेअ जैसे शूटर , टोपी बनै छै रे।ऋ साए होयछै ऋषि सेअ - [स्वच्छता जागरूकता- कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swachhta-jagrukta-kartik-kumar/) - स्वच्छ रहेंगे, स्वस्थ रहेंगे। मिलकर आगे बढ़ते रहेंगे। घर-आँगन साफ़ बनाएँ। कूड़ा कभी नहीं फैलाएँ। विद्यालय सुंदर चमकाएँ। सबको स्वच्छता अपनाएँ। हाथों को साबुन से धोएँ। रोगों को हम दूर भगाएँ। साफ़ हवा में खेलें-कूदें। खुशियों के गीत सभी गाएँ। पेड़ लगाएँ, जल बचाएँ। धरती माँ का मान बढ़ाएँ। स्वच्छ सड़कें, सुंदर गाँव। यही हमारा - [मिट्टी मॉडलिंग-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mitti-modling-kartik-kumar/) - मिट्टी से सुंदर रूप बनाएँ। नई-नई कलाएँ अपनाएँ। हाथी, घोड़ा, फूल बनाएँ। गुड़िया, दीपक खूब सजाएँ। छोटे-छोटे खिलौने गढ़ें। मिलकर खुशियों के गीत पढ़ें। हाथों में आए नई कला। बढ़े आत्मविश्वास भला। मेहनत का फल मीठा होता। हर सपना सच में होता।प्र कृति से हम प्यार करें। मिट्टी का सत्कार करें। मिलकर सुंदर सृजन करें। - [कचरा पृथक्करण- कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kachra-prithakkaran-kartik-kumar/) - गीला-सूखा कचरा बाँटें। स्वच्छता की राह को थामें। हरा डिब्बा, नीला डिब्बा। सही जगह पर डालें कचरा। प्लास्टिक अलग, कागज़ अलग। रखो सफाई हर पल सब। गंदगी को दूर भगाएँ। सुंदर भारत हम बनाएँ। पेड़-पौधे मुस्काते हैं। स्वच्छ नगर को सजाते हैं। हर बच्चा यह बात बताए। कचरा कभी नहीं फैलाए। मिल-जुलकर अभियान चलाएँ। स्वच्छ - ["पहली कक्षा के बच्चे" कविता](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/पहली-कक्षा-के-बच्चे-कविता/) - पहली कक्षा के बच्चे, दिखते भोले- भाले, होते मन के सच्चे । पहली कक्षा के बच्चे, पहली कक्षा के बच्चे । पहली बार जब कक्षा में आता, रो-रो कर दुखड़ा सुनाता, कभी सुनाता पेट में दर्द, कभी दिखाता दांत में दर्द। घर जाने के खातिर, तरह-तरह के बहाने बनाता, बहाने नहीं चलता देख, मैडम जी - [शिक्षक तुम सृजन हो-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shikshak-tum-srijan-ho-kartik-kumar/) - शिक्षक तुम सृजन हो, ज्ञान की अमर निशानी हो, शिक्षक तुम विनाश की अकथ कहानी हो। अज्ञान के अंधेरों का तुम अंत कर देते हो, सत्य के दीप जलाकर जीवन भर देते हो। तुमसे ही संस्कारों की खुशबू महकती है, तुमसे ही हर मंज़िल की राह चमकती है। कलम तुम्हारा शस्त्र है, शिक्षा तुम्हारी शान, - [गाय-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gay-kartik-kumar/) - गाय हमारी माता है, सबसे प्यारी, सबसे न्यारी। दूध, दही और घी देकर, करती जीवन की रखवाली। सीधी-सादी, शांत स्वभाव की, सबके मन को भाती है। हर आँगन में सुख-समृद्धि की, मीठी खुशबू लाती है। बछड़े की वह सच्ची ममता, प्रेम का पाठ पढ़ाती है। सेवा, दया और करुणा का, सुंदर संदेश सुनाती है। हरी-हरी - [सूरज:कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/suraj-pahla-jiwan-data/) - सूरज पहला जीवनदाता, जग में लाता नया प्रकाश।सूरज दूसरा आशा बनकर, भर देता मन में उल्लास।पहली किरण जग को जगाती, देती कर्म का संदेश।दूसरी किरण मुस्काती आकर, मिटा देती हर क्लेश।अंधियारे को दूर भगाकर, ज्ञान की ज्योति फैलाता है।धरती, अम्बर और सागर को, स्वर्णिम रंग पहनाता है।मेहनत करने वालों का, सूरज सच्चा मित्र कहलाता।हर दिन - [एक छोटा बच्चा था-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-chhota-bachcha-tha-kartik-kumar/) - एक छोटा बच्चा था, मन से बड़ा सच्चा था। नन्हे-नन्हे उसके सपने, आँखों में उजियारा था। मीठी उसकी प्यारी बोली, सबको बहुत सुहाती थी। हँसी बिखेरता हर पल वह, खुशियाँ घर ले आती थी। माँ की बातें मानता था, पिता का मान बढ़ाता था। गुरुओं का आदर करता, ज्ञान का दीप जलाता था। पुस्तकों से - [विजय पताका-बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vijay-pataka-bindu-agrawal/) - मेहनत करने वालों को मिलती मंज़िल की राहें। मंज़िल स्वागत-गान करे, फैलाकर अपनी बाँहें। जिसने अपना बना पसीना, लहू बहाया होगा, उसने बंजर धरती पर भी, फूल खिलाया होगा। जिसने लोगों के तानों की परवाह कभी न की हो, जिसने खुद के ही दम पर परवाज़ हमेशा की हो। जिसके पास साहस और श्रम हो, - [मंजिल की तलाश-मुन्नी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manjil-ki-talash-munni-kumari/) - मंजिल की तलाश हैं, सपनो की आश है। राह भी कितनी कठिन है, फिर भी, मन में विश्वास है। समय ने मुझे सिखाया, धैर्य सबसे बड़ा दमदार है। जो हारकर भी मुस्कुराता है, वही असली जीत का हकदार है। मंजिल कितनी भी दूर हो, थकना मुझे मंजूर नही। पर्वत कितना भी ऊँचा हो, डरना मुझे - [श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम् राम किशोर पाठक:](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/divyay-washudeway-ramkishore-pathak/) - दिव्याय वासुदेवाय यशोदानंदनाय च।गीताज्ञान प्रदाताय श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम्।।आद्याय विश्वरूपाय गोपाय पालकाय च।लीलाधराय बालाय श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम्।।राधिकांगाय गोविंदाय भुवे काममोहिने।प्रियाप्रीतिकृते सख्ये श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम्।।अप्रमेयाय सूराय श्यामकाय वृकाय च।दिशे वृंदावनेशाय श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम्।।कर्मज्ञानप्रदातारं महाज्ञानप्रदायकम्।भुक्तिमुक्तिप्रदाताय श्रीकृष्णं प्रणमाम्यहम्।। - [बरसात- भ्रमर छंद गीत राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/brasat-bhramer-chhand-ramkishor-pathak/) - ११-१६यति पूर्व पश्चात् पदांत गुरु लघु अनिवार्यजन-जन में अति हर्ष, दर्श कर नभ मेघा घनघोर।शीतल हुई बयार, पपीहा दादुर करते शोर।।बिसरा आतप दंश, चला है पावस लेकर नेह।तन का निर्झर श्वेद, त्याग कर भागा सारा देह।।शांत हुए सब धूल, पड़ी जो रिमझिम उनपर बूँद।जैसे उर आनंद, ग्रहण करते हों आँखें मूंद।।आते ही बरसात, बना सबका - [नमामि वानरेश्वरम् राम किशोर पाठक:](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nmami-wanreshwarm-ramkishor-pathak/) - चिरञ्जीवी महाज्ञानी वेदवेदाङ्गपारगम्।क्षेत्रपालं महावीरं नमामि वानरेश्वरम्।।जगदात्मा पुरारातिं नादरूपं यतीश्वरम्।मारुताय महोदारो नमामि वानरेश्वरम्।।अञ्जनाप्राणलिंगाय वायुवंशोद्भवाय च।कम्बुकंठाय लम्बोष्ठं नमामि वानरेश्वरम्।।अप्रपञ्चाय बुद्धाय भक्ताङ्ग सहनायकम्।रुद्ररूपाय भद्राय नमामि वानरेश्वरम्।।समीरतनयो धीरा मेघजीवनकारकम्।भक्ताय भयहारिण्यं नमामि वानरेश्वरम्।। - [बिंदु अग्रवाल-ऐ लड़कियों सुनो](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बिae-ladkiyon-suno-bindu-agrawal/) - ऐ लड़कियों सुनो...! तुम खुद अपनी पहचान बनो, तुम खुद अपना अरमान बनो, न ढूँढ़ो कहीं किनारा तुम, तुम खुद अपना आसमान बनो। न चूड़ी, कंगन, हार चुनो, तुम साहस से श्रृंगार करो। आँखों में नूतन ख़्वाब बुनो, तुम एक नया नवगान बनो। तेरे दम से ही यह धरती है, तेरे दम से अंबर चमक - [शनिदेवं नमाम्यहम्..राम किशोर पाठक:](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shanidevay-namh-ramkishor-pathak/) - धनरूपाय सौम्याय महनीयगुणात्मने।शर्वाय नीलवर्णाय शनिदेवं नमाम्यहम्।। विरूपाक्षाय वेद्याय आयुष्यकारणाय च।भावुकदाय श्रेष्ठाय शनिदेवं नमाम्यहम्।। कालदाय कवींद्राय गोचराय कलाय च।त्रिगुणाय त्रिनेत्राय शनिदेवं नमाम्यहम्।। अचञ्चलाय नित्याय वीतरोगभयाय च।विधिरूपाय वीराय शनिदेवं नमाम्यहम्।। भेदास्पदस्वभावाय कूर्माङ्गाय घनाय च।खद्योताय वरिष्ठाय शनिदेवं नमाम्यहम्।। - [आदित्याय नमो नमः... राम किशोर पाठक:](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/adityay-namo-namah-ramkishor-pathak/) - अलोपकायः आर्काय एकचक्रधराय च।खगेश्वराय कृष्णाय आदित्याय नमो नमः।।अजिताय तमोहत्रे त्रिपुरेशाय डिण्डिने।नुन्नाय नरनाथाय आदित्याय नमो नमः।।पुटेश्वराय सूर्याय धुरीनाय पुरारये।घटाकराय गांताय आदित्याय नमो नमः।।कपिलाय जिनेंद्राय नेत्रे पद्माश्रयाय च।प्रीतिप्रियाय प्लुष्टाय आदित्याय नमो नमः।।यज्ञेश्वराय यान्ताय योद्ध्रे लोमशाय च।सर्वपापहरं देवं आदित्याय नमो नमः।। - [आया सावन-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aya-sawan-ashish-ambar/) - झूम - झूम कर सावन आया, संग में कितने खुशियाँ लाया । धरती पर है छायी हरियाली , देख बगीचा खुश हैं माली । बगियों में भी झूलें सजी हैं, मन - उपवन में प्रीत जगी है । मोर - पपीहे वन में नाचे, किसानों के भी मन हर्षाये । बच्चों की हमजोली आई, मिल - [अनमोल तेरा प्यार है - रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/anmol-tera-pyar-hai-ratna-priya/) - ओ प्रिय ! तेरी बाँहों में मेरा पूरा संसार है, बिन मोल ही बिक जाऊँ मैं, अनमोल तेरा प्यार है। हो हाथों में हाथ तेरा, जिस पल तुझे पुकारूँ मैं, जीवन भर का साथ हमारा, अपलक तुझे निहारूँ मैं, हर मुश्किल में संघर्षों में, कदम-कदम एक साथ हों, दुःख के क्षण हों, या सूखे के - [बेटियांँ- बाला छंद गीत वर्णिक राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/betiyan-bala-chhand-ram-kishor-pathak/) - बेटियांँ- बाला छंद गीत वर्णिक राम किशोर पाठक बेटियों को पड़ेगा बचाना। भेड़ियों से भरा है जमाना।। सृष्टि को जो चलाती रही है। प्यार सारा लुटाती रही है।। रूप माँ की धरी भी वही है। पालती पोषती जो रही है।। है छला भी उसे भोग जाना। बेटियों को पड़ेगा बचाना।।०१।। पूजते लोग क्यों नारियों को। - [अररिया की धरती बहुत याद आएगी -श्री संजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/araria-ki-dharti/) - लूना, बखरा और परमार की धार, सदियों से जिसके पाँव पखार रही है। अररिया की धरती बहुत याद आएगी। परती परिकथा की ऊसर ज़मीन, 'मैला आँचल' की आँचलिक कथा, आँचलिक कथाकार, शिल्पकार रेणु की 'ठेस', कला एवं सामाजिक प्रतिष्ठा-बोध लिए जीता निर्धन शिल्पकार सिरचन की कथाभूमि— अररिया की धरती बहुत याद आएगी। सुंदरनाथ धाम का - [मेरा किसान-संजीत कुमार निगम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mera-kisan-sanjit-kumar-nigam/) - जब मंडराने लगे आसमान में बादल काले-काले, कंधों पर कुदाल लिए खेतों की राह चले मतवाले। जब बरसने लगीं बूँदें झम-झम, बिछड़ी उखाड़ने लगे किसान हरदम। बारिश की बूँदें मोतियों-सी चमकती हैं, धरती की सूनी गोद में आशा बन बरसती हैं। हर बूँद का मोल किसान ही पहचानता है, अपने पसीने से उसका पूरा हिसाब - [डर-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dar-ruchika/) - अपने ही मन में पनपते कुछ ख़्याल, कुछ परिस्थितियां जन्म लेती, औऱ जन्म लेते कुछ विचार थाम लेते हमारे बढ़ते कदमों को और रोक देते हर बार कोई अनहोनी की आशंका डर ये कैसा उठता हर बार। तमाम उजालों के बीच अँधेरा हावी होता जाता रास्ते भी पथरीले लगते चुभते हर बार घुटन बढ़ती रहती - [युद्ध नहीं जिनके जीवन में-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yuddha-nhi-jinke-jivan-me-kartik-kumar/) - युद्ध नहीं जिनके जीवन में, वह तो बड़े अभागे होंगे। या तो प्रण को तोड़े होंगे, या तो रण को छोड़े होंगे।। जीवन का हर श्वास समर है, हर पल नई चुनौती है, वीरों की पहचान सदा ही, साहस, श्रम और दृढ़ता होती है। जो अंगारों पर चलते हैं, वे ही शीतल छाँव रचाते, जो - [बादल-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/badal-ashish-kumar/) - छोटी - छोटी बूँदें लाएँ, ये मतवाले बादल , श्वेत - स्लेटी , नीले - पीले , भूरे - काले बादल । कैसे - कैसे रूप बदलते , करते जादू - मंतर, हाथी जैसे कभी मचलते , गरजन करें निरंतर । इधर - उधर घोड़ों - से दौड़े, चाबुक वाले बादल, छोटी - छोटी बूंदें - [पर्यटन - ए - बिहार-रवि कुमार ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/paryatan-e-bihar-ravi-kumar/) - हाँ मैं बिहार हूँ पर्यटनों का भरमार हूँ , इतिहासों की पुकार हूँ धर्मों का प्रयाग हूँ । माता सीता की अवतरण का गवाह हूँ , जारसंध की विशाल मगध का मैं ही प्रमाण हूँ । चलो सभी मिल कर करें बिहार पर्यटन का काम, पधारो गया जी धाम यहाँ पद चिन्ह हैं हरी के - [पावस है आया अभी-अभी-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pawas-hai-aya-abhi-abhi-ram-kishor-pathak/) - पावस है आया अभी-अभी। है मन हर्षाया अभी-अभी।। बादल बाशिंदे यहाँ-वहाँ। हैं गिरते बूँदे यहाँ-वहाँ।। है सरि मुस्काई यहाँ-वहाँ। है खुशियाँ छाई यहाँ-वहाँ।। हर्ष मही छाया अभी-अभी। पावस है आया अभी-अभी।।०१।। आतप है भागा जहाँ-तहाँ। शैशव है जागा जहाँ-तहाँ।। है चहका कागा जहाँ-तहाँ। पाहुन का धागा जहाँ-तहाँ।। मुग्ध हुई काया अभी-अभी। पावस है आया अभी-अभी।।०२।। - [शिवप्रिया नमोस्तुते।](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shivpriya-namostute-ramkishor-pathak/) - आद्यशक्त्या परमाद्या जगत्स्रष्टा तपस्विनी।सर्वव्यापिणी शैलसुता शिवप्रियायै नमोस्तुते।।परापरा महामायै महाशक्त्यै पद्मलोचना।दुर्गायै दुर्गतिनाशिन्यै शिवप्रियायै नमोस्तुते।।महाविद्या महामाया सर्वसौभाग्यवर्धिणी।स्थितिसंहारकारिण्यै शिवप्रियायै नमोस्तुते।।कपालकुण्डलायै नित्यायै सत्य मार्ग प्रबोधिनी।श्वासोच्छवासगत्यै शिवप्रियायै नमोस्तुते।।स्वाहा स्वधा रूपिण्यै चामुण्डा भुवनेश्वरी।सर्वपापहारिण्यै शिवप्रियायै नमोस्तुते।।रचनाकार:- राम किशोर पाठक: - [](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sooraj-ugle-aag/) - विषय -सूरज उगले आग सूरज उगले आग खेत में सूख रहे सब्जी साग, हरे -भरे बगीचों में जैसे लग गये हैं आग। लोग सड़क पर छाता लेकर चलते रखकर अपने माथे पर पाग, मुँह को कपड़े से ढंकते धूप से कहीं पर जाए न दाग। गर्मी में लू से बचने को खा रहे बनाके हरी - [विद्यार्थी रहूँगा- गीतिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vidhyarthi-rahunga-ramkishor-pathak/) - २१२२-२१२२-२१२२मैं अनवरत एक शिक्षार्थी रहूँगा।कर्म में तल्लीन पुरुषार्थी रहूँगा।।वक्त ही सबको सिखाता है यहाँ पर।वक्त का मैं खास विधार्थी रहूँगा।।ज्ञान के जो हैं धनी उनसे सदा ही।मार्ग नूतन प्राप्ति अभ्यर्थी रहूँगा।।प्रेम सब मुझसे करें यह चाहता हूँ।नेह का तो मैं सदा स्वार्थी रहूँगा।।हो सके मुझसे न आहत अन्य कोई।कर्म का रख ध्यान परमार्थी रहूँगा।।रचनाकार:- राम - [श्रीराम शरणं प्रपद्ये](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shri-ram-stuti/) - कौशल्यासुतं राजीवलोचनं आजानुबाहु हरिम्।सौम्याय धीराय श्रीराम शरणं प्रपद्ये।।कुलभूषणाय पुरुषोत्तमाय रघुनंदनंदन नंदिताय।नित्याय शुद्धाय शिवप्रियाय श्रीराम शरणं प्रपद्ये।।मनोहरं मुखारविंद हस्ते धनुसायकम्।मायाविमोहितं सीतापति श्रीराम शरणं प्रपद्ये।।सुरसंतहिताय ब्रह्मस्वरूपाय लीलाधराय।जगतांप्रतिपालकाय श्रीराम शरणं प्रपद्ये।।सर्व दोष निकंदनाय भवभयभंजनाय च।शत्रुदलनाय सुखप्रदाय श्रीराम शरणं प्रपद्ये।।रचनाकार:- राम किशोर पाठक: - [पर्यावरण संरक्षण - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-20/) - पर्यावरण संरक्षण पर्यावरण है हमारा जीवन आधार, जिससे सुरक्षित है और घर संसार। मिट्टी, जल, वायु, अनल के संग, आसमान में छाए इंद्रधनुषी रंग। पेड़ बड़े उपकारी होते, कड़ी धूप में छाया देते। नदियां, पर्वत,वन और झरनें, इनके उपकार का क्या हीं कहने। पक्षी के कलरव पवन के शोर, खींचें सबको संगीत की ओर। हम - [Nothing teaches you better](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nothing-teaches-you-better/) - Nothing Teaches you Better Nothing teaches you better than these fives The years The fears The tears The jeers The peers. - [पेड़ लगाओ-मुन्नी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ped-lagao-munni-kumari/) - पेड़ लगाओ, पेड़ लगाओ पर्यावरण को स्वच्छ बनाओ प्रदूषण को दूर भगाओ धरती माँ का मान बढ़ाओ । पेड़ लगाओ,ऑक्सीजन पाओ पर्यावरण से जीवन स्वस्थ बनाओ हर आँगन में पेड़ लगाओ हरा-भरा संसार सजाओ । एक पेड़ सौ पुत्र समान यहाँ न करो जंगल वीरान सब मिल पूरा करो अरमान यहीं हैं प्रकृति का सम्मान - [NTA का कमाल-मुन्नी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nta-ka-kamal-munni-kumari/) - वाह रे, एन टी ए तु ने कर दिया कमाल, नीट पेपर लीक पर मचा बवाल, पैसे वालो ने कर दिया धमाल, नेताओं का हाल हुआ बेहाल । बच्चों के भविष्य के साथ हुआ खिलवाड़, आज नीट प्रश्न पत्र बना कबाड़, अमीरो ने लगाया डॉक्टर बनने का जुगाड़, गद्दारों ने देश को दिया उजाड़। देखो - [You Meet the People](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/you-meet-the-people/) - you Meet the people You meet the people you are meant to meet not by accident not by chance but by something your soul agreed to keep Some will come to heal you Some will come to break you but the ones who stays through both are the ones who are written in your heart. - [किस कारण तुम हो चुप रहते-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kis-karan-tum-ho-chup-rahte-ram-kishor-pathak/) - कुछ तो तुम मुझसे अब कहते। किस कारण तुम हो चुप रहते।। मन आज विकल हो धधक रहा। तुम दूर अगर हो झिझक रहा।। अपनापन अब बोझिल लगता। उर अंतर मुझको यह ठगता।। पर क्यों सब-कुछ हो तुम सहते। किस कारण तुम हो चुप रहते।।०१।। अपनी बस हर चाहत तुमसे। कहती तुम अब आहत हमसे।। - [बादल-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/badal-ram-kishor-pathak/) - बदन ताप से मैं व्याकुल हूँ। उनके दर्शन को आकुल हूँ।। दर्श बिना हो जाऊँ पागल। क्या सखि! साजन? न सखी! बादल।।०१।। आस लगाए तकती रहती। विरह आग में जलती रहती।। मेरे मन बसता एक ऋषभ। क्या सखि! साजन? न सखी! नीलभ।।०२।। तृप्ति वही बेचैन हिया की। प्राण बचाए कौन जिया की।। उसके बिना हुई - [लक्ष्य-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/lakshya-ratna-priya/) - लक्ष्य न हो आँखों से ओझल, साहस हम दिखलाएँगे । उठते, गिरते और सँभलते, यूँ ही चलते जाएँगें । चरैवेति के महामंत्र से, जन-जन का उत्थान हो, लगन, परिश्रम, आत्मिक बल से, व्यक्तित्व का निर्माण हो, अपने बल से मिली सफलता, व्यक्ति को चमकाती है, धैर्य, धीरज, नैसर्गिक गुण से, जीवन सहज बनाती है, सहज, - [पिता-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pita-ruchika-2/) - उम्र के पायदान दर पायदान चढ़ते पिता पहले से थोड़ा अधिक सुस्ताते हैं मगर जिद पर अड़े हुए वह उम्र को धता बनाने की कोशिश में अधिक आत्मविश्वासी बन जाते हैं। अनुभवों के पिटारे से रोज दो चार नए अनुभवों से रूबरू करवाते पिता थक कर भी नही थकते धुन के पक्के,किस्मत बदलते अपने कर्मो - [योग भगाए रोग-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-bhagaye-rog-nitu-rani/) - सुबह-शाम करिये योग डरकर भागेगा रोग, कोरोना हो या कोई महामारी योग से भागे सभी बीमारी। सुबह-शाम की हवा लाखों की दवा , ये कथन है बड़े बुजुर्गो का आप सभी इसको करके तो आजमा। ऋषि मुनि न कभी हुए बीमार योग जड़ी -बूटी से किये बीमारी का उपचार, सुबह-शाम किये योगासन और दिये शिष्यों - [पिता-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pita-girindra-mohan-jha/) - परमपिता परमेश्वर हैं, हम सब हैं उनकी संतान, उन्हीं की अनुकम्पा से, हम सब सदा क्रियमाण । सबसे पहले परमपिता परमात्मा को प्रणाम, उन्हें वन्दन, उनका स्तवन, पुण्यप्रद उनके नाम।। पिता अनुशासन है, पिता उदाहरण है, पिता ही प्रेरणा है, पिता दुख निवारण है, पिता अपने संतानों का साहस है, एक शब्द में कहूं तुलसी - [मेरे पिता-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mere-pita-ashish-ambar/) - कभी अभिमान है तो , कभी अरमान है पिता , कभी धरती है तो , कभी आसमान है पिता । जन्म दिया है अगर माँ ने हमको, फिर भी जग में हमारी पहचान है पिता । मेरा साहस , मेरी इज्जत ,मेरे सम्मान हैं पिता, मेरी ताकत , मेरी पूँजी , मेरे जहान हैं पिता - [पिता-ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pita-beauty-kumari-2/) - जिम्मेदारियों की बोझ लिए कंधे पर, हर मुसीबत में मुस्कान है पिता। हमारा अरमान हमारी पहचान, धरती अंबर और जहान है पिता। जिसके तले परिवार को मिलता छांव वह बरगद का पेड़ है पिता। स्वयं से ज्यादा संतान की कामयाबी चाहता एक ऐसा इंसान है पिता। राह भटक जाए सच्चा राह दिखाता, गिर -गिरकर उठना - [पिता का सम्मान-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pita-ka-samman-manu-kumari/) - पिता संग मानव का जीवन, होता सखे निहाल है, बिना पिता के मां- बच्चों का ,होता सुन लो बुरा हाल है। पिता है तो रोटी,कपड़ा और सिर पर मकान है , पिता के कारण हीं होता मानवता का ज्ञान है। पिता से हीं मेहनत, त्याग, संघर्ष की कहानी है, पिता हमारे रक्त में ,दया,करूणा की - [पिता बिन सूना सब संसार-नीतू रानी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pita-bin-suna-sab-sansar-nitu-rani/) - पिता है तो घर है जिसको पिता नहीं है वो घर बेघर है, जिसको पिता है उसके पास रोटी है , मकान है,सम्मान है और भगवान है जिसके पास पिता नहीं है उसके पास कुछ नहीं सिर्फ अपमान हीं अपमान है। पिता वो छत हैं जिसके छत्रछाया में सभी परिवार खुशी से मगन रहते हैं, - [योग-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-ram-kishor-pathak-2/) - रोग-मुक्त निज तन पाइए। योग सहज जब अपनाइए।। दूर भगाओ आलस्य को। खाना उत्तम है शस्य को।। सुबह टहलना व्यायाम है। करना भी प्राणायाम है।। निज मन को यह समझाइए। योग सहज जब अपनाइए।।०१।। तन से मन को है जोड़ना। व्याधि अंश को है तोड़ना।। करना प्रतिदिन अभ्यास है। यह योग बहुत ही खास है।। - [योग का महत्व-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-ka-mahatv-ashish-ambar/) - नित्य जो करता मानव योग , रहे जीवन में सदा निरोग । ऋषि - मुनियों ने प्रतिपादित किया, सत्य में वरदान कहलाता है योग । चुस्ती - फुर्ती वह दिखलाए, आलस उसके पास न आए । जिसने भी अपनाया योग , केवल यह नही है संयोग । सूर्य-नमस्कार हो या अनुलोम - विलोम, इसकी महिमा - [योग- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-ram-kishor-pathak/) - बात मेरी मानकर अब आइए। योग जीवन अंग है अपनाइए।। जोड़ने की सीख सबमें यह भरे। स्वस्थ तन दे रोग यह सारी हरे।। शुद्ध भावों को हमारे मन गढ़े। दिव्यता का बोध अंतस् में मढ़े।। है कठिन यह सोच मत घबराइए। योग जीवन अंग है अपनाइए।।०१।। रक्त शोधन कर प्रखर तन तेज दे। अस्थियाँ अवसाद - [योग-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-ratna-priya/) - सहज, सरल, स्वभाव मधुर, मुख पर हँसी का योग हो, स्वस्थ तन हो, मन प्रसन्न, ऐसा अनुपम संयोग हो। स्वस्थ जीवन का आधार, सशक्त तन-मन होता है, हो शुद्ध भाव अंतस में तो, दिव्यता को बोता है, हो रोग व पीड़ा शमन यह, रामबाण उपचार है, यह पतञ्ञलि का अष्टांग योग, ऋषि का उपकार है, - [वृक्ष- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vtiksh-ram-kishor-pathak/) - वृक्ष है जीवन हमारा, क्यों किया इसका विनाश। कर रहे हो फिर भला क्यों, शुद्ध संचारी तलाश।। ताप जब बढ़ता धरा का, भूल आती याद सर्व। थें यही अपनी धरा पर, पूर्व धारे खास गर्व।। हो विरानी आज धरती, कर रही सबको निराश। वृक्ष है जीवन हमारा, क्यों किया इसका विनाश।।०१।। काट जंगल को हमीं - [जल ही जीवन है-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jal-hi-jiwan-hai-ram-kishor-pathak/) - जल ही जीवन विचार लाओ। अपनी धरती निहार आओ।। प्यासे कब-तक भला सहेंगे। दिन कितने हम बचे रहेंगे।। धरा-ताप जब हमें जलाए। प्राण हमारे यही बचाए।। कहते ईश्वर जल बरसाओ। जल ही जीवन विचार लाओ।।०१।। खाना पीना अरे नहाना। तरुवर होगा हमें लगाना।। बिना नीर के नही गुजारा। पग-पग पर दे यही सहारा।। हो दूषित - [अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/antarrashtriya-yig-diwas-amarnath-trivedi/) - आत्मचिंतन से निकली ऊर्जा ज़ब भोग का नाश कराती है । तभी योग उमड़ता जीवन में , यह शरीर से रोग शोक भगाती है । सिर्फ बैठे रहकर हम जीवन खोते, तभी जिंदगी में रोग लगाते हैं । आएँ सब मिल इसे सदा अपनाएँ , योग से ही तन मन स्वस्थ बनाते हैं । योग - [शशि नभ मंडल, आए कैसे-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shashi-nabh-mandal-aaye-kaise-ram-kishor-pathak/) - शशि नभ मंडल, आए कैसे? नित छवि नूतन, पाए कैसे? हरपल शीतल, दे अंजोरा। तन रखता निज, गोरा-गोरा।। हम सबका वह, कैसा मामा? विधु उपमा पर, क्यों हंगामा? रस निशिनायक, लाए कैसे? शशि नभ मंडल, आए कैसे?०१।। दिनभर आखिर, सोते क्यों हैं। वृहद कभी तन, छोटे क्यों हैं। धवल कलाधर, कैसे तोलूँ? अमर सुधाकर, क्यों - [गर्मी आई-ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/garmi-aai-beauty-kumari/) - गर्मी आई लू बरसाई , सूरज की तेज तपिश । धरती पर छाई लू की कहर, निकल ना पाते घर से दोपहर । मैदानों में है धूप की लहर , लेते सहारा छतों का मगर । चिलचिलाती धूप में सूना पड़ा डगर, गात से बह रहा पसीना धराधर। गर्मी की छुट्टी है मगर , मस्ती - [प्रज्ञा निखार- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pragya-nikhar-ram-kishor-pathak/) - ले ली है अब अपनी, प्रज्ञा निखार। रहते हैं हम होकर, सबसे उदार।। क्षमा दान दूँ अब, तजकर विलाप। रखना सहज सभी से, मुझको मिलाप।। सबको गले लगाऊँ, यह है विचार। ले ली है अब अपनी, प्रज्ञा निखार।।०१।। रहता हर-पल जैसे, मैं हूँ अबोध। करता नहीं किसी का, कोई विरोध।। भाव सहज मैं करता, प्रेमिल - [पावस-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pawas-ram-kishor-pathak/) - नैन व्यथित थें दर्श हुआ है। मिलकर मुझको हर्ष हुआ है।। अब पूनम सी लगे अमावस। क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०१।। मुझे जलाती थी पुरवाई। राह निरखते दिवस बिताईं।। मिलकर उसने दी है ढाढस। क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०२।। विरह आग में मैं जलती थी। अक्सर दिन रैन मचलती थी।। उनसे मिली बनी - [हमें करना है प्रेम-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamen-karna-hai-prem-ram-kiahor-pathak/) - हमें करना है प्रेम। करे जो सबका क्षेम।। कुटिल कुत्सित सह क्रूर। हुए सब हमसे दूर।। नहीं प्रेमिल सहवास। नहीं कोई है खास।। सभी की चाहत हेम। हमें करना है प्रेम।।०१।। अरे मूरख आकाश। करो मत सुख का नाश।। यहाँ झूठा विश्वास। रखो मत कोई आस।। बदलना होगा नेम। हमें करना है प्रेम।।०२।। क्षमा को - [बाल श्रम नहीं, पढ़ने की उम्र है-राहुल कुमार रंजन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baal-shram-nhi-padhne-ki-umra-hai-rahul-kumar-ranjan/) - खेलने-कूदने की उम्र है, अभी बढ़ने दो, नन्हे हाथों में काम नहीं, सपने रहने दो। कंधों पर बस्ते सजने दो, ज्ञान के दीपक जलने दो। हँसी-खुशी से बचपन बीते, उनको आगे बढ़ने दो। कलम पकड़ें, किताबें पढ़ें, जीवन का आधार गढ़ें। मजबूरी की जंजीरों से, उनको मुक्त निकलने दो। देश का उज्ज्वल भविष्य हैं ये, - [हितोपदेश-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hitopdesh-girindra-mohan-jha/) - कर्त्तव्यपरायण और व्यवहारकुशल बनना, स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ-ईमानदार बनना, निरंतर सीखना, जिज्ञासु बनना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना, प्रगति के लिए सदा संघर्ष करना, तार्किक दृष्टिकोण रखना, अपने काम से सदा प्रेम करना, उसे लगन, निष्ठा से करना, उच्च ध्येय को लक्ष्य बनाना, प्रतिबद्धता से उसे प्राप्त करना, बड़े कार्यों में स्वयं को निमित्त मानना, और यश - [पिता-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pita-ruchika/) - पिता एक सुरक्षा कवच इस समाज में जो ढाल बन जाते हर मुश्किल में। पिता मार्गदर्शक एक सलाहकार जो सही गलत का फर्क बतला मार्ग दिखलाते। पिता एक खजांची जब भी जरूरत पड़ी धन की वह अपने बचत से हाथ पर धर जाते। बीमारी में चिकित्सक के पास ले जाना हो या कोई भी परीक्षा - [जीना तो इसी का नाम है-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jina-to-isi-ka-naam-hai-girindra-mohan-jha/) - कर्त्तव्यपरायण और व्यवहारकुशल बनें हम, सदा-सर्वदा स्वयं के प्रति ईमानदार बनें हम, जीना इसी का नाम है। प्रगति पथ पर, सतत बढ़ते रहे, चलते रहे, जरूरत पड़ने पर मदद दूसरों की करते रहे, जीना इसी का नाम है । सदा खुश रहें, हंसते और हंसाते रहे, शुभ और श्रेष्ठ कार्यों में जीवन बिताते रहे, जीना - [सपनों की उड़ान-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sapno-ki-udan-ashish-ambar/) - हम तो आगे बढ़ चलें हैं, सपनों की एक लिए उड़ान । बस लक्ष्य अपना हम साध लिए हैं, चाहे आँधी आए या तूफान । हमारी कश्ती के अब हम ही हैं कप्तान, थाम ली हाथ में जिसने अपनी कमान । हम इतने भी तो नही हैं गुणवान, पर हमने ठाना , खुद की बनानी - [नन्हे फूल-रामपाल प्र०सिंह अनजान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nanhe-fool-rampal-prasad-singh-anjan/) - विद्यालय के बाग बगीचे।आओ हम सब मिलकर सींचे। मुन्नी-मुन्ना कोमल प्यारे।आँगनबाड़ी के हैं सारे।। इनको कक्षा में ले जाओ।ज्येष्ठ तुम्हीं हो मार्ग दिखाओ।। आए हैं आधार बनाने।जगती की गति आज बढ़ाने।। उम्र सरीखे पढ़ने आए। खेल प्रथम फिर आए जाए।। रोको मत इनको बढ़ने दो। शिक्षा की सीढ़ी चढ़ने दो।। होंगे एक दिवस ये छत - [मजदूर की मजबूरी-बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/majdoor-ki-majburi-bindu-agarwal/) - वो चल पड़ा अपने कर्म के पथ पर लिए अपने हुनर का नूर, अपने घर परिवार से दूर किसी अनजान के बीच सुदूर। किसी शहर में काम खोजता दर-दर भटकने को मजबूर, जिसकी कोई पहचान नहि, मान नहि, सम्मान नहि कहलाता है वो मजदूर। कई अट्टालिकाओं की नीवं उसने है रखी, कई नहरों को खोद - [Human emotions -Ashish k Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-k-pathak-k/) - Human Emotions human emotions are unique The peak of happiness is crying The peak of sadness is laughing and the peak of anger is silence The peak of tears is relief The peak of laughs are warnings The peak of parting is smile The peak of silence is Goodbyes Expect those emotions Upkeep those emotions - [रे ! मानव -विजय शंकर ठाकुर ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/re-manav-vijay-shankar-thakur/) - रे !मानव ,तू मानव बन । तू साध, अपने मन,वचन और कर्म, समझ ले, इस जीवन का मर्म, अधर्म मत,धर्म कर। तू शूल न बन, जीवन का मूल समझ । दिखा संवेदनाएं, समस्त जीवों के प्रति, तू जान ले, जीवात्मा, परमात्मा का अंश है। - [बस यूं ही-विजय शंकर ठाकुर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bas-yun-hi-vijay-shankar-thakur/) - गाय -बैलों को भूलकर, कुत्ते के पीछे भागते, गंवार से संभ्रांत बनने की चाहत में। भूलते बिसरते अतीत ! खुले दरवाजे से ,अहाते में सिमटकर, पेड़ों को काटकर, गमले तक अटककर, प्राणवायु ढूंढ़ रहे अस्पतालों में, ढूंढ रहे चैन ,सुकून और शांति , छोड़करअपने,परायों की खोज में ! परिस्थितिके झंझावातों से जूझकर , खट्टे मीठे - [ज्ञान का दीपक शिक्षक - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gyan-ka-dipak-shikshak-kartik-kumar/) - ज्ञान का दीप जलाता शिक्षक, फिर भी दुख ही पाता शिक्षक। बच्चों को उजियारा देता, अपने मन को समझाता शिक्षक। सुबह-सवेरे विद्यालय आता, कर्तव्य पथ पर बढ़ता शिक्षक। कागज़, रजिस्टर, आँकड़ों में, अक्सर उलझा रहता शिक्षक। सम्मान की बातें सब करते, पर सम्मान न पाता शिक्षक। देश का भविष्य गढ़ने वाला, चिंता में दिन बिताता - [शिक्षा का मंदिर - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiksha-ka-mandir-kartik-kumar/) - शिक्षा का मंदिर न्यारा है, ज्ञान जहाँ का उजियारा है। यहाँ संस्कारों की गंगा बहती, जीवन की हर राह सँवरती। कक्षा-कक्षा दीप जलाते, गुरुजन हमको राह दिखाते। पुस्तक में संसार समाया, ज्ञान ने मानव को ऊँचा बनाया। अक्षर-अक्षर मोती बनते, मेहनत से सपने सच होते। यहीं सीखते प्रेम और सेवा, यहीं मिलता जीवन का मेवा। - [जल ही जीवन है-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jal-hi-jiwan-hai-ashish-ambar/) - जल से ही तो है जीवन, जल से ही तो है ये जहाँ । उपयोग करें हम सोच - विचार के, व्यर्थ न फेंकें यहाँ - वहाँ । गर्मी में जब उड़ जाता है यह , कितनी सूखी लगती यह धरती । मोल बहुत तब बढ़ जाता है, चलती नही किसी की मरजी । उपयोग - [गुरु की महिमा-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/guru-ki-mahima-ashish-ambar/) - गुरु के बिना ज्ञान नही , ज्ञान के बिना कोई महान नही । भटक जाता है जब इंसान, तब गुरु ही देते हैं सच्चा ज्ञान । गुरु हैं चारों तीरथ - धाम, इनको कोटि - कोटि है प्रणाम । जीवन हमारा है उपवन तो, गुरु उपवन के है माली । सच्चे मन से गुरु - - [राष्ट्रवाद-मृणाल गौतम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rashtravad-mrinal-goutam/) - तुम अलख जगाओ ‘राष्ट्रवाद’ की न्याय नीति की—‘नव प्रभात’ की नवचेतना जाग्रति होगीं— जन-मानस हुँकार भरेगा, भारत नव निर्माण के पथ पर, क़दम-क़दम पर साथ चलेगा! बटकर-कटकर मिट् जाओगे इतिहासों के पन्नों से, देश,धर्म नहीं, लाज बचेगी चढ़ते ‘चील’ फत्तिगों से! आखेटक की आँख अधर्मी— खँड-खँड तुम बिखर न जाना, बच्चा-बच्चा-सच्चा सेवक— वतन तुम्हारा क्या - [सूरज अगले आग -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-14/) - शीर्षक :- सूरज उगले आग । मम्मी , मुझको बहुत सताती , यह गरमी की तपती धूप । मैं नही खेलने जाऊँगा, और न पढ़ने जाऊँगा । रंग काला हो जाता है, खूब पसीना आता है । मम्मी, मेरे अंग जलाती, देखो सूरज आग उगलती । जब भी बाहर जाता हूँ, मैं बेहद थक जाता - [In the love, In the hate](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/in-the-love-in-the-hate/) - In the love, In the hate In this mystic world Some people will love you Some people will hate you Both will be in your favour In the love, you would be in their hearts In the hate, you would be in their minds Not just for few moments But all the time. Penned by Ashish K - [आओ करें प्रकृति से प्यार - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-19/) - आओ करें प्रकृति से प्यार आओ करें प्रकृति से प्यार, प्रकृति का है हम पर उपहार। पर्यावरण है जीवन का आधार, इससे हीं महके सारा संसार। पेड़ बड़े उपकारी होते, इनके सानिध्य में जीवन पलते। नदियां अमृत जल है पिलाती, धरती मां सबकुछ सह जातीं। आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ, धरती माँ का मान बढ़ाएँ। प्लास्टिक - [पर्यावरण - रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-38/) - पर्यावरण उठी जगत में आज क्यों,वही पुरानी बात फिर। दिखा उजाला था कभी,अभी सजी है रात फिर।। बढ़ता ताप जगा रहा, संकट सिर पर है खड़ा। एक नहीं हर हाथ से, भरना है खाली घड़ा।। देख दृश्य पर्यावरण,करते चिंतन जा रहे। पेड़ लगाने का विषय,थल पर कब ?हर्षा रहे।। दूर-दूर जो पेड़ हैं,गले-गले तक ला - [एक पेड़ माता के नाम-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-ped-mata-ke-naam-nitu-rani/) - आओ राजू आओ राधा पहन के ड्रेस तुम हरा और सादा, चलो हमसब मिलकर पेड़ लगाए और पर्यावरण दिवस मनाएँ। पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ पेड़ को तुम कभी न कटाओ, पेड़ से मिलते हैं हमें शुद्ध हवा और मिलते हैं जड़ी बूटी दवा। जहांँ देखेंगे पेड़ की कटाई वहाँ बुलाएँगे सरकारी सिपाही, पेड़ काटनेवाले को - [बेचारा मजदूर -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-30/) - शीर्षक - बेचारा मजदूर। * बेचारा मजदूर दिनभर करता मजदूरी, परिवार से रहता दूर,बेचारा मजदूर। कभी खेत में काम है करता कभी सड़कों पर धूप को सहता, जाड़ा गर्मी और बरसात को सहता है भरपूर,बेचारा मजदूर। कभी गाँव में कभी शहरों में कभी झोपड़ी कभी महलों में, कम पैसों में काम है करता करता है - [वटवृक्ष की पत्नी कहती है नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-33/) - विषय- वटसावित्री त्योहार शीर्षक -वटवृक्ष की पत्नी कहती है। वटवृक्ष की पत्नी कहती है क्या यही है वटसावित्री का त्योहार, जिस त्योहार में मनुष्य महिलाएँ करती हैं हमारे वृक्ष पति से प्यार। बार -बार महिलाएँ करती आ रही यही अपराध, जिसकी वो खुद से स्वयं हैं जिम्मेवार और सजावार। देखिए वटवृक्ष भी है किसी वटवृक्षिका - [माँ-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-ruchika/) - अधूरी हसरतों के संग अधूरी सी लगती जिंदगी, खुशियों की बातें लगती सब बिल्कुल ही बेमानी, तेरा साथ मेरे टूटते भरोसे को जोड़ता सदा ही, मेरी दुनिया तुझमें कही फिर मैंने ये है जानी। तुझसे ही जिद तुझसे ही मेरे सारी चलती लड़ाई, खुशियों के पल में तेरा साथ सबसे बड़ा मिठाई, तुमसे ही मिलती - [जनगणना नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-31/) - विषय -जनगणना । शीर्षक -जनगणना केअ एलै बहार। जनगणना केअ एलै बहार बहार मेरी सखिया शिक्षक केअ मिललै प्रगणक केअ कार्य ------२। पहिले प्रगणक अपन बाँटल क्षेत्र घुमै , तब बनबै नजरी नक्शा कमाल कमाल मेरी सखिया जनगणना केअ एलै बहार। नक्शा में प्रगणक भवन, मकान दर्शाबै , नर्शाबै नदी तालाब तालाब मेरी सखिया जनगणना - [मां -मुन्नी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/munny-kumari-2/) - माँ सुबह की पहली किरण है माँ, ममता का सागर है माँ, त्याग की मूर्ति है माँ, दिल की धड़कन है माँ, एक अनमोल उपहार है माँ। धूप की छांव है माँ, हर दर्द की दवा है माँ , हर आँसू में मुस्कान सजाती है माँ, अपनी दर्द छुपाकर प्यार लुटाती है माँ, एक अनमोल - [पर्यावरण को स्वच्छ बनायें-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/paryawaran-ko-swachh-banaye-ashish-ambar/) - बदलें हम तस्वीर जहाँ की, सुन्दर सा एक दृश्य बनायें । संदेश ये हम सब फैलाएँ , आओ मिलकर पर्यावरण बचाएँ । तापमान जब बहुत बढ़ेगा, जीना अपना हो जाएगा भारी । धरती मैली होती जाएगी, पग - पग होगी घातक बीमारी । वृक्षारोपण कर हम इसे बचाएँ, अवांछित कचरों को नही फैलाएँ । जागरुकता - [विश्व पर्यावरण दिवस-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vishwa-paryawaran-diwas-kartik-kumar/) - हरियाली का संदेश सुनाएँ, आओ मिलकर वृक्ष लगाएँ। धरती माँ की शान बढ़ाएँ, जीवन को खुशहाल बनाएँ। पेड़ लगेंगे, फूल खिलेंगे, सुंदर होंगे गाँव-नगर। शुद्ध हवा का उपहार मिलेगा, महकेगा सारा यह घर। नदियाँ निर्मल, जल हो स्वच्छ, ऐसा सुंदर काम करें। प्रकृति माँ के हर उपवन का, मिलकर हम सम्मान करें। पक्षी गाएँ मधुर - [विश्व साईकिल दिवस-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vishwa-saikil-diwas-nitu-rani/) - साईकिल की करो सवारी, न होगी कभी कोई बीमारी जी। आज तीन जून है चलो साईकिल खरीदें, बाँटेगे गली -गली मिठाई कभी न होगी कभी कोई बीमारी जी। साईकिल की -------2। साईकिल का अविष्कार जर्मन बैरन कार्ल वाॅन ड्रेइस ने की थी, बिना पैडल बिना चे्न्ह बिना गियर की बनाई थी धक्का देकर साईकिल चलाई - [वृक्ष हमारे परिवार जैसा-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vriksha-hmare-pariwar-jaisa-ashish-ambar/) - वृक्ष मेरे मित्र अनोखे, हमें जीवन की सौगात दिये हैं । रहे मौन सदा, नही कोई शिकायत, बदले में सब अपशिष्ट लिये हैं । परिवार का रूप है ये पेड़, अचल, शांत, स्थिर है जमीं पर । स्वयं में गुणों की खान समेटे, जो सबको छाया देते हैं । वृक्ष मेरे मित्र अनोखे, धरती को - [ताड़ासन - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/katik-kumar/) - ताड़ासन सीधे खड़े हो तन को तानो, ताड़ वृक्ष सा रूप बनाओ। दोनों हाथ ऊपर ले जाकर, आकाश की ओर बढ़ाओ। एड़ियों को ऊपर उठाओ, संतुलन का पाठ पढ़ाओ। धीरे-धीरे श्वास चलाओ, मन को भी शांत बनाओ। रीढ़ की हड्डी सीधी होती, शरीर में स्फूर्ति भर जाती। कद बढ़ाने में सहायक बन, सुंदर मुद्रा यह - [वृक्षासन -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-13/) - वृक्षासन एक पैर पर खड़े हो जाओ, वृक्ष समान संतुलन पाओ। दूसरा पैर जंघा पर रखकर, हाथ जोड़ ध्यान लगाओ। धीरे-धीरे श्वास चलाओ, मन की चंचलता मिटाओ। तन और मन का मेल कराकर, आत्मविश्वास खूब बढ़ाओ। संतुलन शक्ति बढ़ती इससे, एकाग्रता भी बढ़ जाती। पैरों की मांसपेशियाँ मजबूत, शरीर में ऊर्जा भर जाती। रीढ़ सदा - [भद्रासन -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-12/) - भद्रासन भद्रासन में बैठो प्यारे, दोनों तलवे साथ मिलाओ। घुटनों को बाहर फैलाकर, रीढ़ सीधी रख दिखलाओ। धीरे-धीरे श्वास चलाओ, मन को शांत बनाओ। योग साधना का यह आसन, तन-मन को सुख पहुँचाओ। जांघ और कूल्हे लचीले होते, पैरों में बल आता है। रक्त प्रवाह सुचारु होकर, शरीर स्वस्थ बन जाता है। ध्यान लगाने में - [जीवन और मृत्यु - गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-19/) - जीवन और मृत्यु जीवन जीवन ही होता है, जीवन का ध्येय भी जीवन होता है, जन्म-मृत्यु के है जीवन कर्म-प्रधान, उज्ज्वल जिसका कर्म है, जीवन वही महान, जीवन और कर्म के विषय में सोचना सहज और स्वाभाविक है, जीवन वही महान होता है, जो आत्मप्रगति के साथ परोपकारार्थ हो, जीवन वही महान है, जिसमें अपने - [विश्व ब्राह्मण दिवस -. गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-18/) - विश्व ब्राह्मण दिवस गायत्री-जप, सन्ध्या-वन्दन है परम कर्त्तव्य तुम्हारा, निरंतर सीखना, उसे योग्य लोगों में बांटना है कर्म तुम्हारा, धर्म की रक्षा करना, राष्ट्र की सेवा है परम धर्म तुम्हारा, मानव समाज को उत्कर्ष का पथ दिखाना है धर्म तुम्हारा, अपना कर्त्तव्य पालन कर तुम ही विप्र, द्विज कहलाते हो, ज्ञान-विज्ञान को नित पाकर ज्ञान-विज्ञान - [पुरवाई आई,गर्मी घबराई रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-37/) - शीर्षक:- पुरवाई आई,गर्मी घबराई। पछुआ पवन पाँव,रौंद दिया गाँव-गाँव, बढ़ गया काँव-काँव ,चैन नहीं छाँव में । प्रभु ने लिखा है लेख,फटती दरार देख, कैसी सर-भाग्य-रेख ?, लिखी ठाँव-ठाँव में। पुरवाई सागर से,मिलने को नागर से, शीतल पवन शीघ्र, घुस आई गाँव में। संजीवनी रसधार,लौटाए सृष्टि में प्यार, सुख जो भी पादप थे ,लिपटे हैं - [दो जून की रोटियां - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-18/) - दो जून की रोटियां यूं हीं नहीं मिलती दो जून की रोटियां, पूछो उन गरीबों से, लाचारों से और जरूरतमंदों से। संघर्ष की आग में जलते हैं जिनके हाथ, मेहनत करते हुए टूटते हैं कमरें और फटती है एड़ियां। यूं हीं नहीं मिलती है किसी को दो जून की रोटियां.. आधी रात को हीं उठकर - [शिक्षा में नवाचार-रवि कुमार ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiksha-me-navachar-ravi-kumar/) - आओ हम सब मिल कर करें थोड़ा विचार, चलो शिक्षा में करते हैं कुछ नवाचार। समाज में बनाता ना किसी को लाचार , इसलिए शिक्षा को कतई ना समझो तुम बेकार । शिक्षा से ही सारा जगत है , बिन शिक्षा ना बना कोई भगत है । नवाचार से ही शिक्षा प्रगत है, नवाचार ही - [मानव कल्याण की गाथा-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manav-kalyan-ki-gatha-kartik-kumar/) - अष्टांग हृदयम अमृत धारा, आयुर्वेद का दिव्य सितारा। ऋषियों का अनुपम यह ज्ञान, जीवन देता नव सम्मान। दिनचर्या का सुंदर मर्म, स्वस्थ रखे तन-मन का धर्म। ब्रह्ममुहूर्त जागो प्यारे, जीवन होंगे सुख के तारे। उषापान का नियम महान, शुद्ध रहे तन, निर्मल प्राण। योग-प्राणायाम अपनाओ, रोगों को दूर भगाओ। सादा भोजन, सात्विक थाली, यही है - [ऋग्वेद में अमृत ज्ञान-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rigved-me-amrit-gyan-kartik-kumar/) - खाली समय में ऋग्वेद पढ़ें, ज्ञान सुधा से मन को गढ़ें। ऋषियों की वाणी अमृत बनकर, जीवन में नवदीप जलाएँ। सत्य-अहिंसा का पथ लेकर, मानवता का फूल खिलाएँ। संस्कारों की पावन गंगा, हर आँगन में बहती जाए। जीवन को उन्नत बनाएँगे, हर हृदय में प्रेम जगाएँगे। लोभ-मोह के अंधियारे को, ज्ञान सूर्य से दूर भगाएँगे। - [अनुशासन - भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwanand-singh-6/) - अनुशासन प्यारे बच्चो सुन लो तुम शिक्षकों की बात, रहो हमेशा अनुशासन में होगा तुम्हारा विकास। प्रगति के पथ पर आगे है बढ़ना, देश के भविष्य हो तुम यह बात तुम समझना। जीवन सफल बनेगा मान लो मेरी बात, रहो हमेशा अनुशासन में होगा तुम्हारा विकास। लक्ष्य बनाकर तुमको आगे है बढ़ना, आए कोई मुसीबत - [दूर ना जाए मां से बच्ची - रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-36/) - सार छंद दूर न जाए माँ से बच्ची, बाहों में है सिमटी। गोया डाली से कोई लतिका,रहती ज्यों है लिपटी।। आँखों में पहला शिक्षालय,शिशु ने की ठहराई। आपस की आँखों ने देखी,अद्भुत-सी गहराई।। बाहर का मौसम जो भी हो,अंदर है हरियाली। डाली पत्ती से लिपटी है,या पत्ती से डाली।। नहा रही है प्रेम-सिंधु में,जननी-संतति जोड़ी। - [बदलना जरूरी है -। बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bindu-agrawal-4/) - बदलना जरूरी है वक्त के साथ बदलना जरूरी है पर बदल कर संभलना जरूरी है । ब्याधियां लग जाती है अक्सर शरीर में सुबह ठंडी हवा में टहलना जरूरी है। मौसम बहारों का आयेगा नही बार-बार कलियों को देख भौरों का मचलना जरूरी है। चाँद की चांदनी होती नही सदा के लिए सूरज सा अंबर - [प्रणत पाल हे राम आइए - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-99/) - प्रणत पाल हे राम आइए- इंदिरा छंद वर्णिक १११-२१२-२१२-१२ प्रणत पाल हे राम आइए। विनित त्रस्त है ध्यान लाइए।। प्रखर सूर्य का तेज हो गया। सकल जीव निस्तेज हो गया।। असर ताप का देख रो रहा। कसर मौत का लेख हो रहा।। अगर हो सके तो बचाइए। प्रणत पाल हे राम आइए।।०१।। मिलन रोहिणी संग - [कौन रुका है - गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-17/) - कौन रुका है? प्रश्न है कौन रुका है? सूर्य मंदाकिनी का चक्कर लगाते, अवनि सूर्य का चक्कर लगाती, मयंक पृथ्वी का चक्कर लगाता, फिर बोलो कौन रुका है? पौधे निरन्तर बढते जाते, फलित पुष्पित हो जाते, प्रकाश-संश्लेषण करके, प्राणवायु भी हैं दे जाते, फिर बोलो कौन रुका है ? नदियां पयोधि की ओर, निरन्तर है - [जागरूकता हम फैलाएंगे - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-17/) - जागरूकता हम फैलायेंगे विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस पर, किशोरी के सम्मान और सुरक्षा दिवस पर, गाँव - गाँव हर गली - गली में , जागरुकता हम फैलायेंगे । कठिनाइयों के वो पांच दिन को, किसी से नहीं छुपायेंगे । कहते हैं जिसे माहवारी, ना समझो कोई इसे बिमारी । ईश्वर का दिया यह अद्भुत पहचान, - [शिव स्तुति -गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-16/) - शिव स्तुति - २ हे शिव शंभू रुद्र उमावर । नीलकंठ शिव हर महेश्वर ।। शंभूनाथ शिव शिव हे दिगम्बर । शिव शिव हर हर हे करुणाकर ।। महादेव हो तीनों लोक के त्राता । नंदी सवार संग तिहुं लोक के माता ।। हर हर हर महादेव तू सदा कहा कर । नामोच्चारण से निज - [बाल विवाह -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-35/) - विषय -बाल विवाह। शीर्षक - दामाद आनलेअ बुढ़वा। माय गे शादी नै करिहेअ अभी पढ़ाई कराबिहेअ गे, जब बियाह के जोग हेबै हम तब बियाह कराबिहेअ गे। एखैन हमर उमर पढ़ै और लिखै केअ छलै, हमरा बियाह केअ नै तूँ ससुराल पठाबिहेअ गे। माय गे पढ़बौ, लिखबौ, नौकरी करबौ तोहर सबके नाम बढ़ेबौ, ससुराल में - [प्रेरणा -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-98/) - प्रेरणा - मधुर ध्वनि छंद मुक्तक गहें प्रेरणा, उर संवेदना, सबसे प्यारी। हर्षित रहिए, सुख-दुख सहिए, बन‌ व्रत धारी।। उत्तम सबसे, लेना जग से, कर्म सही है, खुद में उत्तम, मैं सर्वोत्तम, विस्मयकारी।।०१।। बनो प्रेरणा, भरो चेतना, सुंदर सबमें। हाथ बढ़ाना, गले लगाना, हर-पल जग में।। मिले सहारा, अगर तुम्हारा, जग आगे हो, कदम बढ़ाओ, - [गौ हत्या को रोकना -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-35/) - कुंडलिया। गौ-हत्या को रोकना, प्रश्न उठा फिर यक्ष। माता जिसको कह रहे,करना रोको भक्ष।। करना रोको भक्ष,दिलाकर माँ का दर्जा। गोपालक है दीन, उन्हें होगा ही हर्जा।। सबका है जब धर्म,लगाएँ सब मिल मत्था। धर्म से आया लाभ, मिटाएगा गौ हत्या गोपालक को प्राप्त हो,गौ-सेवा का लाभ। बिक्री पर प्रतिबंध हो,विस्मित प्रकट प्रभाभ।। विस्मित प्रकट - [नवतपा -एस के पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-k-poonam-6/) - 🙏ऊँ कृष्णाय नमः🙏 विधा:-मनहरण घनाक्षरी विषय:-(नवतपा) आग बरसाते रवि, बढ़ रहे तापमान, तपती है धरातल,मुरझाया फूल है। चहुँओर वनराई, अनगिनत काटे हैं, अब कहाँ छाँह मिले,मानव की भूल है। बीत जाए माह ज्येष्ठ, चाहते हैं जन-जन, नव तपा में सूरज,भी चुभाते शूल हैं। नदियाँ है सूखी सारी, चेतना को खोते लोग, पवन का गर्म झोंका,आच्छादित - [नारी -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-97/) - नारी- मत्तमयूर छंद गीत वर्णिक २२२२, २११-२२१-१२२ मैं नारी हूंँ, प्रेम दया की अवतारी। गंगा जैसी, पावन हूँ कल्मषहारी।। मैं ही तो हूँ, देवनदी की जलधारा। मेरा ही तो, रूप रमा का अति प्यारा।। मैं ही दुर्गा , शक्ति शिवा उपकारी। मैं नारी हूंँ, प्रेम दया की अवतारी।।०१।। मैं ही छाया, प्रेमिल सारे उर में - [धूप से तन मन जले हैं -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-34/) - मनोरम छंद 2122 2122 धूप से तन-मन जले हैं। लाल-पीले फल ढले हैं।। सर्व सुंदर बाग प्यारा। राहगीरों का सहारा।। दुख मगर इस बात का है। दुख मगर उस रात का है।। काट जंगल हम बसे थे। दाब से बिल्कुल कसे थे।। खोजते हैं लोग छाया। पूर्व में जो बाँट खाया।। वक्त आगे बढ़ गया - [अर्द्धनारीश्वर रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ratna-priya-4/) - अर्द्धनारीश्वर शिव-उमा के कल्पित रूप, अर्द्धनारीश्वर है, प्रकृति है समष्टि में अधिष्ठाता अधीश्वर है । स्नेहमयी दो नयन, एक रसमयी दूजा विकराल एक भुजा की त्रिशूल शोभा, दूजा अलक्तक लाल जटाजूट में गंङग् वास है, अविरल संजीवन धार विषधर गलमाल लपेटे, दूजे में वैजन्ती हार त्रिनेत्र में धधक रही ज्वाला, शीतल सुरेश्वर है । शिव-उमा - [अनुलोम विलोम -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-11/) - अनुलोम विलोम कभी कार्तिक कुमार मध्य विद्यालय कटरमाला गोरौल वैशाली 7004318121 kartikyog.kumar@gmail.com अनुलोम-विलोम करो रे भाई, तन-मन में भर जाए तरुनाई। धीरे-धीरे श्वास को लेना, फिर प्रेम से बाहर है देना। नाक बदलकर श्वास चलाओ, मन की सारी चिंता भगाओ। रोज सुबह जो योग करेगा, स्वस्थ और निरोग रहेगा। पढ़ाई में मन लग जाएगा, जीवन - [लू और प्रणायाम-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-10/) - लू और प्राणायाम प्रस्तुति कार्तिक कुमार मध्य विद्यालय कटरमाला गोरौल वैशाली 7004318121 लू चली है धूप में, सूरज आग उगलाए, घर से बाहर निकले जो, पसीना खूब बहाए। गर्मी इतनी तेज है, सड़क तवे सी तपती, आम का पन्ना पी लो भाई, तबियत रहे चमकती। टोपी पहन के निकलिए, पानी साथ रखो, धूप में ज्यादा - [छुट्टियां रामपाल प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-2/) - विधा-मुक्तक आ-सार छंद विषय-छुट्टियाँ अब तो ढिग में जून महीना,सूरज है गरमाया, छुट्टी भी हो गई हमारी,वक्त करो मत जाया। पास तुम्हारे मैं सोऊँगा,शिशु दादू से बोला..., सुबह साथ उठ जाना लेकर,सबल बनेगी काया।। बाग-बगीचे की हरियाली, पुस्तक में है अच्छी, या चलकर देखें लेखक ने,बात लिखी है सच्ची। पोता ने दादू से कहकर,खाते-खाते सोया..., - [मुस्कान -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-96/) - मुस्कान - उल्लाला छंद गीत दशरथ नंदन मुख सखी, मंद-मंद मुस्कान है। आओ उनसे पूछकर, दिल मेरा अनजान है।। नैना जबसे है लड़ी, साँसे मेरी तेज है। कोई भी लख ले जिसे, करना भी परहेज है।। मैं तो हारी चित सखी, उनसे पूछा है नहीं। समझ न पाऊँ क्या करूँ, राह दिखाओ तो सही।। मोह - [मानव के सहयोगी बनें -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-9/) - मानव के सहयोगी बने कार्तिक कुमार की प्रस्तुति 100 में 80 आदमी, जग में हुए कठोर, स्वार्थ की इस भीड़ में, खो गया है छोर। चेहरे पर मुस्कान है, मन में भरा विषाद, अपनों से ही दूर हैं, कैसा यह संवाद। 20 ऐसे लोग भी, मानवता के दीप, दुखियों का सहारा बनें, मन में प्रेम - [कर्मों का फल - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-8/) - कर्मों का फल प्रस्तुति कार्तिक कुमार सचिन जिला योग संघ वैशाली विद्यालय कटरमाला गोरौल वैशाली वैशाली 7004318 121 मानव जीवन कर्मों का, अद्भुत एक विधान, जैसा बोओ वैसा पाओ, यही सृष्टि का ज्ञान। पूर्व जन्म के कर्मों से, बनता जीवन हाल, सुख-दुख के इस खेल में, कर्मों का ही जाल। प्रारब्ध कर्मों का फल, साथ - [जीवन पथ में सदा विजय हो -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-13/) - क शीर्षक :- जीवन पथ में सदा विजय हो । बाधाएँ अब हमें नही सताएँ, विपदा भी अब हमें नही डराएँ । हार मिले न , सदा ही जय हो , जीवनपथ में सदा विजय हो । रोजगार के दिखें न लाले, किस्मत के खुल जाए ताले । यश , वैभव , ऊर्जा अक्षय हो, - [सूरज उगले आग -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-34/) - विषय -सूरज उगले आग सूरज उगले आग खेत में सूख रहे सब्जी साग, हरे -भरे बगीचों में जैसे लग गये हैं आग। लोग सड़क पर छाता लेकर चलते रखकर अपने माथे पर पाग, मुँह को कपड़े से ढंकते धूप से कहीं पर जाए न दाग। गर्मी में लू से बचने को खा रहे बनाके हरी - [बच्चों का संस्कार और योग - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-7/) - बच्चों का संस्कार और योग कार्तिक कुमार जिला शिक्षा पुरस्कार प्राप्त मध्य विद्यालय कटरमाला गोरौल वैशाली 7004318 121 kartikyog.kumar@gmail.com www.vihangamyoga.com सतोगुण रजो तमोगुण छोड़ के करो तुम ध्यान, तब तेरे जीवन में आएगा अच्छा ज्ञान। सुख शांति सबको मिले, यह उपदेश हमार, सारा विश्व हमार है, हम हैं सब संसार। सुबह सवेरे उठकर, माँ-पिता कर - [गर्मी की छुट्टी-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/garmi-ki-chhutti-kartik-kumar/) - स्कूल कल जब बंद होगा, छुट्टी का संदेश आएगा, प्यारे बच्चे हँसते-गाते अपने घर को जाएँगे। मस्ती के संग सीख नई हर दिन तुम अपनाओगे, अच्छे कर्मों की खुशबू से जग में नाम कमाओगे। कार्तिक सर का योगा करके स्वस्थ सदा रह पाओगे, तन होगा मजबूत तुम्हारा, मन में दीप जलाओगे। माँ की सेवा, पिता - [म्याऊं म्याऊं म्याऊं -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-6/) - म्याऊं म्याऊं म्याऊं लेखक कार्तिक कुमार म्याऊं म्याऊं म्याऊं, आई बिल्ली रानी गांव। धीरे-धीरे चलती जाती, दूध मलाई खूब ही खाती। काली-भूरी प्यारी बिल्ली, लगती जैसे छोटी तितली। चूहे देखे दौड़ लगाती, फुर्र से उनको दूर भगाती। म्याऊं म्याऊं मीठी बोली, सब बच्चों की यह हमजोली। कूदे फांदे दिनभर न्यारी, सबको लगती बहुत ही प्यारी। - [हे गणेश - रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-95/) - हे गणेश- स्वागता छंद वर्णिक गीत हे गणेश! पद पंकजधारी। दृष्टि खास जग मंगलकारी।। हे महेश सुत आज पधारो। नाथ कष्ट हर आप उबारो।। पूज्य देव प्रथमेश उचारे। सर्व भक्त वृषकेतन तारे।। मोह भंग हर संशय सारी। हे गणेश! पद पंकजधारी।।०१।। रिद्धि-सिद्धि शुभता वर देते। रोग शोक पल में हर लेते।। पार्वती सुत तुम्हें सिर - [वट सावित्री -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-33/) - वट सावित्री व्रत। कर सोलह शृंगार से,प्रकट स्वर्ग निज द्वार। हे नारी!तू धन्य है,कितना पति से प्यार।। कितना पति से प्यार,जलाती मुख की लाली। नीचे तलवा ताप,मगर छूटे कब थाली।। कहते कवि "अनजान",निर्जला रहती है रह। अंतस रख तैयार,साज सम्यक कर सोलह।। शीतल छाया है नहीं,शाखी बरगद साथ। नर्तन करती नारियाँ,झुका रही हैं माथ।। झुका - [कुंडलियां -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-94/) - कविता- कुंडलिया कविता के प्रति मोह से, वनिता होती रुष्ट। वनिता को जब खुश करें, कविता कहती दुष्ट।। कविता कहती दुष्ट, प्रेम यह बोलो कैसा। क्या पाओगे चैन, कभी तुम पहले जैसा।। तेरे उर का हाल, भला कब समझी वनिता। रहो सदा बेचैन, न होगी तेरी कविता।।०१।। कविता शब्दों का नहीं, अंतस् का है भाव। - [ऊपर का भगवान चकित है-रामपाल प्रसाद सिंह अनजान ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/upar-ka-bhagwan-chakit-hai-rampal-prasad-singh-anjan/) - देव नाथ रत्ना का सपना।सच होगा यह जल्दी इतना।। किसने सोची थीं ये बातें।शीघ्र दिखेगी विस्मित रातें।। सूरज पश्चिम से निकलेगा।पत्थर पर से बीज उगेगा। मजबूती से खड़ी रही है।तनिक नहीं वह डरी रही है।। न्याय नहीं मिलता है जब-जब।प्रकट द्रौपदी होती तब-तब।। धर्म साथ स्वामी की यारी।होती है नारी आभारी।। धर्म साथ भगवान दिया - [सत्यकाम चरित्र-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/satyakam-charitra-girindra-mohan-jha/) - जबाला का एक पुत्र महान, नाम पड़ा जिसका सत्यकाम, आ गया अब शिक्षा का काल, पुत्र हेतु माँ चिंतित हुई तत्काल, माँ शिक्षा प्राप्त करनी है, जाना है योग्य गुरु के पास, सुत जाओ ऋषि गौतम के पास, जाकर करो विद्या का अभ्यास, माँ उन्होंने पूछा गर पिता का नाम, क्या कहूँगा, हूँ जिनसे मैं - [गुरुदेव -राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gurudev-ram-kishor-pathak/) - वंदन कर गुरुदेव का, करते सारे काम। जिससे जीवन हो सरल, सहज सरस अभिराम।। ज्ञान चक्षु जब खोलते, सहज भाव गुरुदेव। ईश्वर का सानिध्य फिर, मिल जाता स्वयमेव।। भवसागर तरना सहज, जिनके कर को थाम। वंदन कर गुरुदेव का, करते सारे काम।।०१।। हरते रहते दोष नित, प्रतिपल भर नवतेज। हर विकार से मुक्ति दें, अंतस - [माँ भारती पद वंदना-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-bharti-pad-vandana-ram-kishor-pathak/) - माँ भारती पद वंदना, कर मातु का नित ध्यान। पाऊँ सभी सुख संग में, शुभ ज्ञान का वरदान।। कोई नहीं दुख आपदा, पल एक भी अब पास। है ज्ञान की अब संपदा, सुख का सदा अहसास।। भाया मुझे हर वक्त है, करना सतत् गुणगान। माँ भारती पद वंदना, कर मातु का नित ध्यान।।०१।। जो भी - [जूता-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/juta-ram-kishor-pathak/) - चलने खाली पैर न देता। ठोकर सारे वह सह लेता।। रखे शूल से पाँव अछूता। क्या सखि? साजन! न सखी! जूता।।०१।। मेरा हर-पल शान बढ़ाए। उसके संग न मन घबराए।। रक्षक जैसे फल का सरही क्या सखि? साजन! न सखी! पनही।।०२।। लिपट संग में जब चलता है। ठोकर शूल हाथ मलता है।। लगे नहीं पथ - [Some People are like Sunsets-Ashish K Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/some-people-are-like-sunsets-ashish-kumar-pathak/) - Temporary, breathing, Impossible to hold Onto No matter how badly You want a moment to stay. They arrive quietly soften your heaviness then they leave behind colors Your heart remembers to stay. Beautiful enough to heal you in a moment Painful enough to remind you there's nothing that stays. You don't realize how beautiful they - [बेटियाँ-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/betiyan-ruchika/) - बेटियाँ संघर्षों की नींव पर एक मजबूत महल बनातीं भूत और वर्तमान को परे धकेलकर भविष्य को सुदृढ़ करने में स्वयं को खपाती। वो होती हैं बथुआ सी बिना खाद पानी के गेहूँ के खेतों में उग जाती। बेटियाँ दो कुलों के बीच में बनती एक महीन सी डोर जो दोनों कुलों को मजबूत बनातीं। - [हरि को लखना है -राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hari-ko-lakhna-hai-ram-kishor-pathak/) - सबसे इतना ही कहना है। सबसे प्रेमिल ही रहना है।। द्वेष भला क्यों मन में धारे। सबको मिट्टी में मिलना है।। धन बल यौवन नश्वर सारा। अहं भला किसका रखना है।। साँसों का भी ठौर अनिश्चित। छोड़ जगत् सबको चलना है।। माया जिस जीवन से सबको। उसको भी पल में तजना है।। मानव तन का - [उत्तम मास-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/uttam-mas-ram-kishor-pathak/) - सूर्य का जब मेष धनु में, हो कभी भी वास। लोग कहते वर्ष का अब, आ गया खरमास।। मांगलिक कारज सभी ही, हों तभी से बंद। सूर्य की गति मंद पड़ती, हीन हो आनंद।। तीन वर्षों में सदा यह, संग लाता फंद। मान्यता ऐसी यहाँ है, मोक्ष होता मंद।। सत्य क्या है जानिए तो, क्यों - [बाल रस](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बाल-रस/) - ​ बाल रस ​सब देते बात-बात पे गच्चा मुझको । नहीं बनना पापा ताऊ चच्चा मुझको ।। बेफ़िकरी का हँसता बचपन ही अच्छा , फिर से कोई बना दे बच्चा मुझको ।। ​खेल खिलौने मस्ती मेरी । ऊंट-पटंगा हस्ती मेरी ।। कलम किताबें बस्ता मुझको , फिर से कोई - [अंगिका कविता 'नानी घर जैबय'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/अंगिका-कविता-नानी-घर-जैबय/) - नानी घर जैबय अबकी गरमी छुट्टी हमहु, नानी घर जैबय। नानी-नाना साथे हमहु, नदी में नहैबय।। नदी में नहैबय अउरो, खूब डुबकी लगैबय। अबकी गरमी छुट्टी हमहु, नानी घर जैबय।। आलथि-पालथी मारी हम्मे, झोर-भात खैबय। औरों मामा साथे हम्मे, लटुआ नचैबय।। लटुआ नचैबय अउरो हम्मे, गुड्डी भी उरैबय। अबकी गरमी छुट्टी हमहु, नानी घर जैबय।। - [कर्मठ बालक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/कर्मठ-बालक/) - कर्मठ बालक प्रखर तेज सा निखरो बल शाली बन उभरो । रूको ना कही पर ना टूटो ना बिखरो। बुलंदियों को बना लो ठिकाना। चाहे राह जैसी हो दुर्गम से होकर । ओ मेरे प्यारे सीख रखना संजोकर। । सितारों से दूर सितारों से ऊपर । गुजरना पड़ेगा सितारों से होकर। ओ मेरे प्यारे - [बाल लोरी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बाल-लोरी/) - बाल लोरी तू विधि का अमूलय निधि मेरे प्राणों से भी प्यारे । अब तू सो जा मेरे राज दुलारे। कहो क्या मै गाउं किस किस से बताऊं। चंदा मामा को बुलाऊं कि हाथी घोड़ा पर चढ़ाऊं। चलो गोद ले तुम्हे लोरी सुना दें। अब तो सो जा मेरे राजदुलारे ।। आ - [वट पूजन रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-93/) - वट-पूजन:- बाल कविता (मनोरमा छंद गीत) माँ बतलाओ कैसी विधान है। खोज रही क्या वट में निदान है।। बालों में वट-पत्ता प्रसून है। मुख मंडल पर जैसे सुकून है ।। कहती मुझसे आज उपवास है। होता सौभाग्य सतत् विकास है।। मुझको दिखती तुम दीप्तिमान है। खोज रही क्या वट में निदान है।।०१।। माँ बोली बेटे - [आज झुकेगी विनयी डाली -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-32/) - आज झुकेगी विनयी डाली। जेष्ठ अमावस दिन पावन को।क्या कहने मन के सावन को।। भोर हुई छाई खुशियाली।आज झुकेगी विनयी डाली।। जीव-जंतु सब हर्षित जग में।स्वर्ग-सरीखे छाये मग में।। धूप-सिंदूर अक्षत सारे। दूर भगाए मन के कारे।। कुमकुम रोली थाल सुशोभित।खनक चूड़ियाँ बिंदी मोहित।। नवल शांति चहुँदिश मुस्काई।रंग-बिरंगी छवियाँ छाई।। घर से बाहर दूर चली - [भारतीय योग भाषा उत्सव -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-5/) - भारतीय योग भाषा उत्सव 14.05.2026 भारतीय योग भाषा उत्सव आयल, ज्ञान-योग के दीप जलायल। सोनाली मीठ सुर में गावे, सोनाक्षी योग आसन सिखावे। पियूष बोले ज्ञान के बात, शिवानी चमके जइसे प्रभात। आसना ध्यान लगावे प्यारा, अनु बनल सबके सहारा। खुशी हँसी के फूल खिलावे, सपना नया उजियार दिखावे। अविनाश मेहनत से बढ़त जाए, अलीशा - [भारतीय भाषा उत्सव - कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-4/) - भारतीय भाषा उत्सव प्रस्तुति – कार्तिक कुमार छोटकी बुचिया पढंल हमार नन्ही बुचिया पढ़े-लिखे, हो जाव होशियार, ज्ञान के जोती जलाव हो, चमकी संसार। भोर भिनसारे उठ के बच्चा, स्कूल जाए रोज, किताब-कॉपी साथे लेके, करे ज्ञान के खोज। गुरुजी देसें सीख बढ़िया, साँच अउर व्यवहार, पढ़-लिख के बच्चा बनिहें, देश के रखवार। क ख - [सज्जन कैसे जी सके -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rakishor-pathak/) - सज्जन कैसे जी सके- दोहा छंद गीत भ्रष्टाचारी बोलते, करके हर-पल शोर। सज्जन कैसे जी सके, बने नहीं जो चोर।। पग-पग बाधा कर खड़ी, देते सभी तनाव। मीठी वाणी से वही, रखते सतत् लगाव।। सज्जन उर समझे नहीं, दुनिया की यह चाल। चुभता रहता शूल नित, किसे बताए हाल।। कहते चलिए संग में, ले जाए - [Some people are like sunset -Ashish k Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-k-pathak-4/) - Some People are like Sunsets Temporary, breathing, Impossible to hold Onto No matter how badly You want a moment to stay. They arrive quietly soften your heaviness then they leave behind colors Your heart remembers to stay. Beautiful enough to heal you in a moment Painful enough to remind you there's nothing that stays. You - [Mother- Ashish k Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-k-pathak-3/) - MOTHER She is the Soil from where my roots came She is the silent of whatever am I. Her love breathes in my every pulse and bone Even my first heartbeat was borrowed from her own. In her rowing eyes I am always enough In her heart I am always home. She lifts me whenever - [मातृ दिवस - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-32/) - -मातृ दिवस। शीर्षक - मेरी माँ को। मेरी प्यारी माँ को , सुर्ख लाल रंग पसंद था। लाल सिंदूर लाल बिंदी, लाल साड़ी माँ को पसंद था। लाल चूड़ी लाल कंगन , लाल माला माँ को पसंद था। लाल पैर रंगा, लाल नेल‌पाॅलिस, लाल रबड़ माँ को पसंद था। मेरी प्यारी माँ को, सुर्ख लाल - [Tagore's India - Ashish k Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-k-pathak-2/) - Tagore's INDIA An India without fear without hatred Without smallness of narrow thinking. An India where resides dignity, truth and compassion as regulation not necessarily an aberration. Free thought we actually live and with humanity We admire. We as Indian🇮🇳 hope a bit of Tagore stays with us Where the mind is without fear and - [An act Resistance: Joy - आशीष कुमार पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-k-pathak/) - An act Resistance:JOY A deliberate act of rebellion, an unyielding beacon of hope, A move that isn't naive or a denial, It's a radical move against despair, It has to be chosen actively in the hardest time, Choosing it in the middle of difficulty, Makes it most Courageous to do, Done instinctively or deliberately result - [नदी के उस पार - रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-15/) - नदी के उस पार नदी के उस पार एक खूबसूरत जमीन है हवा है,पानी है और उन्मुक्त आसमान है। इसी उम्मीद में नदी के किनारे खड़े हो उस पार ताकती रही। अफसोस करती रही उस पार नही पहुँचने का और आनन्द भी नही उठा सकी इस पार मिलने वाली नेमतों का शुक्रिया भला क्या ही - [मेरा परिवार -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-12/) - शीर्षक : - मेरा परिवार प्यारा सा परिवार हमारा , छोटा सा संसार हमारा । नन्हा - नन्हा , प्यारी - प्यारी, मिलजुल कर हम रहते हैं । प्यारा सा परिवार हमारा , जिसमें दादा - दादी रहते हैं । जब हम रात को सोते हैं, तब प्यारी कहानियां कहते हैं । मम्मी - पापा - [गृह प्रवेश -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-92/) - गृह प्रवेश- विजया छंद शुभ वरदाई मंगल गणेश जी। करने आए शुभ गृह प्रवेश जी।। सारे परिजन का शुभ विचार दें। प्रेमिल मति मन सबका उदार दें।। लेकर मातु उमा सह महेश जी। आओ मंगल कारी गणेश जी।।०१।। गेह जगत में सुंदर मिसाल हो। पाकर स्वागत आगत निहाल हो।। कृपा सदा बरसाए धनेश जी। आओ - [राधे-राधे -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/radhe-radhe-r-kishor-pathak/) - आओ प्यारे राधे-राधे गाने आओ। बंशी वाले गोपाला को पाने आओ।। क्यों खोये हो यों ही बोलो अंगारा में। आओ डूबें भावों की प्यारी धारा में।। नैया खेने वाले को ही ध्याने आओ। आओ प्यारे राधे-राधे गाने आओ।।०१।। प्रेमी जो भी ग्वाले जैसे हो जाते हैं। पीछे-पीछे कान्हा को भी वे पाते हैं।। गीतों में - [शिव स्तुति - गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiv-stutu-girindra-mohan-jha/) - शिव शिव हर हर जपो निरंतर । साम्ब सदाशिव शम्भो महेश्वर ।। ॐ हर हर हर महादेव - 2 नीलकंठ विश्वनाथ उमावर । गिरिजापति के चरण शरण धर ।। ॐ हर हर हर महादेव-2 गौरीपति का नित्य ध्यान कर । करे सुमंगल हर शिवशंकर ।। ॐ हर हर हर महादेव -2 शिवशंकर का नित्य पूजन - [माँ-रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-rampal-prasad-singh-anjan/) - जन्म देकर कह रही माँ,पूज लो भगवान को। लग गया आघात पल में,आज तो "अनजान"को।। कर लिया ऐसा अगर मैं,छोड़कर पल्लू जरा। फिर कहूँगा मैं पलट कर,दिल नहीं मेरा भरा।। ग्रंथ जग के कह रहे जब,स्वर्ग तुमसे मौन है। सृष्टि माँ तुझमें समाई,जग विधाता कौन है।। सृष्टि को जिसने बनाई,तर गए अवतार से। गोद दो-दो - [कविता और कवि - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavita-or-kavi-ram-kishor-pathak/) - मैं वही शब्द का शिल्पकार हूँ। काव्य में भाव का चित्रकार हूँ।। छंद कविता बनी खास संगिनी। हर रही चित वही रास रंगिनी।। रूप कवि का धरा गीतकार हूँ। काव्य में भाव का चित्रकार हूँ।।०१।। लोग तो मस्त है देखकर जिसे। प्रेमिका है वही मैं कहूँ किसे।। प्रेम नव गढ़ रहा काश्तकार हूँ। काव्य में - [संबंध - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sambandh-ram-kishor-pathak/) - सुंदर सा संबंध, जहाँ बन जाए। जीवन का सुख सार, वही हम पाए।। हर रिश्तों के संग, रहे समरसता। सुरभित सारे अंग, गहे चंचलता।। संग सभी के प्यार, रखे कोमलता। आए कोई दौर, रहे निश्छलता।। सब हो ऊर्जावान, सभी हर्षाए। सुंदर सा संबंध, जहाँ बन जाए।।०१।। संबंधों में प्रेम, जरूरी होता। उर में भी विश्वास, - [प्यारी लीची-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pyari-lichi-kartik-kumar/) - तू है मीठी, रस से भरी, प्यारी-प्यारी लीची, गर्मी में ठंडक पहुँचाती, सबको लगती अच्छी। हरे पत्तों के बीच चमकती, लाल-गुलाबी दाना, तुझे देखकर खिल उठता है, बच्चों का मुस्काना। गुच्छों में तू लटक रही है, जैसे मोती माला, तेरी खुशबू मन हर लेती, लगता बड़ा निराला। ऊपर से खुरदुरी दिखती, भीतर रस की खान, - [मां-ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-beauty-kumari/) - ममता की निर्मल सरिता, वसुंधरा सी असह्य पीड़ा, सह कहलाती जननी । स्वयं भूखी परवाह नहीं, बच्चों के क्षुधा मिटाने को करती रहती दिन -रात जतन। कहीं ठोकर खाकर गिरे नहीं, अंगुली थामें रहती है । सूरज के तप्त किरण हो, या पावस के शीतल बूंद, आंचल के छांव में छुपा लेती । वह अनमोल - [माँ की ममता-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-ki-mamta-ram-kishor-pathak/) - जग में लानेवाली माँ की, ममता का है मोल नहीं। कैसे चर्चा मैं कर पाऊँ, निकल रही है बोल नहीं।। जिसने जगत नियंता को भी, आँचल में रख पाला है। जिसके चरणों में देवों ने, अपने सिर को डाला है।। जिसकी ममता के सम्मुख है, सुरपुर का भी तोल नहीं। जग में लानेवाली माँ की, - [मां-बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-bindu-agrawal/) - मैंने उसे कभी चैन से सोते नहीं देखा। मजबूरी का रोना कभी रोते नहीं देखा।। हर वक्त थामे रहती थी वह पतवार साहस की । मुश्किलों में धैर्य कभी खोते नहीं देखा।। वह अकेली अबला ही सौ मर्दों पे भारी थी। अकेले लड़ी जमाने से,क्योंकि मां थी वह नारी थी।। उसने अपना फर्ज निभाया,भूखे रात - [वंदन करिए सुभग अवधेश को रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-91/) - वंदन करिए सुभग अवधेश को- विजया/मनोरमा छंद गीत वंदन करिए सुभग अवधेश को। संग विराजे सुता मिथिलेश को।। भव-भंजन सुख-दायक पुकारिए। कमल-नयन धनु-सायक निहारिए।। सुंदर स्वामी सिया हृदयेश को। वंदन करिए सुभग अवधेश को।।०१।। मर्यादा पुरुषोत्तम विचारिए। प्रतिपालक सर्वोत्तम उचारिए।। दशरथ नंदन सुहृद कमलेश को। वंदन करिए सुभग अवधेश को।।०२।। कल्मष हारी के पग पखारिए। - [मेरी मां - आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-11/) - शीर्षक :- मेरी माँ माँ शब्द एक और अर्थ है अनेक, यह कैसे कर दिखलाती हो । इस एक शब्द के बोझ तले, कहीं खोकर तो न रह जाती हो । है व्यंजन की तो बात कहाँ, तुम नीर भी मधु बनाती हो । वायु सा वेग, सूरज सी ऊर्जा, नित रोज कहाँ से लाती - [मां भावानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwanand-singh-5/) - माॅं माॅं हमारे जीवन का, मजबूत आधार है, ममता की मूरत है, इसे समझाइए। संसार की जननी है, सफलता की राहों में, प्रेरणा का एक श्रोत, सबको बताइए। ईश्वर का रूप है माॅं, उनकी पूजा-पाठ से, अपना जीवन आप, सफल बनाइए। माॅं हमारी ढाल भी है, और हमारी आन भी, कभी भी आप उनका,दिल मत - [हर सांस जिससे थी जुड़ी - कुमकुम कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kunkum-kumari/) - संयुत छंद (वार्णिक मापनी-112 121 121 2) गणावली-सलगा जभान जभान गा हर साँस थी जिससे जुड़ी। मुख मोड़ वो मुझसे उड़ी।। गलती हुई मुझसे यही। सच बात को सच जो कही।। किस बात से तुम हो खफा। इतना हमें अब दो बता।। चलना नहीं यदि साथ तो। अब भूल जा सब बात को।। रहना सदा - [एक पृथ्वी एक स्वास्थ्य के लिए योग -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-3/) - “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग” योग से स्वस्थ बनेगा अपना हिंदुस्तान। गोरौल की धरती से उठी यह मधुर पुकार, योग अपनाओ मिलकर, जीवन होगा साकार। वैशाली की पावन माटी देती हमको ज्ञान, तन-मन स्वस्थ रहे सदा, यही योग का मान। एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य का सुंदर यह संदेश, योग से दूर होंगे रोग, - [बेमौसम बारिश रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-90/) - बेमौसम बारिश - बाल कविता बेमौसम जब बारिश आई। गर्मी से कुछ राहत पाई।। पर आँधी तूफान लिए थी। अम्मा को हलकान किए थी।। बात पते की हमें बताई। बेमौसम जब बारिश आई।।०१।। उखड़े टूटे पेड़ दिखाकर। चोट-मोट की बात बताकर।। बड़े प्यार से गले लगाई।। बेमौसम जब बारिश आई।।०२।। बिजली घातक गिरती इसमें। खतरा - [मां की याद सताती है -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-16/) - मां की याद सताती है गर्भकाल से हीं जो हमपर ममता प्रेम लुटाती है, स्वस्थ काया को मेरे खातिर ,रोगग्रस्त कर जाती है । मेरे सुरक्षा के कारण वो, हरपल देव मनाती हैं। इसलिए हर सुख - दुख में बस मां की याद सताती है। जिह्वा- स्वाद को भूल के वह, उबला खाकर रह जाती - [मां की ममता -हर्ष नारायण दास](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/harsh-narayan-das/) - शीर्षक- मां की ममता मां --- मेरा पहला संसार। सदा देती खुशियां अपार। मां का प्रेम अपनी सन्तान के लिए , होता है गहरा और अटूट। अपनी सन्तान के लिए सदा, मेहनत करती भरपूर। मां की महिमा है धन्य धरा पर, मां से ही है सृष्टि का सृजन। त्याग, समर्पण ही है इसका भूषण । - [श्री राम नाम की महिमा गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-15/) - श्रीराम नाम की महिमा ।। ॐ सीतारामाभ्यां नम: ।। श्रीराम नाम है परमात्मा श्रीहरि विष्णु का अद्भुत, अलौकिक नाम । श्रीराम नाम है ब्रह्म और प्रणव(ॐ) का वाचक, है यह अमूल्य नाम ।। बोलो राम राम राम.... श्रीराम नाम की महिमा है बड़ा ही अपरम्पार। मैं क्या कहूं, मुझमें कहां है ऐसा सामर्थ्य अपार ।। - [मां तेरी आगोश में -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-15/) - मां तेरी आगोश में मेरी खुशियों के खातिर मां बरगी डैम पर आई थी , बाहों में कसकर मुझपर तुम,कितना प्यार लुटाई थी।। प्रकृति के थे सौंदर्य निराले,उसपर तेरा अनुपम प्यार। कर रहे थे बड़े मजे से,तेरे संग नौका विहार।। लाईफ जैकेट तुझे मिला पर,सुरक्षा कवच मेरी तुम थी मां। मुझे यकीं था कुछ नहीं - [श्याम सखा का इंतज़ार है -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-89/) - श्याम सखा का इंतजार है- अपरांतिका छंद गीत अठकल-रगण-लघु-गुरु राधा का दिल बेकरार है। श्याम सखा का इंतजार है।। मिलने अब तो श्याम आइए। मान वचन का तो निभाइए।। बिना तुम्हारे अंधकार है। श्याम सखा का इंतजार है।।०१।। होंठों की लाली निहारिए। होती उदास है विचारिए।। आँखों में बस अश्रुधार है। श्याम सखा का इंतजार - [मां -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-14/) - माँ शब्दों से परे, अपरिभाषित रिश्तों की नाजुक डोर से बंधी माँ से शुरू जिंदगी माँ ही जिंदगानी माँ आदि और अंत है माँ न कभी खत्म होने वाली कहानी। माँ सुरक्षा का एहसास, माँ जीवन के धूप छाँव में रहे खास, माँ मरूभूमि में बुझाती प्यास, माँ हर मर्ज की दवा माँ दर्द में - [मां -डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-15/) - माँ माँ! सुंदर ! बहुत सुंदर, शब्द ब्रम्ह समाया , अंतस्थ अन्तर्मन रोम रोम, स्पंदन समर्पण सुंदर सुरभित चितवन! माँ! मेरी संगिनी, प्रेम की रागिनी, दुलार की अद्भुत सरिता, प्रेमाश्रु की अथाह मीठी नदी। माँ! कोमल स्पर्श, ममता का दर्प हरती है सब दंश, मैं तो मां का अंश। माँ! बसती मुझमे, मैं संवरती उससे, - [किताब - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-27/) - विषय -किताब। शीर्षक -एनसीआरटी में। एनसीआरटी में हे सखिया, नै छपलै अभी वर्ग नौ के किताब। जब बच्चा स्कूल पढ़ै लय जेतै , बिना किताब केअ घर एतै निराश। एनसीआरटी में हे बिना किताब केअ बच्चा स्कूल नै जाय छै, किताब जल्दी छपबाबू सरकार। एनसीआरटी में हे बिना किताब केअ बच्चा कोना केअ पढ़तै , - [राधे राधे -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-88/) - राधे-राधे- माया छंद गीत वर्णिक २२२-२, २११-२२१-१२२ राधे-राधे, जो जन गाते रहते हैं। गोपाला को, नित्य सखा जो कहते हैं।। कंसारी से, कष्ट सदा जो बतलाते। माया का वे, ग्रास नहीं हैं बन पाते।। भूलें जो भी, आतप ढेरों सहते हैं। राधे-राधे, जो जन गाते रहते हैं।।०१।। कान्हा का ही, रूप लिए बालक सारे। देखो - [आतप रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-87/) - आतप- रोला छंद गीत आतप से हलकान, हुए अब जन है सारे। बहुत बनें नादान, समझ कब पाए प्यारे।। तरुवर डाले काट, खूब उत्पात मचाया। धरा उगलती आग, नहीं है शीतल छाया।। पेड़ लगाना भूल, खोजता साधन केवल। कलयुग किया विकास, प्रकृति की दोहन के बल।। चिंता में अब लोग, बने फिरते बेचारे। आतप से - [मजदूर की मजबूरी बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bindu-agrawal-3/) - मजदूर की मजबूरी वो चल पड़ा अपने कर्म के पथ पर लिए अपने हुनर का नूर, अपने घर परिवार से दूर किसी अनजान के बीच सुदूर। किसी शहर में काम खोजता दर-दर भटकने को मजबूर, जिसकी कोई पहचान नहि, मान नहि, सम्मान नहि कहलाता है वो मजदूर। कई अट्टालिकाओं की नीवं उसने है रखी, कई - [मजदूर -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-14/) - मजदूर कभी चिमनियों में ईंट बनाते, कभी ईंट वह स्वयं बन जाते। कभी कारखानों , उद्योगों की, श्रम अग्नि में स्वयं तपाते। कभी ऊंची इमारतों के ऊपर चढकर, अपनी जीवन का दांव लगाते। स्वयं अधूरे रहकर सबके ,सपनों में रंग भर जाते। दो जून की रोटी खातिर हर दिन, मौत से जूझते देखा है, हां - [तुम्हे देखकर अंकुरित प्रणय -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-86/) - तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय- गीत तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय। होता स्पंदित है नित्य निलय।। यौवन अंगराई आज अजब। फैलाई जुल्फें झटक गजब।। आओ कर लें अहसास विलय। तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय।।०१।। ले मंद-मंद मुस्कान अधर। कातिल है चंचल शोख नजर।। हिय में लाती है आज प्रलय। तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय।।०२।। लेकर पलकों का बोझ नयन। - [खेल खेल में- रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-12/) - खेल खेल में खेल खेल में उसने सीखा जिंदगी के गुण, हार जीत में नही बदलो जीवन के धुन, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रखो एक दूजे संग ईर्ष्या नही रखो बात लो यह तुम सुन। जाति-पांति का भेद भूलाकर खेलो तुम अमीर हो या गरीब सबको ले लो तुम मन में नही कोई पूर्वाग्रह कभी पालो, भाईचारे - [स्वास्थ्य ही धन है -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-10/) - स्वास्थ्य ही धन है अच्छी आदत तुम अपनाओ, रहो स्वस्थ और खुशियाँ पाओ, स्वास्थ्य से बड़ा नही कोई धन है उत्तम स्वास्थ्य और धनवान बन जाओ। हरी सब्जियां फल तुम खाओ, तेल मसाले कम उपयोग में लाओ, सन्तुलित भोजन की आदत डालो स्वस्थ जीवन फिर तुम पाओ। शारीरिक श्रम की आदत डालो योग व्यायाम नियम - [सरकारी स्कूल में हमर नाम-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sarkari-school-me-hamar-naam-nitu-rani/) - लिखाए दाएअ हौ पापा सरकारी स्कूल में हमर नाम ---२। सरकारी स्कूल में आब सब कुछ मिलै छै, खाना मिलै छै कपड़ा मिलै छै किताब मिलै छै काॅपी मिलै छै नै लागै कुछो के दाम लिखाए दाएअ हौ पापा ---२। सरकारी स्कूल केअ शिक्षक बढ़ियाँ पढबै छै, बच्चा जबतक नै समझै तब तक समझाबै छै - [इंतजार रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-11/) - इंतजार वक्त के शिकंजे में कसे हो फिर क्यों करते हो बेहतर वक़्त का इंतजार। जो मिला है वही बेहतर है, कर लो उससे जी भर कर प्यार। बेहतर के इंतजार में जो मिला है उसको भी तुम खोओगे भविष्य के गर्भ में क्या छुपा कौन जानता कौन जानता हँसोगे या फिर रोओगे। तुरन्त ही - [नयन कटारी -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-85/) - नयन कटारी- मानस छंद गीत वर्णिक १११-१२२, २११-११२ नयन कटारी, यौवन तन के। विकल निगोड़ी, पायल खनके।। मृदुल लता सी, मोहक लगती। अधर अनोखी, प्रेमिल ठगती।। सरस सुधा सी, आसव निकले। विहँस हमेशा, अंतस कुचले।। सघन घटा सी, अंजन बनके। नयन कटारी, यौवन तन के।।०१।। बनकर रंभा, नर्तन करती। रति बन जैसे, संयम हरती।। नजर - [शिव भजन -गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-14/) - शिव भजन शिव शिव हर हर जपो निरंतर । साम्ब सदाशिव शम्भो महेश्वर ।। ओं हर हर हर महादेव-2 नीलकण्ठ विश्वनाथ उमावर । गिरिजापति के चरण शरण धर ।। ओं हर हर हर महादेव-2 गौरीपति के नित्य ध्यान कर । करे सुमंगल हर शिव शंकर ।। ओं हर हर हर महादेव -2 शिवशंकर का तू - [भजन से परम धाम पाइए - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhajan-se-param-dham-paiye-ram-kishor-pathak/) - सहज नाम बस राम गाइए। भजन से परम धाम पाइए।। सहज पाप करते हुए कभी। हृदय ताप धरते हुए कभी।। गरल मोह तजते हुए कभी। महज भाव रखते हुए कभी।। दुसह बात रब को बताइए। भजन से परम धाम पाइए।।०१।। मन अशांत जब आपका रहे। ग्रसित रोग तन सर्वदा कहे।। विकल क्लांत अति वेदना सहे। - [पुस्तक -राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pustak-ram-kishor-pathak/) - जबसे मैंने प्रीत लगाई। हर मुश्किल का हल है पाई।। गर्वित जिससे मेरा मस्तक। क्या सखि? साजन! न सखी! पुस्तक।।०१।। मन की पीड़ा को हरता है। उर में वह संबल भरता है।। दुविधा कभी न देती दस्तक। क्या सखि? साजन! न सखी! पुस्तक।।०२।। सहज समस्या हल बतलाए। नित्य नवल ही राह दिखाए।। भर देता है - [सैनिक - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sainik-ram-kishor-pathak/) - प्रहरी बनकर डटे हमेशा, रखते भारत को स्वाधीन। वीर हमारे सारे सैनिक, राष्ट्र सुरक्षा में तल्लीन।। हर मौसम में सीमाओं पर, हर-पल रहते हैं तैनात। पड़े सामने दुश्मन तो फिर, दिखलाते उनको औकात।। वक्ष चीरकर लहू निकाले, सीने पर होकर आसीन। वीर हमारे सारे सैनिक, राष्ट्र सुरक्षा में तल्लीन।।०१।। पीठ दिखाना जिसे न आता, भारत - [उपलब्धि-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/uplabdhi-girindra-mohan-jha/) - सूर्य की उपलब्धि है कि सबको रोशनी, ऊर्जा, जीवन-शक्ति मिले, वृक्ष की उपलब्धि है, सबको फल-फूल, सुगंध, वायु, छाया मिले, पहाड़ की उपलब्धि है, वह अडिग, अटल रहे, रक्षा करे बिन हिले-डुले, नदियों की उपलब्धि है, सबको जल की आपूर्ति हो, समुद्र से वह जा मिले, प्रकृति में सबकी उपलब्धि है, सबको लेश मात्र भी - [गर्मी -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-84/) - गर्मी- हास्य-व्यंग्य कुंडलियां गर्मी भीषण पड़ रही, सूरज हुए प्रचंड। व्याकुल सारे लोग हो, खोज रहे हैं ठंड।। खोज रहे हैं ठंड, छाछ लस्सी हैं पीते। छुपकर रहते गेह, कैद में जैसे जीते।। पर कैसा संयोग, बात में है बेशर्मी। गर्म माँगते चाय, पड़े कितनी भी गर्मी।।०१।। गर्मी आते ही सभी, हो जाते बेहाल। तन - [किताब -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-10/) - शीर्षक - किताब । सब चीजों सबसे प्यारी, होती है किताब । उलझे - उलझे हर सवाल का, देती है जवाब । इसको पढ़कर बन जाता है, मूर्ख भी विद्वान । अनपढ़ शिक्षित हो जाता है, पा लेता है ज्ञान । कोई छोटी, कोई मोटी, होती है किताब । कोई कठिन तो कोई सरल, होती - [आओ वृक्षारोपण करके पर्यावरण बचाये- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-83/) - आओ! वृक्षारोपण करके, पर्यावरण बचायें - सार छंद गीत धरा श्यामली कुंठित रहती, मिलकर उसे हसायें। आओ! वृक्षारोपण करके, पर्यावरण बचायें।। तरुवर हमने जमकर काटे, धरती हुई विरानी। हरी-भरी धरती की केवल, सुनते अभी कहानी।। पुनः धरा पर वृक्ष लगाकर, हरियाली लौटायें। आओ! वृक्षारोपण करके, पर्यावरण बचायें।।०१।। आग उगलने वाली गर्मी, तन सबका झुलसाती। हाय! - [पुस्तक- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-82/) - पुस्तक- गीता छंद गीत २२१२-२२१२, २२१२-२२१ पुस्तक सदा वरती हमें, शुभ ज्ञान का आधार। है मित्र सच्चा मान लो, सपना करे साकार।। अच्छे बुरे के भेद का, देता सहज ही ज्ञान। दोस्ती करो इससे अगर, होता नहीं नुकसान।। करता सतत हर-पल सहज, अज्ञानता पर वार। पुस्तक सदा वरती हमें, शुभ ज्ञान का आधार।।०१।। हमको मिलाती - [किताबें - रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-13/) - किताबें दर्द में मरहम सी, तन्हाई में सच्ची साथी, खुशियों में साथ रहकर ये अपने होने का एहसास कराती। किताबें न जाने कितने ही अनसुलझे प्रश्नों का हल लेकर आती। किताबें दुनिया भर की सैर कराती, नए नए लोगों से मिलवाती नए स्वाद,नए रहन-सहन का बतलाकर कहीं भी अनजाना नही रहने देती किताबें न जाने - [क्या छूट रहा है प्रकृति प्रेम - अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/awadhesh-kumar-7/) - क्या छूट रहा है प्रकृति प्रेम ? ​वो पीपल की ठंडी छाँव, अब बस यादों में बसती है, विकास के इस भागदौड़ में, सांसें अब बहुत सस्ती हैं। वो गौरैया का चहचहाना, वो भोर का सुहाना मौसम, सब कंक्रीट के जंगल में खो गया अब? गमलों में खिलते हरियाली को, हम प्रकृति प्रेम मान बैठे - [लड़ी रह गई - रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-81/) - लड़ी रह गई- गजल २१२-२१२-२१२-२१२ आँख ज्यों ही लड़ी फिर लड़ी रह गई। मैं उसे वह मुझे देखती रह गई।। यूँ उठाकर पलक देख तुझको लिया। चाल मेरी रुकी की रुकी रह गई।। हुस्न तेरा दिखा तो बुरा हाल है। आँख मेरी खुली की खुली रह गई।। जुल्फ से कुछ छिटककर गिरी गाल पर। और - [परोपकार - गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-13/) - परोपकार आत्मप्रगति के संग जिनका हो परोपकारी जीवन, उन्हीं का जीवन धन्य है, है धन्य उन्हीं का मरण, अपनी जीवन-यात्रा पर ध्यान देते सदा आगे बढ़, आत्मप्रगति संग बिना अभिमान के परोपकार कर, बिना प्रत्युपकार की आशा के तू सदा उपकार कर, अपने किये उपकार को भूल, कोई अभिमान न कर, प्रभु को कर्ता, खुद - [साथ रहते गए-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sath-rahte-gaye-ram-kishor-pathak/) - तंज कसते गए। अश्क बहते गए।। मान मैंने लिया। और सहते गए।। दर्द पीकर सभी। मस्त हँसते गए।। रंज कोई नहीं। साथ रहते गए।। होश सबके उड़े। लोग कहते गए।। बात होती गई। राज खुलते गए।। राह धीरे मगर। रोज चलते गए।। पाँव रोका नहीं। पास बढ़ते गए।। चाह थी जो हमें। खास मिलते गए।। - [प्यारी धरती-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pyari-dharati-ashish-ambar/) - जीवन जहाँ पर संभव होता, धरती है वह सुन्दर उपवन । करें सुरक्षा इस धरती की, मिलकर हर प्राणी और जन । हरे - भरे प्यारे वन, सुन्दर ये नजारे, कल - कल करता झरना, देखो कितने प्यारे । खुशियों से चहकती परिंदे और लहराती हवाएँ, धरती नी अद्भुत गोद में जीवन खूब मुस्काए । - [मच्छर-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/machchhar-ram-kishor-pathak/) - हर-पल आकर गीत सुनाता। चुंबन लेकर ही वह जाता।। नींद हरण कर लेता अक्सर। क्या सखि? साजन! न सखी! मच्छर।।०१।। छेड़-छाड़ दिन रैन करे वह। नटखट बन बेचैन करे वह।। रहूँ बदलती करवट बिस्तर। क्या सखि? साजन! न सखी! मच्छर।।०२।। अंग-अंग पर प्यार जताता। अपना वह अधिकार बताता।। छूने को वह रहता तत्पर। क्या सखि? - [एक दिन बिना बिजली - विकास कुमार साव](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-din-bina-bijalee-vikash-kumar-saav/) - एक दिवस जब बिजली रूठी, सुख-सुविधा की डोरी टूटी। ठिठक गया है सब जन-जीवन, थमा हुआ सा लगता आँगन।। मौन पड़ा है अब तो पंखा, मन में जागी कई आशंका। शोर न करती कोई स्क्रीन, हुए सभी अब सुर से विहीन।। अलार्म का भी स्वर है सोया, समय कहीं अँधियारे खोया। गर्मी की जो तपन - [धरती माँ का ये आँगन प्यारा - बबीता कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dharatee-maan-ka-ye-aangan-pyaara-babeeta-kumari/) - धरती माँ का ये आँगन प्यारा, हरियाली से सजा है सारा। पेड़, पौधे, नदियाँ, पर्वत, इनसे ही जीवन है समृद्ध। मत काटो इन वृक्षों को यूँ, ये देते हैं जीवन का सुकून। शुद्ध हवा और ठंडी छाया, इनसे ही है जीवन की माया। नदियों को मत गंदा करो, जल ही जीवन - इसे समझो। हर - [मिट्टी से भी यारी रख - सत्य नारायण सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mittee-se-bhee-yaaree-rakh-saty-naaraayan-sinh/) - मिट्टी से भी यारी रख, दिल से दिलदारी रख। चोट न पहुंचे बातों से, इतनी समझदारी रख। पहचान हो तेरी हटकर, भीड़ मे भी कलाकारी रख। पल भर ये जोश जवानी का, बुढ़ापे की भी तैयारी रख। धरती की गोद क़ो, हरदम हरियाली रख। प्राण वायु देते है हर पादप वन उपवन प्रीत प्यारी रख। - [मैं और मेरा समाज -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-29/) - विषय -मैं और मेरा समाज। शीर्षक -ये दोनों देते एक दूसरे का साथ। मैं और मेरा समाज करते हैं, मिलकर सारे काम- काज। मैं और मेरा समाज हीं मिलकर भगाएँगे, समाज की कुरीतियांँ और अंधविश्वास। मैं और मेरा समाज हीं बंद करेंगे, दहेज प्रथा,बाल मजदूरी एवं बाल विवाह। मैं और मेरा समाज हीं मिलकर रचेंगे - [मधुर रिश्ता बनाएँ - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/मधुर-रिश्ता-बनाएँ-राम-किश/) - चलो सबसे मधुर रिश्ता बनाएँ। चलो अपनी सभी रंजिश मिटाएँ।। नहीं रखना सदा शिकवा किसी से। चलो मिलकर गले सबको लगाएँ।। मिला जितना मुकद्दर में किसी को। अधिक उससे किसे बोलो दिलाएँ।। करो नेकी बिना सोचे यहाँ पर। सभी देंगे खुशी से ही दुआएँ।। बड़ा ही वक्त है जालिम समझ लो। नहीं यह एक सा - [एक दिन बिना बिजली-विकास कुमार साव](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-din-bina-bijali-vikas-kumar/) - एक दिवस जब बिजली रूठी, सुख-सुविधा की डोरी टूटी। ठिठक गया है सब जन-जीवन, थमा हुआ सा लगता आँगन।। मौन पड़ा है अब तो पंखा, मन में जागी कई आशंका। शोर न करती कोई स्क्रीन, हुए सभी अब सुर से विहीन।। अलार्म का भी स्वर है सोया, समय कहीं अँधियारे खोया। गर्मी की जो तपन - [धरती माँ- बबीता कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dharati-ma/) - धरती माँ का ये आँगन प्यारा, हरियाली से सजा है सारा। पेड़, पौधे, नदियाँ, पर्वत, इनसे ही जीवन है समृद्ध। मत काटो इन वृक्षों को यूँ, ये देते हैं जीवन का सुकून। शुद्ध हवा और ठंडी छाया, इनसे ही है जीवन की माया। नदियों को मत गंदा करो, जल ही जीवन - इसे समझो। हर - [प्रकृति प्रहरी- सत्य नारायण सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prakriti-prahari/) - मिट्टी से भी यारी रख, दिल से दिलदारी रख चोट न पहुंचे बातों से, इतनी समझदारी रख पहचान हो तेरी हटकर, भीड़ मे भी कलाकारी रख पल भर ये जोश जवानी का, बुढ़ापे कि भी तैयारी रख..! धरती कि गोद क़ो, हरदम हरियाली रख प्राण वायु देते है हर पादप वन उपवन प्रीत प्यारी रख - [एक क्षण](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/एक-क्षण/) - एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए ( गीत) एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए । भावनाओं के नव उन्नयन के लिए ।। बढ़ रहा आज तम, रौशनी क्षीण है सूखते सर सभी, व्यग्र सी मीन है संतुलन आज सारा बिगड़ने लगा घन प्रतीक्षा निरत हैं पवन के लिए । एक क्षण चाहिए नव - [लोरी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/लोरी/) - स्वरचित एवं मौलिक रचना रचनाकार - योगेश कुमार पाण्डेय उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया 8851142751 1. "दिल मोरा घबराए रे" पागलपंती करे इ मनवा दिल मोरा घबराए रे। कूद-कूद के पेड़ प' बइठे चिरई उड़-उड़ जाए रे कभी कूद छानी पर जाए कभी नीचे गिर जाए रे पागलपंती करे इ मनवा दिल - [जग कैसे सुख पाए रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-80/) - जग कैसे सुख पाए- सार छंद गीत हाहाकार मचा है जग में, कौन किसे समझाए। युद्ध थमेगा अगर नहीं तो, जग कैसे सुख पाए।। सनकी सत्ता के भोगी ने, की ऐसी नादानी। गाजर मूली सी जनता को, जिसने हर-पल मानी।। झूठी अकड़ दिखाता रण में, बम गोले बरसाए। युद्ध थमेगा अगर नहीं तो, जग कैसे - [किताबों की दुनिया संजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sanjay-kumar/) - किताबों की दुनिया पार्ट 2 इसकी दुनिया में गाँव का सरल जीवन है जिसमें खेतीवारी और दुनियादारी है तो गाँव का साहू और समाज की मक्कारी भी होरी जैसा ठगा जानेवाला किसान है तो दिन रात मेहनत करने के बाद भी एक अदना सा कम्बल नहीं खरीदपाने की कसक लिए पूस की रात में ठिठुरता - [बालगीत : क्रिकेट](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बालगीत-क्रिकेट/) - ** क्रिकेट ** आओ खेलें खेल क्रिकेट, बीच में गाड़ो तीन विकेट। आपस में दो टीम बनाकर, फील्डिंग कर लो सब सेट। बाइस गज़ की दूरी से, बॉल लेकर तैयार रहो। सामने बड़े भैया भी, बैट लिए तैयार रहो। लगते ही जब बैट पे गेंद, दो विकेट के बीच दौड़ो, इसे ही कहते - [पढ़ेगा कौन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/पढ़ेगा-कौन/) - पढ़ेगा कौन दीदी... पढ़ेगा कौन? दीदी... पढ़ेगा कौन? दीदी नहीं पढ़ेगी तो, मुझको...पढ़ाएगा कौन? दीदी... पढ़ेगा कौन? दीदी... पढ़ेगा कौन? पढ़ने के समय पर, खेलेगी दीदी, खेलेगी दीदी और देखेगी मोबाइल, तो पढ़ने के समय पढ़ेगा कौन? पढ़ेगा कौन? पढ़ेगा कौन? दीदी... पढ़ेगा कौन? दीदी... पढ़ेगा कौन? ब्रजेश कुमार वर्मा प्रधान - [होनहार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/होनहार/) - *होनहार* विद्यालय की घंटी अब सुबह-सुबह पुकारती है, नींद भरी आँखों में भी नई राह सँवारती है। बिस्तर से उठते ही मन में एक बेचैनी छाई है, पढ़ने की चाहत ने हर सुस्ती को हराई है। दादी जो रोज सवेरे मुस्काकर हमें जगाती थीं, आज चुपचाप बिस्तर पर ही उनींदी-सी सो जाती हैं। लगता है - [भीम महान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/भीम-महान/) - ।।भीम महान।। -ब्रजेश कुमार वर्मा- आज है 14 अप्रैल का दिन, आज का दिन है बड़ा महान। आज के दिन ही जन्म लिये, भारत रत्न भीम महान।। पढ़ें-लिखें वह देश-विदेश, किये बहुत बड़े ही नाम। बने प्रमुख प्रारुप-समिति, अंकित कर गये अपने नाम।। आरक्षण देकर दलित-पिछड़ों - [गाँव मेरा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/principal/) - गांव मेरा भी अब मुस्कुराता नहीं ( ग़ज़ल) गांव मेरा भी अब मुस्कुराता नहीं। आह भरता मगर गुनगुनाता नहीं।। शब्द सोहर के जाने कहां खो गए। अब ये विरहा पराती सुनाता नहीं।। खेत में कंक्रीटों की उगती फसल। धान गेहूं कोई अब उगाता नहीं।। अजनबी बन गए गांव के लोग भी। कोई भी अपने सर - [कमल नयन से राधा कहती -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rankishor-pathak/) - कमल नयन से राधा कहती- राधा रमण छंद गीत १११-१११-२२२-११२ कमल नयन से राधा कहती। निसदिन उर में पीड़ा रहती।। हर-पल मुरली छेड़ा करते। दिनभर वनिता डेरा धरते।। अनबन सखियों की मैं सहती। कमल नयन से राधा कहती।।०१।। कुछ पल अपना दे दो मुझको। निज कर अपने ले लो मुझको।। प्रिय हिय सरिता धारा बहती। - [राधा माधव सबने बोला -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-79/) - राधा माधव सबने बोला- प्रणव छंद गीत राधा माधव सबने बोला। कैसे अंतस किसने खोला।। जो है कृष्ण भजन में भाई। माया क्योंकर डँसने आई।। काला क्यों फिर उसका चोला। राधा माधव सबने बोला।।०१।। डूबें सागर भव में सारे। देखो मोहन किसको तारे।। छोड़ा स्वार्थ सहज जो झोला। राधा माधव सबने बोला।।०२।। जीवों से समरस - [सुकून से गाने दो -रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ratna-priya-3/) - सुकून से गाने दो जीवन का नया संगीत, मुझे गुनगुनाने दो, बंशी बजाऊँ चैन की, सुकून से गाने दो । रंग खिले दीप सजे, हर कोना उजियारा हो, अंधेरों से लड़ता रहे, वह दीप हमारा हो, झंझावातों से लड़कर, विजय मुझे पाने दो । बंशी बजाऊँ चैन की, सुकून से गाने दो । मंजिल का - [किरदार -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-78/) - किरदार- सरसी छंद आधारित गीत पावन भूतल धरा धाम यह, हम सबका आधार। रंगमंच सा मंचन करते, यहाँ सभी किरदार।। जिसको जितना साँस मिला है, उतना उसका पाठ। अपने-अपने हिस्से में सब, लिए फूल या काठ।। अभिनय सबके अलग-अलग हैं, अलग सभी व्यवहार। रंगमंच सा मंचन करते, यहाँ सभी किरदार।।०१।। अपने-अपने कर्मो से सब, निभा - [मैं डुबाता है मुझे ही भँवर में - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-dubata-hai-mujhe-ho-bhanwar-me-ram-kishor-pathak/) - मैं डुबोया है मुझे ही भँवर में। हो अकेला रह गया मैं शहर में।। है फिकर किसको यहाँ दूसरे की। स्वार्थ बस रहता यहाँ हर नजर में।। खास हूँ का भ्रम लिए उम्र भर मैं। ठोकरें खाता रहा हर डगर में।। सुर्खियों में था कभी गर्व से मैं। आज दिखता भी नहीं मैं खबर में।। - [बाबा साहब का जन्मदिन है आया-मृत्युंजय कुमार ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baba-saheb-ka-janmdin-hai-aya-mrityunjay-kumar/) - देखो आज 14 अप्रैल है आया, बाबा साहब का जन्मदिन है लाया। मिलजुलकर बाबा साहब का जन्मदिन मनाएंगे, अपने दिलों में हमेशा उनको बसाएंगे। संविधान जनक कहलाते हैं, हमसब के द्वारा हमेशा पूजे जाते हैं। समानता का अधिकार देश को दिए, अपने तो खुद कुछ नही लिए। जब-जब संविधान की बात आती है, बाबा साहब - [बाबा साहेब-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baba-saheb-ruchika/) - अपने भाग्य को तुम आकार दो, स्वतंत्रता समानता स्वीकार लो, गलतियों से सदा सीखो तुम, गौरवशाली अतीत को सम्मान दो। बाबा साहेब की ये सारी बातें हैं, संविधान रूपी देश को दी सौगातें हैं, संघर्ष को जीवन मूल माना जिसने धर्म मनुष्य के लिए दिन और रातें हैं। शिक्षित होने पर जिसने जोर दिया, संगठित - [Water wouldn't sound so melodious-Ashish Kumar Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/water-wouldnt-sound-so-melodious-ashish-kumar-pathak/) - Water Wouldn't Sound so melodious If there were no rocks in their way Rainbows of colors are created Only if Rains intercept Sunshine Someway Every Rock in River's path is part of River's lifesong lifelong Your struggles so constant Eventually becomes your melody Rocks carrying moss has more meaning Than carrying nothing at all Like - [जिसने मिटाया छुआछूत-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jisane-mitaya-chhua-chhut-nitu-rani/) - भारत के ये वीर सपूत, जिसने मिटाया छुआछूत। रामजी मालोजी सकपाल के थे सुपुत्र भीमाबाई के थे चौदहवीं पुत्र। गरीब परिवार में लिए अवतार, व्यक्तियों में बन गए सबसे खास। रोज पढ़ने जाते थे स्कूल, शिक्षक बैठाते थे सभी बच्चों से दूर। जब लगती थी इन्हें प्यास , कोई नहीं देता था इनको गिलास। जाते - [गंगाधर शिव को मन रखिए-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gangadhar-shiv-ko-man-rakhiye-ram-kishor-pathak/) - गंगाधर शिव को मन रखिए। भोले बम-बम का फल चखिए।। हैं सुंदर शिव शंकर सबके। लेते अघ हर मानव जन के।। मायापति वृषदा दुख भखिए। गंगाधर शिव को मन रखिए।।०१।। ओमेश्वर नट मालिक जग के। न्यायी अनमय रक्षक सबके।। दाता हिय निज चिंतन लखिए। गंगाधर शिव को मन रखिए।।०२।। हैं शोभन मुनि मंगल करते। आलोकित - [पिंजड़ मन को अब तोड़ो -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-76/) - पिंजर मन को अब तोड़ो- गीतिका पिंजर मन को अब तोड़ो। दुनिया से नाता जोड़ो।। कैद हुए क्यों कोने में। कायरता को अब छोड़ो।। आसमान की सैर करो। तन को अब नहीं सिकोड़ो।। कदम बढ़ाकर तो देखो। शूलों से मुख मत मोड़ो।। मंजिल कदमों में होगी। भय के गुब्बारे फोड़ो।। प्रेम सार है जीवन का। - [बात हमारे रामायण की- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baat-hamare-ramayan-ki-ram-kishor-pathak/) - त्याग तपस्या और प्रेम की, बातें करती नानी। बात हमारे रामायण की, जिसमें राम कहानी।। दशरथ नंदन चारो भाई, अद्भुत अवध दुलारे। असुर निकंदन कहलाए जो, भटके कानन प्यारे।। नहीं किसी को राज-पाट का, मन में लोभ सताया। देख समर्पण सुकुमारों का, पटकी थी सिर माया।। ऐसी गाथा और न दूजा, कोई जिसकी सानी। बात - [मैं तो हूं दिलवाला - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-to-hu-dilwala-jainendra-prasad-ravi/) - कोई करें सजदा मंदिर में या भजन करें शिवाला। मैं घूमूंँ गलियों में यूं ही बनकर बंसी वाला।। हिंदू-मुस्लिम सिख-इसाई सबको मीत बनाऊंँ, साथ गाऊंँ कव्वाली-होली मिलकर ईद मनाऊँ। मुझे नहीं है बैर किसी से मैं तो हूंँ दिल वाला।। भाई से भाई को बांँट चलाते जो नफरत की दुकान, निजी स्वार्थ के खातिर अपना - [कैसे आदर सबसे पाएं -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-77/) - कैसे आदर सबसे पाएँ- प्रणव छंद गीत कैसे आदर सबसे पाएँ। आँखों में बस सबकी जाएँ।। ऐसी चाहत सबकी होती। भूलों में फिर दुनिया खोती।। जैसी आदत जिसकी होती। वैसा ही वह गहता मोती।। सारे सुंदर सपने ध्याएँ। कैसे आदर सबसे पाएँ।।०१।। पाऊँ दौलत सुविधा सारी। मारूँ ठोकर दुविधा भारी।। देवों से रख अपनी यारी। - [जाऐब हमहूँ स्कूल ( मैथिली बाल कविता)](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/जाऐब-हमहूँ-स्कूल-मैथिली-ब/) - बाल कविता माय जाऐब हमहूँ स्कूल , हम छि बगियाक सुन्दर फूल । पढ़ब - लिखब हम नाम कमाऐब, मात - पिताक प्रतिष्ठा सँ बढ़ाऐब । अनपढ़ रहबाक बड़का अछि भूल, ज्ञानी होएबाक अछि संसारक मूल । हमहूँ आखर बोध कराऐब, ककहरा सीख कँ गणित बनाऐब । भाषाक ज्ञान केर महत्ता जानि, अप्पन - [गूंजे आपस की लाली -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-31/) - गूँजे आपस की लाली। दो धर्मों के मेल निरंतर,सुख की धार बहाते हैं। कुछ ऐसे कट्टरपंथी हैं,लपट कटार उठाते हैं।। जब तक यह संबंधन कायम,प्रेम की बंसी बजती है। गंगाधार पलट जाए तो, मानवता भी लजती है।। मन करता है रच बस जाएँ एक ही बाग बगीचे में एक महल में रहना सहना, झाँकें एक - [Head Master](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/head-master/) - अंगिका कविता 1. पानी पानी पानी होय गेलय लोग पानी रॅ प्रबंध मॅ तैयो कोय नै सोचय छै पानी रॅ संबंध मॅ । ताल तलैया सुखी गेलय सुखलय गांमाॅर कुईयाँ दूर दराज सॅ पानी लानैम छुटय छै आबे धुईयाँ । दिक्कत सहतै मकटा ढोते पर पानी कोय नय बचैतय हम्में तोंय - [विकसित भारत गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gorindra-mohan-jha/) - विकसित भारत हमारे देश भारत का ऐसा होगा रूप, विश्व भर में यह रहा है, रहेगा सदा अनूप, सड़कें, बिजली, स्वास्थ्य, हर घर में रोजगार, शिक्षा में निरंतर विकास, हर घर हो खुशहाल, नैतिकता, अनुशासन, हर कोई हो संस्कारी, जन-जन के पास जिज्ञासा, हर कोई सदाचारी, जन-जन के पास होगा अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उच्च व - [नीला आसमान - आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-9/) - कविता शीर्षक :- नीला आसमान देखो , कितना प्यारा लगता, नीला - नीला आसमान । चमचम चमकें चाँद - सितारे, इसमें रहते सब भगवान । सुबह से लेकर शाम घूमते , चीं - चीं - चीं करते पाँखी । नभ की काया अब तक किसी ने, नहीं है परखी -जाँची । सुबह सूर्य को, रात - [भाई बहन दिवस -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-28/) - विषय -भाई, बहन दिवस। शीर्षक -दै छी भाय केअ खूब आशीर्वाद हे ना। ** हे बहिना आय छीयै भाय बहिन दिवस त्योहार हे, दै छी भाय केअ खूब आशीर्वाद हे ना। नेहेबै- सोनेबै करबै श्रृँगार ईश्वर से माँगबै भाय लय आशीर्वाद, हे बहिना भाय केअ उमर बढ़तै सौ हजार हे दै छी भाय केअ भाय - [लोड़ी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/लोड़ी/) - लोड़ी सोजा मेरा मुन्ना राजा सुनाऊँ मैं कहानी.... तेरे सपनों में आएगी परियों की रानी ...... आजा निंदिया तू चुपके-से मेरा सोना बुलाए ...... रात अकेली जागी-जागी हवा उसे सुलाए....... सोजा मेरा मुन्ना राजा सुनाऊँ मैं कहानी.... तेरे सपनों में आएगी परियों की रानी ...... चंदा मामा आएगा तुझको लोड़ी सुनाने....... तारे बादल संग आयेंगे - [चलो रे साथी चलो चलो](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/चलो-रे-साथी-चलो-चलो/) - चलो रे साथी चलो चलो... चलो चलो स्कूल चलो... चलो रे साथी चलो चलो... चलो चलो स्कूल चलो... उठाओ बस्ता कदम बढ़ाओ, खुशियों के घर जाना है... अंधियारे को दूर भगाकर, ज्ञान का दीप जलाना है। चलो रे साथी चलो चलो... चलो चलो स्कूल चलो चलो रे साथी चलो चलो... चलो चलो स्कूल चलो... आज - [शिक्षक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/शिक्षक/) - आओ खेलें खेल,चलगी अब अपनी रेल पढ़ें और लिखेंगे, बनेंगे महान हमको भी तब जानेगा सारा जगत महान करते रहेंगे अपनी मेल,आओ खेलें खेल चलेगी अब अपनी रेल अक्षर मोती लाल महान बल्लेबाजी करें महान शब्दों को आपस में जोड़ता, बनता जाता शब्द महान कविताओं के रूप में जाने सकल जहान , खेल खेल में - [शिक्षक बनना आसान नहीं ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/शिक्षक-बनना-आसान-नहीं/) - शिक्षक बनना आसान नहीं खुद को तरासना पड़ता है नन्हें हीरे को तरासने के लिए..... थके हुए बदन में भी जान डालनी पड़ती है इनके साथ चलने के लिए..... हर दिन, हर पल तरकीब नई लगानी पड़ती है कुछ नया पाठ सीखाने के लिए....... खुद को चंदन जैसा घिसकर जीवन शिष्यों - [लट्टूवा के नाच](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/लट्टूवा-के-नाच/) - लट्टूवा के नाच (बाल कविता) लट्टूवा घुम-घुम घूमेला, धरती पर रंग बनावे। ना थकाला, ना रुक जाला, सबके मनवा बहलावे। पप्पू बोले— “अरे बाप रे!” गोल-गोल जइसन चाँद। गुड़िया हँस के बोले– “ई त नाचेला दिन-रात।” जब रुक जाए लट्टूवा तब, सबके मन थोड़े उदास। फेर धक्का दे दीं हौ छोटका, फिर शुरू - [Wo bihar wala bachpan](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/wo-bihar-wala-bachpan/) - ​वो बिहार वाला बचपन ​पीपल की छइयाँ, बगिया की वो क्यारी, वो अमरुद तोड़ना, वो मज़ेदारी। याद आता है वो बिहार वाला बचपन, सत्तू का शरबत और माँ का आँगन। ​नंगे पाँव मिट्टी में वो दौड़ लगाना, पकड़म-पकड़ाई में सारा दिन बिताना। गंगा किनारे वो रेत के घरौंदे, वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश के - [तुम विज्ञान पढ़ने -गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-12/) - तुम विज्ञान पढ़ना तुम होमी भाभा, सी वी रमण, कलाम को याद करना, तुम अपने मन को जिज्ञासु, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना, धर्म, अध्यात्म, दर्शन सबको तुम विज्ञान से जोड़ना, हर घटित घटना के पीछे वैज्ञानिक कारण को ढूंढना, तुम विज्ञान पढ़ना, जीवन के हर क्षेत्र पर तुम सदा आगे ही बढ़ते रहना, हर चीज, हर - [पहले देश फिर शेष - जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-23/) - पहले देश फिर शेष त्रिभुवन में ना ऐसा, कोई है भारत जैसा, सबसे सुंदर प्यारा, हमारा ये देश है। माटी का चंदन कर वीरों को नमन करें, पहले है मातृभूमि, फिर कुछ शेष है। सागर की लहरें हैं, नदी झील झरने हैं, हरा भरा बाग-वन, स्वच्छ परिवेश है। विकास की आई क्रांति, चहुंँओर फैली शांति, - [जीवन-दर्शन-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jiwan-darshan-girindra-mohan-jha/) - तुम अपने जीवन के सुदीर्घ पथों को देख, मात्र निज जीवन-यात्रा पर फोकस करना, तेरा जीवन सहज, पवित्र, अर्थपूर्ण, परोपकारमय हो, यह जीवन-दर्शन है, ये बातें तुम सदैव ध्यान रखना । जीवन में कुछ अति नहीं, कुछ कम नहीं रखना, मध्यम मार्ग ही श्रेष्ठ मार्ग है, यह सदा याद रखना, कर्म-विचार ही तेरे वश में - [कलम से प्यार-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kalam-se-pyar-ratna-priya/) - यह लेखनी चले निरंतर, तू कलम से प्यार कर, अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द से, एक नया विस्तार कर । अक्षर-अक्षर गूँथ जाएँ तो शब्दमाला बन जाएगी , शब्दकोश की शान बढाकर, अधरों पर मुसकाएगी, हृदय कमल खिल उठेगें, मुधुपों का गूँजार कर । यह लेखनी चले निरंतर, तू कलम से प्यार कर । काव्य कवि की कल्पना - [रुद्र लिए अवतार -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-75/) - रुद्र लिए अवतार- दोहा छंद गीत चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा, रूद्र लिए अवतार। संकटमोचन रूप में, प्रकट हुए संसार।। पुत्र अंजना मातु के, पिता केसरी लाल। जन्म हुआ हनुमान का, रघुवर भक्ति मिसाल।। कपि कुल गौरव मानिए, कहते उन्हें कपीश। अजर अमर का वर गहे, हनुमत बने सतीश।। भक्त शिरोमणि बोलते, राम नाम जयकार। संकटमोचन - [राम रमन डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-14/) - राम रमन कर कण कण में हे राम रमन कर कण कण में, अब आन बसो तुम जन गण में, आनंद हो प्रतिपल जीवन में, मर्यादा पालन तन मन में। पुरुषोत्तम तुम अविनाशी तुम, इस वसुधा के सुखराशी तुम, अनंत सहज दुखनाशी तुम, जीवन के पथ के बासी तुम। हे राम तुम आ जाओ जग - [तू जीवन पथ पर चलता जा -गिरिंद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-11/) - तू जीवन-पथ पर चलता जा, कार्य सृजन के करता जा, ..... जन्म-मृत्यु के मध्य स्थित, है जीवन कर्म प्रधान, उज्ज्वल जिसका कर्म है, है जीवन वही महान। तू सतत ज्ञान प्राप्त करता जा, तू जीवन-पथ पर चलता जा, कार्य सृजन के करता जा, ...... आत्मप्रगति के साथ तू निरंतर परोपकार कर, मनसा, वाचा, कर्मणा, अर्थपूर्ण - [पौधे सुंदर लहराते हैं -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-74/) - पौधे सुंदर लहराते हैं- प्रणव छंद गीत वर्णिक पौधे सुंदर लहराते हैं। मेघों का जल यह लाते हैं।। प्राणी भोजन इनसे पाते। छाया दे हम-सबको भाते।। फूलों से जब भर जाते हैं। पौधे सुंदर लहराते हैं।।०३।। जीवों का सुरभित डेरा हूँ। पक्षी का सहज बसेरा हूँ।। सारे ही तरुवर गाते हैं। पौधे सुंदर लहराते हैं।।०३।। - [मेरा बिहार-मुन्नी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mrra-bihar-munni-kumari/) - हाॅं यह मेरा बिहार है, हाँ यह अपना बिहार है। इतिहास जिसके कदम चूमे, हाँ वह मेरा बिहार है। जहाँ बुद्ध, महावीर का त्याग छाया, सत्य - अहिंसा का संदेश लाया। अशोक की धर्म शिलालेख भाया, वीरों की गौरव गाथा गाया। हाॅं यह मेरा बिहार है। जहाँ चाणाक्य की नीति जन्मी, शिक्षा और ज्ञान की - [फागुन का महीना-मुन्नी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/fagun-ka-mahina-munni-kumari/) - फागुन का महीना आया, रंगों का त्योहार लाया। खुशियों का बौछार छाया, अपनो का प्यार पाया । लाल, गुलाबी,हरा,पीला, जब रंगों में रंग मिला। हर चेहरे पर मुस्कान खिला, मिलकर रहने का संदेश मिला। ढोल, मंजीरा, झाल बजे, गीतो की मधुर तान सजे। घर-घर पुआ, गुझिया पकवान बने, हर मन में उमंग भरें । राग, - [आज की नारी -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-7/) - आज की नारी अपने घावों से खुद ही उबरती, संघर्ष की जमीन पर एक नई पटकथा लिखती है वह आज की नारी जो नित नए आयाम को गढ़ती। दोहरी जिम्मेदारी भी निभाती स्वयं के अस्तित्व को बचाती अपनी इच्छाओं को जीती वह है वह आज की नारी जो अपने दम पर सपनों को जीती जाती। - [दहलीज -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-6/) - दहलीज हर बार वह सोचती की अब नही, मगर कदम उसके ठहर जाते थे घर की दहलीज पर घुटती रहती थी मगर हिम्मत नही जुटा पाती थी की छू ले नभ की ऊँचाई को और सिमट जाती थी अपने ही दायरे में। मिली प्रेरणा उसके वजूद को जब निकली अचानक दहलीज के बाहर। देखा कितनी - [नारी शक्ति - मुन्नी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/munny-kumari/) - नारी-शक्ति स्व-रचित-कविता नारी की शक्ति अपार, नारी की महिमा अपरम्पार। नारी में गुणों का भंडार, नारी में ममता की बहार। कभी माँ की ममता बहाती, कभी बहन बन प्यार लुटाती। कभी बेटी बन घर-आंगन महकाती, कभी पत्नी बन जीवन संवारती। माँ दुर्गा बन अन्याय मिटाती, माँ सरस्वती बन ज्ञान लुटाती। माँ लक्ष्मी बन समृद्धि लाती, - [डाली के फूल-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dali-ke-phool-ashish-ambar/) - नीले - पीले , लाल - काले, प्यारे - प्यारे , भोले - भाले , चारू - चंचल और मतवाले , भीनी - भीनी खुशबू वाले, ये डाली के फूल । कभी शरमाएँ , कभी मुस्काएँ , झूम - झूम कर नाचे गाएँ, कभी झुक जाएँ, कभी उठ जाएँ, तो कली पवन संग लहराएँ, ये - [परीक्षा केअ एलै परिणाम-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pariksha-ke-aele-parinam-nitu-rani/) - परीक्षा केअ एलै परिणाम परिणाम मेरी सखिया, झूमै छै शहर और गाम गाम मेरी सखिया परीक्षा---२। देलकै परीक्षा बच्चा एलै परिणाम सबके , नाचै बच्चा घुरि- घुरि भैर गाम। भैर गाम मेरी सखिया परीक्षा केअ एलै ---------२। कियो केलकै फर्स्ट कियो सेकेण्ड डीविजन, कियो थर्ड ककरो बुरा परिणाम। परिणाम मेरी सखिया परीक्षा केअ एलै परिणाम - [अंजन-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/anjan-ram-kishor-pathak/) - मिलकर नैना खिल-खिल जाए। अँखियों में मैं रखूँ बसाए।। है मेरे मन का वह रंजन। क्या सखि? साजन! न सखी! अंजन।।०१।। नैन बसाकर मैं इठलाऊँ। बलिहारी मैं बलि-बलि जाऊँ।। उससे पाती मैं मुख उरमा। क्या सखि? साजन! न सखी! सुरमा।।०२।। नहीं मिले तो अँखिया सूनी। उसे मिले तो चमके दूनी।। उसके लिए रहूँ मैं पागल। - [कविताएं जन्म लेती हैं-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavitayen-janm-leti-hai-manu-kumari/) - कविताएं जन्म लेती हैं - शब्द और भाव के अर्थपूर्ण मिलावट से, उन्मुक्त आकाश में उड़ते पक्षियों की चहचहाहट से। कविताएं जन्म लेती हैं - मां की ममता -दुलार हमारी संस्कृति - संस्कार से , मेहनत करते,कर्तव्य पथ पर खड़े पिता के डांट फटकार से। कवितायें जन्म लेती हैं - पेड़ की झुकती डालियों से, - [प्रेम बड़ा अनमोल-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prem-bada-anmol-ram-kishor-pathak/) - महज शब्द मत मानिए, प्रेम बड़ा अनमोल। तार साँस की जोड़ता, द्वार हृदय का खोल।। कौन बखाने प्रेम को, जो है चित का भाव। कब कैसे किससे हुआ, किसको यहाँ लगाव।। मुमकिन कुछ कहना नहीं, निकल न पाए बोल। महज शब्द मत मानिए, प्रेम बड़ा अनमोल।।०१।। साँसों का अहसास यह, हर-पल लगता खास। जिस पल - [प्रवेशोत्सव-ब्यूटी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/praveshotsav-beauty-kumari/) - नए सत्र का हुआ आगाज, गूंजेगी अब बच्चों की आवाज। विद्यालय में मनेगा प्रवेशोत्सव, परीक्षा फल प्रकाशन उत्सव । अभिभावक को आमंत्रण, शिक्षकगण करते अभिनंदन। शिक्षा की ज्योति पहुंचे जान-जान, अशिक्षा तम को दूर करें हम । बगिया में आएगा नव अंकुरण, हम करें अपने कर्तव्य का निर्वहन। शिक्षा जल से सींच - सींच, श्यामपट्ट - [प्रथम रश्मि का आना -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-13/) - प्रथम रश्मि का आना कितना मनभावन लगता है, प्रथम रश्मि का आना। सुबह-सबेरे बाल-विहंगिनी, गाती हो तुम गाना। सोए थे जो नन्हें पौधे, अलसाई सी दुनिया में। मंद-मंद पवन के झोंके, गीत सुनाएँ उपवन में। लहराती फसलों ने गाया, उत्सव का नया तराना। कर्मपथ पर अडिग हिमालय, दृढ़ निश्चय है ठाना। शांत, अचेतन, निर्मल नदियाँ, - [आखिर राम कौन है रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-73/) - राम आखिर कौन हैं?- बाल कविता राम आखिर कौन हैं? प्रश्न सुन सब मौन हैं। ले रहे सब नाम हैं। मग्न करते काम हैं।। मैं समझ पाया नहीं। भाव कुछ आया नहीं।। हो रहें क्यों गौन हैं। राम आखिर कौन हैं?०१।। माँ बताओ तो सही। राम दिखते क्यों नहीं।। नाम सब हैं जानते। भेद फिर - [श्री राम -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-26/) - विषय -श्रीराम। शीर्षक -यही है तेरा धर्म। आसन पर बैठे श्रीराम हैं पलथी मारे, देख रहे हैं सभी लोगों के क्रिया कलापों को सारे। क्या- क्या कर रहे लोग नोटिस कर नजर में रखते, सभी के नाम के आगे वो कर्म फल को लिखते। कौन-कौन जप रहा प्रभु का नाम है नित्य दिन, कौन कर - [राम मनुज अवतार -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-72/) - राम मनुज अवतार- सरसी छंद गीत चैत्र शुक्ल तिथि अति पावन, राम मनुज अवतार। ब्राह्मण गौ की रक्षा करने, हरने भूतल भार।। कौशल्या सुत सबके प्यारे, परम ब्रह्म का नाम। कण-कण वासी धरा विराजे, धरा हुई तब धाम।। अवधपुरी में जन्म लिए है, दशरथ जी के द्वार। चैत्र शुक्ल तिथि अति पावन, राम मनुज अवतार।।०१।। - [जय श्री राम - रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-9/) - जय श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहो, या कहो सीता राम दशरथ नन्दन राम कहो अयोध्या जिनका है धाम। त्याग तपस्या का मार्ग दिखाए लोभ मोह से दूर ले जाए वचन की रक्षा का मार्ग दिखाकर जीवन का सही अर्थ समझाएं। जय श्री राम कहो या कहो प्रभु श्री राम इनका ही गुणगान करो यही - [राम नाम गुणगान करूं मैं -स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/snehlata-dwivedi-6/) - राम नाम गुनगान करूँ मैं राम हैं संयम राम धर्म हैं, राम का अद्भुत नाम कहूँ मैं। राम हैं मर्यादा के रक्षक, राम को सीताराम कहूँ मैं। राम नाम गुनगान करूँ मैं, स्वयं का जब सम्मान करूँ मैं! राम जगत को राह दिखायें, चलना सुबह शाम कहूँ मैं। भय और भूख है कहीं नही तो, - [मर्यादा पुरुषोत्तम राम -भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwannd-singh/) - ----मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ---- राम नाम भज प्यारे, जीवन का आधार है, सनातन को बढ़ाया, हमारे श्रीराम हैं। दुष्टों का संहार किये, भक्तों का उद्धार किये, जो भी शरण में आया,उनका सम्मान है। मर्यादा पुरुषोत्तम, कहलाए महान हैं, ऐसे सनातनी पर, बड़ा अभिमान है। उनकी कृपा दृष्टि से, संसार का सौन्दर्य है, सबसे बड़े भक्तों - [मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम-ब्यूटी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maryada-purushottam-shree-ram-beauty-kumari/) - हुआ धन्य अयोध्या नगरी , श्री राम लिए अवतार । राजा दशरथ हुए निहाल , बाजे बधैया चहुंओर। मुखड़ा चंद्र सामान, प्रगट भए श्रीराम । करी विनती मात कौशल्या, प्रभु कीजिए शिशु लीला । मात वचन सुनी बाल रूप , धर रोदन ठाना भगवाना । बड़े भए परिजन सुखदाई, गुरु गृह गए पढ़न रघुराई। श्याम - [हे राम -स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-13/) - हे राम हे राम बसों सबके मन में, मन सबका आलोकित हो जाए। सब कष्ट मिटे अज्ञान हटे यह हृदय सुबसित हो जाए।। बस प्रेम बसे मर्यादा रहे मन सुंदर मधुबन हो जाए। नीरव निश्चल नव गीत अधर, सब ओर से झंकृत हो जाए।। हे राम बसों सबके मन में, मन सबका आलोकित हो जाए। - [सब तुम्हारा  ही आसरा है -अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sab-tumhara-hi-asara-hai-amarnath-trivedi/) - प्रभु जी सब आसरा तुम्ही हो , इसे दिल में बसाए रखना । प्रभु ज़ी तुमसे है हर नाता , सदा इसे बनाए रखना । दीप आशा क़े तुम्हीं जलाए , लाए संसार में तुम्हीं हो । कभी इसमें मन उलझता , सब रचाए रास तुम्हीं हो । मेरे मालिक भी तुम्हीं हो , हे जग के तू रचइया । अब तो लगाओ पार प्रभुजी , तुम्हीं जग के हो खेवइया । प्रभुजी चाहता ऐसी भक्ति , जो ज्योत जीवन को बना दे - [राम जन्म का अवसर यह-अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ram-janm-ka-avsar-yah-amarnath-trivedi-2/) - 1.राम जन्म का अवसर यह, खुशियों का भी आधार है । साध चलो इसे मन से तो, अपना निश्चित ही बेरापार है । राम नाम मन गा ले बन्दे , जीवन सुखमय हो जाएगा । मिलेगी कृपा प्रभु राम से तो यह जीवन भर अधिक सुहाएगा। राम प्रेम भक्तों से करते , जीवन में खुशियाँ भी भरते हैं । बिना राम के कुछ नहीं होता, तभी राम नाम जप करते हैं । भक्तवत्सल श्रीराम प्रभु , - [प्रभु राम तुम्हारा अभिनंदन आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-8/) - कविता शीर्षक :- प्रभु राम तुम्हारा अभिनंदन । हे राम तुम्हारा है अभिनंदन , भगवान तुम्हारा शत - शत वंदन । अवतार धरा पर लेते हो, खल - दुष्ट दमन कर देते हो । अन्याय नष्ट हो जाता है, पापी भी मुँह को खाता है । आनंदित होते मुनिगण - जन , हे राम तुम्हारा - [राम जन्म नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-25/) - शीर्षक -चैत महिनमा। विषय -राम जन्म। रामजी लिहलन्हि जनमुवाँ हो रामा चैत महिनमा। चैत केअ शुभ दिन बैशाखक शुक्ल पक्ष, बारह बजे दिन में लेलनि जनमुवाँ हो रामा दशरथ अंगनमा। रामजी लिहलन्हि दशरथ के तीन रानी कौशल्या, केकई, सुमित्रा तीनों रहथि निःसंतान हो रामा दशरथ भवनमा। रामजी लिहलन्हि एक दिन केलखिन्ह पुत्रेष्टि यज्ञ दशरथ जी - [हे माहेश्वरी -डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-12/) - हे माहेश्वरी। कोटि सूर्य की प्रभा , त्रैलोक्य तू विहारिनी, जगदम्बा तू स्वयं प्रभा, है कर्म की प्रकाशिनि। तू दुष्ट दलन कर महि ,को धर्म से सवांरती, इहलोक के कल्याण को, त्रिशूल बज्र धारिणी। है कोटि कोटि है नमन, सुरेश्वरि महेश्वरी! भवानी माँ तू शूल हर, जीवन के सब समूल हर, प्राकट्य तेरा है सुखद, - [महागौरी रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-71/) - महागौरी - सरसी छंद गीत आज अष्टमी तिथि अति पावन, चलिए माँ के द्वार। मातु महागौरी है करती, भक्तों का उद्धार।। चार भुजाओं वाली माता, श्वेत वसन शुभ रंग। श्वेत वृषभ वाहन पर चलती, शोभित अद्भुत अंग।। कर त्रिशूल डमरू को रखती, शक्ति सौम्य सुख सार। मातु महागौरी है करती, भक्तों का उद्धार।।०१।। संग अभय - [राम जन्म -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-70/) - राम जन्म- सार छंद गीत अवधपुरी के राजमहल में, हर्षित सब नर-नारी। बाल रूप में ब्रह्म स्वयं ही, आए बन अवतारी।। त्रेता युग में दशरथ राजा, चौथे पन में आए। यज्ञ पुण्य से पुत्र रूप में, ब्रह्म गोद में पाए।। कौशल्या नंदन की फिर तो, गूँज उठी किलकारी। बाल रूप में ब्रह्म स्वयं ही, आए - [जिंदगी की दास्तान---गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-10/) - जिंदगी की दास्तान बचपन, जवानी, बुढ़ापा से होकर बीते जीवन महान, जीवन-पथ पर बढ़ते जाते, कर्म ही होती हमारी पहचान, जन्म-मृत्यु के मध्य स्थित, जीवन यह कर्म प्रधान, उज्ज्वल जिनका कर्म है, जीवन है वही महान, ज्ञान, कर्म के साथ श्रेष्ठ अनुभव भी हमें मिलता जाता, यह तीनों ही आते हैं स्वयं के साथ मानव - [डोली चढ़ी मां भगवती-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-24/) - विषय -नवरात्रा। शीर्षक -डोली चढ़ी माँ भगवती। चैत नवरात्र में एली हे मैया, डोली चढ़ी माँ भगवती। माँ हँसति खल -खल दाँत झल -झल रुप सुंदर भगवती। माँ त्रिशूल हाथ लेल महिषासुर मारती , सोनित पीबति घट घट । चैत नवरात्र में एली हे मैया, डोली चढ़ी माँ भगवती। माँ अहैं छी काली अहैं छी - [सूरज दादा -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-7/) - शीर्षक :- सूरज दादा । सूरज दादा , सूरज दादा, लगते कितने प्यारे - प्यारे । चलते - चलते सुबह से शाम, कभी नहीं तुम थककर हारे । सुबह - सुबह दुनिया करती है, दादा, तुमको रोज प्रणाम । हर रोज तुम सबको जगाकर, करते हो दिन भर काम । पूरी धरती , पूरे नभ - [सूर्य-चंद्र-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/surya-chandra-girindra-mohan-jha/) - सूर्य अकेला ही विचरता है, जगत् का तम वह हरता है, एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करे, तो वह संक्रांति कहलाता है, इसके चारों ओर ग्रह परिक्रमा करते, यह आकाशगंगा की परिक्रमा करता है, शास्त्रों में यह आरोग्य और स्वास्थ्य का देवता कहलाता है, धरती पर यह प्रकाश, ऊर्जा, जीवनी-शक्ति दान करता है, - [जलती दुनियां आग में -रामकिशोर पाठक ह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-prasad-singh/) - जलती दुनिया आग में- प्रदीप छंद गीत धरा एक ही सबका प्यारा, बँटें भले भूभाग में। ध्वंस मचाते युद्ध कही भी, जलती दुनिया आग में।। अहंकार में गोले दागे, दुश्मन सबको मान के। समय उसे भी सिखलाता है, लाले पड़ते जान के।। पर इसमें निर्दोषों की भी, हत्या होती झाग में। ध्वंस मचाते युद्ध कही - [राम में रमाइये -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-30/) - अनुप्रास अलंकारित। मनहरण घनाक्षरी। राम में रमाइए। रामदूत राम-भक्त, रमणीय रंग-रक्त, राही जो अपंगे गूंँगे,राम में रमाइए। मारुति मंगलकारी, महावीर धर्माचारी, मनोबल मन मेरा,मन में समाइए। अमर अंजनी पुत्र, अतुलित बल-सूत्र, आसरा है अब आप,अपना बनाइए। विद्या-बुद्धि के निधान,बसे हैं हृदय-स्थान, बजरंगी बलधाम,वासना मिटाइए। रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' सेवानिवृत शिक्षक, मध्य विद्यालय दरवेभदौर - [विश्व क्षय रोग दिवस नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-23/) - विषय -विश्व क्षयरोग दिवस। शीर्षक -क्षयरोग को घर से भगाइंए। क्षयरोग दिवस मनाइए, क्षयरोग से लोगों को बचाइए। स्कूल के बच्चे निकलो चार, क्षयरोग का करो प्रचार। गली -गली घर- घर में जाओ, क्षयरोग के बारे में बतलाओ। रहने बोलना साफ सुथरा, पहनने बोलना साफ कपड़ा। अगल- बगल की कहना रखने सफाई, नही आएगी किटाणु, - [उन्नत बिहार उज्जवल बिहार  -अमरनाथ त्रिवेदी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/unnat-bihar-ujjwal-bihar-amarrnath-triwedi/) - उन्नत बिहार के उज्जवल भविष्य की हम ज़ब - ज़ब कल्पना करते हैं । तब खुशी से मन झूम उठता ज़ब लोग हिल- मिल भी रहते हैं ।। उन्नत बिहार के साँचे में जब हम सब ढलते जाएँगे। इसका वैभव होगा अनंत जब हम प्रेम की राह अपनाएँगे ।। कोशिश ही तकदीर बने इस भव्य मंदिर को सजाने में। इसमें ही अपना - [जब ज़ब बिहार दिवस  आता है -अमरनाथ त्रिवेदी  ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jab-jab-bihar-diwas-aata-hai-amarnath-triwedi/) - ज़ब ज़ब बिहार दिवस आता है खुशियों से चमन मुस्काता है। बढ़ते बिहार के क़दमों से मन अति प्रसन्न हो जाता है । बिहार दिवस तरुणाई भी मन भी झंकृत कर जाता है।. विकास के अनवरत कार्यों से जीवन में उमंग सदा छा जाता है। निः सृत होती है यहाँ सदा फाग ,यह मन को भी रंग जाता है। यह केवल रेत - [सुनो बिहार-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/suno-bihar-ruchika/) - सुनो बिहार, तुझसे है मेरा अटूट नाता तुझसे ही पाया मैंने अमूल्य संस्कार है किस्मत की मुझ पर मेहरबानी तेरी मिट्टी में पले बढ़े नही रहे मन में कोई भी तकरार। सुनो बिहार, तेरा गौरव अपने कर्मो से बढाया, अपनी संस्कृति विदेशों में भी निभाया, शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर प्रयासरत हो विश्वपटल पर नाम - [हम बिहार हैं -संजीत कुमार निगम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sanjeet-kumar-nigam/) - शीर्षक:- हम बिहार हैं। हम भक्त प्रह्लाद की जन्मभूमि हैं, हम महादानी कर्ण की कर्मभूमि हैं। हम वह पावन धरा हैं जहाँ सूर्य स्वयं पधारे, जहाँ विद्यापति के गृह उगना बनकर शिव शंकर गुजारे। हम भगवान राम की ज्ञानभूमि हैं, हम विश्वामित्र की तपोभूमि हैं। हिरण्यकशिपु-वध की गाथा हमारी पहचान है, नरसिंह अवतार का दिव्य - [लोकतंत्र की जननी बिहार-ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/loktantra-ki-janani-bihar-beauty-kimari/) - चाणक्य का ज्ञान चंद्रगुप्त की पहचान, बुद्ध की तपस्या महावीर का अवतार, जनक नंदिनी सीता का श्रृंगार, लोकतंत्र की जननी बिहार। भारत का राष्ट्रीय प्रतीक, सम्राट अशोक का कृति चिन्ह, गांधी की कर्मभूमि चंपारण, वीर कुंवर सिंह की ललकार, लोकतंत्र की जननी बिहार। ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी का वेद ज्ञान, आर्यभट्ट का आविष्कार, विद्यापति का संसार, राष्ट्रकवि - [मैं हूं गौरवशाली बिहार -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-12/) - मैं हूँ गौरवशाली बिहार मैं हूँ गौरवशाली बिहार । मैं भारत का हूँ कंठहार, मैं गौतम बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग, मैं महावीर का पंचशील, मैं बापू के सत्य अहिंसा का, खिलता हुआ गुलजार हूँ । मैं गौरवशाली बिहार हूँ। त्योहारों में मैं दीवाली हूँ। ज्ञानदीप से तिमिर भगाकर, होली, छठ, और खिचड़ी, दशहरा , सामा - [हमारा बिहार -भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwanand-singh-4/) - हमारा बिहार बिहार दिवस आज, सभी लोग मनाते हैं, इनकी माटी की खुश्बू, विश्व में फैलाइए। लिच्छवी का गणतंत्र, था प्रथम लोकतंत्र, यह बात लोगों को भी, आज समझाइए। नालंदा, विक्रमशिला, की ज्ञान गंगा से सभी, विभूषित आज हम, सबको बताइए। भगवान महावीर, व बुद्ध का उपदेश, प्रेरणा के श्रोत हैं ये,जन को जगाइए। भवानंद - [अपना श्रेष्ठ बिहार है रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-ki/) - अपना श्रेष्ठ बिहार है - प्रदीप छंद गीत युगों-युगों से गौरवशाली, अपना श्रेष्ठ बिहार है। तपोभूमि यह गौतम जी की, सतत ज्ञान भंडार है।। जनक दुलारी सुकुमारी की, जन्मभूमि यह ही रही। विश्वामित्र तपस्वी की भी, कर्म भूमि यह ही रही।। ज्ञान केन्द्र नालंदा का तो, चर्चा चारों ओर है। रहा विश्व गुरु भारत बनकर, - [जल जीवन -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/richika/) - जल जीवन जल जो धरा की नमी को बचाये, उर्वरता बढ़ाए प्यास बुझाए नदियों को विस्तार दे झरनों से झर मधुर संगीत सुनाए। जल आँखों के कोरों में ठहर दर्द छुपाये राज दबाए दिल की तड़प को बाहर न आने दे मन नही वरन आत्मा भींगाये। जल आँखों से बाहर आकर दर्द को रास्ता दे - [बिहार दिवस - स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/snehlata-dwivedi-5/) - बिहार दिवस की बधाई🌹🌹 बिहार दर्शन आओ प्यारे तुम्हें कराऊँ दर्शन मैं बिहार की, यह मिट्टी है ज्ञान शौर्य की शांति की, सद्भाव की। श्रमशक्ति का ओज रगों में प्रतिभा के सम्मान की, विजयी जीवन देश को अर्पण करते पूत महान की। चक्रवर्ती अशोक यहाँ थे चक्र तिरंगा शान की, शेरशाह के ग्रैंड ट्रैंक और - [बिहार के विकास-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bihar-ka-vikas-karyik-kumar/) - बिहार की धरती, ज्ञान की खान, इतिहास में इसका ऊँचा मान। नालंदा की गूँज आज भी है, ज्ञान का दीप यहाँ सदा प्राण। गाँव-गाँव में सड़कें आईं, हर घर तक अब रोशनी छाई। शिक्षा, स्वास्थ्य में बढ़ते कदम, नई दिशा ने राह दिखाई। खेती में आई नई तकनीक, हरियाली से सजी हर एक। किसान बना - [हमर बिहार सबसे नंबर वन छै-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamar-bihar-sabse-numbar-one-chhey-nitu-rani/) - पढ़ल- लिखल भाई -बहना सुनियौ ध्यान लगाय उन्नत दोसर राज के लोग सब सम्मान करै छै आय, सब कियो सोचू ने यौ हमर बिहार सबसे नंबर वन छै। बिहार निवासी जखने कतहू सफर में छै जाय बिहार के नाम सुनि के लोग सब सिर लै छै उठाय, सब कियो सोचू ने यौ, हमर बिहार सबसे - [ईद-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/id-manu-kumari/) - प्रेम की सौगात लेकर ईद है आई, हर आंगन और गली - गली में खुशियां छाई। नये - नये कपड़े पहने हैं हामिद,सलमा, दुआ करेंगे रब के आगे,पढ रहे हैं कलमा। नफरत की दीवारों को हम मिलके गिराएं, इक - दूजे को गले लगाकर आओ ईद मनायें। दुआ के संग - संग आज, मिलेंगे बड़ों - [हमारा बिहार-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamara-bihar-ashish-ambar/) - हमारा बिहार सबसे महान है, इसकी सभ्यता का हमें अभिमान है । बुद्ध की धरती इसका परित्राण है, चन्द्रगुप्त, चाणक्य, अशोक जिनकी पहचान है । जहाँ बहती गंगा की अविरल धारा है, हिमालय सुरक्षा करता हमारा है । लिट्टी - चोखा की स्वाद निराली है, धरा जहाँ की उन्नत और हरियाली है । बिहार संस्कारों - [मेरा बिहार-बिंदु अग्रवाल ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mera-bihar-bindi-agrawal/) - यह बिहार की पावन भूमि, दामन भारत माँ का है। करुणा बोध मिली जग को, यह वरदान यहाँ का है। भूमि वीर कुंवर सिंह कि यह, विश्वामित्र का आश्रम है। जन्मे जहाँ वीर बजरंगी, माँ सीता का आँगन है। जहाँ गुजारा पांडव ने, बारह वर्षों का बनवास। माखन चोर के रथ का पहिया, अभी तलक - [बिहार हूं मैं"-अर्जुन केशरी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bihar-hun-mai-arjun-keshari/) - "छठ पूजा का ठेकुआ हूं, स्वाद से भरपूर लिट्टी चोखा आचार हूं मैं शिक्षक नवाचार हूं मैं अजी हां बिहार हूं मैं !! "चाणक्य की नीति हूं , आर्यभट्ट का आविष्कार हूं मैं। महावीर की तपस्या हूं , बुद्ध का अवतार हूं मैं। अजी हां ! बिहार हूं मैं। सीता की भूमि हू, विद्यापति का - [बंधन और मुक्ति -गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gieindra-mohan-jha/) - बंधन और मुक्ति मुझे बंधन चाहिए, कर्तव्यों-दायित्वों का बंधन, कर्त्तव्य के साथ थोड़े भावनाओं का बंधन, देश-भक्ति, श्रेष्ठ आदर्श, यथार्थ का बंधन, सच्चाई-ईमानदारी, सहज स्वभाव का बंधन, मुझे मुक्ति चाहिए, दुर्व्यसन, कुविचारों से मुक्ति, कुसंग से मुक्ति, संसृति, भवबंधन से मुक्ति । .....गिरीन्द्र मोहन झा - [कविता क्या है -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-8/) - कविता क्या है कविताएँ रूठती हैं, मानती हैं शिकवे और शिकायतें करतीं कभी पुचकारती कभी सम्भालती कभी खुद को खुद से जोड़ती हैं। कविताएँ जीवन का रंग-ढंग बतलाती कभी जीना सिखलाती, कभी टूटे दिल की उम्मीद बन जाती कभी हिम्मत जुटाती कभी हौसला बन जीवन से नजरें मिलाती हैं। कविताएँ हवा हैं, पानी हैं रोटी - [कोटि बधाइयां -स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/snehlata-dwivedi-4/) - अंतरराष्ट्रीय कविता दिवस कोटि बधाईयाँ मानव को मानव से जोड़े, कविता मन में मन को मोहे। भाषा मन की कविता ही है, कविता दिवस बधाई सोहे। विश्व में भाषा विविध प्रवीना, भाव सबके मन एक ही होवे। प्रेम, रुदन ,नंदन, वन्दन सब, कविता तो बस कविता होवे। पहुँचे कवि, रवि से पहले, गूढ़ रहस्य उजागर - [गौरैया-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gouraiya-ruchika/) - बड़ी मुश्किल से दिखती हैं, गौरैया आजकल छत के मुंडेरों पर घर के आँगन में अब उसका चहकना कानों में रस नही घोलता अब उसके लिए जगह नही बची घरों में। गौरैया चली गयी है आबादी से दूर। इस आस में की शायद उसकी चहक कोई सुन ले वहाँ। अब कहाँ गौरैया आती है दाना - [विलुप्त हो गई गौरैया-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vilupt-ho-gayi-gouraiya-nitu-rani/) - गौरैया दिवस मनाइए, गौरैया को घर में बसाइए। जब से बना पक्का का मकान, गौरैया की उड़ गई मुस्कान। घर से हो गई बेघर गौरैया, वन- वन भटक रही गौरैया। फूस के घर में रहती थी गौरैया, सपरिवार के साथ खुश थी गौरैया। सुबह सबेरे उठती थी गौरैया, घर आंगन में फुदकती थी गौरैया। फूस - [गौरैया गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-9/) - विश्व गौरैया दिवस- 20 मार्च गौरेया दरवाजे पर आकर अपना घोंसला बना लेती थी, अनाज के दानों पर आकृष्ट हो आंगन की शोभा बढ़ा देती थी, पुराने लोग कहते थे, गौरेया लक्ष्मी का ही स्वरूप है, उसे एकत्र देख आंगन में, कदाचित् मनोरंजन अनूप है, एक गौरेया को दो अनाज के दाने, झुंड बुला लेती - [गौरैया -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-6/) - शीर्षक - गौरैया छोटी सी प्यारी यह चिड़िया, कहलाती है वह गौरैया । फुर्र - फुर्र करके आती है, फुर्र से वह उड़ जाती है । विश्व गौरैया दिवस आया अलबेला, बीस मार्च का दिन शुभ - बेला । घर आंगन को चहकाती है, फिर इधर - उधर भाग जाती है । घास - फूस - [नन्हें परिंदे -अरविंद कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/arvind-kumar/) - नन्हें परिंदे अरविंद कुमार, भरगामा, अररिया की कलम से अभी मैं जिंदा हूं , लेकिन मेरा अस्तित्व खतरे में है , मुझे बचा लो वायदा रहा तुम्हारे घर-आंगन को चहचहाहट से भर दूंगी । कभी घरों में,बंगलों में दालान में,मचानों पर ची..ची..ची..ची..करती गौरेया की जोड़ी आपस में झगड़ती रहती मानो मादा गौरेया अपने पति गौरेया - [दिखे की दुखी तुझको -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-69/) - दिखे कोई दुखी तुझको उसे गम से निकाला कर- गजल दिखे कोई दुखी तुझको उसे गम से निकाला कर। बिना सोचे गले लगकर जरा कुछ नेह डाला कर।। करेंगे लोग अक्सर ही तुम्हारे साथ में उल्टा। अगर गुस्सा कभी आए उसे कुछ देर टाला कर।। करेंगे सब यहाँ कोशिश तुम्हें हर-पल गिराने की। मगर रख - [नव संवत्सर-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/नव-संवत्सर-राम-किशोर-पाठक/) - आया नव संवत्सर, हम झूमें गाएँ। माँ का पूजन करके, उल्लास मनाएँ।। इसी दिवस शुरू किए, ब्रह्म सृष्टि रचना। राम राज्य भी पाएँ, जो सबका सपना।। नवल पर्ण पेड़ों पर, नव रूप गढ़ा है। नवदुर्गा है आई, मन झूम रहा है।। बासंतिक बेला में, नव दीप जलाएँ। आया नव संवत्सर, हम झूमें गाएँ।।०१।। कण-कण सुरभित - [Just alone-Avdhesh kumar ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/just-alone-avdhesh-kumar/) - I often find myself alone I cry alone , I gathered myself alone After all , solitude too Turns out to be one cherished companion No fear of anyone saying anything I don't have to worry for anyone , Nor take anyone's pain . I was born alone at birth , I will die alone - [रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/रामपाल-प्रसाद-सिंह-अनजान-2/) - भाग गया है शीत,निकल कर देखो। बाहर किरणें प्रीत,निकल कर देखो।। पगडंडी के प्रांत,आज है भारी। हरियाली है मगन,मार सिसकारी।। तृण पर मोती दाॅंत,जड़े अब टूटे। थे इतने अनमोल,साथ क्यों छूटे?।। बचपन का दिन एक,साथ छोड़ेगा। जब तक है यह साथ,मोह जोड़ेगा।। कल तक था जो ठोस,आज पिघला है। बंधक था आलोक,आज निकला है।। हुआ - [मानवता- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manavta-ram-kishor-pathak/) - ज्ञानी जन चिंतन करें, मानव कर्म विमर्श। कुंठित मानवता हुई, कैसे हो शुभ दर्श।। कैसे हो शुभ दर्श, वर्ष नव आस जगाए। माता का आशीष, नवल अब पथ दिखलाए।। झेल रहे सब दंश, नहीं माने अभिमानी। माता से अब अर्ज, देख लो करते ज्ञानी।।०१।। मानव-मानव का बना, देखो दुश्मन आज। अहं भाव रख कर रहा, - [पढ़ाई से छुट्टी -जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/padhai-se-chhutti-jainendra-prasad-ravi/) - आया मस्ती का दिन पढ़ाई से मिल गई छुट्टी, जब से आया इम्तिहान गुरुजी पिलाते थे घुट्टी। हुई परीक्षा खत्म पढ़ाई की नहीं है चिंता, रात-रात भर जाग याद किया प्रश्न-कविता। रोज खेलेंगे खेल करेंगे खूब सैर- सपाटे, पढ़ाई के लिए पिताजी से मिलेंगे नहीं अब डांटें। जाएंगे बाजार बनाकर रोज नए-नए बहाने, सोएँगे चादर - [नव संवत्सर में शैलजा-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nav-sanvatsar-me-shailaja-ram-kishor-pathak/) - संवत्सर प्रारंभ नव, प्रथम दिवस है आज। आदि शक्ति शुभ शैलजा, पूजे सकल समाज।। आदि शक्ति के रूप का, दर्श प्रथम कर आज। भक्ति भाव से पूजकर, हर्षित सकल समाज।। मातु शैलजा को नमन, करता बारंबार। भक्ति भाव जो बन सके, मातु करो स्वीकार।। मंगलमय नववर्ष हो, माँ दे दो आशीष। डटे रहे निज कर्म - [बिना पिया केअ गैस हे-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bina-piya-ke-gas-he-nitu-rani/) - हे बहिना बिना पिया केअ कोना केअ आनब गैस हे, पिया बसै परदेश हे ना। गैस सिलेंडर भेल बड़ महंगा, सुनि केअ हाथ पाएर में लागै बगहा , हे बहिना सोएच- सोएच केअ सिर केअ उरै केश हे पिया बसै परदेश हे ना हे बहिना ------2। भूखल बच्चा सब टेटियाय कैन -कैन धरती पर ओंघराय, - [बुद्ध की पावन धरा-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/buddh-ki-pawan-dhara-ram-kishor-pathak/) - बुद्ध की पावन धरा। दिव्यता से है भरा।। है रमा जन्मस्थली। बोल मगही मैथिली।। अंगिका सह भोजपुरी। शिल्क है भागलपुरी।। ज्ञान से हर-पल हरा। बुद्ध की पावन धरा।।०१।। भूमि उर्वर दलदली। पर्व छठ दीपावली।। राष्ट्र कवि दिनकर यहाँ। मौर्य का बस्ती जहाँ।। ख्याति नालंदा वरा। बुद्ध की पावन धरा।।०२।। क्या बिहारी शान है। विश्व में - [मर्यादा पुरुषोत्तम-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maryada-purushottam-ram-kishor-pathak/) - बुलाते हैं प्यारे, सकल जन राजा भजन में। अधोगामी सारे, सहज तर जाते शरण में।। पिता आज्ञा से जो, गहन वन में पाँव धरने। निभाने मर्यादा, इस भुवन का भार हरने।। दुलारे माता के, सुमन रघुवंशी भवन में। बुलाते हैं प्यारे, सकल जन राजा भजन में।।०१।। त्रिलोकी आएँ है, मनुज तन का सार कहने। किए - [नूतन वर्ष-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nutan-varsh-ram-kishor-pathak/) - आया है अपना शुभ संवत्सर, आओ खुशी मनाएँ। राग फाग का गाए हैं अब, माँ को जरा बुलाएँ।। हुई सुवासित हवा सुहानी, कुसुमित धरती रानी। फसलों से संपन्न हुए हम, हर्षित कहूँ कहानी।। शीतलता से मुक्ति मिली है, गीत खुशी के गाएँ। आया है अपना शुभ संवत्सर, आओ खुशी मनाएँ।।०१।। जब मन सुनकर मोहित होता, - [राम वन से आ गये- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ram-van-se-aa-gye-ram-kishor-pathak/) - राम वन से आ गये। देवता बन भा गये।। सूचना से राष्ट्र में। हर्ष पूरे छा गये।। शोक चौदह साल का। आज खुद से ढा गये।। आरती की थाल ले। नारियाँ सब आ गये।। प्रेम नैनों में दिखा। धार सा छलका गये।। दौड़कर आती हुई। मातु दर्शन पा गये।। नेह से लिपटे गले। प्राण तन - [मातु अम्बे आ रही-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/matu-ambe-aa-rahi-ram-kishor-pathak/) - मातु अम्बे आ रही। सौम्यता दिखला रही।। भक्त को खुशियाँ मिली। दुष्ट को दहला रही।। रात्रि नौ मधुमास की। दिव्यता बरसा रही।। दिव्य लेकर रूप नौ। शक्ति रूपा भा रही।। थाल हाथों में लिए। नारियाँ बतला रही।। वर्ष नव प्रारंभ हो। गीत मंगल गा रही।। शैलपुत्री मातु से। सिद्धिदात्री छा रही।। लाल चुनरी संग में। - [दहि तू एक्जाम रे ना -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dahi-tu-exam-re-na-manu-kumari/) - नुनू खुशी - खुशी से दहि तू एक्जाम रे, पाबिहैं बड़ा मुकाम रे ना। परीक्षा में डरै के नय कोनो बात, मजबूत राऽख अपन जज़्बात। नुनु हंसि कय हल करिहैं तू प्रश्न तमाम रे, पइबै बड़ा मुकाम रे ना। पहिले लिखिहैं तू अप्पन नाम, तखन विद्यालय, कक्षा के नाम । बीच में रौल, विषय, प्रखण्ड, - [मूल्यांकन -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-11/) - मूल्यांकन ( कविता) मुस्कानों से भरा हुआ हर एक चेहरा, मन में उमंग, न कोई डर का बसेरा। मूल्यांकन का यह सुंदर अवसर आया, साल भर की मेहनत ने रंग अब दिखलाया। कापियों में सपनों की स्याही उतरती, हर उत्तर में लगन की कहानी संवरती। भय रहित माहौल में बच्चे खिलखिलाते, आत्मविश्वास के दीपक मन - [दोहा विधान रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-68/) - दोहा विधान आओं हम सीखा रहे, दोहा लिखना खास। सरल तरीका है यही, करना है अभ्यास।।०१।। जान रहा हूँ मैं यहाँ, ज्ञान हमारा अल्प। फिर भी हूँ बतला रहा, दोहा का संकल्प।।०२।। चार चरण में लिख रहे, हम सब दोहा जान। तेरह मात्रा से लिखें, विषम चरण श्रीमान।।०३।। ग्यारह मात्रा का चरण, रखिए सम पद - [खत -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-67/) - खत - विधाता छंद रखा खत में कभी मैंने, हृदय को खोलकर अपना। लिखा कुछ शब्द जो मैंने, वही तो खास था सपना।। मगर जिसको लिखा मैंने, उसे दे तक नहीं पाया। रखा हर स्वप्न को यूँ ही, सफलता छोड़ मुस्काया।।०१ जमाना आज है बदला, मगर उनके निगाहों में। दिखा मुझको वही मंजर, चले आएँ - [बिहार दिवस -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-29/) - बिहार दिवस। हरि गीतिका छंद में। रुकता नहीं बढ़ता सदा रथ,नव नवीन बिहार है। जो पूर्व-उत्तर में अवस्थित,देश का श्रृंगार है।। उत्तर-दिशा में है हिमालय,मध्य गंगा बह रही। मौरंग से आती हवा सुख,लूटने को कह रही।। हम मार्च की बाईस तिथि में,गा रहे यशगान को। जन-बोलियाॅं भाषा निरंतर,भा रही भगवान को।। आशीष पाकर पूर्वजों से,धन्य - [दोहा रचना कीजिए -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-66/) - दोहा रचना कीजिए - एक प्रयास दोहा रचना जब करें, रखिए इतना ध्यान। मात्रा गिनती स्वर सभी, व्यंजन का न विधान।।०१।। गुरु स्वर की मात्रा सदा, गिनना दो है भार। लघु प्रयोग होता जहाँ, वजन एक स्वीकार।।०२।। जहाँ संयुक्त वर्ण हैं, अक्षर अर्ध विसार। अर्ध वर्ण के पूर्व में, होता गुरु का भार।।०३।। चार चरण - [फिर कैसे मिले बच्चों में संस्कार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/फिर-कैसे-मिले-बच्चों-में-स/) - फिर कैसे मिले बच्चों में संस्कार चाईनीज खाना चाईनीज प्यार फिर कैसे मिले बच्चों में संस्कार शिक्षा जब बनी व्यापार जिसका न कोई परिवारिक सरोकार फिर कैसे मिले बच्चों में संस्कार कैसे पाएँ बच्चों में संस्कार का आधार जब परिवार में हुए दादा दादी बेकार फिर कौन सिखाए इनको संस्कार जब चाहरदिवारी में सिमटा घर - [मेरे भोले नाथ जी-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mere-bhole-nath-ji-ram-kishor-pathak/) - शिव शंभू अविनाशी, कहलाते जो कैलाशी, घट-घट के हैं वासी, पार्वती के साथ जी। बेलपत्र पर रीझे, भक्तों से कभी न खीझे, काल दुष्ट सब सीझे, मेरे भोलेनाथ जी। जटा जूट धर गंग, भस्म रमाए मलंग, गले लिपटे भुजंग, नवाऊँ मैं माथ जी। सकल सृष्टि के स्वामी, प्रभु तुम अंतर्यामी, हूँ मूरख खल कामी, रखो - [करो उद्धार प्रभु-कुमकुम कुमारी 'काव्याकृति'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/karo-uddhar-prabhu-kumkum-kumari-kavyakriti/) - मुनि से शापित ये सुकोमल सी नारी, हो गई उपेक्षित अहल्या बेचारी। महा तपस्विनी थी विदुषी जो नारी, क्यों बन गई कड़ी सजा की अधिकारी। देवराज इंद्र की छल की मैं मारी, पड़ी हूँ राह में शिला बन मैं नारी। अग्नि सी शुद्ध थी पतिव्रता वो नारी, हो गई क्यों शंकित क्या थी नाचारी। आओगे - [परीक्षा केअ एलै बहार-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pariksha-ke-aele-bahaar-nitu-rani/) - परीक्षा केअ एलै बहार बहार मेरी सखिया बच्चा सेअ शोभै स्कूल हमार हमार मेरी सखिया परीक्षा ---2। पहिले बच्चा अपन नाम लिखै, बाद में स्कूल, प्रखंड, जिला के नाम लिखै लिख केअ रहै छै तैयार तैयार मेरी सखिया परीक्षा --२। सोएच- सोएच केअ बच्चा काॅपी में लिखै बगलों वाला बच्चा केअ चुपचाप लिखाबै , मन - [मानवता जो जीवित मन में-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manavta-jo-jivit-man-mei-ram-kishor-pathak/) - मानवता जो जीवित मन में, उत्तम हर व्यवहार। भरा रहे मन नित खुशियों से, हर जीवों से प्यार।। सरल नहीं है मानव रहना, जिस मन रहता क्रोध। नहीं समस्या जबतक खुद पर, मिलता है कब बोध।। अमल हमें ही करना होगा, रखकर समता सार। मानवता जो जीवित मन में, उत्तम हर व्यवहार।।०१।। बस इतना सा - [हरि वामन बन आए-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hari-waman-ban-aaye-ram-kishor-pathak/) - भक्ति पुष्प फुलवारी महके, हरि आते हर्षाए। असुर राज बलि के ही द्वारे, हरि वामन बन आए।। प्रहलाद भक्त पुत्र विरोचन, हरि का ध्यान लगाया। अश्वमेध सौ यज्ञ किया वह, भक्ति मार्ग अपनाया।। तीन लोक का बनकर स्वामी, प्रभु की महिमा गाए। असुर राज बलि के ही द्वारे, हरि वामन बन आए।।०१।। दानवीरता का यश - [चैत्र पावन मास है-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chaitra-pawan-maas-hai-ram-kishor-pathak/) - चैत्र पावन मास है। माँ बता क्यों खास है।। नेह से माँ लाल को। चूम उसके भाल को।। आज है बतला रही। राज है समझा रही।। वर्ष की शुरुआत है। पूजते नव रात है।। सूर्य का पूजन करे। खेत फसलों से भरे।। है विदाई शीत की। प्रेम की ही रीत की।। उष्णता भी दूर है। - [परीक्षा-नैना कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pariksha-naina-kumari/) - खेलकूद में नहीं बिताना बच्चों अपना पूरा साल आएगा मार्च होगी परीक्षा होगा तेरा बूरा हाल गणित के प्रश्न पत्र में होंगे ऐसे टेढ़े मेढे सवाल हिंदी में भी होगा फंसाने व्याकरण का जाल अंग्रेजी में मैचिंग देखकर बच्चों छक्के छूट जाएंगे गेंद बल्ला बैडमिंटन कैरम काम वहां ना आएंगे पर्यावरण और हम के जीव - [वामन अवतार- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/wan-avtar-ram-kishor-pathak/) - नारायण निज अंश से, ले वामन अवतार। हरने भूतल भार को, प्रकट हुए संसार।। गंगा तट बक्सर शुभद, सिद्धाश्रम स्थान। अदिति गर्भ उत्पन्न हो, लिए नया पहचान।। कश्यप ऋषि के पुत्र बन, ब्राह्मण रूप कुमार। नारायण निज अंश से, ले वामन अवतार।।०१।। भक्त पौत्र प्रह्लाद बलि, राजा बने त्रिलोक। सुरपुर फिर से इन्द्र को, मिल - [अहिल्याबाई होल्कर-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ahilyabai-holkar-ram-kishor-pathak/) - वीरों की गाथाओं में है, एक पुराना नाम। वीरांगना अहिल्याबाई, को हम करें प्रणाम।। महाराष्ट्र साम्राज्य मराठा, चौंड़ी नामक गाँव। खण्डेराव संगिनी प्यारी, माहेश्वर थी ठाँव।। सीमाओं के बाहर तक की, जनसहयोगी काम। वीरांगना अहिल्याबाई, को हम करें प्रणाम।।०१।। कुएँ और बावड़ियाँ जिसने, करवाया निर्माण। अन्न-क्षेत्र भूखों को खोली, करती जन कल्याण।। लिंग स्थापना विश्व - [कृपा करो प्रदान माँ-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kripa-karo-pradan-maa-ram-kishor-pathak/) - कृपा करो प्रदान माँ। मिले नया विहान माँ।। निदान भूल का करो। विकार शूल को हरो।। विचार शुद्धता भरो। प्रगाढ़ दिव्यता वरो।। गिरा उदार मान माँ। कृपा करो प्रदान माँ।।०१।। विचारता उदास है। पुकारता सुदास है।। हुआ नहीं विकास है। मिला नहीं उजास है।। कुपुत्र भक्त जान माँ। कृपा करो प्रदान माँ।।०२।। अबोध बोध‌ माँगता। - [अंग-अंग प्रेम रंग-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ang-ang-prem-rang-ram-kishor-pathak/) - अंग-अंग प्रेम रंग। साँवरा बना विहंग।। राधिका उदास जान। छेड़ मंद-मंद तान।। सौम्य गीत प्रेम गान। कुंज ढूँढता निदान।। ध्यान में धरे अनंग। अंग-अंग प्रेम रंग।।०१।। श्याम बोलते निहार। राधिका करो न प्यार।। वक्त का करो विचार। प्रेम का चढ़ा खुमार।। सोच-सोच श्याम दंग। अंग-अंग प्रेम रंग।।०२।। क्यों पड़ी उदास मौन। है भला उपाय कौन।। - [गीता का संदेश -गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gita-ka-sandesh-girindra-mohan-jha/) - श्रीकृष्ण कहते, तुझमें शक्ति है, तू परंतप, महाबाहो, महावीर है, तू पार्थ, ईश्वर का पवित्र अंश, गुडाकेश, साहसी, परम धीर है, कर्तापन का अभिमान छोड़, मेरे कार्यों में निमित्तमात्र बनता चल, अपना कर्त्तव्य निष्ठा से करता चल, तू निरंतर यश प्राप्त करता चल, तुम अपने कर्त्तव्य-मार्ग पर अपकीर्ति से डरता चल, यश को प्राप्त करता - [कैसे आए शांति -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramjishor-pathak/) - कैसे आए शांति- सरसी छंद गीत गद्दारों की फौज खड़ी हैं, जो फैलाती भ्रांति। विकट समस्या आज जगत् की, आए कैसे शांति।। सभी जहाँ हैं सीना तानें, बनता खुद सिरमौर। अपनी करनी सही बताता, सुनें नहीं कुछ और।। आज लगी है धूमिल पड़ने, मानवता की कांति। विकट समस्या आज जगत् की, आए कैसे शांति।।०१।। बरस - [बीत गया फागुन माह- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-65/) - चैत्र- राधिका छंद गीत बीत गया फागुन माह, चैत है आया। महुआ का मादक गंध, प्रीत भर लाया।। नूतन आता है वर्ष, लता हर्षाती। शीत उष्ण मिलकर संग, फूर्ति है लाती।। कलियों फूलों के पास, भ्रमर मँडराया। बीत गया फागुन माह, चैत है आया।।०१।। धरती गढ़ती सौंदर्य, हवा भरमाती। कोयल अपनी प्रिय कूक, सुना बहकाती।। - [यही है सार जीवन का -एस. के. पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sk-poonam/) - विधा:-विधाता छंद। (यही है सार जीवन का) यहाँ सीखा, रहो मिलकर, न जीओ तुम, निराशा में। पढ़ी सरगम, उमंगों की, न घबराया, हताशा में।। कभी मुड़कर,न देखा प्रिय, जिसे मैं छोड़, आया था। अपरिचित था,शहर मुझसे, वहीं से प्यार, पाया था।। (2) न करता था, शरारत मैं, जुड़ा रिश्ता, परायों से। प्रकृति को प्रीत, मुझसे - [जीत का उत्सव-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jeet-ka-utsav-ram-kishor-pathak/) - जहाँ जीत है मिलता हमको, उत्सव में हम-सब खोते। कभी हार जब गले लगाती, नजर झुकाए हम रोते।। हार-जीत दोनों ही हमको, सीख सदा सबको देती। जीवन का बन अंग हमेशा, बांँहों में है भर लेती।। मगर फसल वह ही हम काटे, जो बीज खेत में बोते। जहाँ जीत है मिलता हमको, उत्सव में हम-सब - [नींद से अब जागिए-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nind-se-ab-jagiye-ram-kishor-pathak/) - नींद से जग जाइए। गीत प्रभु का गाइए।। भूल कड़वी बात को। प्रेम से मुस्काइए।। दोष जिसका भी रहा। रोष मत दिखलाइए।। ध्यान रख मन सत्य का। जोश में मत आइए।। मोह में हैं क्यों पड़े। ज्ञान को विकसाइए।। हो नियंत्रित मन सदा। व्यर्थ मत बहकाइए।। राम से रख आसरा। राम को बस ध्याइए।। रचनाकार:- - [कुछ तो सोच समझ ले प्राणी - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kuchh-to-soch-samajh-le-prani-ram-kishor-pathak/) - कुछ तो सोच समझ ले प्राणी। निकले जब भी मुख से वाणी।। निज पर इतना अभिमान न कर। अपना इतना गुणगान न कर।। पूर्ण धरा पर कौन यहाँ है। भ्रम में पड़कर मौन यहाँ है।। है इतना ही संसार नहीं। क्या और कहीं विस्तार नहीं।। अंतस में अपने देखो तुम। तुमने ही सत्य किया है - [होली-कहमुकरी- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holi-ram-kishor-pathak/) - उसके आते नर्तन करती। मन में नव भावों को गढ़ती।। बहकाए वह मेरी बोली। क्या सखि? साजन! न सखी! होली।।०१।। आते ही उल्लास जगाए। उपवन सरिस बदन महकाए।। करके हर-पल हँसी-ठिठोली। क्या सखि? साजन! न सखी! होली।।०२।। अंग-अंग वह छेड़े मेरा। जबसे उसने डाला डेरा ।। बहक गई मैं बनकर भोली । क्या सखि? साजन! - [महिला सशक्तिकरण-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mahila-sashtikaran-ram-kishor-pathak/) - नारी के सम्मान की, आज लगी है होड़। पुरुष बिचारा कर रहा, घर-बाहर कर-जोड़।। घर-बाहर कर-जोड़, करे दिल को समझाए। आधा निज का अंग, उसे सामर्थ्य दिखाए।। खुशी आज चहुँओर, कही संकट है भारी। कहते पुरुष प्रधान, चलाती शासन नारी।।०१।। महिला आज सशक्त है, बदला हर व्यवहार। पुरुषों का है छिन रहा, नित्य यहाँ अधिकार।। - [रसधार है नारी-अर्जुन प्रभात](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rasdhar-hai-nari-arjun-prabhat-2/) - प्रकृति की कल्पना कोमल, मधुर रस धार है नारी। नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी ।। ये नारी स्नेह की प्रतिमा ये ममता का भरा गागर दया की है बनी देवी हृदय में प्रेम का सागर क्षमा ,ममता,तपस्या,त्याग का भंडार है नारी - [नारी- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nari-ram-kishor-pathak/) - नारी का सम्मान, हमें संस्कृति सिखलाती। जीवन की हर राह, हमें नारी ही दिखलाती।। देती जब यह जन्म, दुग्ध से पालन करती। हर-पल भरती नेह, अंक में लालन करती।। ममता की वह खान, रूप माता की लेकर। रक्षा करती लाल, प्राण भी अपनी देकर।। भगिनी का भी रूप, प्यार देती जी भरकर। चलती पग दो - [श्याम नारी वेश में-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shyam-nari-vesh-me-ram-kishor-pathak/) - श्याम नारी वेश में। पुष्प डाले केश में।। माथ पर डलिया लिए। कान की बलिया लिए।। हार कंगण संग में। चूड़ियाँ नवरंग में।। नारियों के देश में । श्याम नारी वेश में।।०१।। प्रेम का उपहार लो। नेह से स्वीकार लो।। बेचती हूँ चूड़ियाँ। देख लो जी खूबियाँ।। क्यों भला हो क्लेश में। श्याम नारी वेश - [कलह-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kalah-manu-kumari/) - प्रेम से बनता स्वर्ग सा घर है,कलह से बिखरता संसार। कलह से अगर बचना है तो, नि:स्वार्थ प्रेम कर रिश्तों से यार।। ईर्ष्या, द्वेष का जब धुंआ उठे, तब दिलों में जलती वैमत्य की आग। नफ़रत मन से त्यागो बहना, स्नेह से खेलो घर में फाग।। कटु वचनों से बढ़ता है यह, घर में लाता - [देवी अवतारी -जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/devi-avatari-jainendra-prasad-ravi/) - संसार की माता बन संतानों को पालती हैं, सृष्टि की कीमती रत्न, दुनिया में नारी है। घर हो या राजनीति तालमेल बैठाती है, जीवन सफ़र पर, कभी नहीं हारी है। महिलाएंँ जहांँ जाती परचम लहरातीं, अबला-निरीह नहीं, रही सुकुमारी है। समय के अनुरूप खुद को बदल लेती, पत्नी व बहन बेटी ,जैसी होती बारी है। - [वंदनीय होता है हर-पल, नारी का हर रूप-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ahista-ahista-leti-nari-hai-har-rup-ram-kishor-pathak/) - वंदनीय होता है हर-पल, नारी का हर रूप। उसके सारे रूप निराले, लगते बड़े अनूप।। धीरज धरती सा रखती हैं, पर्वत सा विश्वास। नदियों जैसी बहती हर-पल, लेकर सदा मिठास।। दुर्गा, वाणी, लक्ष्मी, काली, सबकी ले दायित्व। भाव हमेशा संग रखे जो, ममता है स्थायित्व।। परिजन को छाया है देती, सहकर खुद ही धूप। वंदनीय - [करूणा की धारा - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/karuna-ki-dhara-manu-kumari/) - ममता की मूरत है वो, करूणा की निर्मल धारा है। मां ,बहन ,पत्नी ,सखी रूप में,रिश्तों की बगिया को संवारा है। रात- रात भर जागके जिसने,निज संतति को पाला है। पति प्राण को यम के मुख से ,जाकर स्वयं निकाला है। वेदों की वाणी बनकर, ज्ञान जगत में लाई है, रण में दुर्गा बनकर उसने - [बस इतना देना-मधु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bas-itna-dena-madhu-kumari/) - सृष्टि के निर्माण में जो साझेदारी कर सकती है अपना छोड़ जो सबकी हितकारी बन सकती है जो हंसकर अपमान भरे विष प्याला भी पी सकती है हर चुनौती का सामना डटकर नारी भी कर सकती है देखो हमें कम ना आंकना, हम हर नामुमकिन को भी मुमकिन कर सकती हैं कहां कहां आजमाओगे हमें, - [नारी एक"कल्पना"- बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nari-ek-kalpna-bindu-agarwal/) - हाँ !मैं कल्पना हूँ उस परमपिता परमेश्वर की, जिसने मुझे यह स्वरूप दिया, साथ ही दिया एक कोमल हृदय। सहनशक्ति दी धरती सी, और पवन सा वेग दिया। एक मूक वाणी देकर, इस कठोर जगत में भेज दिया। पर कहाँ है मेरा वजूद हे ईश्वर! क्यों उसे बनाना भूल गये? क्या है मेरे अधिकार प्रभु, - [बेटियाँ-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/betiyan-ashish-ambar/) - बेटियाँ दोनों कुल की मर्यादा है, उनसे ही होता कुल का वैभव । उसी के वश में सृजन सृष्टि है, रहती हरदम सबके लिए सुलभ । खेलकूद में भी बेटियों ने, नवल इतिहास बनाया है । विश्व रंगमंच पर भी भारत का, स्वाभिमान बार - बार दर्शाया है । बेटियाँ लक्ष्मी का है स्वरूप, यह - [मैं नारी हूं -ब्यूटी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-nari-hun-beauty-kumari/) - प्रकृति की अनुपम छवि है नारी, सहनशील वसुंधरा, चंदा सी उजियारी शारदा की वीणा, मां दुर्गा की कटारी, मैं अवतारी हूं, हां मैं नारी हूं । उपवन की शोभा फुलवारी, बिन नारी दांपत्य अधूरी । परिवार की धूरी नारी , मैं अवतारी हूं, हां मैं नारी हूं। शुभ घड़ी की वादन शहनाई, वेद - ऋचा - [नारी तूँ नारायणी-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nari-tu-narayani-nitu-rani/) - नारी तूँ नारायणी तुम हो शिव की अर्द्धांगिनी, तुम्हीं हो कृष्ण की राधा रानी तुम्हीं हो घर की महारानी, तुम हो सबका दुःख हारिनी तुम्हीं हो साक्षात लक्ष्मी नारायणी, नारी तूंँ नारायणी। नारी तूँ न होती तो कैसे सृष्टि का होता सृजन, तेरे बिन सब अधूरे रहते स्वर्ग के सभी देवगन, जहाॅ॑ भी देखो नारी - [करो नारी का सम्मान-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/karo-nari-ka-samman-ashish-ambar/) - नारी तुम प्रेम हो , आस्था हो, विश्वास हो , टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आस हो । हर जान का तुम्ही तो आधार हो, उठो अपने अस्तित्व को सम्भालो । केवल एक दिन ही नही , हर दिन नारी दिवस बना लो । दुनियां की पहचान है नारी, दुनियां की एहसान है नारी । - [नारी शक्ति-लवली कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nari-shakti-lovely-kumari/) - हां मैं एक औरत हूं । सृष्टि की निर्माणकर्ता समर्पण ममता की मूरत त्याग बलिदान, कोमलता की सीरत प्रतिदिन घर के कामों में खुद को व्यस्त रखना पूजा की वंदना अर्चना करना पति बच्चों की सेवा करना कभी रोज लकड़ियां चुनकर डिबिया की रोशनी में चूलहे फूकती कष्ट हो फिर भी मुस्कुराती रहती कभी रेगिस्तान - [नारी की व्यथा-लवली कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nari-ki-vytha-lovely-kumari/) - खिड़की से झांक कर देखना सहमी ,सकुचाई सी खड़ी रहना दरवाजे पर आहट आते ही मन घबरा जाता आखिर कब तक आखिर कब तक यूं छुप -छुप कर रहना अकेली न बाहर जाना जमाने की तानों से विचलित हो जाना मन विकल हो उठता आखिर कब तक आखिर कब तक घर ही बन गया कारागार - [शंख नाद करो - डाॅ उषा किरण](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shankh-naad-karo/) - उठो तुम! हुंकार भरो! अन्याय का प्रतिकार करो! भेद कर घन तिमिर को, चहुंँओर प्रकाश भरो! छवि तोड़ तुम अबला की, जियो पल-पल अब न मरो! अब तक थीं चूड़ियाँ शोभती, उन कर में कलम कटार धरो! तोड़ पायल की बेड़ियाँ, नित नव पथ पर पाँव धरो! पोंछ आँसू आँख के उनमें, इंद्रधनुषी रंग भरो! - [एक युग का विराम-संजीत कुमार निगम ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-yug-ka-viram-sankit-kumar-nigam/) - आपने जो बिहार को दिया, रहेगा सदा कर्जदार बिहार दे रहे राज्यसभा के लिए बधाई आपने पर आपका CM पद छोड़ना कैसे सहेगा बिहार, कुर्सियाँ बदल तो जाएँगी, पर उम्मीद है आपकी सेवा की पहचान नहीं बदलेगी। आपने यह अचानक कैसा निर्णय लिया, पूछ रहा है हर दिल, रो रहा है पूरा बिहार। जिसने विकास - [तुम कौन हो?-डॉ स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-11/) - तुम कौन हो? उसने पूछा, आखिर कौन हो तुम?, उर्वशी मेनका ,इंद्राणी, या अपाला लोपा घोषमुद्रा! यशोदा , राधा रुक्मिणी सीता, या कुंती द्रौपदी! आखिर कौन हो तुम? आग में जलती गोल रोटी के लिए रागिनी! धूप में जलती हरियाली के लिए कर्म योगिनी! जिंदगी की तपिश में भी इठलाती संगिनी! गर्वित मां, स्नेहिल बहन, - [बिटिया पढ़ाबअ पापाजी-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bitiya-padhab-papaji-nitu-rani/) - घर में खिलैहअ नून रोटिया हो, बिटिया पढ़ाबअ पापाजी। स्कूल में नाम लिखैहअ हो, हमरा पढ़ाबिहअ पापा जी। पढ़ी- लिखी लेबै हम नौकरिया हो, नाम तोहर हेतअ पापा जी। पढ़ाए- लिखाए कराबिहअ शादी हो, दुल्हा मिलतै अच्छा पापाजी। अठारह साल बाद शादी करबाबिहअ हौ, तन मन रहतै स्वस्थ पापाजी। बेटी बचाबिहअ बेटी पढ़ाबिहअ हो, करिहअ - [लोग के कामे बा कहे के, कहते रही-भारत भूषण आजाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/log-kame-ba-kahe-ke-kahte-rahi-bharat-bhushan-azad/) - लोग के कामे बा कहे के, कहते रही, रउआ अच्छा काम करी, आगे बढ़ते रही। लोग के कामे बा जले के, जलते रही, रउआ अपना मेहनत से जलवा बिखेरते रही। लोग के कामे बा....... ज्यादा खाएम त लोग मोटका कही, कम खाएम त उहे पतरका कही। बोलम त लोग बोलक्कड़ा कही, आ चुप रहम त - [विद्युत प्रयोग -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vidhyut-prayog-ram-kishor-pathak/) - विद्युत का करना उपयोग। बच्चों परिजन के सहयोग।। सुविधा देता हमें अनेक। इसे न समझो पर तुम नेक।। भींगे हाथों से परहेज। वरना देता झटका तेज।। कभी-कभी यह लेता प्राण। उचित तरीका दे कल्याण।। कटी-छिली तारों पर ध्यान। गुणी जनों का कहना मान।। उपकरणों का करो प्रयोग। जरुरत पर लेकर सहयोग।। आश्रित हम-सब इसपर आज। - [उमंग की सरिता-जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/umang-ki-sarita-jainendra-prasad-ravi/) - बसंती बयार चली, खिल गई कली-कली, *कोयल की आ गई है, फिर तरुणाई है।* चिड़ियाँ चहक रही, डालियाँ लचक रही, *बागों में महक रही, खूब अमराई है।* ऋतुओं में होता खास ऋतुराज मधुमास, *बहारों ने पराग कू, सुरभि उड़ाई है।* मौसम का देख रंग, मदन भी हुआ दंग, *प्रकृति ने उमंग की, सरिता बहाई है।* - [बिकें किताबें तौलकर-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bike-kitaben-taulkar-ram-kishor-pathak/) - बिकें किताबें तौलकर, कूड़े वाली भाव। देख साहित्य की दशा, मन में होती घाव।। पुस्तक हैं साहित्य के, लिए ज्ञान भंडार। मोबाइल में भूलकर, खोया यह संसार।। लिखते हम साहित्य है, लाना है बदलाव। बिकें किताबें तौलकर, कूड़े वाली भाव।।०१।। प्रज्ञा सबका कर हनन, बना दिया लाचार। मोबाइल के सामने, चले नहीं अधिकार।। मोबाइल के - [रमजान - कुमारी रूपरानी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramjan-kumari-ruprani/) - पाक महीना है रमजान। चलो करें आत्म शुद्धि पर ध्यान।। तरावीह की नमाज़ पढ़ कर। शुरू करो नेक और निश्चल काम।। इस पाक महीना मे कभी ना करना तुम अपमान। हिंदू, मुस्लिम हो या सिख ईसाई रखना, सबके लिए सम्मान।। हम सभी, हैं अल्लाह के नूर। कभी नहीं करते वो एक दूसरे को दूर।। देखो - [करो दाँतों की रक्षा-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/karo-dant-ki-raksha-nitu-rani/) - दंत चिकित्सक दिवस मनाइए, दाँत को चिकित्सक से दिखाइए। दंत दिवस में सभी कोई करना दाँतो की सफाई, ऐसा नहीं करने पर आपको खाना पड़ेगा दवाई। साल में कम से कम दाँतों को चिकित्सक से दिखलाओ, उनके कहे अनुसार दाँतो को रोज चमकाओ। सुबह शाम ब्रश करना दाँतों में नहीं लगेगा कीड़ा, अच्छे से खाओगे - [विकास पुरुष-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vikas-purush-manu-kumari/) - बिहारक जनता अखन रोई रहल छनि नयन सँ झहरैत अछि बस नीर, इस्तीफा द कऽ अहां जाइ रहल छी, हे विकास पुरुष ! बड़ देलहुं पीर। जखन अन्हार घेरने छल बिहार कय, निराशा देने छल चहुँदिस पांव पसार, ओहि घड़ी आशा कऽ दीप बनि क’ कयलहुं सगठे उजियार। गामक पथ पर उजियार भेल, सड़क बनल, - [मेरा संकल्प - मोहम्मद आसिफ इकबाल ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mera-sankalp-md-aasif-eqbal/) - मैं सागर से भी गहरा हूँ तुम कितने पत्थर फेंकोगे ? चुन-चुनकर सारे पत्थर को मैं नई डगर बनाऊंगा, नित-नए कदम बढ़ाऊँगा, बढ़ता ही चला जाऊंगा। बोलो मेरी राहों में, तुम कितने कांटे बोओगे? समय की लम्बी दौड़ में, मैं ऐसी दौड़ लगाऊंगा, अपनी तेज़ रफ्तार से, समय को भी हराऊंगा। मिटा सको तो मिटा - [रंगों का त्यौहार -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-10/) - रंगों का त्योहार होली है रंगों का त्योहार , रंगों से रंगा सारा संसार l गुलाल की महक संग रिश्तों का प्यार, मिले सबको सचमुच खुशियां अपार। नफ़रत, ईर्ष्या, द्वेष, नहीं आए किसी के द्वार, सत्य, प्रेम और धर्म की हो सदा जय जयकार। लाल रंग भरे जोश हैं तन में, हरा रंग विश्वास, पीला - [रंग मिल सब संग में -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-64/) - रंग मिल सब संग में- पुष्पमाला छंद गीत रंग सब मिल संग में। कृष्ण राधा अंग में।। गीत मिलकर गा रहें। रूष्टता दिखला रहें।। प्रीत है हर जंग में। रंग सब मिल संग में।।०१।। गाल गोरी लाल है। शोखियों में हाल है।। सोचते अनुषंग में। रंग सब मिल संग में।।०२।। बाँह डाले वे गले। कृष्ण - [होली का त्यौहार -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-22/) - व शीर्षक-होली का त्योहार होली है हिन्दुओं का त्योहार लोग लगाते हैं एक-दूसरे के गालों में रंग गुलाल, खाते हैं सब पुआ और खीर गाते हैं जोगीरा सारा रा रा। सभी जानते हिरण्यकश्यप का नाम था वह राक्षस अभिमानी शैतान, सबको कहता मुझको पूजो क्योंकि मैं हूँ तुम्हारा भगवान। हिरण्यकश्यप के डर से थर-थर काँपता - [होली -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-28/) - वंदनवार सजे शारदा जोगीरा सा र रररररररर कुंडलिया होली मन-ऑंगन को रंग दो,भर दो दिल में प्यार। हरे-भरे संसार में,स्वर्ग लगे निस्सार।। स्वर्ग लगे निस्सार,धूम होली जो आई। दौड़ रहे नर-नार,स्वयं पहचान मिटाई।। कहते हैं"अनजान",स्वर्ग में है वृंदावन?। लूटो सुख का सार,सृष्टि सुखदा मन-ऑंगन।।** पावन होली पर्व से,जीवन का है अर्थ। राग-द्वेष-तम मिट गया,हर पूजा - [होली के उत्साह में -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-63/) - होली के उत्साह में- दोहा छंद गीत होली के उत्साह में, मैंने पी ली भंग। शाम ढले घर भूलकर, मिला पड़ोसन संग।। जोगीरा सर ररर गोरा मुखड़ा देखकर, मैंने मला गुलाल। प्रेम पड़ोसन का मिला, बाँह गले में डाल।। तभी पड़ोसी आ गये, करने मुझसे जंग। होली के उत्साह में, मैंने पी ली भंग।।०१।। जोगीरा - [सोहर गीत -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-21/) - रेणु जी के जन्म दिवस पर हमर स्वरचित रचना,"सोहर गीत" सोहर गीत धन्य हमर पूर्णियाॅ॑,अररिया जिला धन्य गाॅ॑व औराही हिंगना रे , ललना रे धन्य भेल शिलानाथ पाणो देवी कि जिनकर घर रेणुजी जन्म लेल रे। छोटे से रहथिन बुद्धिमान से माता-पिता के आज्ञाकारी रहथिन रे ललना रे मिललैन हुनका सबके आशीर्वाद कि कुलके नाम - [समझ लेना कि होली है](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/samajh-lena-ki-holi-hai/) - करे जब पग स्वयम् नर्तन, समझ लेना कि होली है रग-रग में फूट पड़े स्पंदन, समझ लेना कि होली है। वायु में उन्मुक्त पराग सा जब माधुर्य बिखरने लगे, स्मृतियों के श्वेत कपोलों पर गुलाल का अनुराग उतरने लगे, और अंतरतम की वीणा से अदृश्य कोई धुन झरने लगे, हिलोरें लेने लगे - [अजी आई होली-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aji-aayi-holi-ram-kishor-pathak/) - अजी आई टोली, सरस सहसा रंग भरने। कहे आई होली, विरह मन के दु:ख हरने।। जगाए भावों को, मधुर अति प्यारी धुन सदा। बनाए रंगों से, अजब मतवाली मुख अदा।। नगाड़ा भी जैसे, मधुरिम लगा बात करने। अजी आई टोली, सरस सहसा रंग भरने।।०१।। गुलाबी गालों को, इस तरह से लाल करिए। शराबी आँखों में, - [होलिका दहन - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holika-dahan-manu-kumari/) - आओ हम सब मिलकर होलिका दहन मनायें। अधर्म पर धर्म की जीत का पताका लहरायें। छल प्रपंच को निज मन से मि टाकर, नवप्रभात का सुंदर संदेश जन मन तक पहुंचायें। बुराई चाहे कितनी भी हो बड़ी अंततः मिट जाती है, आओ हम नयी पीढ़ी को यह सीख दे जायें। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध ,नफरत, अहंकार - [भीग गई श्यामा सारी-एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhig-gayi-shyama-saari-s-k-poonam/) - होली आई होली आई, रंग सारे साथ लाई, नीर भी रंगीन हुआ,भीग गया अंग है। कीचड़ उछाल रहे, करते वबाल रहे, कहाँ माने रुके नहीं,मन में उमंग है। ढोल तासे मंजीरे से, निकले मधुर थाप, साथी सारे बोल रहे,गलियारे तंग है। सांसों में उसका नाम, कृष्ण ने रचाये भाव, प्रीत भरी पिचकारी,लड़ रहे जंग है। - [होली-धीरज कुमार ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holi-dhiraj-kumar/) - रंगों से सजी, बसंत की मादक हवाओं में महकती, हर आंगन में खुशियों की इंद्रधनुषी छटा बिखेरती रंगों का अनुपम पर्व — होली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। इस संसार में रंगों की कोई कमी नहीं, बस ज़रूरत है ऐसा रंग लगाने की जो चेहरे से नहीं, दिल से लगे और जीवन भर न - [इको क्लब संग अनोखी होली](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/इको-क्लब-संग-अनोखी-होली/) - इको क्लब की टोली आई, खुशियों की रंगोली लाई। हँसी-मस्ती की चली फुहार, होली लाई खुशियाँ अपार। सोनाक्षी लाई गुलाल सुहाना, आरती ने सबको रंग लगाने का ठाना। हँसते-हँसते रंग बरसाए, सबके चेहरे खिल उठ आए। साक्षी बोली — “संयम रखना”, बबी ने कहा — “खुशियाँ रखना।” चाँदनी, सोनाक्षी, इरफाना आए, सावरी सुमन संग सब - [फाग में कुछ बोलिए-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/फाग-में-कुछ-बोलिए-राम-किशो/) - राज दिल का खोलिए। फाग में कुछ बोलिए।। लाल सबके गाल हैं। रंग शोभित भाल हैं।। शोखियाँ है नैन में। जागते सब रैन में।। रूप सबने नव गढ़ा। भंग जैसा है चढ़ा।। जोश को मत तोलिए। फाग में कुछ बोलिए।। आज गलियाँ गाँव की। धूल छलिया पाँव की।। मोह में सब पड़ गये। नैन अंजन - [ख्वाब-राहुल कुमार रंजन ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/khawab-rahul-kumar-ranjan/) - बड़े महंगे ख्वाब नहीं मेरे, मैं जिंदगी में सुकून चाहता हूॅं। चमक - धमक की भीड़ नहीं, बस अपना सा जुनून चाहता हूॅं। ना ऊंचे महलों की आरजू है, न शोहरत की ऊंची मीनारें। भीड़ भरे इस शोर शहर में, थोड़ा सा आसमान चाहता हूॅं। थका हुआ जब लौटूं घर को, कोई पूछे दिन कैसा - [दिखा जो मीत चुन लेती-एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dikha-jo-mit-chun-leti-s-k-poonam/) - घनी-सी है चिकुर काली, न भीगे हैं पलक तेरी। गुलाबी रंग गालों का, अधर पर है हँसी मेरी। छिपाई जो दिखा दे तुम, कहा प्रिय को इशारे में। अपरिचित राह पर चल कर, तुझे खोजा सितारों में। (2) लगाया नेह तुम से ही, तुम्हारा ये दिवाना है। निहारा है झरोखों से, मिलन का पल सुहाना - [मन चंगा तो कठौती गंगा-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/man-changa-to-kathouti-ganga-manu-kumari/) - एक साधारण गृह से उठी, चेतना की दिव्य ज्वाला। रविदास ने कर्म से तोड़ा, रूढ़ि-बंधन का हर ताला। न मंदिर की सीढ़ी ऊँची, न तीर्थों का आडंबर भारी, मन की निर्मलता में देखी उन्होंने ईश्वर की तैयारी। “मन चंगा तो कठौती गंगा” बस इतना सा ज्ञान दिया। भीतर की पवित्रता को ही, मोक्ष का प्रथम - [बसंत की बहार- मुन्नी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant-ki-bahar-munni-kumari/) - बसंत की बहार है, वर्षा की फुहार है। रंगों का त्योहार है, आया खुशियों का बौछार है। सूरज की किरणे सारी, कोयल की कूक प्यारी। भँवरे की राग न्यारी, गीतो की सूर प्यारी। रंग-बिरंगे फूलो ने ली अंगड़ाई, पीली- पीली सरसों छाई। आम की मंजरी निकलकर आई, ऋतु बंसत की मान बढ़ाई। सूनी डाली पर - [मेरे सपनों का गांव](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/मेरे-सपनों-का-गांव/) - कविता मेरे सपनों का गाँव सहज सुभग शाश्वत विहान हो। मधु खग-कलरव, दिव्य आख्यान हो। जन-जन में बसे प्रबुद्ध ज्ञान हो। हो प्राकट्य जब प्रथम किरण का, विकास के लय में चल पड़े पाँव। ऐसा हो मेरे सपनों का गाँव । रोगमुक्त, आत्मनिर्भर, श्रमशुभंकर, विद्वान हो। शीलगुण सम्पन्न, प्रेमपूरित हृदय वितान हो। - [बसंत ऋतु आया-मुन्नी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant-ritu-aaya-munni-kumari/) - देखो बसंत ऋतु है आया, कितना सुंदर खुशियां लाया। मोर, पपीहा, कोयल गाए, सुंदर-सुंदर पक्षी छाए। देखो बसंत ऋतु है आया, कितना सुंदर खुशियां लाया। सुबह-सुबह जब सुरज निकले, मन में उमंग भर लाए। डाली-डाली फूल खिले, चारो तरफ हरियाली छाए। देखो बसंत ऋतु है आया, कितना सुंदर खुशियां लाया। फूलों से बाग-बगीचे मुस्काएँ, खेतो - [छुट्टियों की खुशियां मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mrityunjay-kumar-3/) - छुट्टियों की खुशियाँ... छुट्टियों के दिन आए हैं, बच्चों में खुशियाँ छाई हैं। मौज-मस्ती खूब करेंगे, नहीं किसी से तनिक डरेंगे। रोज़-रोज़ जाते हैं स्कूल, स्कूल को कह सकते हैं गुरुकुल। गुरुकुल में होती है पढ़ाई, पढ़े-लिखे बच्चों की होती है बड़ाई। मम्मी-पापा के संग छुट्टियाँ बिताएँगे, खूब सैर-सपाटा कर आएँगे। छुट्टियों का दिन आया - [होली-भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holi-bhavanand-singh/) - राधा संग नंदलाल, खेले रंग व गुलाल, रंगों का त्योहार होली, खुशी से मनाइए। सबको गले लगाना, करें न कोई बहाना, कुत्सित मानसिकता,मन से मिटाइए। होली है त्योहार ऐसा, मन का मैल भगाता, पैर छूकर बड़ों का, आशीर्वाद पाइए। हो गरीब या अमीर, लोगों के मन में खूब, अपनेपन का भाव व उल्लास जगाइए। - [वन्यजीवों की सुनो पुकार-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vanyajivon-ki-suno-pukar-nitu-rani/) - विश्व वन्यजीव दिवस मनाईए, सभी वन्यजीवों को मारने से बचाइए। वन्यजीव के लिए लगाइए पेड़, रहेंगे उसमें बंदर,हाथी ,चीता और शेर। वन्यजीवों की सुरक्षा का करो प्रबंध, बनाओ उसके साथ अच्छा संबंध। वन्यजीव को चाहो अगर बचाना, तो सबसे पहले हरे -भरे पेड़ लगाना। सभी वन्य-जीवों की सुनो पुकार, न करो उसकी हत्या लगेगा तुझे - [होली-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holi-girindra-mihan-jha/) - भक्त प्रह्लाद की रक्षा में होलिका का हुआ दहन, पर्व होली का तब से ही जाना जाता है आरंभन, लोग खेलते हैं जमकर मिट्टी, रंग, गुलाल, अबीर, मन-आत्मा हो जाता प्रसन्न, रंगों से भींगता शरीर, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हम यह पर्व मनाते हैं, पहले दिन धूरखेल, दूसरे दिन रंग-गुलाल उड़ाते हैं, धूरखेल के दिन - [श्याम मोहे रंग दे-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shyam-mohe-rang-de-ram-kishor-pathak/) - फाग में नव ढंग दे। श्याम मोहे रंग दे।। आज श्यामा बोल दी। राज दिल की खोल दी।। फाग में भी मौन क्यों। रास करके गौन क्यों।। खेलता जाने कहाँ। है छुपा माने कहाँ।। काश कान्हा संग दे। श्याम मोहे रंग दे।।०१।। दूँ गुलाबी रंग मैं। लाल पीला संग मैं।। आसमानी डाल दूँ। खींच उसके - [अनुपम है माँ की ममता-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/anupam-hai-maa-ki-mamta-ram-kishor-pathak/) - अनुपम है माँ की ममता। अद्भुत रखती तन्मयता।। अर्पित हर-पल रहती है। बच्चों का दुख हरती है।। चलना वह सिखलाती है। सतपथ वह बतलाती है।। सहकर सारी बाधाएँ। सुख देती है माताएँ।। कोई जब पीड़ा आए। ईश्वर से भी लड़ जाए।। कहती मुन्ना प्यारा है। जीवन मुझपर वारा है।। ईश्वर भी झुक जाते हैं। जब - [माटी देश की शान- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mati-desh-shan-raam-kishor-pathak/) - शान माटी देश की। मान है परिवेश की।। भूख से यह त्राण दे। दिव्यता कल्याण दे।। है उगल सोना रही। गर्व है भरती यही।। शीश पर धारण करें। राष्ट्र का तारण करें।। गाइए निज गान में। राष्ट्र के सम्मान में।। वंदना इसकी करें। प्रार्थना इससे करें।। अंत में इससे मिले। पुष्प श्रद्धा के खिले।। वीरता - [समस्या का निदान -जैनेंद्र 3](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-22/) - समस्या का निदान (रूप घनाक्षरी छंद) उद्यम से समस्या का मिलता निदान सदा, कर्मवीरों की मदद, करते हैं भगवान। राम-कृष्ण गांधी जी के जीवन में सिखाया है, धैर्यवानों की होती है, विपत्ति में पहचान। मुसीबत आने पर होता ना जो विचलित, ऋषि-मुनि कहते हैं, सच्चा है वही इंसान। द्वापर में पांडवों ने कठिन संघर्ष किया, - [चिंतकों के मध्य शिक्षा -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-27/) - गीतिका छंद चिंतकों के मध्य शिक्षा,आज भी बेचैन है। नीतियों में हम निपुण थे, धर्म का बस राज था। जोड़कर संस्कार सचमुच, सिर रखा बस ताज था।। कंटकों पर रंक-राजा, पुत्र सोते थे जिधर। जंगलों में वास करते, दुख मगर सोते निडर।। है नहीं शिक्षा हमारी, जो कभी थी पास में। पुत्र राजा भी चला - [होली गीत -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-20/) - होली गीत वृंदावन में कृष्ण खेले होली, वृंदावन में कृष्ण के हाथ भरल पिचकारी, भिंगाबै राधा के साड़ी -चुनरी । वृंदावन में राधा केअ संग सब सखियाॅ॑ सहेली, कृष्ण केअ संग सब दोस्त मंडली। वृंदावन में राधा सखियन हाथ लाल रंग लागल, कृष्ण दोस्त भरल ऐछ पिचकारी। वृंदावन में सोने सुराही में रंग भरल अछि, - [चिंतकों की मध्य चिंता - रामपाल प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prsad/) - गीतिका छंद चिंतकों की मध्य शिक्षा,आज भी बेचैन है। नीतियों में हम निपुण थे, धर्म का बस राज था। जोड़कर संस्कार सचमुच, सिर रखा बस ताज था।। कंटकों पर रंक-राजा, पुत्र सोते थे जिधर। जंगलों में वास करते, दुख मगर सोते निडर।। है नहीं शिक्षा हमारी, जो कभी थी पास में। पुत्र राजा भी चला - [राधा-कृष्ण की होली- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/radha-krisjna-ki-holi-ram-kishor-pathak/) - मोहन रंग लिए कर में छुपते छुपते जब दौड़ लगाए। धूल सभी अति हर्षित होकर माधव के तन से लिपटाए।। लाल गुलाल अबीर नहीं मकरंद सजा तन को चमकाए। दर्श हुआ वृषभान सुता जब तो चुपके-चुपके धर लाए।।०१।। मोहन की छवि सुंदर शोभित देख रही वृषभान दुलारी। श्याम छुपे तृण ओट लिए निज रूप धरे - [जागृति शंख बजाएँगे हम-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jagriti-shankh-bajayenge-ham-nitu-rani/) - भारत को शिक्षित बनाएँगे हम, बदलेंगे जमाना। शिक्षा ग्रहण करना ध्रुव सा अटल है काया की रग -रग में शिक्षा का बल है , शिक्षा की रौशनी फैलाएँगे हम बदलेंगे जमाना। बेटा- बेटी दोनों को हम पढा़एँ शिक्षा से बच्चों का भाग्य जगाएँ, जीवन में शिक्षा अपनाएँगे हम बदलेंगे जमाना। छूआ- छूत को जड़ से - [मानव अब मानव न रहा- मोहम्मद आसिफ इकबाल ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manav-ab-manav-na-raha-md-aasif-eqbal/) - मानव अब मानव न रहा, ये विकराल रूप दानव का है। जानवर ने जो छोड़ दिया वही काम अब मानव का है। बर्ताव ऐसा करते हैं कि देखे न सुहाय, ये कैसा कलयुग आया है, ये कैसा संस्कार पाया है कि, अपने ही अपनों के काम न आए। स्वार्थ की अंधी दौड़ में ऐसे भुला - [हमारी जिम्मेदारी -ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/beauty-kumari-4/) - हमारी जिम्मेदारी अभिभावक -शिक्षक संगोष्ठी की तैयारी, हमारी साझा जिम्मेदारी। नामांकन की तैयारी, हमारी साझा जिम्मेदारी। उपस्थिति की तैयारी, हमारी साझा जिम्मेदारी। ठहराव की तैयारी , हमारी साझा जिम्मेदारी। पढ़ाई की तैयारी, हमारी साझा जिम्मेदारी। पोशाक की तैयारी, हमारी साझा जिम्मेदारी। पोषण स्वास्थ्य की तैयारी, हमारी साझा जिम्मेदारी । गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तैयारी, हमारी साझा - [महाशिवरात्रि -भावानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwanand-singh-3/) - महाशिवरात्रि धनाक्षरी छंद आओ कर लें दर्शन, बाबा का दरबार में, आज महाशिवरात्रि है,सबका कल्याण हो। भक्तों को भोलेनाथ से, मिलता आशीर्वाद है, सभी भक्तों के लिए बाबा का बड़ा मान है। बाबा सबको बुलाया, आओ गाऍं बोलबम, बाबा बड़े दयालु हैं, भक्तों का वे शान है। जो भी जल चढ़ाते हैं, श्रद्धा और सम्मान - [शिक्षक का कर्तव्य -भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwanand-singh-2/) - शिक्षक का कर्तव्य धनाक्षरी छंद आओ करें शिक्षा दान, पाकर बच्चे महान, ये देश के भविष्य हैं, इनको बताइए। माता-पिता व समाज- और समुदाय में भी, शिक्षा रूपी दीप आप,मन से जलाइए। कर्तव्य के प्रति आप, हमेशा सजग रहें, ईमानदारी को आप, सुनीति बनाइए। विद्यालय व गुरु का, सम्मान करे हमेशा, यह बात विद्यार्थियों को - [होली -डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/snehlata-dwivedi-3/) - होली सारे शिकवे गिले एकदम छोड़ दें। आज होली के रंग में शहद ऊघोल दे , इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे। आज होली के रंग में शहद घोल दे , इक पिचकारी लें तन व मन बोर दे। दर्द के राह के भी सपन छोड़ दें, कल नहीं आज हम, आज हम - [प्रकृति की कहानी -गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-8/) - प्रकृति की कहानी कर्त्तव्य पथ पर लगन, निष्ठा, प्रतिबद्धता के साथ, हर कोई निरंतर चलता ही रहता है निर्विघ्न, अबाध, सूर्य, चंद्र चलता है, न ग्रहण का भय, न किसी का साथ, तथापि कर्त्तव्य-पथ पर सतत चलता रहता है अबाध, वृक्ष फलते हैं, नदियां चलती हैं, सागर रहते हैं शांत, प्रकृति में हर कोई कर्त्तव्य - [मन मेरा है मतवाला -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-62/) - मन मेरा है मतवाला- हाकलि मन मेरा है मतवाला। फागुन ने जादू डाला।। दुनिया लगती रंगीली। करती हर-पल अठखेली।। तरुवर पर झूलें झूला। खेतों में सरसों फूला।। उपवन फूलों से महका। यौवन तन में है बहका।। गाते हैं सब मिलकर होली। मिलते ही साथी टोली।। मधुरिम है सबकी बोली। मन भाए अब हमजोली।। मिलते ही - [आज की युवा -कुमारी रूपरानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kumari-ruprani/) - शीर्षक - आज की युवा किसी को तुम मिटाते हो, कोई तुमको मिटाता है।। ये वक्त की वो आंधी है, जिसमें सब लुभाते है।। ना किसी को है सम्मान गर दिल में, मगर सब दिल क्यों जलाते है किसी को तुम मिटाते हो, कोई तुमको मिटाता है।। मुखौटे ओढ़ कर अब तो चलते लोग यहां - [अच्छे बच्चे सच्चे बच्चे -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-5/) - बाल कविता शीर्षक : अच्छे बच्चे- सच्चे बच्चे । अच्छे बच्चे सत्य बोलते , सच से सबकी आँख खोलते । अच्छे बच्चे मन के सच्चे, करते नही शिकायत बच्चे । सुनते रहते कान हमेशा, आँख देखती कैसा - कैसा । मगर नहीं ये चुगली खाते, देखी - सुनी हजम कर जाते । इससे उसको नहीं - [डायरिया से डर नही-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dayriya-se-dar-nahi-nitu-rani/) - डायरिया से डर नही, अब डायरिया से कोई जाएगा मर नही। डायरिया का मतलब स्वच्छ और साफ, कभी न आएगा डायरिया का बाप। अगल- बगल की करो सफाई, न खाना पड़ेगा तुझे दवाई। डायरिया का लक्षण है दस्त और कय , इससे रहता है डायरिया का भय। डायरिया से पीड़ित बच्चे को ORSघोल पिलाओ, ज्यादा - [देखो बसंत है -डॉ स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/डॉ-स्नेहलता-द्विवेदी/) - देखो बसंत है। देखो बसंत आया मीठी मीठी ठंड है, फाग धुन गा रहा क्यों देखो मकरंद हैं। हवा बासंती यह लाई अब सुगंध है, मन के मयूर देख नाचे अनंत हैं। चुनरी रंगीन देख हो गये मतंग हैं बहुरंगी पुष्प देख हर्षित अंग अंग हैं। बैठी कुछ आस लिए मन में उमंग है, भौरा - [वही है भारत देश हमारा-सत्यम कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/wahi-hai-bharat-desh-hamara-satyam-kumar/) - जहाँ महात्मा गांँधी का महात्म्य जहाँ वीर भगत ने रचा शौर्य का इतिहास, जहाँ बहती है गंगा की निर्मल धारा वही है भारत देश हमारा। जहाँ भगवान बुद्ध ने पाया ब्रह्म ज्ञान जहाँ कण- कण में बसा राम का नाम, जहाँ ऋषियों ने खोला ज्ञान का पिटारा वही है भारत देश हमारा। जहाँ उगते डूबते - [कलम -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-26/) - कलम । मनहर घनाक्षरी शब्द-शब्द जड़कर,छंद चंद लिखकर, कागज जो कार करे, कलम बेचारी है। चलाती निशाने तीर,बदलती तकदीर, तोडी़ गुलामी जंजीर, यह सदाचारी है। मानस में भाव फले,कलम की धार चले, समस्या निदान करे, सबकी आभारी है। भोजपत्र छोड़कर,नई राह जोड़कर, करती श्रृंगार यह, बनी स्वेच्छाचारी है। किसी को बनाए कवि,नोक से उतारे छवि, - [पायल रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-61/) - पायल- कहमुकरी हर स्वर कानों को प्रिय लगता। सुनते ही जैसे चित ठगता।। हो जाती मेरा दिल घायल। क्या सखि? साजन! न सखी! पायल।।०१।। भाता तन से लिपटे रहना। आलिंगन का क्या है कहना।। मनभावन बोली है सुमधुर। क्या सखि? साजन! न सखी! नूपुर।।०२।। चिपके रहना हर-पल तन से। रिश्ता रखता जोड़े मन से।। पुलकित - [उड़ी वासंती खुशबू -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-4/) - विधा - कविता उड़ीं वासंती खुशबू । पीत वसन ओढ़े धरा, अंबर दिखता लाल , टेसू सरसों खिल गए , मौसम बदले चाल । तन चढ़ता आनंद है, मन वासंती रूप, खेतों में सरसों खिली, पीली लगती धूप । बर्फ पड़े जब लॉन में, सर्दी लगती खूब , तन गरमा लें धूप में, छोड़ उदासी - [बाल कविता -आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/asish-ambar/) - बाल कविता शीर्षक : अच्छे बच्चे- सच्चे बच्चे । अच्छे बच्चे सत्य बोलते , सच से सबकी आँख खोलते । अच्छे बच्चे मन के सच्चे, करते नही शिकायत बच्चे । सुनते रहते कान हमेशा, आँख देखती कैसा - कैसा । मगर नहीं ये चुगली खाते, देखी - सुनी हजम कर जाते । इससे उसको नहीं - [तुम चलो तो सही-अमृता कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tum-chalo-to-sahi-amrita-kumari/) - सारी नाउम्मीदी, उलझनों, चिंताओं को किनारे रखकर, एक बार उठो तो सही! पता है कि रास्ते में आती हैं मुश्किलें हजार कोई बात नहीं; घबराना, रुकना या हारना क्यों! तुम बदल दो अपने रास्ते तुरंत लेकिन चलो तो सही! तुमने पढ़ी है वरदराज की कहानी मेहनत करने की - [होली आई -ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/beauty-kumari-3/) - होली आई होली आई होली आई, खुशियों की सौगात लाई। रंगों की बौछार लाई, सबको हमने गुलाल लगाई। पूआ और मिठाई खाई, होली आई होली आई, खुशियों की सौगात लाई। मिलकर हमने फाग गाई, ढोलक और मजीरा लाई। सबके मन उमंग भर आई, हम सबने गुलाल उड़ाई। होली आई होली आई, खुशियों की सौगात लाई। - [कुत्ते पाल रहे-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kutte-paal-rahe-nitu-rani/) - लोग माता -पिता को अपने घर में दुत्कार रहे , खरीद कर लाए शौक से कुत्ते पाल रहे। माता- पिता को समय पर नही देते खाना, कुत्ते को अच्छा खाना मिलता रोजाना। माता -पिता को टूटे घर में बिछावन, कुत्ते को सोफ़ा पर रोज पावन। माता -पिता बिछावन पर रहे बीमार, कुत्ते के लिए एक - [होली का रंग-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holi-ka-rang-kartik-kumar/) - बच्चों, बुद्ध, महिला, पुरुष, युवती-युवक सब मिलें भरपूर। होली का रंग सबको भाए, प्रेम का संदेश जग में फैलाए। नन्हे बच्चे हँसते-गाते, पिचकारी से रंग बरसाते। युवक-युवती झूम-झूम गाएँ, मित्रों संग खुशियाँ मनाएँ। महिलाएँ थाल सजा कर आईं, गुझिया-मिठाई सबको खिलाईं। पुरुष भी हँसी-ठिठोली में, रंग लगाएँ प्रेम की टोली में। बुज़ुर्गों का आशीष पाकर, - [बसंत का आगमन -जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant-ka-aagaman-jainendra-prasad-ravi/) - खेतों में हरियाली शोभें सरसों-अलसी बलखाती है। ऋतुराज के स्वागत में कोयल गीत खुशी से गाती है। नव पल्लव पा मधुबन हंँसता कलियांँ खिलती हैं धीरे, हरे दूब पर बिछें हैं मोती जैसे लगते हैं हीरे। आतुर है बसंत आने को प्रकृति भी हर्षाती है।। निर्मल हो गए ताल-तलैया शान्त हुई जलधारा है, चांँदी जैसा - [फाग में महका है हर अंग-- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/faag-me-mahka-hai-har-ang-ram-kishor-pathak/) - खिली जो कलियाँ ले नव रंग। फाग में महका है हर अंग।। देख कर फूलों का शृंगार। भ्रमर ने छेड़ा कोई तार।। प्रीत है गाता उसका गान। सुनी तो कलियाँ हैं हलकान।। मचल कर बोली मत कर तंग। फाग में महका है हर अंग।।०१।। आम की डलियों में है बौर। महक से मिलता मन को - [देखो आयी होली - आयी होली- श्री रवि कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dekho-aayi-holi-aayi-holi-shree-ravi-kumar/) - रंगों से हुई आँख मिचोली, देखो आयी होली-आयी होली । बच्चों बूढ़ो की निकली टोली, देखो आयी होली-आयी होली ।। प्यार भरा ये त्योहार, बना देता आपसी व्यवहार। मिलती सबसे खुशियाँ हैं आपार, नही रह जाता मतभेद भरा विचार ।। जब आती होलिका दहन की बारी, तब सभी मिल करते इसकी विशेष तैयारी। जलते होलिका - [फाग-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/faag-ram-kishor-pathak/) - हुआ है धूमिल सभी उमंग। फाग में कैसे खेलें रंग।। लगे हैं रोटी में श्रीमान। सदा हैं वे भी तो हलकान।। याद उनको भी आती रोज। रहे नित अवसर को ही खोज।। नहीं अपनी सजनी के संग। फाग में कैसे खेलें रंग।। रहे हम रात-रात भर जाग। वदन में जैसा लगता आग।। कही सुन आती - [फाग क्या होती अम्मा बोल-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/faag-ky-hoti-amma-bol-ram-kishor-pathak/) - बजाते हैं सब देखो ढोल। फाग क्या होती अम्मा बोल।। सभी जो करते हैं हुड़दंग। तभी तो जो जाता हूँ तंग।। सभी के ऐसे होते ढंग। देखकर आता हमें उमंग।। जरा अपने मुख को तुम खोल। फाग क्या होती अम्मा बोल।। बुरा मत मानो कहते यार। सभी का सुंदर लगा विचार।। दिखाते हैं दूजे से - [गर्मी आई -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-19/) - विषय -गर्मी आई। शीर्षक -झटपट भागा ठंडा भाई। झटपट भागा ठंडा भाई, लेके कंबल और रजाई। स्वेटर पहनकर जैसे- तैसे भागा , जैसे उड़ता काला कागा। छोड़ गया वह पतला चद्दर, रात में ओढ़ेगा बेटा गब्बर। घर आई गरमी की बेटी, लहराती अपनी वो चोटी। एसी पंखा साथ में लाई, फ्रीज लेके आई रखने मलाई। - [सामाजिक न्याय _रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-60/) - सामाजिक न्याय- दोहा छंद गीत न्याय शब्द ही गूढ़ है, कैसे करें बखान। पाना सब हैं चाहते, मुश्किल होना मान।। समता इसका मूल है, बड़ा कठिन सा कार्य। स्वार्थ रहित जब हो सके, तब कहलाएँ आर्य।। मिलता सतत समाज में, नित नूतन व्यवधान। न्याय शब्द ही गूढ़ है, कैसे करें बखान।।०१।। मन की आशा भी - [पैगाम - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/paigam-ram-kishor-pathak/) - दीवानों का हाल सुनाने, संग लिए अपने पैगाम। कुसुमाकर है दौड़ा आया, बैठे हम अपना चित थाम। रंग-गुलाल हवा है मिलकर, लगा रहा सबको है रंग। मंद-मंद वह छूकर सबको, मन में भरता नवल उमंग।। नैनों में शोखी है आयी, दिल में होता धूम धड़ाम। दीवानों का हाल सुनाने, संग लिए अपने पैगाम।।०१।। लाल हरा - [भरे हुए भंडार समय पर लूटो-रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhare-huye-bhandar-samay-pr-luto-rampal-prasad-singh-anjan/) - भाग गया है शीत,निकल कर देखो। बाहर किरणें प्रीत,निकल कर देखो।। जो था कल तक ठोस,पिघलते देखो। बूॅंदें अटकीं ढीठ, चमकते देखो।। सोनू मोनू दौड़,लगा कर आओ। हवा फेफड़ा फेंक,स्वस्थ हो जाओ।। ग्रीवा कंचन हार,उसे अब फेंको। सर्षप सचमुच पीत,मन भर देखो।। कागज ऊपर छाप,हृदय कर पीला। जाओ कुछ दिन भूल,गगन है नीला।। सुख का - [Student](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/student/) - हे नारी, तू नारायणी है, डर मत तू झाँसी की रानी है, डट कर सामना कर, मनुष्य रुपी दानवों का , तू दुर्गावती जैसी प्रतिभा वाली है। तू चाहे रच इस स दृष्टि को, चाहे, नष्ट कर इस दृष्टि की तू है चाहे बन जा सीता तू चाहे बन जा शूर्पणखा तेरी वाणी - [आया बसंत आया बसंत](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/आया-बसंत-आया-बसंत/) - आया बसंत आया बसंत आया बसंत आया बसंत सबके मन को भाया बसंत दादूर मोर पपीहा बोले कोयल के मन पीहू बोले आमों में मंजर लद आये मंद - मंद भौंरे मुस्काये बच्चों के मन को भाया बसंत आया बसंत आया बसंत सूरज की किरणें जो आयी सोई नभ में उषा - [ऋतुराज के आगमन पर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ऋतुराज-के-आगमन-पर/) - ऋतुराज के आगमन पर निकल उठीं हैं दिवा-रश्मियां नव प्रभात, नव यौवन मन छाया है, स्वागत के लिए कूक रही है कोकिला क्रोड से निकल, विहगों ने स्वागत गीत गाया है। वृक्षों की डालियां झूम कर कह रही हैं- आओ ऋतुराज आओ। पुष्प धरा पर बिछ चुके हैं स्वागत में आओ यहां आसान जमाओ। - [एक दिन का सम्मान या हमेशा?](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/एक-दिन-का-सम्मान-या-हमेशा/) - "एक दिन का सम्मान या हमेशा?” “मैं शिक्षक हूँ — और यह मेरी कहानी है” मैं शिक्षक हूँ… हाँ, वही — जो सुबह पहले विद्यालय पहुँचता है और अंत में ताला लगने पर लौटता है। मेरी कोई बड़ी अभिलाषा नहीं थी, बस एक जिद थी — मेरे बच्चे मुझसे आगे निकलें। मैंने अपने सपनों को - [योग का महत्व.. रीना कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-ka-mahtaw-rima-kumari/) - आओ बच्चो ! योग करे हम,जीवन में सदा स्वस्थ रहे हम।योग से जीवन अच्छा बनता,जीवन इससे है चलता रहता।बच्चों जानों योग ही है जीवन,!इस्से ही सजता है सुन्दर मन।योग कोआवश्यक समझे हम,तभी तो सदा स्वस्थ रहेंगे हम।आओ बच्चों ! योग करे हम।आओ———————-ये अमूल्य है अपना जीवन,इससे बढ़कर न है कोई धन।अतः महत्व दे सदा इसे - [किनारा-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kinara-ruchika/) - किनारों पर खड़ा होकर गहराई का अंदाजा लगा नही सकते, बिना चोट के दर्द कितना ये कहाँ कभी बता सकते। कयास ,अंदाज ,अटकलें चाहे कितना भी लगा लें बिना चखे भला कैसे स्वाद का कोई मजा ले, दो किनारों का मिलना कहाँ कभी सम्भव भला, हर असम्भव को हम सम्भव कहाँ बना सकते। आदतें बदलने - [युवा-कुमारी रूपरानी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yuva-kumari-ruprani/) - "युवा हैं हमारे देश की शान आओ मिलकर करें सलाम।। अपने जीवन को ना करो ध्रुमपान और मादक द्रव में बर्बाद, क्योंकि तुमसे हैं, मां-बाप का ही नहीं देश को अभिमान।। क्यों कर रहे, अपने जीवन को परेशान । फेसबुक, इंस्टा हैं तुम्हारे तनाव का प्रमाण ।। उठो तुम, करो कर्तव्य अपना। यहीं कसम खा - [महादेव की महिमा-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mahadev-ki-mahima-ashish-ambar/) - महाशिवरात्रि का त्योहार है आया, शिवालयों में है उत्सव छाया । जिनकी जटा से निकली है गंगा, आज शिवजी का बज रहा डंका । आज भक्तों की पूरी हो जाए मांग, चढ़ाएं धतूरा, बेलपत्र और भांग । सबके हृदय में रहते सदैव , देवों के देव , हर - हर महादेव । महादेव की महिमा - [शिव भजन-हर्ष नारायण दास](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiv-bhajan-harsh-narayan-das/) - मेरेभोले बाबा का प्यारा है नाम। कैलाश है उनका धाम।। मेरे भोले बाबा का सुन्दर है नाम। मैया गौरी हैं उनके वाम। जटा में उनके गंगा है विराजे। संग में मैया गौरा है साजे।। उसने किया है विषपान। जिससे पड़ गया नीलकंठ नाम। मेरे भोले बाबा का सुन्दर है नाम। मेरे भोले बाबा हैं करुणा - [पुलवामा के वीरों को नमन-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pulwama-ke-viron-ko-naman-kartik-kumar/) - 14 फ़रवरी का दिन था, दर्द भरी वह घड़ी आई, पुलवामा की धरती रो पड़ी, जब वीरों पर आफ़त छाई। चलते थे काफिले वीर जवान, दिल में देश का मान लिए, मां भारती की रक्षा खातिर, अपने प्राणों का दान दिए। अचानक गूंजा धमाके का शोर, आसमान भी कांप उठा, मिट्टी-मिट्टी में मिलकर भी हर - [ऊँ कृष्णाय नमः-एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/om-krishnay-namah-s-k-poonam/) - 💐रुद्राणी संग त्रिलोचन ने💐 (1) तिलक चंदन लगे मस्तक, जटाधारी सदा राजे। विराजीं शीश पर गंगा, सुधाकर माथ पर साजे। कलेवर है अघोरी-सा, न गौरी छोड़ कर भागी। जगत सारे रहे सोते, महारुद्र पा निशा जागी। (2) गरल पी कर त्रिलोचन ने, भरी है प्राण हर आत्मा। सुधा की धार पीकर, नमन है आज परमात्मा। - [शिव-शक्ति-रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiv-shakti-ratna-priya/) - कल्याण करते हैं जगत् का शिव आदिदेव अनंत हैं परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं अनुप्राणित दिग्-दिगंत हैं । शिव गंड्ग की महिमा निराली गौरा के प्रियवंत हैं युगों-युगों से इक-दूजे के निर्बाध प्रेम रसवंत हैं । अमर प्रेम का अपूर्व बंधन हार्दिक स्नेह है अनश्वर ज्ञान, शक्ति, निर्बाध भाव से अनश्वर व पूर्णवन्त हैं । माँ - [जल ही जीवन है-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jal-ho-jivan-hai-aashish-ambar/) - जल से ही तो है जीवन, जल से ही तो यह धरती हैं । उपयोग करें हम सूझबूझ से, व्यर्थ न इसका उपभोग करें । गर्मी में जब उड़ जाता है यह, कितनी सूखी लगती यह धरती । मोल बहुत तब बढ़ जात है, चलती नही किसी की मर्जी । उपयोग करें हम समझदारी से, - [भोलेनाथ हो-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bholenath-ho-ram-kishor-pathak/) - लेकर आए हैं बाराती, करके चौड़ी छाती, भोले नाथ हो। है हैरत में दुनिया सारी, अद्भुत रूप निहारी, शशिधर माथ हो।। भूत-प्रेत सब नाच रहे हैं, सुरगण सजकर धाए। हाथी घोड़ा संग पालकी, लेकर सब हैं आए।। भोले भंग लिए गटकाए, तन पर भस्म रमाए, नंदी साथ हो। लेकर आए हैं बाराती, करके चौड़ी छाती, - [शिव विवाह -रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiv-vivah-rampal-prasad-singh-anjan/) - क्षितिज लालिमा की झलक,संपूरित उल्लास। नभचर थलचर चेतना,भरतीं हैं हुल्लास।। सारी सृष्टि सजी-धजी,निकलेगी बारात। गाजे-बाजे में खिले,दानव-मानव जात।। जय-जय हे शिव-पार्वती,मिटें दिलों की स्याह। उन्मत उत्सव दिव्यता,दिखा रही शुभ राह।। प्रेम-त्याग सम मेल से,होगी धरा सनाथ। खींची धर्म लकीर की,हम सब होंगे साथ।। तट द्वि खड़े हैं शिव-शिवा,मध्यम परमाधार। सागर सुलभ ढलान पर, तत्वज्ञान विस्तार - [हौसलों की उड़ान - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hosalon-ki-udan-raam-kishor-pathak/) - पा जाते हर लक्ष्य हम, बिना किसी व्यवधान। मन लेता है जब वहाँ, हौसलों की उड़ान।। बाधाओं को चीर कर, करते रहिए नृत्य। हो जाता उनका सफल, सहज सदा हर कृत्य।। दृढ निश्चय मन में रखें, बिना हुए हलकान। मन लेता है जब वहाँ, हौसलों की उड़ान।।०१।। पर्वत में भी राह की, रखकर मन में - [फागुन-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/fagun-ram-kishor-pathak/) - अन्न भरा खेतों में, मन को भाया है। हलचल अब रेतों में, फागुन आया है।। सरसों पीली फूले, मस्ती से झूमे। पाकर खिलती कलियाँ, भौरों ने चूमे।। मादक हुई हवाएँ, तन हर्षाया है। हलचल अब रेतों में, फागुन आया है।।०१।। चंपा और चमेली, गेंदा सह बेली। लिपट मकरंद सबसे, करती अठखेली।। अब भ्रमर कुमुदिनी से, - [मन की वीणा के तार कसे-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/man-ki-vina-ke-taar-kase-manu-kumari/) - मन की वीणा के तार कसे, अब नए सुरों की बात करें। डर और संशय दूर हटाएँ, खुद पर फिर विश्वास करें। सपनों को फिर जागृत करें, हिम्मत को फिर साथ लें। जो भीतर सोया साहस है, उसे जगाकर हाथ लें। हर मुश्किल को सीख समझें, हर आँसू को शक्ति बनाएं। टूटे मन को जोड़-जोड़ - [*गुरु-शिष्य महिमा*](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/गुरु-शिष्य-महिमा-2/) - गुरु-शिष्य महिमा गुरु चाणक्य का सानिध्य पाकर, चंद्रगुप्त मिशाल बना; नंद वंश का नाश कर, वह मगध सम्राट बना। भद्रबाहु से शिक्षा पाकर, प्रियदर्शी अशोक बना; विश्वभर में बौद्ध धर्म का, वह संदेशवाहक बना। परशुराम ने कर्ण को, महावीर योद्धा किया; द्रोणाचार्य ने अर्जुन को, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर किया। संदीपनी के आश्रम - [मेरा इको क्लब परिवार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/मेरा-इको-क्लब-परिवार/) - जब धरती माँ की आँखें भर आईं, सूखी नदियाँ, थकी हुई हरियाई… तब नन्हे क़दम आगे बढ़कर बोले— “माँ, अब हम हैं… तू मत रोना।” नन्हे हाथों में पौधों की साँसें, मासूम आँखों में कल की आसें। सोनाक्षी की मुस्कान में हरियाली, आरती की शपथ में धरती की लाली। साक्षी ने जल को - [लिखनी एक कहानी होगी- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-59/) - २२-२२-२२-२२ लिखनी एक कहानी होगी लिखनी एक कहानी होगी। जिसमें खास रवानी होगी।। उसने आँचल है लहराई। चढ़ती मस्त जवानी होगी।। उसके गोरे गालों पर अब। कुमकुम भी मस्तानी होगी।। प्रीत हमारा बचपन का है। उसको याद दिलानी होगी।। काम बहुत सा शेष अभी है। सबको ही निपटाना होगा।। राग हवाओं ने है छेड़ा। कहती - [प्रभाती पुष्प जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-21/) - प्रभाती पुष्प सीता स्वयंवर जनक दुलारी सीता, साध्वी परम पुनीता, दुल्हन बन कर अवधपुरी आई है। धनुष जो हुआ भंग, देख लोग हुए दंग, घर-घर मिथिला में, बजी शहनाई है। खुश हुए नर-नारी, उमंग में प्रजा सारी, राम जी की सीता संग, हो गई सगाई है। मुदित हैं राजा-रानी, अंँखियों में भरा पानी, सीता जैसी - [बाल कविता नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-18/) - विषय -बाल कविता। शीर्षक -सोमवार को आएगा मेरा मोटरकार। सोमवार सोमवार सोमवार, सोमवार को आएगा मेरा मोटरकार। मंगलवार मंगलवार मंगलवार, माँ करती बच्चों से बेइंतहा प्यार। बुधवार बुधवार बुधवार, मलाई खाकर घर से भागा काला बिलार। गुरुवार गुरुवार गुरुवार, खाना खाओ ताजा न कभी पड़ो बीमार। शुक्रवार शुक्रवार शुक्रवार, आए स्नान करने हम गंगा किनार। - [भक्त हितकारी-जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhakt-hitkari-jainendra-prasad-ravi/) - विश्वनाथ मम नाथ मुरारी। त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।। कौशल्या नंदन बन रघुकुल आये, नीर निधि के बीच द्वारिका बसाये, कोई कहे रघुवर कोई गिरधारी। त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।। इन्द्र को व्यापा जब तेरी माया, वृंदावन को था पल में डुबाया, गोपों को बचाया बन गिरधारी। त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।। करन चहत प्रभु पद कर सेवा, - [ऋतुराज बसंत -ब्यूटी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rituraj-vasant-beauty-kumari/) - मनहर लगता दृश्य धारा, उपवन-उपवन खिले सुमन, धरा पर सरसों की पीली चुनरी, केसरिया खिला टेसू फूल, तरु पर लगा नव पल्लव, आ गया ऋतुराज बसंत। बहे मंद- मंद समीर, मौसम लगता है सुहावन, अवनी धरण की नवयौवन, होली का त्योहार निराला, जीवन में भरता नवरंग, आ गया ऋतुराज बसंत। रंग बिरंगी उड़ी तितलियां, - [कविता](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/कविता/) - ।। तुम हो मेरी रागिनी सी ।। तुम्हारी बोली जैसे मीठी रागिनी सी, अंधेरी रातों में हो तुम मेरी चाँदनी सी।। मैं चकोर, तुम हो पूनम की रात, जैसे मैं एक कविता, तुम हो मेरी किताब।। ग्रीष्म ऋतु की ठंडी पवन हो तुम, मेरी बगिया की खिलती चमन हो तुम।। मस्ती में मचलती हो दिशाहीन - [सच्चे मार्गदर्शन की रोशनी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/सच्चे-मार्गदर्शन-की-रोशन/) - जब थककर बैठ गए थे हम, और लगा — अब आगे क्या? तब किसी ने धीरे से आकर कहा — “चलो, अभी रास्ता है बचा।” एस० एल० डी० से जूझते बच्चों को, जब दुनिया कमतर आँक रही थी, तब किसी ने उनके भीतर उम्मीदों की दुनिया झाँक रही थी। मुज़फ्फरपुर की गलियों में फिर मेहनत - [*चलें स्कूल*](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/चलें-स्कूल/) - चलें स्कूल हम हैं सृजन के फूल, चलें स्कूल। चलें स्कूल, चलें स्कूल।। बच्चे हैं हम, सृजन के हार, हमसे ही आती, है बहार। मिल जाये जवाब, हमें माकूल, चलें स्कूल, चलें स्कूल।।(1) हम हैं प्रकृति के उपहार, विद्यालय में सीखते जीत और हार। नैतिकता में हैं बड़े उसूल, चलें स्कूल, चलें - [गुरु-शिष्य महिमा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/गुरु-शिष्य-महिमा/) - गुरु-शिष्य महिमा गुरु चाणक्य का सानिध्य पाकर, चंद्रगुप्त मिशाल बना; नंद वंश का नाश कर, वह मगध सम्राट बना। भद्रबाहु से शिक्षा पाकर, प्रियदर्शी अशोक बना; विश्वभर में बौद्ध धर्म का, वह संदेशवाहक बना। परशुराम ने कर्ण को, महावीर योद्धा किया; द्रोणाचार्य ने अर्जुन को, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर किया। संदीपनी के आश्रम - [ होली का त्योहार - आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/holi-ka-tayohar-ashish-amber/) - होली का त्योहार - आशीष अम्बर देखो होली का त्योहार है आया, संग में रंगों का बौछार है लाया। बैरी भी गिले मिटाकर हाथ मिलाया, अपनो ने भी क्या खूब साथ निभाया। देखो होली का त्योहार है आया, हँसने और हँसाने आया। रंग लगाओ, ढोल बजाओ, फिजाओं में अजब खुमार है छाया। देखो होली का - [आती चिड़िया - जाती चिड़िया - आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aati-chiriya-jati-chiriya-ashish-amber/) - आती चिड़िया - जाती चिड़िया - आशीष अम्बर कू - कू करती आती चिड़िया, फुर - फुर करती जाती चिड़िया । गाना कितना गाती बढ़ियाँ, नन्ही - नन्ही प्यारी चिड़िया । रोज सवेरे चहक - चहक कर, हमें सदा जगाती चिड़िया । धरती से आसमान तक, लम्बी दौड़ लगाती चिड़िया । कभी न थकती, कभी - [प्रपोज डे - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/perpose-day-nitu-rani/) - नमन मंच प्रपोज डे - नीतू रानी शीर्षक -करिए माता-पिता को प्रपोज। आज है प्रपोज डे दिन के है आज संडे, माता-पिता से स्नेह रखिए देखिए मत है कि कौन डे। करिये बूढ़े माता-पिता को प्रपोज, जो करते रहते दिन भर आपकी खोज। करिए माता- पिता से प्यार, जो करते दिलों जान से दुलार। उनसे - [कविता : - बसंत का आगमन - आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavita-basant-ka-aagamn-ashish-ambar/) - कविता : - बसंत का आगमन - आशीष अम्बर गीत हजारों लिखे गये सब पड़े पुराने, देखो आया फिर बसंत नव गीत सुनाने । मन के अन्दर जाने कैसी हूक उठी है, कोई बताएं कोयलियाँ क्यूँ कूक उठी है । वृक्षों ने क्यों वस्त्र पुराने त्याग दिए हैं, नए वस्त्र फिर ऋतु बसंत से माँग - [प्रेम - एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prem-s-k-punam/) - ऊँ कृष्णाय नमः विधाता छंद विषय:-प्रेम - एस.के.पूनम करें हम प्रेम जीवन में, सुखद परिणाम हम पायें। मिटा कर क्लेश लोगों का, भँवर को पार कर जायें। गहन हैं प्रेम प्रभु अपना, चुने हैं पंथ सुखदाई । दिया है जन्म जीवों को, अलौकिक दीप्ति है पाई । (2) यहाँ शुभ रीत सीखी है, रखेंगे - [गजल - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gazal-ram-kishor-pathak/) - अब और क्या बाकी बताना रह गया- गजल २२१२-२२१२-२२१२ अब और क्या बाकी बताना रह गया। इस जिंदगी का गुल खिलाना रह गया।। हर शख्स होता खास अपने आप में। पर वक्त का मुझको सिखाना रह गया।। जो भी मिला है आजतक काफी नहीं। कुछ और पाने का बहाना रह गया।। जब अश्क आँखों में - [शारदे वंदना- अरुण छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sharde-vandana-arun-chhand-ram-kishor-pathak/) - शारदे वंदना- अरुण छंद गीत - राम किशोर पाठक सुर सभी, साध लूँ, मातु जो प्यार दे। प्यार दे, तार दे, भक्त को शारदे।। बोध हो, सत्य का, अर्थ को जान लूँ। शब्द की, शक्ति से, काव्य पहचान लूँ।। काव्य का, रस सहज, दे मुझे तार दे। प्यार दे, तार दे, भक्त को शारदे।।०१।। कर्म - [ईश्वर से कुछ सवाल - रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ishwar-se-kuch-sabal-rampal-prasad-singh-anjan/) - ईश्वर से कुछ सवाल - रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' पूर्व प्रभात बेला में बड़ी दुखद खबर मिली कि दर्वे ग्राम के प्रधान शिक्षक अशोक कुमार मेरे प्रिय शिष्य का निधन हो गया है इस दुखद घड़ी में मैं ईश्वर से कुछ सवाल किए हैं जो इस मेरी कविता में समीक्षा आप लोगों की जल - [दोहा - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dohe-ram-kishor-pathak/) - दोहा - राम किशोर पाठक दोहे छाया पति मार्तण्ड का, स्वागत करती भोर। पक्षीगण गायन करें, नृत्य करे वन मोर।। सप्तवर्ण आभा लिए, प्रकट हुए संसार। देख तेज डरकर तिमिर, डाल दिया हथियार।। होते रथ आरूढ़ ज्यों, अरुणाचल में सूर्य। कण-कण धरती का खिले, बजने लगता तूर्य।। पंखुरी अपनी खोलकर, स्वागत करता पद्म। त्राहिमाम करता - [बसंत -डॉ अजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-ajay-kumar/) - बसंत आम के पेड़ पर छाए बौड़़ चर- अचर नाचें चहूँ ओर सुरभित भए दिग- दिगंत सखि, यही तो है बसंत! रे अलि! आया बसंत! सिसिर का सुनापन है भागा वन उपवन में जीवन जागा फाग राग गाने लगे संत सखि,यही तो है बसंत! रे अलि! आया बसंत! गेंदा,डालिया धरती चूमी महुआ महका,सरसों झूमी दसों - [दोहे रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-58/) - दोहे सकल सृष्टि में कर्म के, फल का बना विधान। जिसका पालन का सदा, रखते शनि हैं ध्यान।। जिसने जैसा है किया, उसे वही हो प्राप्त। न्याय व्यवस्था शनि किए, सारे जग में व्याप्त।। पिता सूर्य से रूष्ट शनि, दिखलाते हैं क्रोध। माता छाया के लिए, पाकर करुणा बोध।। शोभित वाहन गिद्ध की, कर में - [आकाश बाल कविता -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-57/) - आकाश- बाल कविता अम्मा कहती हैं मुझे, छूना है आकाश। मेरे सारे कार्य पर, देती है शाबाश।। हर्षित होकर मैं सदा, करता अपना काम। मीठी बोली से सदा, माँ लेती है थाम।। सफल न हो पाओ अगर, होना नहीं निराश। अम्मा कहती हैं मुझे, छूना है आकाश।।०१।। बाधा मिलती है बहुत, हो जाता हलकान। करते-करते - [बगुला नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-17/) - विषय -बगुला। शीर्षक -आटा से बना मेरा बगुला। आटा से बना ये बगुला, देखने में लंबा और पतला। दिन भर देखता रहता पानी, खाता रहता मछली रानी। घर इसका बरगद, पीपल पर, लगभग रहता इसी पेड़ पर। दो लंबी होती इनकी टाँगे, छोटी-छोटी होती इनकी आँखें। चोंच भी इनकी लंबी होती , जिससे झट मछली - [मैं हूं शिक्षक-डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-hu-shikshak-dr-snehalata-dwiwedi-arya/) - मैं इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ, जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ। मैं शिक्षक संस्कार, सत्य तप का राही, वसुधा से अज्ञान मिटाने वाला हूँ। इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ, जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ। नवजीवन की ज्योत जलाने वाला हूँ, नव अंकुर को पुष्प बनाने - [मैं हूं शिक्षक डॉ स्नेहलता द्विवेदी आर्या](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-10/) - मैं हूं शिक्षक मैं इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ, जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ। मैं शिक्षक संस्कार, सत्य तप का राही, वसुधा से अज्ञान मिटाने वाला हूँ। इस धरा के ज्ञान धर्म का वाहक हूँ, जननी के स्वाभिमान मर्म का नायक हूँ। नवजीवन की ज्योत जलाने वाला हूँ, नव अंकुर - [डालती रंग है रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-56/) - डालती रंग हैं- अरुण छंद होली गीत पीसकर, सिल सदा, शिव पिए भंग हैं। पार्वती, रूद्र को, डालती रंग हैं।। नेत्र हैं, शिव किए, लाल पीला जहाँ। रंग नव, भर रही, हिम सुता है वहाँ।। भंग के, ढंग से, शैलजा तंग हैं। पार्वती, रूद्र को, डालती रंग हैं।।०१।। चंद्रमा, स्याह हैं, छिप रहें रंग से। - [संकल्प- मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-9/) - संकल्प (कविता) संकल्प जगे जब अंतर में, तो पथ स्वयं बन जाता है। साहस के चरण जहाँ पड़ें, भय वहीं मिट जाता है।। साक्षी है यह इतिहास स्वयं, हर युग, हर परिवर्तन का। जो झुका नहीं वह अमर हुआ, सत्यपूर्ण आचरण का।। समानता की ज्योति जले, हर मन, हर अधिकार में। भेद मिटें, मानव दिखे, - [धैर्य रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-55/) - धैर्य - शक्ति छंद मात्रिक गीत हमें आप इतना बता दीजिए। कहाँ धैर्य खोया पता कीजिए।। हमें भी जरा सा पता तो चले। किया क्या खता मैं हुआ क्यों गिले।। नहीं इस तरह से मजा लीजिए। कहाँ धैर्य खोया पता कीजिए।।०१।। बसंती हवा भी चली है अभी। रहे प्रेम में संग भी हम कभी।। उन्हें - [मेरी गुड़िया नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-16/) - विषय -बाल कविता। शीर्षक -मेरी गुड़िया फल, सब्जी से बनी है। मेरी गुड़िया फल, सब्जी से बनी है, दिखने क्या अद्भुत लग रही है। बाल मेरी गुड़िया का हरी मिर्ची का , आँख चुकंदर का क्या खूब जमती है। मेरी गुड़िया -----२। कद्दुकस का शरीर हाथ मिर्ची से बनी है, लहसुन की अंगुली क्या सुंदर - [मुट्ठी में रेत... मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/muthhi-me-ret-manu-kumari/) - मुट्ठी में रेत-सी है यह जीवन की कहानी,कब फिसल जाए उँगलियों से, किसे है यह निशानी।काग़ज़-सा भीग जाए, जल में घुल जाए पल में,बूँदों का बुलबुला-सा, टूटे क्षण भर के छल में।छाया-सी चलती है देह, सूरज ढलते ही खो जाए,समय की तेज़ हवा में,नाम-निशान मिट जाए।न ठहराव, न ठिकाना है, न कल का है भरोसा,सच - [होली गाए रे- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-54/) - होली गाए रे मचल-मचल के भ्रमर कुमुदिनी में छुप जाए रे। आज पपीहा कूक मधुर सी होली गाए रे।। कलियाँ हंँसकर इठलाई खोल पंखुरियाँ रे। लगी तितलियाँ मँडराने गलियाँ-गलियाँ रे।। झूमें डलिया पीली सरसों भी लहराए रे। आज पपीहा कूक मधुर सी होली गाए रे।।०१।। हवा सुवासित बहकाती है गाँव नगरिया रे। लगी बहकने आज - [ग़जल-रामपाल प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-25/) - ग़ज़ल दूर कितना मगर चलेंगे हम। दिख रहा है शहर चलेंगे हम।। शीत अब छोड़ है गया मग को। दिख रही है डगर चलेंगे हम।। मान्यताऍं नहीं सरल फिर भी। भूख कहती उधर चलेंगे हम।। लोग कहते कई हुनर मुझमें। कायदे में कसर चलेंगे हम।। ऑंधियों को नहीं कभी देखा। अब दिखी है लहर चलेंगे - [प्रेम- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-53/) - प्रेम - सरसी छंद गीत प्रेमिल रहना चाहत सबकी, उलझन में संसार। करते सब हैं प्रेम जगत में, सबके अलग प्रकार।। कोई धन से नाता जोड़े, देता है जी जान। कोई यहाँ समझ बैठा है, धन को ही भगवान।। इसको भी हम प्रेम कहें या, चाहत का अंबार। करते सब हैं प्रेम जगत में, सबके - [बच्चो तुम प्रश्न पूछो - गिरींद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-7/) - बच्चों तुम प्रश्न पूछना ! बच्चों तुम प्रश्न पूछना शिक्षकों से, गुरुजनों से, माता-पिता से, गूगल से, अपने वरेण्य जनों से, तुम्हारे प्रश्नों से ही तुम्हारा स्तर समझा जाता है, कभी-कभी तेरे प्रश्न शिक्षकों को भी सिखा जाता है, तुम्हारे प्रश्न से कभी-कभी हम सभी सीखते हैं, बच्चे वही अच्छे होते हैं, जो प्रश्न पूछते - [मंगल रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-24/) - मनहर घनाक्षरी। मंगल नीले-नीले नभ नीचे,हरियाली नैन खींचे, मटर की छिमियों में,स्वाद बलवान है। सर्षप के आसपास,अलसी बसी है खास, नीली-नीली ऑंखवाली,तारे के समान हैं। बौने-बौने मसूरी में,लाल लहू दाने भरे, खेतिहर समंगल,कर रहे दान है। कोयल ने छेड़ी राग,सृष्टि ही गई है जाग, भौंरे के गुंजार ताक,धीना धीन गान है। रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' - [शिक्षा की रोशनी में बदला मुज़फ्फरपुर”](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/शिक्षा-की-रोशनी-में-बदला-म/) - जब सपनों को दिशा नहीं मिलती थी, जब उम्मीदें भी मौन खड़ी रहती थीं, तब शिक्षा ने थामा बच्चों का हाथ, और मुज़फ्फरपुर ने बदली अपनी बात। अँधेरों से लड़कर जली जो लौ, वह यूँ ही नहीं जल पाई थी कोई। इसके पीछे था संकल्प अपार, दूर तक देखने वाला विचार। प्रशासन जब - [गांधी: देह नहीं, एक विचार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/गांधी-देह-नहीं-एक-विचार/) - यह केवल एक तारीख नहीं, यह आत्मा का मौन है। आज भारत सिर झुकाकर कहता है— बापू, आप अमर हैं, कौन है जो आपको मौन कर सके? न तलवार की धार से इतिहास बदला, न सिंहासन की चाह ने मार्ग चुना। नंगे पाँव चले सत्य की राह, और साम्राज्य काँप उठा, थर्रा उठा। - [मिथिला हाट - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mithila-haat-manu-kumari/) - सीता माय के पावन जन्मभूमि , मधुबनी झंझारपुर । ताहि में बनल अछि मिथिला हाट । गेलों घुमय सपरिवार। दुई बजे सब ओतय पहुंचलों । ओतय देखय छी उमड़ल भीड़ , भीड़ कय दुनु बहिन देलों चीर। तीस चालीस टा लागल कार, आयल छलखिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। आधा घंटा करलौं हम सब इंतजार , तखन - [फसलों का त्योहार है खिचड़ी-एम० एस० हुसैन कैमूरी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/fasalon-ka-tyohar-hai-khichadi-m-s-husain/) - फसलों का त्योहार है खिचड़ी प्रकृति का उपहार है खिचड़ी देखिए फसलों की पैदावार बढ़ाकर लाई खुशियों की बौछार है खिचड़ी नए फसल भी लगा लिए हैं ,हम-सब ने फिर खुशियां मनाने को तैयार है खिचड़ी इसके आगमन से खेतों में हरियाली छाती जब ही कहते हैं वसंत की बहार है खिचड़ी आईए हम-सब एक - [| मत छीनों बचपन - बाल विवाह |](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/मत-छीनों-बचपन-बाल-विवाह/) - स्व-रचित - कविता मत छीनो बचपन - बाल विवाह 1. नन्हीं सी गुड़िया है, बागों की कलियाँ है। हुआ न बचपन पूरा है, यौवन अभी अधूरा है। 2. कांच कली है, नन्हीं सी परी है, न बांधो शादी के इस बंधन में। यह परम्परा नहीं, अन्याय है, न डालो जिम्मेदारियों के बंधन में। 3. हाथों - [Primary Teacher](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/primary-teacher-2/) - "अभी ना ब्याह रचाओ मां " अभी ना ब्याह रचाओ मां.... मुझे पढ़ लिख जाने दो अपने पैरों पर खड़ी होकर, मुझे कुछ बन जाने दो। अभी ना ब्याह रचाओ मां.....। खेलने कूदने के दिन है मेरे, गुड्डे गुड़िया संगी मेरे बचपन को थोड़ा जी लेने दो। अभी ना ब्याह रचाओ मां.....। कच्ची मिट्टी की - [तुम हो तो बसंत है-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tum-ho-to-basant-hai-manu-kumari/) - तुम हो तो बसंत है, वरना मौसम रूठ जाते हैं, तुम्हारी हँसी से पतझर भी गीत गुनगुनाते हैं। तुम्हारा साथ मिले तो राहें मुस्कुराती हैं, अधूरी-सी ज़िंदगी भी पूरी हो जाती है। तुम्हारी आँखों में ठहरता है मेरा हर सपना, तुम्हारे नाम से ही धड़कता है दिल का अपना। तुम बोलो तो शब्दों को अर्थ - [संत रविदास जयंती-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sant-ravidas-jayanti-nitu-rani/) - आज है संत रविदास जी की जयंती आज का दिन है बड़ा महान, आज बनारस में लोग उत्सव मनाते करके तीर्थ प्रयाग स्नान। माघ पूर्णिमा को प्रकाश पर्व के रुप में मनाई जाती संत रविदास जी की जयंती, इस दिन निकाला जाता शोभायात्रा लंगर खिलाते करके सबको विनती । संत रविदास जी कहते हैं रहिए - [| मैं शिक्षक हूँ |](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/मैं-शिक्षक-हूँ-2/) - स्व-रचित -कविता मैं शिक्षक हूँ मैं शिक्षक हूँ, हाँ मैं शिक्षक हूँ, राष्ट्र‌ का निर्माता हूँ, ज्ञान का दाता हूँ, हां मैं शिक्षक हूँ। मैं मिट्टी हूँ, पर सोना गढ़‌ता हूँ, मैं मौन हूँ, पर युगों से बोलता हूँ। हर बच्चा में खुद को ढालता हूँ, एक मुस्कान से हर दर्द छुपाता हूँ। हां मैं - [दियौ बच्चा केअ छुट्टी सरकार यौ - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/diyo-bachchha-ke-chhutti-sarkar-yau-nitu-rani/) - दियौ केअ छुट्टी सरकार यौ, नै तेअ बच्चा सब बच्चापड़त बीमार यौ। आय तेअ सबसेअ बेसी येअ ठंडा धूप एखैन यहाँ बड़ येअ मंदा, ठंडा सेअ हालत येअ हमर खराब यौ दियौ बच्चा केअ छुट्टी सरकार यौ। बच्चा केअ बड़ जोर खाँसी येअ सर्दी फिर भी बच्चा घुमै अपन मर्जी, बच्चा मानै नै बतिया हमार - [युवा ही है देश की शान - मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yuva-hi-hai-desh-ki-shan-mrityunjay-kumar/) - युवा है हम देश की शान, रखेंगे हम इसका मान। आओ मिलकर कुछ ऐसा काम करें, देश दुनिया में अपना नाम करें। देश की खातिर अपनी जान, जरूरत पड़ी तो कर देंगे कुर्बान। जागो युवा जागो जागो, अपने कर्तव्य से कभी न भागो। युवा के कंधो पर होती बड़ी जिम्मेदारी, हरदम निभानी होती है बड़ी - [अश्रु आंखों में लिए-रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashru-ankhon-me-liye-rampal-prasad-singh/) - आज जाने की घड़ी पर,रो रहा है आसमां। जो अभी परिवार ही हैं,कल रहेंगे पास ना।। राम आए कृष्ण आए,छोड़कर सब चल दिए। देश दुनिया नभ दुखी हैं,अश्रु ऑंखों में लिए।। आज किंचित पल वही है,शुभ विदाई की घड़ी। प्रेम की माला गुथी है,टूट जाए ना कड़ी।। है हमें विश्वास हमसे,दूर तक जाऍं मगर। दे - [कहे ऋतुराज अपनों से-एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kahe-rituraj-apno-se-s-k-punam/) - प्रभंजन आज चंचल है, विदाई सर्द की करते। अभी तो शुष्क धीरे से, तुषारापात को हरते। वसंती वात चलने से, प्रकृति के द्वार खुल जाते। भ्रमर जब गुनगुनाते हैं, हजारों गीत वे गाते। (2) गई है रंग अब वसुधा, हुई जगमग हरेपन से। कहे ऋतुराज अपनों से, डरो मत प्रिय सुनेपन से। बुआई की किसानों - [मुझे तिरंगा माँ दिलवा दो- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tiranga/) - मुझे तिरंगा माँ दिलवा दो- रासा छंद बाल कविता मुझे तिरंगा माँ दिलवा दो।वैसा ही कुर्ता सिलवा दो।। भैया संग मुझे भी जाना।ध्वज मुझको भी है फहराना।। मैं भी वहाँ जलेबी खाऊँ।शाला में मैं गीत सुनाऊँ।। बस तुम इतना सा बतला दो।सुंदर गीत मुझे सीखा दो।। यह दिन क्योंकर अब है आया।इसमें कैसा राज समाया।। - [बाल शोषण-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baal-shoshan-ram-kishor-pathak/) - अम्मा कहती प्यारी हूँ मैं। छवि तेरी ही धारी हूँ मैं।। फिर शाला क्यों मुझे न भेजी। रखती घर में मुझे सहेजी।। मुन्ना को मैं देखा करती। पाँवों की पीड़ा भी हरती।। सबका खाना सदा पकाती। फिर भी मुझको डाँट लगाती।। पढ़ूँ नहीं बस काम करूँ मैं। बोलो शोषण इसे कहूँ मैं।। भेद-भाव यह कैसा - [अपना लक्ष्य-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/अपना-लक्ष्य-राम-किशोर-पाठ/) - लक्ष्य सुनिश्चित रखकर हर-पल, तुम बढ़ते रहना। तय है होना सफल तुम्हारा, रख हिम्मत गहना। बस कदम बढ़ाकर चलना है, कभी नहीं रुकना। आएगी बाधाएँ पर तुम, नहीं कभी झुकना।। दृढ़ निश्चय से डटे रहो तुम, लाख पड़े सहना। लक्ष्य सुनिश्चित रखकर हर-पल, तुम बढ़ते रहना।।०१।। सहज प्राप्त हो दुनिया में सब, दुःख बहुत सहते। - [मैं संविधान हूं - आंचल शरण](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/samvidhan/) - "मैं संविधान हूं" मैं भारत का संविधान हूं,महज़ एक किताब नहीं,गहन करो तो अधिकार हूंमैं भारत का संविधान हूं।इसमें केवल शब्द नहींभारतीयों की तकदीर हूंमैं भारत का संविधान हूं।करता हूं बात मैं समानता कीजात पात धर्म की गिरता हुआ दीवार हूं।मैं भारत का संविधान हूं।भेद भाव ऊंच नीच कोई नहींमैं स्त्रियों का सम्मान हूंमैं भारत - [सूर्य रश्मियाँ रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-52/) - सूर्य रश्मियाँ- महाशिव छंद गीत २१२-१२१-२२१-२१२-१२ नित्य सूर्य रश्मियाँ तेज को बिखेरती। दृष्टि बोध को भरे चित्र को उकेरती।। लुप्त हो कभी कभी रूष्टता प्रमाण दे। क्रुद्ध हो गई कभी तो वही कृपाण दे।। मौन हो कभी कभी नेत्र जो तरेरती। नित्य सूर्य रश्मियाँ तेज को बिखेरती।।०१।। दिव्यता भरे यही विश्व सार मान ले। प्राण - [मुहब्बत है- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-51/) - मुहब्बत है - गजल १२२२-१२२२-१२२२-१२२२ हमें तो हिंद से यारो अधिक इतनी मुहब्बत है। लुटाकर जान भी अपनी इसे करना हिफाजत है।। करे हर-पल वफा जिससे हमारा वह वतन भारत। उठाकर आँख जो देखे यहाँ किसकी हिमाकत है।। उठाते लोग अक्सर है यहाँ पर ऊँगली यारो। नहीं कायर समझ लेना सहन करना शराफत है।। तिरंगा - [आमंत्रण पुष्प ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/beauty-kumari-2/) - आमंत्रण पुष्प बच्चे हैं उपवन के फूल जिससे सजाते हैं स्कूल। करें हम और आप मिलकर बच्चों का समग्र विकास । अभिभावक से सादर विनती स्कूल को दें समय कीमती । बच्चे हैं कल के भविष्य मिलकर गढ़ें इनका तकदीर। निपुण बनेगा हमारा बिहार, निपुण बनेगा हमारा बिहार। घर में हो पढ़ाई का कोना मिटे - [तीसवां दिन जनवरी के रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-23/) - गीतिका छंद तीसवाॅं दिन जनवरी को,जो हुआ अच्छा नहीं। मार गोली संत हिय को,क्या किया अच्छा कहीं?!! हिल गयी बुनियाद निष्ठा,सब लगे चित्कारने। गोडसे जो भी किये थे,सब लगे धिक्कारने।। शाम होते कर रहे थे,याद श्री प्रभु राम को। पास में कोई खड़ा तब,था मिटाने नाम को।। आपसे तो विश्व को ही,मिल रहा आलोक था। - [युवा संकल्प कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar-2/) - युवा संकल्प यूजीसी, जात-पात सब मिटा दो, भेदभाव की दीवार गिरा दो। हम युवा हैं, एक हमारा स्वर, मिलकर विकसित भारत सजा दो। कुत्सित सोच की उपज जो बने, वह नियम हमें स्वीकार नहीं, भारत माँ के सपूत हैं हम, कोई पराई सरकार नहीं। जब चाहे जिधर मोड़ दो हमको, ऐसी कोई लगाम नहीं, संस्कारों - [माता वाणी से विनय- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-45/) - माता वाणी से विनय- विधाता छंद गीत पुकारूँ मैं तुम्हें माता, जरा मुझपर तरस खाओ। हरो अज्ञानता मेरी, सहज कुछ ज्ञान दे जाओ।। जरा वीणा बजा दो माँ, सभी सुर ताल जिसमें हैं। मिले सुर ज्ञान कुछ मुझको, अभी बदहाल जिसमें हैं।। सवारी हंस का लेकर, यहाँ माता चली आओ। हरो अज्ञानता मेरी, सहज कुछ - [छा गया मधुमास- रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/रामकिशोर-पाठक/) - छा गया मधुमास हर दिल शायराना हो गया- गजल २१२२-२१२२-२१२२-२१२ छा गया मधुमास हर दिल शायराना हो गया। भाव नव मन में जगी तो गुनगुनाना हो गया।। श्यामली धरती सजी धानी चुनर नव ओढ़ के। पुष्प से डाली भरी उपवन सुहाना हो गया।। है तितलियाँ भी मचलती फूल की हर डाल पर। देख कलियों को - [स्वतंत्रता की चिंगारी जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-20/) - स्वतंत्रता की चिंगारी (शहीद दिवस पर श्रद्धांजलि मात्र आधी धोती पर, जीवन गुजार दिया, आधुनिक भारत के, नमन भिखारी को। चरखा से बना खादी, मोहन से बने गांँधी, लोग संत मानते अहिंसा के पुजारी को। ईश्वर के बन दूत, रहे जैसे अवधूत, चरण वंदन उस, नर अवतारी को। सच्चाई की बांँह गह अंत में 'हे - [पहाड़ा नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-15/) - विषय -पहाड़ा। शीर्षक -एक अंक से शुरू होता है पहाड़ जैसा पहाड़ा। एक अंक से शुरू होता है पहाड़ जैसा हमारा पहाड़ा, दिखने में ये लगता बच्चो लाल ,पीला,नीला और हरा। इसमें लगते अंक बहुत बँधे रहते गले में सूत, आसमान में उड़ते हैं जैसे पतंग हमारा। एक अंक से-----२। लिखते बच्चे नीचे से ऊपर - [छायावाद के शिखर कवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-8/) - छायावाद के शिखर कवि जयशंकर प्रसाद जयंती विशेष कविता भावों की सरिता बनकर, शब्दों में प्राण बसाए। छायावाद के शिखर कवि, प्रसाद हुए कहलाए। आँसू, कामायनी, झरना, काव्य-जगत की अमर धरोहर। जहाँ नारी की गरिमा बोली, जहाँ मानवता हुई उजागर। संघर्ष, करुणा, स्वप्न और दर्शन, सबको तुमने एक किया, छाया में भी दीप जलाकर मानव - [सत्य का पथ-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/satya-ka-path-manu-kumari/) - नमन है आज उस आत्मा को, जो सत्य बनी, अहिंसा बोली। जो दंड नहीं, संवाद सिखाए, जिसने शक्ति को करूणा माना। न हथियार उठाया उसने, पर साम्राज्य डगमगा गए। एक लाठी, एक दृढ़ संकल्प से, अन्याय के सिंहासन हिल गए। चरखा बोला—स्वावलंबन, उपवास ने आत्मा जगा दी। साधारण तन, असाधारण मन, जिसने दुनिया को राह - [बापू तेरे देश में - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bapu-tere-desh-me-manu-kumari/) - बापू तेरे देश में, सत्य सवालों में खड़ा है, लाठी अब हाथों में नहीं, पर डर हर दिल में जड़ा है। बापू तेरे देश में, चरखा कोने में रोता है, मेहनत हारी, लालच जीता, ईमान अक्सर सोता है। बापू तेरे देश में, मंदिर–मस्जिद बाँट रहे हैं, इंसान से पहले नाम–धर्म, हम खुद को ही काट - [दोहे - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dohe/) - दोहे श्री निवास घर में करें, जब तक मिलता मान।अहंकार के जागते, कर जाती प्रस्थान।। श्री पाकर सेवा करें, करिए कुछ उपकार।यही सीख श्री दे रही, करें जगत स्वीकार।। श्री नारायण की प्रिया, जहाँ बसे हैं संग।पुलकित रहता वह धरा, भरकर नवल उमंग।। श्री आकर्षण घात कर, भटकाती है राह।नारायण के संग में, पूर्ण करें - [। गणतंत्र दिवस कविता - मुन्नी कुमारी।](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/।-गणतंत्र-दिवस-कविता-मुन्/) - । गणतंत्र दिवस। छब्बीस जनवरी का दिन है सुहाना, गणतंत्र हुआ है देश अपना । संविधान का मान बनाए रखना, अधिकार अपना जताए रखना। यह केवल पर्व नहीं, इतिहास की पुकार है, गणतंत्र केवल बोल नहीं, संवैधानिक धार है। समता केवल कानून नहीं,मानवता की पहचान है, भारत केवल देश नहीं, तिरंगा की शान है। महापुरुषों - [मौसम - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mausam/) - मौसम - रास छंद गीत२२२२,२२२२,२११२ मौसम भाए, ऋतुपति आए, प्रीत गहे।खुशी मनाते, सब इठलाते, झूम रहे।। कुसुम खिले हैं, गंध मिले हैं, होश हरे।मीत बुलाए, प्रीत जगाए, जोश भरे।।संग गंध ले, नव उमंग ले, पवन बहे।खुशी मनाते, सब इठलाते, झूम रहे।।०१।। धानी चुनरिया, लेके गुजरिया, मनहर सी।चहके डगरिया, गाँव- नगरिया, अल्हड़ सी।।शोख नयन से, पुलकित - [लाला लाजपत राय - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavita-4/) - लाला लाजपत राय (जयंती विशेष) पंजाब की धरती पर जन्म लिया,देशप्रेम का दीप जला।28 जनवरी का शुभ दिन,भारत माँ को यह वीर मिला। लाला लाजपत राय थे नाम,साहस जिनका था पहचान।“पंजाब केसरी” कहलाए,वीरता का बने प्रमाण। शिक्षा को जीवन का आधार बनाया,और जन-जन तक ज्ञान पहुँचाया।आर्य समाज से जुड़े रहकर,समाज सुधार का पथ अपनाया। अंग्रेज़ों - [सेना हमारी शान- भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/army/) - धनाक्षरी छंद सेना हमारे देश की,आन,बान व शान है,सेवा समर्पण ही इनकी पहचान है। देश रहे सुरक्षित,अखंड और अटूट,इनमें ही इनका अपना स्वाभिमान है। गर्व होता इनपर,देश और समाज को,हमें हमारे सेना पर बड़ा अभिमान है। हमसे ना टकराना,मैं दे रहा पैगाम हूॅं,ऑंख मत दिखाओ ये नया हिन्दुस्तान है। भवानंद सिंह (शिक्षक) ‌ मध्य विद्यालय - [बोलता समय - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavita-3/) - बोलता समय- दोहा छंद गीत शोर शराबा तो सदा, खौलाता है रक्त।अधर जहाँ पर मौन हो, वहाँ बोलता वक्त।। अगर प्रकट करते नहीं, मन के अपने भाव।ध्यान रखें इतना मगर, बढ़े नहीं अलगाव।।करते रहिए कर्म नित, सत में हो आसक्त।अधर जहाँ पर मौन हो, वहाँ बोलता वक्त।।०१।। बोली बदले अर्थ को, तिल बन जाता ताड़।कोई - [अनुकरण से सीखना - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavita-2/) - अनुकरण से सीखना बोलने से पहले बच्चे,आँखों से पढ़ना सीखते हैं।कहने से पहले दुनिया को,करके देखना सीखते हैं। जो देखा, वही सीखा उसने,जो पाया, वही अपनाया।जीवन की पहली पाठशाला,अनुकरण ने ही सजाया। माँ की बोली, पिता का आचरण,गुरु की दृष्टि, मित्रों की चाल।सब मिलकर गढ़ते जाते हैं,बालक का व्यक्तित्व विशाल। कहना कम, करना ज़्यादा—यही शिक्षा - [जातिवाद तो कोढ़ है - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jatiwad/) - जातिवाद तो कोढ़ है- दोहा छंद गीत बना दिया शासन जिसे, लाइलाज सा रोग।जातिवाद तो कोढ़ है, कहते ज्ञानी लोग।। जाति पूछते रोज हैं, नियम बद्ध हर रोज।फिर कहते यह दोष है, नवयुग का यह खोज।।जहाँ जाति से ही चले, सरकारी उद्योग।जातिवाद तो कोढ़ है, कहते ज्ञानी लोग।।०१।। देकर शिक्षा दान हम, दिखलाते नव राह।राजनीति - [जब नव वर्ष की खुशी मिली - अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/new-year/) - ज़ब नव वर्ष की खुशी मिली,बढे चलो बढे चलो ।वैर हो कुपंथ से ,कुमार्ग से बचे चलो । तेजस्वी की शान हो,मनस्वी की संतान हो ।सुमार्ग में न क़ोई अवरोध दे ,अलग ही उसकी तान हो । बाधाओं से न तुम डरो ,स्वपंथ पर बढे चलो ।वैर हो कुपंथ से ,कुमार्ग से बचे चलो । नवोल्लास की बहार है,स्वजन का भी प्यार है ।विश्वास की सुरभियों से ,फैला हुआ दुलार है । नव वर्ष में सृजन करो ,अभिमान की - [ऋतुओं का स्कूल - आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/season/) - पोस्टमैन है सूरज चाचा,डाक सुबह की लाता है ।द्वारा - द्वार किरणों की पाती ,ठीक समय पहुँचाता है । चुन - चुन करती चिड़िया रानी,चुगती दाना, पीती पानी ।गीत सुनाती प्यारे - प्यारे ,जैसे हो आकाशवाणी । बसंत ऋतु छाई मतवाली,बागों की है छटा निराली ।खेतों में पीले सरसों लहराते,बसंती हवा भी मानो फाग गाते - [श्रम की महिमा - आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/labour/) - श्रम से हर मंजिल होती आसान,श्रम से ही तो मानव बनें महान । श्रम से जो भी है नाता रखता,जीवन - पथ पर वह कभी न थकता । श्रम से तुम भी अब नाता जोड़ो,आलसपन की कारा को तोड़ो । श्रम से ही तो दुनिया में है हरियाली,इसकी महिमा है अजब - निराली । जिसने - [दोहे -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-50/) - दोहे हर्षित होकर आज हम, मना रहे गणतंत्र। भाई जैसा प्रेम हो, जन-गण-मन का मंत्र।। भारत माँ के शान में, नभ में ध्वज उल्लास। यह समृद्धि सुख शांति की, जग को दे आभास।। जन-गण-मन रक्षित रहें, लेकर भाव स्वतंत्र। भारतवासी एक हो, सफल तभी गणतंत्र।। राष्ट्र भावना हो प्रबल, जननी से भी श्रेष्ठ। आओ मिल-जुल - [तिरंगा हमारी शान है -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-14/) - शीर्षक- तिरंगा हमारी शान है। दिन -सोमवार तीन रंग का मेरा झंडा कितना सुन्दर प्यारा है, इसको वीर सपूतों ने मिलकर इसे संवारा है। देखो ऊपर लहर रहा है आसमान में फहर रहा है देश -विदेश में टहल रहा है कितना सुन्दर न्यारा है। देखो इसमें तीन रंग हैं केसरिया,सादा ,हरा बीच में देखो गोल - [गणतंत्र दिवस --डॉ स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-9/) - गणतंत्र की जय । गणतंत्र में हो आस्था , सुदृढ़ हो व्यवस्था। नियमों में हो दृढ़ता , गणतंत्र की जय गणतंत्र की जय । नीतियों का शासन हो , कानूनी प्रशासन हो। रहे सभी अनुशासन हो, गणतंत की जय गणतंत्र की जय । जाति पाति सम भाव, धर्म से ना हो दुराव। मानवता से हो - [26 जनवरी -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-13/) - विषय -छब्बीस जनवरी। शीर्षक -सखी हम झंडा फहरेबै हे। एलै छब्बीस जनवरी केअ त्योहार, सखी हम झंडा फहरेबै हे। झंडा फहरेबै गणतंत्र दिवस मनेबै , गेबै हम जन गण मन सखी हम झंडा फहरेबै हे। सब स्वतंत्रता सेनानी के नाम हम लेबै, सबके नाम केअ नारा लगेबै सखी हम झंडा फहरेबै हे। झंडा फहरेबै वंदे - [हमारा तिरंगा-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamara-tiranga-manu-kumari/) - तीन रंगों में बंधा हुआ, भारत माँ का स्वाभिमान है। केसरिया बलिदान कहे, श्वेत शांति की पहचान है। हरित रंग में जीवन बहता, आशा का मधुर संदेश लिए, अशोक चक्र की गति बताती, धर्म-पथ पर अविराम चले। जब-जब लहराए नभ-मंडल में, सीना गर्व से भर जाता है। वीरों का इतिहास सुनाकर, नव भारत को गढ़ - [तिरंगा का करें सम्मान-विवेक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tiranga-ka-karen-sammaan/) - तिरंगा है भारत की शान, इसमें बसती देश की जान। केसरिया कहता साहस–त्याग, श्वेत सिखाता सत्य–ज्ञान। हरा रंग हरियाली बोले, खेत–खलिहान, वन–उपवन डोले। अशोक चक्र हर पल सिखाए, रुकना नहीं, आगे ही बढ़ना बोले। इस ध्वज तले सोई कुर्बानी, हर धागे में अमर कहानी। वीरों ने हँसकर प्राण दिए, तब पाई हमने ये आज़ादी। ना - [हमारा देश बना गणतंत्र -ब्यूटी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamara-desh-bana-gantantra-beauty-kumari/) - राष्ट्र यज्ञ में आहुति देने आया हूं, मां भारती का भाल सजाने आया हूं, तिरंगा झंडा लहराने आया हूं। देश हमारा था परतंत्र, नहीं चला गोरों का षड्यंत्र, यातना सह हुआ स्वतंत्र, हमारा देश बना गणतंत्र। रखना है अधिकार के साथ कर्तव्य का ध्यान कहता है हमारा संविधान, हमारा देश बना गणतंत्र। गण का,गण के - [जन गण मन-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jana-gana-mana-ruchika/) - जन गण मन जयगान है, सर्वधर्म समभाव गणतंत्र की पहचान है। एक राष्ट्र,एक ध्वज एक ही संविधान है। देश के लिए हर मन में रहे सम्मान है। अधिकार और कर्तव्य में सदा ही रखें सन्तुलन हम। देश हित सर्वोपरि हो विकास पथ पर बढ़े सदा कदम। नियम और कानून का सबको ज्ञान रहे। भ्र्ष्टाचार का - [गणतंत्र हमारी पहचान है-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gantantra-hmari-pahchan-hai-aashish-ambar/) - गणतंत्र हमारी पहचान है, भारत देश हमारा महान है । गौतम , गाँधी की धरती पे , भारत की शान , पूरी जहान है । गणतंत्र हमारी पहचान है, जिसका नाम हिनुस्तान है । तिरंगा झंडा इसकी शान है, इसके लिए हमारी जान कुर्बान है । अनेकता में एकता ही इसका परिज्ञान है, जो मेरे - [आया है गणतंत्र हमारा - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gantantra/) - आया है गणतंत्र हमारा- सरसी छंद गीत जन-गण-मन हो सुंदर अपना, आओ प्यारे संग।आया है गणतंत्र हमारा, भरने नवल उमंग।। कर्तव्यों को पहले रखकर, फिर पाएँ अधिकार।अपनी इच्छा संग सभी को, करिए मन से प्यार।।नियमों को हम ऐसे बांधे, जो लाए नव रंग।आया है गणतंत्र हमारा, भरने नवल उमंग।।०१।। प्रेम भरे हो बोल हमारे, थामे - [मां भारती के साधक - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-bharti/) - माँ भारती का साधक : माखनलाल चतुर्वेदी कलम नहीं थी उनकी केवल,ज्वाला थी अंगार बनी।शब्दों में राष्ट्र धड़कता था,भारत माँ साकार बनी।। न भय लिखा, न दास्यता,न झुकी कभी उनकी लेखनी।सत्य, त्याग, बलिदान लिए,चलती रही निर्भीक चेतनी।। “पुष्प की अभिलाषा” में,त्यागका अमर उपदेश दिया।काँटों पर खिलकर भी जिसने,देश-प्रेम का अर्थ जिया।। कर्मवीर के संपादक बन,जगाई - [कश्यप नंदन देव दिवाकर - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dev-diwakar/) - कश्यप नन्दन देव दिवाकर- सरसी छंद गीत तुमसे ही जग जीवन पाता, करते तुम उपकार।कश्यप नन्दन देव दिवाकर, नमन करो स्वीकार।। तिमिर घनेरा हरने वाले, दिनकर देव महान।क्षमा करें हर भूल हमारी, बालक हम नादान।।नित्य तुम्हारे दर्शन से ही, होता जग उजियार।कश्यप नन्दन देव दिवाकर, नमन करो स्वीकार।।०१।। सभी ग्रहों के स्वामी तुम हो, कहते - [गणतंत्र दिवस-मुन्नी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gantantra-diwas-munni-kumari/) - छब्बीस जनवरी का दिन है सुहाना, गणतंत्र हुआ है देश अपना । संविधान का मान बनाए रखना, अधिकार अपना जताए रखना। यह केवल पर्व नहीं, इतिहास की पुकार है, गणतंत्र केवल बोल नहीं, संवैधानिक धार है। समता केवल कानून नहीं,मानवता की पहचान है, भारत केवल देश नहीं, तिरंगा की शान है। महापुरुषों की अमर कहानी - [राष्ट्रीय मतदाता दिवस-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rashtriya-matdata-diwas-manu-kumari/) - आज मत का महापर्व आया, जन-जन में जागा स्वाभिमान, हर हाथ में लोकतंत्र की शक्ति, हर मत में बसता हिंदुस्तान। मत की शक्ति अमर रहे, जनता का यह अधिकार, एक बटन से लिखी जाती भारत की नई सरकार। ना लोभ चले, ना भय रहे, ना धन-बल का अत्याचार, विवेक बने मतदाता का अमर, अडिग हथियार। - [जय बोलो भारत माता की-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jay-bolo-bharat-mata-ki-ram-kishor-pathak/) - सुरभित सत्ता को अपनाएँ, मान इसे चित अंत्र। जय बोलो भारत माता की, आया शुभ गणतंत्र।। संविधान है अपना प्यारा, बना बहुत विस्तार। नियम सभी है इसमें वर्णित, शासन का सब सार।। छब्बीस जनवरी को ही यह, बना देश का मंत्र। जय बोलो भारत माता की, आया शुभ गणतंत्र।।०१।। चलता जिससे देश‌ हमारा, रखकर जग - [गीत गाते सभी हैं-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/geet-gate-sabhi-hai-ram-kishor-pathak/) - झूमो गाओ, मिल-जुल सभी, प्रीत पाते सभी हैं। आओ प्यारे, जय-जय करें, गीत गाते सभी हैं।। आजादी है, समरस रहें, देश का तंत्र न्यारा। रंगों में है, घुल मिल गया, धर्म का मंत्र प्यारा।। आगे आओ, नवपथ गढ़ो, जीत जाते सभी हैं। आओ प्यारे, जय-जय करें, गीत गाते सभी हैं।।०१।। ईसाई है, समझ अपनी, - [टीचर्स ऑफ बिहार-मधु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teachers-of-bihar-madhu-kumari-3/) - एक नाम नहीं ये है हमारा सम्मान जिससे मिली पहचान जो देता एक पैगाम हमारे आत्मसम्मान के नाम....... एक ऐसा आन्दोलन जिसने काले अक्षरों को भी खूबसूरत और रंगीन बना दिया..... एक ऐसा लगन जिसने जीता अपने उड़ान से हर शिक्षक का मन.... जहां ना कोई दिखावा नहीं कोई शोर और अभिमान जिसने शिक्षकों की - [वसंत- आस्था दीपाली](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vasant-aastha-deepali/) - (हाइकू) १ कोपल मुस्काई- भीनी आम्र-मंजरी में नव-प्राण-स्पंदन। २ पीत-पुष्प खिले- नीरव आँगन के भीतर स्मृति-सरोवर जागा। ३ सरसों हँसी- शीत का अंतिम अश्रु धरा ने पोंछा। ४ मलयानिल बहा- गंधित हुई दिशाएँ, चित्त हुआ आलोकित। ५ वीणा-निनाद- शारदा-चरणों में तम हुआ विसर्जित। आस्था दीपाली शिक्षिका राजकीयकृत कृत उच्च माध्यमिक (+२) विद्यालय कुढ़नी, मुज़फ़्फ़रपुर - [राष्ट्रीय बालिका दिवस - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/balika-diwas/) - आज मत पूछो,क्यों आई है बेटी—आज पूछो,कैसे बची है बेटी? गर्भ की देहरी परहर बार सवालों से जूझती,मौन की चादर ओढ़ेअपने होने का प्रमाण खोजती—वही है बेटी। उसकी किलकारीघर की दीवारों कोसपनों से भर देती है,और उसकी चुप्पीसमाज के माथे परसबसे बड़ा प्रश्न लिख देती है। मत तौलो उसेदहेज की तराजू में,मत बाँधो उसेपरंपराओं की - [गणतंत्र का जयघोष - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/republic-day/) - गणतंत्र का जयघोष छब्बीस जनवरी पुकार रही,उठो! इतिहास बुलाता है।यह दिन नहीं केवल तिथि कोई,जन-जन का स्वाभिमान जगाता है। जब टूटीं जंजीरें गुलामी की,जब भारत ने प्रण यह ठाना था—राजा नहीं, जनता सर्वोपरि,यह गणतंत्र का फरमाना था। संविधान बना पावन ग्रंथ,न्याय, समानता का आधार।धर्म, जाति, भाषा से ऊपर,मानवता का इसमें अधिकार। यह केवल अधिकार नहीं - [बसंती शाम- मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant-2/) - बसंती शाम उतर आई, सुनहरी धूप के संग,क्षितिज ने ओढ़ ली चूनर, केसरिया रंग के रंग। मंद पवन की उँगली थामे, सरसों हँसने लगी,डाल-डाल पर बैठी चिड़िया, राग नया गाने लगी। फूलों ने खुशबू बिखेरी, गलियों तक आई बात,धरती ने पहनी हरियाली, सजी हुई हर एक घाट। आँगन में फैली उजास की, मीठी-सी मुस्कान,हर मन - [मां वागीश्वरी - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/saraswati-puja/) - जयति जय माँ वागेश्वरी, सरस्वती विंध्यवसिनी lसकल जगत की माता तुम हो, हे सकल मंगलकारिनी..जयति माँ वागेश्वरी.. तुम हो पद्मासना माता शांति, सुख, वरदायिनी,जगत का कल्याण कर माँ ,तुम हो महापातकनाशनी ।जयति माँ ……. पद्म लोचन हैं तुम्हारे, दृष्टि दया की कर जरा,नाव है मझधार में माँ पार कर दे तू जरा।जयति माँ…. अज्ञान में - [शिक्षा की शक्ति - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/education/) - अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस विशेष ज्ञान का दीप जलाएं हम, अज्ञान के अंधेरे में,हर बच्चे के मन में खिलाए, उजाला , ज्ञान के मंदिर में।शिक्षा नहीं केवल पुस्तक, ये है जीवन की राह,बिना शिक्षा के जीवन भी सूना, बिना ज्ञान के सब निराश। हर बच्चा, हर किशोर, हर युवा का हक यही है,सपनों को पंख देने - [भारत की बेटियां - आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/betiyan-2/) - सारे संसार में नाम कमाया है ,अपनी प्रतिभा का जादू बिखराया है।देश हो या विदेश हर जगह ,भारत की बेटियां अपना लोहा मनवाया है। कल्पना चावला, नीरजा या हो पीटी उषा,चाहे किरण हो या लता हो या आशा।हर क्षेत्र में अपना परचम लहराया है,देश का मान और सम्मान बढ़ाया है। नींव है परिवार की, आंगन - [जब से आई बसंती शाम- नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant/) - ठंडी हवा लिए आईमेरी बसंती शाम,इससे प्रभावित हो रहादेश, विदेश और गाम। बसंत पंचमी पर्व परआई बसंती शाम,थोड़ी ठंडी बढ़ गईलोगों को हुआ जुकाम‌। लोगों को हुआ जुकाम‌चिकित्सक के पास गये दौड़े,ख़र्च हो गये रुपएजेब में बच गए थोड़े। जब से आई बसंती शामलोग हो रहे बड़े परेशान,लेकिन यहाँ बसंत पंचमी परलोग गा रहे सरस्वती - [गणतंत्र हमारी पहचान - आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/republic/) - कविता : - गणतंत्र हमारी पहचान है । गणतंत्र हमारी पहचान है,भारत देश हमारा महान है । गौतम , गाँधी की धरती पे ,भारत की शान , पूरी जहान है । गणतंत्र हमारी पहचान है,जिसका नाम हिनुस्तान है । तिरंगा झंडा इसकी शान है,इसके लिए हमारी जान कुर्बान है । अनेकता में एकता ही इसका - [मतदाता दिवस - आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/voters/) - जागो मतदाता अब अपना कर्तव्य निर्वहन करो ,देश के भाग्य - विधाता बन अपने नेता वरण करो । लेकर शपथ अब तुमको करना है वोट,नही कोई लालच हो मन में, ना रहे कोई खोट । समृद्ध भारत का लेकर संकल्प अपना कुछ अनुदान करें,राह प्रगति की आसान करें, आओ मिलकर मतदान करें । सुरक्षित भारत - [खामोशी रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-5/) - खामोशी जब बोलना बेअसर होने लगे तो रास आने लगी खामोशी। खामोशी जो थी अपने में समेटे न जाने कितनी बातें कितने अरमान,कितनी चाहतें कितनी शिकायतें,कितनी मोहब्बतें। ख़ामोशी सदा ही भारी पड़ी शोर पर। क्योंकि शोर अनसुना कर दिया गया या फिर वह मात्र शब्द बनकर रह गए। खामोशी बनी अर्थ उन शब्दों की और - [एक हो हम -कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-kumar/) - गीत : एक हों हम, हक़ की आवाज़ यूजीसी के फैसलों ने सवाल खड़े किए, छात्रों–शिक्षकों ने सच के दीप जले किए। स्वर्ण हो या दलित, पिछड़ा आदिवासी, हक़ की राह में सबकी एक ही प्यास थी। किताबें बोलती हैं, चुप नहीं रहतीं, मेहनत की कीमत यूँ ही घटती नहीं। न ऊँच, न नीच, न - [गणतंत्र दिवस का उल्लास रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-49/) - गणतंत्र दिवस का उल्लास- सरसी छंद गीत जब सबमें है उत्साह भरा, आ जाओ जी पास। ध्वज अपना फहराकर हम-सब, पाएँ कुछ उल्लास।। भला सभी का जिससे होता, वैसा हो कानून। भेद भाव हो नहीं किसी से, सबको मिले सुकून।। आता है गणतंत्र दिवस जब, जगती है नव आस। ध्वज अपना फहराकर हम-सब, पाएँ कुछ - [बागेश्वरी मां -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-22/) - हरि गीतिका छंद बागेश्वरी माॅं श्वेतपद्ममा,ज्ञानदा या भारती। आकार सबके एक जिनकी,हम उतारे आरती।। शुभ भोर सुंदर पूर्व से ही,देव जागे हैं यहाॅं। दिनकर सजाकर रश्मियाॅं पर,संग भागे हैं यहाॅं।। पगडंडियों पर शुभ्र मोती,जो दिखे कमजोर हैं। जो शीत भय के थे हृदय पर,ले रहे अब कोर हैं।। संभावना पावन लिए जो,पंक से पंकज खिला। - [स्वर की देवी सरस्वती-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swar-ki-devi-saraswati-nitu-rani-2/) - कमल आसन पर बैसल छथि, स्वर की देवी सरस्वती। माँ हँस वाहिनी ज्ञान दायिनी, विद्या दायिनी सरस्वती। कमल आसन पर बैसल छथि, स्वर की देवी सरस्वती। मांँ स्वेत वस्त्र धारिनी हंस वाहिनी, रुप सुंदर माँ सरस्वती। कमल आसन पर बैसल छथि, स्वर की देवी सरस्वती। माँ हमर सन अज्ञानी केअ, दियअ ज्ञान भैर माँ सरस्वती। - [टीओबी वर्षगांठ-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/t-o-b-nitu-rani/) - हे बहिना छीयै टीओबी के सातवाँ वर्षगांठ हे, गेबै मंगलगान हे ना। देबै सगरे नोत हकार घर -घर स्थापना दिवस केअ करबै प्रचार, हे बहिना दीप प्रज्ज्वलित कैर मनेबै सातवाँ वर्षगांठ हे कैरकेअ ईश्वर स्तुति पाठ हे ना। अही अवसर पर कवि गोष्ठी होयत, एक से एक कविगण आयत, हे बहिना कियो पढ़त गद्य कियो - [वंदनवार सजे शारदा -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-21/) - वंदनवार सजे शारदा ऐसा अद्भुत भोर। क्षितिज चतुर्दिक दे रहा,ऑंधी जैसा शोर। प्रात:काली भूल कर, पूर्वज ढाड़े लोर।। कहीं भजन कीर्तन ठने,कहीं राम का बोल। कहीं शारदा सादगी,सह भोजपुरी झोल।। कर्ण भला किसकी सुने,झींगुर पकड़े कोर। सोए पशु-पक्षी नहीं,जागे होकर बोर।। मंदिर मस्जिद से नहीं,नि:सारित आवाज। ब्रह्म काल में शोर से,तज मन-खग परवाज।। देख सजी - [सरस्वती वंदना - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/saraswati/) - सुर ताल पल में सहज साध जाऊँ।मैं जो तुम्हारी चरण धूल पाऊँ।। रचना सभी छंद पल में करूँ मैं।हर छंद में प्रीत का स्वर भरूँ मैं।।कोई सरस गीत पल में सजाऊँ।मैं जो तुम्हारी चरण धूल पाऊँ।।०१।। सारे अलंकार रस काव्य में हो।हर सीख का शब्द संभाव्य में हो।।जग को सही राह हर-पल दिखाऊँ।मैं जो तुम्हारी - [वर दे वीणावादिनी - बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-saraswati/) - वर दे वीणावादिनी,जय माँ तू हंसवाहिनीहृदय तिमिर को मिटातू ज्योत ज्ञान की जला। अज्ञानता की कालिमा काअब ना अट्टहास हो,दैदिप्यमान हो धराप्रकाश ही प्रकाश हो। धर्म मार्ग पे चलेंअधर्म का न वास् हो,हर लोभ पाप को मिटाहर हृदय तुम्हारा वास् हो। नीव प्रेम की रखेजब देह का निर्माण हो,नव गीत हो,नव ताल होहर साँस गुंजायमान - [अरज है शारदा से](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/अरज-है-शारदा-से/) - अरज है शारदा से हे श्वेतपुंज ! हे शारदा! सुन लो विनय हमारी, हम दीन-हीन है पातकी तू पाप पुंज हारी। अब खोल दो माँ कमल नयन वरदान दे दो ज्ञान का, ज्ञान का दीपक जलाऊँ भाव रक्खूँ दान का। संत की सेवा करूँ सज्जन का हरदम साथ हो, न कभी हृदय में हो अहम् - [माँ शारदे-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-sharde-ram-kishor-pathak/) - भक्त की आशा यही है, भक्त को माँ तार दे। भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ शारदे।। पुष्प श्रद्धा भक्ति का मैं, ले शरण में आ गया। कर क्षमा हर भूल मेरा, देख लो करके दया।। ज्ञान वाणी मातु मेरी, बुद्धि को नव धार दे। भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ - [नारी तू अबला नहीं](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/नारी-तू-अबला-नहीं/) - नारी तू अबला नहीं नारी नहीं तू अबला है तू ही तो सबला है। बिन तेरे सब सूना है, सबकुछ तूने गूना है। रही नहीं तू चाकरी, अब तो इसको भांप री। तू भरणी तू जननी है, तेरी कहानी कहनी है। तू दुर्गा सब जानी है, तू झांसी की रानी - [| माँ शारदे की महिमा - मुन्नी कुमारी |](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/माँ-शारदे-की-महिमा-मुन्नी/) - स्व-रचित कविता माँ शारदे की महिमा सुंदर - सुंदर सपना सजाएँ, माँ शारदे की महिमा गाएँ। विद्या से जग को महकाएँ, शुद्ध विचार हृदय में आए। वीणा वादिनी, माँ शारदे, सारे जग में प्रकाश भरदे । ज्ञान का माँ दीपक जलादे, अंधकार सब दूर भगादे। श्वेत वस्त्र धारण करती, हंस की सवारी तेरी। कमल आसन - [टीचर्स ऑफ बिहार - मधु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teachers-of-bihar-madhu-kumari-2/) - एक नाम नहीं ये है हमारा सम्मान जिससे मिली पहचान जो देता एक पैगाम हमारे आत्मसम्मान के नाम....... एक ऐसा आन्दोलन जिसने काले अक्षरों को भी खूबसूरत और रंगीन बना दिया..... एक ऐसा लगन जिसने जीता अपने उड़ान से हर शिक्षक का मन.... जहां ना कोई दिखावा नहीं कोई शोर और अभिमान जिसने शिक्षकों की - [स्वर की देवी सरस्वती-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swar-ki-devi-saraswati-nitu-rani/) - कमल आसन पर बैसल छथि, स्वर की देवी सरस्वती। माँ हँस वाहिनी ज्ञान दायिनी, विद्या दायिनी सरस्वती। कमल आसन पर बैसल छथि, स्वर की देवी सरस्वती। मांँ स्वेत वस्त्र धारिनी हंस वाहिनी, रुप सुंदर माँ सरस्वती। कमल आसन पर बैसल छथि, स्वर की देवी सरस्वती। माँ हमर सन अज्ञानी केअ, दियअ ज्ञान भैर माँ सरस्वती। - [](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-8/) - जय मां शारदे माँ तू अपने शरण में रखो अब सदा, है नमन कोटि रखना चरण मे सदा. तू दे दे हमें माँ ये आशीष कदा, ज्ञान जीवन में सुरभित रहेगा सदा. जब कभी इस धरा में तिमिर तोम हो जब कभी देश में रात हो व्योम हो. सूर्य का तेज देना प्रखर शारदे जिससे - [आया बसंत आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-3/) - कविता :- आया बसंत दिन को सूरज लगा चमकने, हवा लगी अब सरसर बहने । पत्ते पीले पड़े पेड़ के, झड़ते हवा संग हैं उड़ते । ऋतु बसंत का स्वागत करने, नई कोपलें सज गई पेड़ पर । सेमल खिलता लाल फूल से, टेसू फूला डाल - डाल पर । नई बौर छा गई आम - [मान मिल जाए -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-48/) - मान मिल जाए- गजल १२२२-१२२२, १२२२-१२२२ दबे कुचले यहाँ जो भी, उन्हें सम्मान मिल जाए। रहे कानून में समता, सही पहचान मिल जाए।। हमें रखना सदा होगा, यहाँ पर ध्यान सबका ही। करे हम कुछ सदा ऐसा, जगत गुणगान मिल जाए।। निगाहों में रहे हर-पल, गरीबों के लिए पानी। मदद कर दें जरा उनको, उन्हें - [मैं टीचर ऑफ बिहार हूं -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-47/) - मैं टीचर्स ऑफ बिहार हूँ - गीत शिक्षा का अटल आधार हूँ। मैं टीचर्स ऑफ बिहार हूँ।। बच्चों के कोमल भावों को। अपनाकर सभी सुझावों को।। शिक्षण का बना व्यवहार हूँ। मैं टीचर्स ऑफ बिहार हूँ।।०१।। उड़ने को देकर पर सबको। संशय अंतस का हर सबको।। करता कल्पना साकार हूँ। मैं टीचर्स ऑफ बिहार हूँ।।०२।। - [सरस्वती प्रार्थना -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-46/) - सरस्वती प्रार्थना- द्विगुणित सुंदरी छंद गीत फँसे मँझधार में हैं, दे दो किनार मैया। कोई मिला न जग में, सुन लो पुकार मैया।। कुछ भी समझ न आए, वक्त निकलता जाए। अज्ञान का तिमिर यह, हमें निगलता जाए।। दे दो हमें उजाला, ज्ञान भण्डार मैया। कोई मिला न जग में, सुन लो पुकार मैया।।०१।। हंस - [शिक्षक ज्ञान के दीपक -आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teacher-2/) - टीचर्स ऑफ बिहार के शिक्षक ज्ञान - दीप जलाते हैं,जीवन जीने की राह बतलाते हैं । मेहनत का महत्व बाखूबी समझाते हैं,सपनों को हकीकत करवाते हैं । अच्छे - बुरे की पहचान कराते हैं,सच्चे इंसान बनना सिखाते हैं । अंधियारे में सूरज बन जाते हैं,उजियारा चारों ओर फैलाते हैं । धैर्य व साहस से जीना - [मधुमास का श्रृंगार-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/madhumas-ka-shringar-manu-kumari/) - मधुमास ने जब धीरे से आँचल फैलाया, वसंत ने धरती को दुल्हन-सा सजाया। सौंदर्य झुका पत्तों की हरित पलकों में, लावण्य चमक उठा ,ओस की झिलमिल छलकों में। डाल-डाल पर मंजरी ने नयनों से बोला, कलिका शरमाकर अधरों पर हँस डोला। पवन ने छूकर कुछ यूँ सरगोशी की, तन-मन में मीठी-सी थरथर सी उठी। सौरभ - [घूँघट-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ghunghat-manu-kumari/) - घूंघट में छुपा चाँद-सा मुख, नयनों में सपनों का बसेरा। लाज की कोमल चादर ओढ़े, मुस्कान बनी मन का सवेरा। धीमे-धीमे पग धरती पर, चूड़ियों ने गीत सुनाया है। पिया की आहट पाकर दिल ने, पहली धड़कन को पाया है। घूंघट केवल परदा नहीं, मर्यादा की है यह पहचान। संकोच, समर्पण, विश्वास का, नारी के - [बिहार के शिक्षक -ब्यूटी कुमारी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bihar-ke-shikshak-beauty-kumari/) - बिहार के शिक्षक नित नई ऊर्जा के साथ विद्यालय आते बिहार के शिक्षक। बच्चों को पढ़ाते मूल्यों का पाठ बिहार के शिक्षक। कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित बच्चों से रखते भावनात्मक लगाव बिहार के शिक्षक। गीली मिट्टी को आकर देते बिहार के शिक्षक। नन्हें पौधों को तरु बनाते बिहार के शिक्षक। आम को खास बनाते बिहार के शिक्षक। - [बिहार का शिक्षक-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बिहार-का-शिक्षक-मनु-कुमार/) - टूटी बेंचों, टपकती छतों के बीच वह शिक्षक खड़ा है— हाथ में केवल चाक नहीं, हाथ में बच्चों का भविष्य है। सीमित साधन, अनगिनत चुनौतियाँ, फिर भी हार नहीं मानता— वह TLM से ज्ञान को जीवंत करता है, और सीख को अनुभव बनाता है। कभी काग़ज़ की नाव से गणित समझाता, कभी बोतल, पत्थर, तिनके - [आओ स्थापना दिवस मनाएँ-मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aao-sthapna-diwas-manaye-mrityun-kumar/) - देखो, सातवाँ स्थापना दिवस है आया, टीचर्स ऑफ बिहार परिवार में खुशियों का उजास छाया। सात वर्षों का यह सफर रहा सुहाना, शिक्षा के क्षेत्र में रचा गया अनगिनत कारनामा। शिक्षकों और छात्रों के लिए उत्कृष्ट मंच बना, सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का संकल्प सजा। आओ मिलकर इस यात्रा को यादगार बनाएँ, घर-घर शिक्षा - [अतुल है राष्ट्र की महिमा-एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/atu-hai-rashtra-ki-mahima-s-k-poonam/) - जहाँ परिवेश है सुंदर, वही महिमा बढ़ाते हैं। पुराणों और वेदों से विद्या की लौ जलाते हैं। हमारा देश है प्यारा, धरा पर मान पाते हैं। अतुल है राष्ट्र की महिमा, जहाँ तरु गीत गाते हैं। (2) विभूषित हों सदा साधू, नदी तट पर बसेरा है। रहे सोते प्रतीची में, यही भारत सवेरा है। धरा - [बसंत पंचमी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant-panchami/) - धनाक्षरी छंद में बसंत पंचमी पर्व,खुशी-खुशी मनाते हैं,सभी भक्त माॅं शारदे का आशीष पाते हैं। हर वर्ष यह पर्व,माघ पंचमी को आता,हम सभी पूरी निष्ठा, श्रद्धा से मनाते हैं। हॅंस पर सवार माॅं,कर में वीणा धारती,माॅं का आशीष से,सब कुछ मिल जाते हैं। माॅं की भक्ति में विद्यार्थी,सारी रात जागते हैं,इस पावन पर्व को, निष्ठा - [आत्मविश्वास से  भरे  डगर में -अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/atmavishwas-se-bhare-dagar-me-amarnath-triwedi/) - आत्मविश्वास से भरे डगर में , न मन, प्राण , वचन से पीछे जाना । हम सबके दिल के स्नेह हो प्यारे , भविष्य में अपनी पहचान बनाना । मन हर्षित दिल अभिलषित है मेरा , तू अभी से सँभलते जाओ । स्नेहसिक्त करूँ आज तुझे मैं , अपने पथ के काँटे चुनते जाओ । तुमसे स्नेह बहुत है मुझको , यही शिक्षक का दायित्व बड़ा है । सामने जो लक्ष्य दिखाई देता , तेरा सच में वही अरमान खड़ा है । - [टीचर्स ऑफ बिहार हमारा-एम० एस० हुसैन कैमूरी ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teachers-of-bihar-hamara-m-s-husain/) - आज है , टीओबी का स्थापना दिवस आईए हम सब मिलकर इसको मनाएं इसी से होती है हमारी रचनाएं प्रकाशित जन - जन तक इस बात को पहुंचाएं कौन करेगा शिक्षकों की रचना प्रकाशित ये बात सोचकर मन होता सदा विचलित उधेड़बुन के भंवर से निकाला शिव सर ने करके टीचर्स ऑफ बिहार को विकसित - [टीचर्स ऑफ बिहार : नवचेतना का उद्घोष-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/teachers-of-bihar-navchetna-ka-udghosh-manu-kumari/) - जब शिक्षा को मिला नव संबल, जब शिक्षक को पहचान मिली, बीस जनवरी का वह पावन दिन, नव इतिहास की आधारशिला मिली। विचार बने दीप, श्रम बनी लौ, प्रतिभा को मिला विस्तार— गूँजा नाद— टीचर्स ऑफ बिहार। जो स्वयं से थे अबूझ, अनदेखे, उनको आई अपनी पहचान, शब्दों ने स्वर पाया, भावों ने, छू लिया - [ऋतुराज बसंत- रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rituraj-basant-ratna-priya/) - प्रकृति यौवन का रूप धार, करती नित्य-नूतन श्रृंगार, सौंदर्य शिखाओं में अनंत, चहुँ ओर खिला यह दिग-दिगंत, कण-कण में उल्लास छा गया । ऋतुराज बसंत है आ गया । पीत-वर्णी पुष्पित ओढ़ चुनर, मँडराते पुष्पों पर भ्रमर, सौरभ की शीतल ज्वाला है, मन मस्त हुआ मतवाला है, बासंती रूप है भा गया । ऋतुराज बसंत - [हे भारत -गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/he-bharat-girindra-mohan-jha/) - हे भारत ! रामायण की मर्यादा, नीति, कर्त्तव्यपरायणता तुममें, है तुझमें वेद, उपनिषद, भगवद गीता का असीम ज्ञान, विदुरनीति, नीतिशतक, कौटिल्य की नीति-अर्थशास्त्र तुममें, कई महापुरुष हैं तेरे सपूत, है तू असंख्य रत्नों की खान, सीवी रमण, मेघनाद साहा, होमी भाभा, है कलाम का विज्ञान, दर्शन, अध्यात्म, साहित्य, स्वर्णिम इतिहास का यत्र-तत्र होता बखान। हे - [प्रकट हो माता भवानी रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-20/) - कुंडलिया प्रकट हो मात भवानी। (दुर्गा/पार्वती) मात भवानी प्रेरणा,शक्ति पुंज आधार। धरा अकारण मानती,तेरा ही उपकार।। तेरा ही उपकार,सघन हरियाली छाई। संकट में संसार,आप ही सम्मुख आई।। कहते हैं"अनजान",अमिट है कथित कहानी। गिरि सम गोचर पाप,प्रकट हो मात भवानी।। वाणी माता (सरस्वती) माता वाणी प्रेरणा,जीवन निखिल प्रभात। रेख रोशनी आ रही,छोड़ी ठंड बिसात।। छोड़ी ठंड - [कछुआ -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-12/) - विषय -बाल कविता। शीर्षक -कछुआ , बिल्ली, घोड़ा जिराफ। मैंने बनाई चार्ट पेपर से कछुआ, बिल्ली, घोड़ा ,जिराफ, देखने में लगते हैं ओरिजनल और दिखते सुंदर और साफ। बिल्ली घर इधर उधर करती रसोईघर में चुपके से घुसती, दूध रखे बर्तन में मुँह लगाती तुरंत दूध को चट कर जाती। घोड़ा खाता दिन भर घास - [इन्सान बदल गया है -बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baikunth-bihari-10/) - इंसान बदल गया है सभी कहते हैं, समय बदल गया है। वास्तविकता यह है, कि इंसान बदल गया है। स्वार्थ में जीना, इसका पर्याय बन गया है। पहले रिश्ते निभाना एक धर्म था, अब मात्र सीढी का पायदान बन गया है। पहले दूसरों की खुशी देख कर खुश होते थे, अब दूसरों की खुशी कांटा - [ॐ कृष्णय नमः -एस. के पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-kpoonam/) - ऊँ कृष्णाय नमः विधाता छंद (हमारी बाँसुरी राधा) हमारी बाँसुरी राधा, कभी मुझसे नहीं रूठी। किया वादा हमेशा ही, सदा निकली शपथ झूठी।। हृदय की बात तुमसे कह, प्रणय की सीख दे जाता। तुम्हारी बोल है मीठी, कन्हैया मौन सुन आता।। (2) सखी तुमसे कहूँ कुछ भी, न सीधी बात तुम करती। व्यथित होता हिया - [ध्वज फहराइए -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-44/) - ध्वज फहराइए- मनहरण घनाक्षरी (८-८-८-७) नियमों का ध्यान कर, सबका सम्मान कर, सत्य गुणगान कर, तंत्र अपनाइए। अपनों से मिलकर, दुश्मन से लड़कर, समरस बनकर, कदम बढ़ाइए। शहीदों के नमन का, हरे-भरे चमन का, वतन के अमन का, नवपथ लाइए। निज सह पराए को, कमजोर सताए को, दलित असहाय को, गले से लगाइए।।०१ देश के - [देश हमारा सबसे प्यारा-आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar-2/) - देश हमारा सबसे प्यारा। देश धर्म पर बलि- बलि जाओ। एक साथ सब मिलकर गाओ। प्यारा भारत देश हमारा। झंडा ऊंचा रहे हमारा। देश को आजादी दिलाने के लिए। जिन - जिन जवानों ने जान गवाईं थी। उनमें कोई हिंदू न था न कोई मुस्लिम। सिख था न उनकी पहचान ईसाई थी। भारत को आजाद - [आह में देखो-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aah-me-dekho-ram-kishor-pathak/) - लोग हैं खास आह में देखो। कौन है आज डाह में देखो।। कह रहे हैं भला तुम्हें जो भी। दे अगर साथ राह में देखो।। फासले यहाँ दिलों में है। गौर से गर निगाह में देखो।। आज उम्मीद है सभी पाले। टूटती आज चाह में देखो।। मीत जो भी बना ठगा यारों। दर्द को रूप - [पहल-रूचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pahal-ruchika/) - पहल जब दूरियाँ बढ़ जाए रिश्तों में पहल कर लो नजदीक आने की दूरियाँ मिटाने की। कोई गलतफहमी जब गाँठ बाँध ले पहल कर लो गाँठें सुलझाने की गलतफहमी मिटाने की। है मुश्किल मगर नही नामुमकिन कोई भी राह जो तुम्हें मंजिल तक पहुँचाए पहल कर लो बस कदम बढ़ाने की मंजिल तक जाने की। - [मेरा नाम गौरव कुमार है-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mera-naam-gaurav-kumar-hai-nitu-rani/) - मैं हूँ उम्र में आपसे बहुत छोटा, लेकिन मैं हूँ आपसे कुछ मोटा। मैं जाना चाहता हूँ फौज में , कुख्यात बदमाशों की खोज में। देश की रक्षा के लिए लिया अवतार, चाहे क्यों न करना पड़े सात समुंदर पार। मैं किसी से न कभी हारुँगा, बदमाश को मारकर आउँगा। मुझे अपने देश पे शान - [ऋतु कुसुमाकर-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ritu-kusumakar-ram-kishor-pathak/) - लाना फूलों की सब माला। ऋतु कुसुमाकर आने वाला।। गुरुवर सबको बोल रहे हैं। राज सभी से खोल रहे हैं।। सजने वाला अपना शाला। ऋतु कुसुमाकर आने वाला।।०१।। पूजा होगी माँ वाणी की। वाग्देवी माँ ब्रह्माणी की।। कुमकुम शोभे भाल निराला। ऋतु कुसुमाकर आने वाला।।०२।। गाजर बेर प्रसाद मिलेंगे। खाकर जिसको झूम उठेंगे।। हर्षित सारे - [अभी खेलने के दिन अपने-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/abhi-khelne-ke-din-apne-manu-kumari/) - जी भरकर अभी खेल न पाई सखियों के संग मैया, मेरे ब्याहन की खातिर क्यों बेच रही तू गैया। अपने हक़ का लाड़-प्यार मुझको री मैया दे दो, शादी की इतनी क्या जल्दी, यह मुझको मैया कह दो। अभी खेलने के दिन अपने, अभी स्कूल है जाना, पढ़-लिखकर इस दुनिया में मुझको नाम है कमाना। - [वीर माता क्यों मजबूर हुई-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/veer-mata-kyu-majbur-hui-nitu-rani/) - वीर‌ माता क्यों मजबूर हुई जब उसपर अत्याचार क्रूर हुई, तभी वीर माता मजबूर हुई। वीर माता पर पुरुषों का बज्र प्रहार, वीर माता खाती रही पुरुषों की मार। वीर माता पर बदनामी की दाग, पुरुषों ने लगाई वीर माता की देह में आग। वीर माता सहती रही सबकी बोली , वीर माता को खिलायी - [हरियाली -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-43/) - हरियाली- रासा छंद गीत शब्दों से आज चीखना है। वृक्ष लताओं से लिखना है।। जब धरती पर हरियाली हो। मौसम मन भाने वाली हो।। शुद्ध हवा पानी सब पाए। पुलकित हो हम-सब हर्षाए।। कुछ इनके रीत सीखना है। वृक्ष लताओं से लिखना है।।०१।। आओ ज्यादा वृक्ष लगाए। मेघों को जो शीघ्र बुलाए।। गर्मी से जो - [आओ नूतन गान लिखे बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bindu-agrawal-2/) - आओ नूतन गान लिखें आओ नूतन गान लिखें हम एक नया अभियान लिखें। अंतरमन के भेद मिटा हर होठों पे मुस्कान लिखें।। नये वर्ष में नया गीत नव कलियों का आव्हान लिखें। खिलता फूल हो,उड़ता सौरभ हर आँगन को गुलफाम लिखें।। नन्हों को दे स्नेहाशीषबैंड कमजोरों का हम मान लिखे। साथ सभी के मिला कदम - [समय का महत्व - आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-ambar/) - समय का महत्व समय का सबसे कहना है, जीवन चलते रहना है । इसको मत बरबाद करो , सदा काम की बात करो । कल - कल नदियाँ बहती हैं, हर पल सबसे कहती हैं, जीवन बहता पानी है, रुकना मौत निशानी है । मस्त हवाएँ गाती हैं, हमको यह समझाती हैं, हर पल आगे - [शून्य दिवस नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-11/) - -शून्य दिवस। आज है शून्य दिवस, जैसे बिना यात्री का बस। शून्य का मतलब गोल और खाली, जैसे दिखता सूरज की लाली। शून्य का मतलब एक बिंदु होता, जिससे एक बड़ा संसार है बनता। बिना शून्य का प्राकृत संख्या, शून्य लगाकर पूर्ण होता संख्या। एक पर शून्य बैठाते जाओ, लाखों ,अरब, खरब तक जाओ। शून्य - [प्रभाती पुष्प -जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-19/) - प्रभाती पुष्प सफाई काध्यान रूप घनाक्षरी छंद पूजा बाद फल फूल नदियों में बहाकर, प्रदूषण बढ़ाने में, करते हैं योगदान। पवित्र जलाशयों में त्याग कर मल-मूत्र, अपवित्र जल में ही, करते हैं हम स्नान। शुभ अवसर पर डुबकी लगाने जाते, सफाई के मामले में, लोग नहीं देते ध्यान। पवित्र सरोवर व धार्मिक तीर्थ स्थलों में, - [खिचड़ी -रामपाल प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad/) - खिचड़ी खिचड़ी मन में पक रही,बिना किसी आधार। घर में पकती आज तो,बहती है रसधार।। बहती है रसधार,आज का दिन है पावन। लटती मस्त पतंग,गगन में लगे लुभावन।। व्यंजन दिखते थाल,भावना सुखमय निखरी।। मगन हुए"अनजान",खिलाकर खाई खिचड़ी। खिचड़ी पर्व महान है,मन में भरे उमंग। एक मास खरमास की,निद्रा करती भंग।। निद्रा करती भंग,भागती गंगा सागर। - [अंजाम होता है -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-42/) - अंजाम होता है- गजल १२२२-१२२२-१२२२-१२२२ सदा ही कर्म अच्छे का सुखद अंजाम होता है। किया जिसने यहाँ ऐसा जगत में नाम होता है।। नहीं कोई यहाँ जिसका कभी उसको न ठुकराना। कभी बेवक्त उससे भी जरूरी काम होता है।। किसी भी हाल में रहिए मगर हँसना जरूरी है। हँसी तो एक अच्छा सा सरल व्यायाम - [मकरसंक्रांति आई है - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/makar-sankrati-aai-hai-manu-kumari/) - मकर संक्रांति आई है संग में खुशियां लाई है। तिल के लड्डू की खुश्बू ने घर में सुगंध फैलाई है।। मुरही, चूड़ा, तिल की लाई मम्मी ने बहुत बनाई है। चूड़ा, दही ,तिलकुट ,मिठाई से खाने की थाली सजाई है।। राजू ,रोहन , मोहन के संग राधा ने पतंग उड़ाई है। मकर संक्रांति त्यौहार पर - [योगासन गीतिका :-कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yogasan-gitika-katik-kumar/) - पद्मासन पालथी मार, पैर जंघा पर धर, रीढ़ सीधी, नेत्र बंद कर। श्वास-प्रश्वास सम, मन हो शांत, लाभ—ध्यान बढ़े, तनाव हो अंत। वज्रासन घुटनों के बल बैठो ध्यान से, पीठ सीधी, हाथ जंघा के पास से। भोजन बाद भी यह आसन सार, लाभ—पाचन ठीक, वज्र समान बल अपार। सुखासन सरल बैठो सहज भाव, पीठ सीधी, - [प्रेम की पतंग-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prem-ki-patang-manu-kumari/) - मकरसंक्रांति आओ, मिलकर मनाते हैं, प्रेम की पतंग पिया हम ,साथ में उड़ाते हैं।। रंग बिरंगी फूलों से हम आशियां को सजाते हैं। प्रेम की पतंग पिया हम साथ में उड़ाते हैं।। प्रेम की पतंग हूं मैं ,पिया तुम डोर हो, अन्धकार रूपी रात मैं ,तुम मेरे भोर हो। विश्वास के स्वच्छंद नभ में,चलो सैर - [पर-हित चिंतन-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/par-hit-chintan-ram-kishor-pathak/) - पर-हित चिंतन- दोहा छंद गीत पर-हित चिंतन में सदा, रहते हैं जो लीन। ईश्वर की उनपर कृपा, रहती नित्य नवीन।। पर-पीड़ा से हो दुखी, करते सदा उपाय। करते नहीं विचार हैं, चाहे कम हो आय।। पर-पीड़ा को देखकर, बहे नयन जल-धार। जितना उनसे बन पड़े, मदद करें हर बार।। चिंता अपनी है नहीं, फिर भी - [मिथिला हाट -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-7/) - मिथिला हाट सीता माय के पावन जन्मभूमि , मधुबनी झंझारपुर । ताहि में बनल अछि मिथिला हाट । गेलों घुमय सपरिवार। दुई बजे सब ओतय पहुंचलों । ओतय देखय छी उमड़ल भीड़ , भीड़ कय दुनु बहिन देलों चीर। तीस चालीस टा लागल कार, आयल छलखिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। की आधा घंटा करलौं हम सब - [प्रभाती पुष्प -जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-18/) - प्रभाती पुष्प विविध त्योहार मनहरण घनाक्षरी छंद मानते हैं लोग साथ, लोहड़ी पोंगल बिहू, मकर संक्रांति जैसे, विविध त्योहार हैं। प्रयाग में कल्पवास, पातक का करे नाश, जाने से बदल जाता, आचार विचार है। तीर्थ में गंगासागर, आस्था का भरे गागर, जीवन में कभी लोग, जाते एक बार हैं। स्नेह पुष्प खिलाकर, राग द्वेष भूलाकर - [एक योगी -डॉ स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-7/) - एक योगी एक योगी! मानव को है जगाता, चेतना को है उठाता, विश्व के रण में उतरता, एक योगी। एक योगी! उस शिकागो को बुलाता, भ्रातृ का संदेश देता, विश्व को नई रोशनी से, जगमगाता। एक योगी! एक योगी! इस सनातन को सहज ही गुनगुनाता, बेदान्त के मर्म को, दूर देशों को दिखाता, एक योगी! - [अभी तो मैं बच्ची हूँ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/अभी-तो-मैं-बच्ची-हूँ/) - अभी तो मैं बच्ची हूँ पापा इतनी क्या है जल्दी, थोड़ा पढ़-लिख जाने दो। अभी तो नन्हीं कली हूं, फूल तो बन जाने दो। मैं तो हूं छोटी सी गुड़िया, कच्ची अभी उमर मेरी। क्या बिगड़ेगा आपका, जो पढ़ लेगी बिटिया तेरी। समाज की इस कुप्रथा को, तोड़ आगे बढ़ जाऊंगी। भैया के जैसा समाज - [लोहड़ी पर्व -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/lohadi-parva-manu-kumari/) - खुशियां लेकर लोहड़ी आई। सबके मन उमंग है छाई। सुख समृद्धि संग लेकर आती। सबको प्रेम से गले लगाती। पुराने फसल हैं काटे जाते। साथ नये फिर बोये जाते। अग्निदेव को खूब चढ़ाते। फसलों का त्योहार मनाते। नयी ऋतु को लेकर आए। दुख का बादल छंटता जाए। बच्चों की किलकारी लाती। आशाओं के दीप - [मकर संक्रांति-रामपाल प्रसाद सिंह अनजान ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/makar-sankranti-rampql-prasad-singh-anjan/) - भोर आज हो रहा। हर्ष राज हो रहा।। आर-पार शोर है। लोहड़ी हिलोर है।। आज सूर्य आ गया। लाल सब्र छा गया।। हर्ष तो नवीन है। दर्द से विहीन है।। दीन औ धनी मिले। प्यार पुष्प में खिले।। पर्व तो मिला रहे। दर्प को हिला रहे।। ऊॅंच-नीच भावना। भंग आज साधना।। देश या विदेश में। - [मकर संक्रांति-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/makar-sankranti-ram-kishor-pathak/) - पुण्य के पल का समझकर राज, पर्व हम अपना मनाएँ। जाह्नवी जल में नहाकर आज, पर्व हम अपना मनाएँ।। हर्ष से अति पावनी जलधार, सिंधु में थी लीन होती। उस दिवस को दे रहे आवाज, पर्व हम अपना मनाएँ।। है फसल से अब भरा भंडार, हर्ष सबके नैन में है। व्यक्त करता है विचार समाज, - [मकर संक्रांति-बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/makar-sankranti-baikunth-bihari/) - आया मकर संक्रांति का पर्व, जो बनाता संतुलन प्रकृति के साथ, संतुलन सूर्योपासना के साथ, संतुलन मानव जीवन के साथ। आया मकर संक्रांति का पर्व, जो जाना जाता है विभिन्न नाम से, उत्तर भारत में मकर संक्रांति, गुजरात महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडू में पोंगल, असम में माघ बिहू, पंजाब में लोहड़ी, हरियाणा में माघी, उत्तर - [कहर-रामपाल प्रसाद सिंह "अनजान"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kahar-rampal-prsad-singh-anjaan/) - गजब शीत काया। बदन काट खाया।। अब कहाॅं सवेरा?। अरुण का बसेरा।। कनकनी चढ़ी है। थरथरी बढ़ी है।। सुबह शाम कैसा! लहर एक जैसा।। पिक निवास सोई। मधुर प्रीति खोई।। न"अनजान"जागे। बहर चंद दागे।। सुन रहा बड़ाई। घर पड़ी रजाई।। कर गई दगाई। बन गई कसाई।। धुॅंध उठान जारी। शहर गाॅंव भारी।। सब पड़े हुए - [मैं पतंग हूँ मुझे उड़ने दो आकाश में-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-patang-hun-mujhe-udane-do-aakash-mein-nitu-rani/) - मैं पतंग हूँ मुझे उड़ने दो खुले नीले आकाश में, मेरे पैरों में धागा न बाँधना नही तो गिर जाउंगा मझधार में। अभी मैं हूँ बहुत हीं छोटा मैं हूँ पतंग पवन का बेटा, और बच्चों से थोड़ा हूँ मोटा देखने में हूँ काला कलूटा। बछड़े की तरह मुझे खूँटे में मत बांधो मुझे किसी - [जीवन दर्शन-मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jivan-darshan-manu-kumari/) - यह जीवन बड़ा अनमोल है, इसे व्यर्थ न गँवाया करो। सुख-दुःख इसमें समाए हुए हैं, इनसे कभी न घबराया करो। सुख-दुःख तो जीवन में आते हैं और जाते हैं, यदि दुःख पहले आ जाए, तो उससे न घबराया करो। उतार-चढ़ाव, लाभ-हानि— यही तो जीवन की कहानी है, यदि पहले हानि ही हो जाए, तो यह - [मत कर अभी ब्याह मेरी मैया - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mat-kar-abhi-byah-meri-maiya-nitu-rani/) - मत कर अभी ब्याह मेरी मैया - नीतू रानी मत कर अभी मेरी ब्याह मेरी मैया, अभी न हुई ब्याह की लायक मेरी मैया। मुझे अभी स्कूल पढ़ने जाना है मुझे भी पढ़ना है भाई-बहनों को पढ़ाना है, ये नैया लगादो किनार मेरी मैया मत कर अभी मेरी----------2। पढ़-लिखकर कर आईपीएस बनूँगी - [एक अभिशाप - विवेक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-abhishap-vivek-kumar/) - एक अभिशाप - विवेक कुमार बेटी ने पूछा बापू से — “इतनी ब्याह की क्या जल्दी?” थोड़ी तो बढ़ जाने दो, अभी तो मैं नादान हूँ, थोड़ी तो ढल जाने दो। अनजान डगर पर चलने से पहले, जीवन को तो समझ लेने दो। अभी तो बचपन भी न जिया, थोड़ा तो जी जाने - [बाल-विवाह - रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-vivah-ragtnas-priya/) - बाल-विवाह - रत्ना प्रिया ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो, बचपन, शिक्षा और यौवन को, मंजिल तो मिल जाने दो । वरदानरूप मिला यह जीवन, बने यह अभिशाप नहीं, खेलना-कूदना हो बचपन, शोषण का संताप नहीं, समझदारी की राह पकड़, व्यक्तित्व को सुलझाने दो । ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा - [बाल मन - ज्योत्सना वर्द्धन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-man-jyotsna-vardhan/) - बाल मन - ज्योत्सना वर्द्धन बाल मन है कितना कोमल सपनों में रहता है उलझा नन्हें ख्वाब बुनती है निंदिया बाल मन है कितना कोमल समय से सब काम होये पीड़ा न ये कोई सहे पढ़े लिखे सब ज्ञानी हो बाल विवाह कुरीति है अंधविश्वास कि रीति है पढ़ लिख कर जागरुकता लाओ कुरीति - [बंद करो बाल विवाह - संगीता कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/band-karo-bal-vivah-sangita-kumari/) - बंद करो बाल विवाह - संगीता कुमारी खूब पढ़ाओ यह देनी एक सलाह, बंद कर दो अब तो बाल - विवाह। लड़का एवं लड़की होने दो जवान, ना करना बचपन में जीवन स्वाहा। क्या सही गलत का नहीं पहचान, अभी है यह कच्चे घड़े के समान। चुनने दो इन्हें अपनी - - [बाल विवाह -    नेहा कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-vivah-neha-kumari/) - बाल विवाह - नेहा कुमारी खेलने के दिन है अभी, हुआ ना बचपन पूरा, ब्याहने की जल्दी में पढ़ने की लालसा रह जाए ना अधूरा। स्नेह और त्याग की मूर्ति को फलने दो, समय बीतने पर मौका मिलेगा ना दोबारा। कच्ची गागरिया को पूरा पकने दो, ताकि टूटे ना जिंदगी का ख़्वाब अधूरा। ब्याहने - [बाल विवाह - संजय कुमार ठाकुर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-vivah-sanjay-kumar-thakur/) - बाल विवाह - संजय कुमार ठाकुर घर में लक्ष्मी आई है उसकी पहली किलकारी यह पैगाम लाई है हमारे दुलार से बिटिया रानी कली सी खिली है जैसे सूरज की पहली किरण है अभी सारे जग में उजियारा फैलाएगी शिक्षा के परवाज देकर देखो सुगंध चहुंओर पहुंचाएगी मौका देकर देखो प्रतिभा का लोहा मनवाएगी... - [मत बाँधों मेरे पंखों को - बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mat-bandho-mere-pankho-ko-bindu-agrwal/) - मत बाँधों मेरे पंखों को - बिंदु अग्रवाल मत बाँधों मेरे पँखों को, मुझे उन्मुक्त गगन में उड़ने दो। अभी जरा बचपन है बाकी, मदमस्त पवन सी बहने दो। अभी उमर चौदह की केवल, अभी मुझे पढ़ना है। अभी तो चलना सीखा मैंने, अभी हिमालय चढ़ना है। मत बाँधो रिश्तों के बंधन - [अभी तो मैं बच्ची हूँ - खुशबू कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/abhi-to-mai-bachchi-hun-khusbu-kumari/) - अभी तो मैं बच्ची हूँ - खुशबू कुमारी पापा इतनी क्या है जल्दी, थोड़ा पढ़-लिख जाने दो। अभी तो नन्हीं कली हूं, फूल तो बन जाने दो। मैं तो हूं छोटी सी गुड़िया, कच्ची अभी उमर मेरी। क्या बिगड़ेगा आपका, जो पढ़ लेगी बिटिया तेरी। समाज की इस कुप्रथा को, तोड़ आगे - [एक निर्दयी बंधन -सुमन सौरभ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ek-nirday-bandhan-suman-sourabh/) - एक निर्दयी बंधन -सुमन सौरभ बाल विवाह है एक अबूझ पहेली जब होने चाहिए बहुत सी सहेली तब भर दी जाती हैं चूड़ियों से हथेली छोटी सी गुड़िया, छोटी सी जान, क्यों लाते हो जीवन में इतना बड़ा तूफान। खेलने की उम्र, पढ़ने का समय, क्यों छीना जाता है उसका निश्चय? न करो, न करो, - [उठो जागो - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/utho-jago-manu-kumari/) - जब स्वार्थ से ऊपर उठकर जिसने राष्ट्र को जीवन माना, निज-मुक्ति से भी महान, भारत-सेवा को पहचाना। जीवन रहते जिसने, मृत्यु के रहस्य को जान लिया, करोड़ों जन-जीवन के उत्थान हेतु तन–मन–प्राण लुटा दिया। उस मनुज-श्रेष्ठ, आदर्श-श्रेष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ को करें नमन, भारत के युगपुरुष को आओ, हम सब मिलकर करें नमन! भारत-भूमि के दिव्य रत्न - [उठो युवाओं आगे आओ लक्ष्य पहचानों-नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/utho-yuvaon-aage-aao-lakshy-pahchano-nitu-rani/) - उठो युवाओं आगे आओ, अपने लक्ष्य को निकट तुम पाओ। स्वामी विवेकानंद जी की जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में मनाते हैं, उनके पावन श्रीचरणों में शत् -शत् शीश नवाते हैं। स्वामी विवेकानंद जी के आदर्शों को हम अपने जीवन में अपनाते हैं, स्वामी जी के कहे वचनों को विद्यालय में बच्चों को - [बाल विवाह अपराध -एम. एस हुसैन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/m-shushain/) - बाल विवाह अपराध है । पापा मुझको अभी पढ़ने दो जीवन की सीढ़ियां चढ़ने दो अभी न ब्याहो तुम मुझको कुछ और उम्र को बढ़ने दो अभी न बंदिशें लगाओ मुझपर निर्णय लो तुम सोच समझकर अभी तो उम्र हमारी कच्ची है चहकना बाकी है मुझे खुलकर कम उम्र में , होने वाली शादी स्वास्थ्य - [ईश्वर के इंसाफ -जैनेन्द्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-17/) - ईश्वर के इंसाफ ले के भारी आफत जाड़ा अइहलै तिल सकरात में, लड़का बड़का में नय अंतर दिखs हय दिन रातमें। रात में रजाई तान सोवे नींद सुखिया, करवट बदल रात काटे दीन-दुखिया। गरीब बोरसी ले के सुते रोज अप्पन साथ में। लड़का बड़का में नय अंतर दिख हय दिन-रात में।। कोय खा हय दही - [जनवरी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/जनवरी/) - जनवरी जब-जब जनवरी है आती, तब-तब ठंडक है लाती; प्राणी घर में दुबके रहते, ठंडक उनको है ठिठुराती। बच्चे बूढ़ों पर तो यह, काल जैसी ही मंडराती; युवा भी तो नहीं सुरक्षित, बीसों कपड़े उन्हें पहनाती। हमारे लिए जनवरी फिर भी, खुशियां लेकर है आती; लोहड़ी, पोंगल, मकर-संक्रांति, से है हमको एक - [मंदिर सोमनाथ - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mandir-somnath-nitu-rani/) - सोमनाथ केअ शोभायात्रा में निकललखिन्ह प्रधानमंत्री सरकार हे बहिना, संग में मंत्री दुई चार। एक सौ अठारह घोड़ा पर बैसल सैनिक राज कुमार हे -----2, रथ में खड़ा भेल प्रधानमंत्री सरकार हे बहिना संग में मंत्री दुई चार। ई मंदिर केअ रक्षा में बहुत वीर जवान देलकै बलिदान हे--2, बहुतों देलकै जीवनदान मंदिर के द्वार - [रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-anjan/) - लौ देखी ऐसी शिक्षा की,फूट रही फुलझड़ियाॅं। उजले कागज कार हो रहे,जुड़ी हुई हैं कड़ियाॅं। फूट रही फुलझड़ियाॅं...... पढ़ता बालक लग्न मगन है,भाग रही हैं घड़ियाॅं। दीप ज्वलित भरपूर लौ में,टूटे कभी न लड़ियाॅं। फूट रही फुलझड़ियाॅं...... आसपास एकांत तपस्वी,गहराई में जड़ियाॅं। पेपर पर है सुभग सुलेखन,जैसी सुंदर चिड़ियाॅं। फूट रही फुलझड़ियाॅं...... शब्दकोश संवाहित करती,चंचल - [विश्व हिंदी दिवस - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vishwa-hindi-diwas-ram-kishor-pathak/) - आप हिंदी पढ़ें यह कथन देखिए। खत्म है आज इसका चलन देखिए।। देव वाणी सुता है धनी शब्द से। पल रही कुछ दिलों की जलन देखिए।। है लिखी यह वही जो कही है सदा। भाव समता लिए है मगन देखिए।। अज्ञता हर अ से यह ज्ञ ज्ञानी करे। शिष्टता युक्त इसके वरन देखिए।। श्रेष्ठ साहित्य - [बाल विवाह: एक अभिशाप - भवानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-vivah-ek-abhishap-bhavanand-singh/) - आओ बताऍं बाल विवाह का दुष्परिणाम क्या होता है ? नासमझी के इस भूल पर जीवन भर वह रोता है। बाल विवाह अपराध है है सबसे बड़ा अभिशाप, इसको समझो मेरे जननी करो न ऐसे घृणित पाप। पढ़ने का मौका नहीं मिलता गरीबी-बीमारी आ जाएगी, शादी में मत बाॅंधो हमको कुछ नया नहीं कर पाऊॅंगी - [मेरी बेटी - सुमन सौरभ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/meri-beti-suman-saurabh/) - मेरी बेटी तुम केवल ऊंची उड़ान ना भरो ऐसा भी करो कि एक कदम तुम्हारा धरती पर भी धरो.....। मेरी बेटी यहां केवल उजाला ही नहीं, तुम इस लगातार स्याह होती दुनिया में एक मशाल बनो......। मेरी बेटी तुम में बची रही आखिर तक कोमलता, पर जहां जरूरी हो दृढ़ता वहां पहाड़ सी मजबूत बनो.....। - [बाल अभिलाषा - अमितेश कुमार (मलिकौरिया)](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-abhilasha-amitesh-kumar-malikouriya/) - बाल अभिलाषा - अमितेश कुमार (मलिकौरिया) हम बच्चे मातृभूमि के वरदान हैं। इस भूमि के हम अभिमान हैं। इस भू को अब्बल–सब्बल करना ही मेरा अभियान है। ब्रह्म-मुहूर्त जग दिन का करना शुरुआत है। नित्य-क्रिया से निपट सुबह शिक्षा का शुरुआत है। शीघ्र विद्यालय पहुंँचना मेरा तो गुमान है। चेतना सत्र से ऊर्जा और ज्ञान - [मत कर अभी ब्याह मेरी मैया - नमन मंच - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mat-kar-abhi-byah-meri-maiya-naman-manch-nitu-rani/) - नमन मंच - नीतू रानी शीर्षक-मत कर अभी ब्याह मेरी मैया । शीर्षक -बाल विवाह। मत कर अभी मेरी ब्याह मेरी मैया, अभी न हुई ब्याह की लायक मेरी मैया। मुझे अभी स्कूल पढ़ने जाना है मुझे भी पढ़ना है भाई-बहनों को पढ़ाना है , ये नैया लगादो किनार मेरी मैया मत कर अभी मेरी----------2। - [सावित्री बाई फुले - सुमन सौरभ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/savitri-bai-fule-suman-sourabh/) - सावित्री बाई फुले - सुमन सौरभ सावित्रीबाई फुले, एक नाम है गर्व का, सावित्रीबाई फुले, एक नाम है फक्र का, महिला शिक्षा की, एक बेमिसाल पहचान का। लाया बदलाव, लाई नई आशा, बदला पितृसत्ता का व्याकरण, सृजित की नई भाषा। सावित्रीबाई फुले, एक नाम है सम्मान का। लड़ाई लड़ी, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ, न कोई मुखौटा, - [कलाधर छंद - रामपाल प्रसाद सिंह अनजान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kalaadhr-chhand-rampal-prasad-singh-anjan/) - कलाधर छंद - रामपाल प्रसाद सिंह अनजान सुधीर छोड़ते निशान हैं। भारतीय लोग हैं विचारवान पुण्यवान, देश में यहाॅं-वहाॅं नई-नई उड़ान हैं। देश में विदेश में जहाॅं मिले विशेष ज्ञान, हैं सनातनी वहीं विकास का चढ़ान हैं। गंग धार बार-बार दूर सिंधु को पुकार, पापनाशती चली अथाह प्राणवान हैं। दृष्टिपात स्वार्थ हेतु वो भला न - [स्वास्थ्य - बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/swasthya-baikunth-bihari/) - स्वास्थ्य - बैकुंठ बिहारी स्वास्थ्य का ध्यान रखिए, यह प्रकृति की अनुपम भेट है। उत्तम स्वास्थ्य ऊर्जा प्रदान करता है, अंग प्रत्यंग को स्फूर्तिमान करता है, आशाओं की नई किरण जगाता है, अनायास रोगों से बचाता है। स्वास्थ्य का ध्यान रखिए, समस्त रोगों का निदान इसी में है, समस्त कष्टों का निदान इसी में है, - [उमर हमर नौनिहाल यौ‌ - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/umar-hamr-nounihal-yo-manu-kumari/) - उमर हमर नौनिहाल यौ‌ - मनु कुमारी बाबूजी कियै करैछी हमर बाल विवाह यौ। उमर हमर नौनिहाल यौ ना।। ई अछि खेलय पढैय केर दिन। हम नय रहब अम्मा केर बिन। बाबूजी कियै एखनहिं भेजे छी ससुराल यौ। उमर हमर नौनिहाल यौ‌ ना.. हम नहि भेलहुं अखन जुआन, हम छी किशोर किशोरी नादान। बाबूजी जीवन - [बाल-विवाह - रत्ना प्रिया](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bal-vivah-ratna-priya/) - बाल-विवाह - रत्ना प्रिया ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो, बचपन, शिक्षा और यौवन को, मंजिल तो मिल जाने दो। वरदानरूप मिला यह जीवन, बने यह अभिशाप नहीं, खेलना-कूदना हो बचपन, शोषण का संताप नहीं, समझदारी की राह पकड़, व्यक्तित्व को सुलझाने दो। ब्याह नहीं कोमल कलियों का फूलों-सा खिल जाने दो। - [ठंड का प्रभाव - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/thand-ka-prabhav-jainendra-prasad-ravi/) - ठंड का प्रभाव - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि' मनहरण घनाक्षरी छंद जाड़े में जो कुहासे से बढ़ जाती ठंड जब, अत्यधिक होती नमी, शीतल पवन में। कभी बढ़ जाती सर्दी, कभी बढ़ जाता गर्मी, मौसम का महत्व है, हमारे जीवन में। धूप नहीं खिलने से तापमान गिर जाता, कम जाती ऊष्मा फिर, हमारे बदन में, ठंड - [बगिया (बिहारी मोमोज) - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bagiya-manu-kumari/) - बगिया (बिहारी मोमोज) - मनु कुमारी बगिया ! मिथिलाक व्यंजन ,पौष्टिकता सौं भरपूर । घूर तापू सब मिल बगिया खाउ जरूर।। इ अछि मिथिलाक समृद्ध, पाककला के निशानी। एकरा प्रेम सं बनाबै छथि दादी नानी। बगिया के अछि विविध प्रकार । चाहे बनाउ कोनो आकार।। दायलबगिया, गुड़ बगिया, तिल बगिया, खोया बगिया, आलू बगिया, तिसीबगिया - [बसंत- दोहा छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/basant-doha-chhand-git-ram-kishor-pathak/) - बसंत- दोहा छंद गीत - राम किशोर पाठक सर्दी से है काँपते, जाने कब हो अंत। हमें बचाने आ रहा, मनहर मृदुल बसंत।। हर मौसम में हो रहा, अक्सर सबको कष्ट। व्याकुल करता हैं कभी, जीवन को कर नष्ट।। अतिशय दिखे प्रकोप तब, याद करें भगवंत। हमें बचाने आ रहा, मनहर मृदुल बसंत।।०१।। जब-तक रहे - [घर की कलियाँ- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ghar-ki-kaliyan-ram-kishor-pathak/) - घर के उपवन की कलियों को। नेह लुटाती उन डलियों को।। ठीक नही ऐसे बिसराना। करके खाली चित गलियों को।। रही सुबह को जो मुस्काती। मनभावन शोख तितलियों को।। मर जाती है धीरे-धीरे। समझों कुछ देख मछलियों को। खुलकर उनको उड़ने देना। दम भर नाजुक पिण्डलियों को।। बचपन उनसे छीन न लेना। डाल अँगूठी उंगलियों - [पहले स्वास्थ्य मायने रखता - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pahle-swasthya-mayane-rakhta-manu-kumari/) - मैडम जी! मैडम जी! कब खुलेगा हमारा प्यारा यह स्कूल ? हम बच्चों के बिना आप विद्यालय आतीं हैं , ये है कहां का रूल।। बच्चों! भीषण शीतलहर के कारण, सरकार का बना यह रूल। हाड़ कंपाती ठंड में निकलने का ना करना भूल।। मैडम जी हम सबको अब तो घर में नहीं लगता है - [नव वर्ष के एलै बहार - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nav-varsh-ke-ele-bahar-nitu-rani/) - नव वर्ष के एलै बहार बहार मेरी सखिया, नजदीक एलै पर्व त्योहार त्योहार मेरी सखिया। नव वर्ष केअ -----२। तिला संक्रांति एलै महाशिवरात्रि एलै, एलै राष्ट्रीय त्योहार त्योहार मेरी सखिया। नव वर्ष केअ -----२। सरस्वती पूजा एलै रंग केअ पर्व होली एलै, बनबै सब छप्पन प्रकार प्रकार मेरी सखिया। नव वर्ष केअ एलै-----२। नव वर्ष - [आँसू और खामोशी-कुण्डलिया - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/आँसू-और-खामोशी-कुण्डलिया/) - आँसू और खामोशी- कुण्डलिया आँसू मेरे नैन में, पत्नी देखी आज। तंज कसी जमकर तभी, कैसा रहा मिजाज।। कैसा रहा मिजाज, समझ मुझको है आई। दो दिन पीहर वास, हमारी तुझे सताई।। रहती जब मैं पास, निकलती बोली धाँसू। देख लिया औकात, निकल आई है आँसू।। खामोशी अच्छी लगी, मैनें ली थी साध। देख पिया - [दोहे - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/doha-ram-kishor-pathak/) - दोहे सोमेश्वर सबके सखा, सहज सुलभ संसार। संकटमोचक सम सदा, सकट सतत संहार।। भ्रमित भँवर भव-भय भुवन, भजन भाव भगवंत। सरल साधना संग सह, सहज सुलभ सब संत।। शुभद शिवाला शिव शिविर, शिष्य शिखर शिष्यत्व। आराधित अक्सर असर, अजर-अमर अमरत्व।। भयहारी भोले भजन, भरता भंजन भाव। सकल सिद्धि सुख सर्वदा, समरसता सद्भाव।। "पाठक" पाप प्रभाव - [संसार- दोहे - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sansar-dohe-ram-kishor-pathak/) - संसार- दोहे जैसी मन की भावना, वैसा ही संसार। अपने-अपने कर्म की, झेल रहे सब मार।।०१।। दुख को जो है झेलता, कहे दुखी संसार। खुशियाँ जिसको हैं मिली, वह करता जयकार।।०२।। मन को निर्मल कीजिए, कुसुमित हो संसार। कार्य सभी होता सफल, मिलती कीर्ति अपार।।०३।। भक्ति-भाव के साथ में, निर्मल रख मन सार। प्रेम सभी - [चित्राधारित सृजन करता मैं रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' छंद विधाता](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chitradhari-srijan-karta-mai-rampal-singh-anjan/) - चित्राधारित सृजन करता मैं रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' छंद विधाता यहाॅं कुछ लोग हैं दिखते, सुवासित कर रहे जग को। कटीली झाड़ियों में से, निकाले थे कभी मग को।। अभावों से सदा लड़कर, किए संघर्ष जीवन में। सदा निस्वार्थ होकर ही, खिलाए फूल निर्जन में।। पुराने पेड़ हैं मेरे,मिली हैं अब तलक छाया। करें स्वागत - [मन वीणा की तुम झंकार बनो - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/man-vina-ki-tum-jhankar-bano-manu-kumari/) - मन वीणा की तुम झंकार बनो - मनु कुमारी तुमपर तन मन दुनियां वारी, भटकी मैं प्रेम की गलियारी। सुध - बुध अपनी मैं भूल गई, मैं लोक लाज सब छोड़ गयी। मेरे प्रीत की रखो लाज सनम, मेरे प्रेम का गृमल हार बनो। उर वीणा की तुम झंकार बनो। क्यों सबकुछ कहना पड़ता है, - [वंशी बजाए नंदलाल - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vansi-bajaye-nandlal-nitu-rani/) - वंशी बजाए नंदलाल - नीतू रानी सब गायों के बीच में वंशी बजाए नंदलाल, एक भी नही दिख रहा वहाँ खड़ा कोई ग्वाल। मुरली बजा रहे नंदलाला देख रही सब गाय, कहीं नही है दीख रही प्यारी राधा माय। कृष्ण सहित सब गायें कर रहे राधा का इंतजार, आज सुबह से नही मिला राधा रानी - [रहमत नगर की शिक्षिका - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rahmat-nagar-ki-shikshika-nitu-rani/) - रहमत नगर की शिक्षिका - नीतू रानी रहमत नगर में आई है नई पाँच शिक्षिका, बच्चों के बीच देने आई सरल, सहज वो शिक्षा। बच्चे उन शिक्षिकाओं से लेंगे अच्छी शिक्षा , बच्चे पढ़ेंगे तब समझेंगे पढ़-लिख कर फिर देंगे परीक्षा। पहले से थी स्कूल में बस चार हीं शिक्षिका, अब सब मिलाकर हो गए - [राष्ट्रीय पक्षी दिवस - मनहरण घनाक्षरी - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rastriya-pakshi-diwas-manharan-ghanakshari-ram-kishor-pathak/) - राष्ट्रीय पक्षी दिवस - मनहरण घनाक्षरी - राम किशोर पाठक आया यह दिन खास, करना है अहसास, जनवरी पाँच आज, समझ बनाइए। कौआ चील गिद्ध मोर, पक्षियों के भाए शोर, नीलकंठ कोयल से, हर्ष अति पाइए। पक्षी होते सहयोगी, समझिए उपयोगी, देखभाल करने को, दाना-पानी लाइए। पक्षियों के हित नित, करिए प्रकृति कृत, होकर हर्षित - [प्रभाती पुष्प - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prabhati-pusp-jainendra-prasad-ravi/) - प्रभाती पुष्प - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि' बाबा औघड़ दानी धतूरा के फूल गंगा जल पर रीझते हो, तभी तो औघड़ दानी, कहलाते भोलेनाथ। राजा-रंक तुझे प्यारा, तूने सभी को है तारा, सबका पालनहार, बनकर दीनानाथ। करते हैं विषपान, बसें जाकर श्मशान, रहते पहाड़ों पर, बन के कैलाश नाथ। भक्त हेतु उमापति कहलाए पशुपति, राम भक्ति - [कैसे समझोगे तुम - बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kaise-samjhoge-tum-baikunth-bihari-2/) - कैसे समझोगे तुम कैसे समझोगे तुम समय को, जिसने लोगों को जीना सिखाया। कैसे समझोगे तुम स्वजन को, जिसने तुम्हारा मान बढ़ाया। कैसे समझोगे तुम परिजन को, जिसने तुम्हारा अपमान टाला। कैसे समझोगे तुम मित्र को, जिसने तुम्हारी राह आसान की। कैसे समझोगे तुम शत्रु को, जिसने तुममे आत्मविश्वास जगाया। कैसे समझोगे तुम सुख को, - [पग-पग आगे बढ़ना होगा - ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pag-pag-aage-badhna-hoga-buty-kumari/) - पग-पग आगे बढ़ना होगा गुरु शिखर पर चढ़ाना हो तो चट्टानों से टकराना होगा । सिंधु पार जाना हो तो लहरों से भी लड़ना होगा। जीवन में कुछ करना है तो पग-पग आगे बढ़ना होगा। बदलाव लाना हो तो आलोचना सहना होगा। सच्चाई पर चलना हो तो बाधाओं से लड़ना होगा। जीवन में कुछ करना - [सजनी अपने आप से रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sajani-apaneaap-se-rampal-prasad-singh-anjan/) - सजनी अपने आप से - रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ट्रेन सवारी करके सजनी, देख रही रस्ते भर सपने। आस-पास की सुंदरता भी, कभी नहीं लगती है अपने।। पिया मिलन की घड़ियाॅं गिनती, ॲंखियाॅं जरा लगी हैं थकने। सिटी विरहिनी मुझे जगाकर, छोड़ गई है मुझको झखने।। दूर क्षितिज पर बादल भी है, लगे गगन नीले - [दुनिया दौलत वालों की - मनहरण घनाक्षरी छंद - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/duniya-doulat-valon-ki-jainendra-prasad-ravi/) - दुनिया दौलत वालों की मनहरण घनाक्षरी छंद भाग-१ किसी को तो दूध-भात मक्खन सुहाता नहीं, किसी को नमक-रोटी, मिलता न थाली में। किसी को तो भर पेट मिलता भोजन नहीं, किसी का तो घर दूध, बहता है नाली में। किसी को तो सिर पर रहने को छत नहीं, किसी को बंदूक धारी, होते रखवाली में। - [नव वर्ष .. मो आसिफ़ इक़बाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nav-vrsh-md-asif-iqbal/) - ऐ नव वर्ष स्वागत है आओ।नया सवेरा, नई शाम, नए उम्मीद जगाओ।।क्या बच्चे ,क्या जवान और क्या बूढ़े,नए साल की उमंग को न छोड़ते अधूरे।।नया साल केवल नई तारीख न लाना,हर घर में थोड़ी सुकून के फूल खिलाना।।कोई आँख नम कोई दिल उदास न रहे,मानवता सबसे ऊपर सब पर विश्वास रहे।।ऐ नव वर्ष स्वागत है - [ठंडा - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ठंडा-नीतू-रानी/) - ठंडा का महीना थर- थर कांँपै सब लोग, कोना केअ बनाएब खाना कि खायत बच्चा मोर। मन नै करैयेअ हम बिछना सेअ निकली ठंडा पैन सेअ हम बर्तन धोबी, ठंडा पैन देखी थर थर कांँपै जियरा मोर कोना केअ बनाएब खाना कि खायत बच्चा मोर---2। बच्चा खाएल लय कानै एक तरफ हम बीमार छी ई - [आँसू और खामोशी - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aansu-or-khamoshi-nitu-rani-2/) - आँसू और खामोशी सिर्फ महिलाओं में हीं होती, ये दोनों लेकर महिला दिन- रात हैं रोती। आँसू और खामोशी महिलाओं को सोने नहीं देती, ये दोनों को सिर पर लेकर जिंदगी भर महिलाएँ ढ़ोती। आँसू और खामोशी कभी भी किसी के यहाँ है आती, ये दोनों सबके जीवन में सुख और दुःख है लाती। आँसू - [धन्यवाद टीचर्स ऑफ बिहार - एम० एस० हुसैन "कैमूरी"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dhanywad-teachers-of-bihr-m-s-husain/) - है कोटि-कोटि धन्यवाद ऐ टीचर्स ऑफ बिहार तेरे बदौलत हीं सबका होता है सपना साकार रचनाएं दब सी जाती थी होता न था प्रचार प्रसार लिखना शुरू मैंने किया तुने दिया है , इसमें धार लेखनी में होती जो त्रुटियां यहां सबका होता है सुधार टीओबी की प्रकाशन टीम सदैव ही , रहती है तैयार - [आओ नववर्ष मनायें - मनु रमन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aao-nav-varsh-manaye-manu-raman/) - आओ नववर्ष मनायें। खुशियों के फूल खिलाएं। नयी उम्मीदें नयी उमंगों के साथ , नित्य नया कुछ कर जायें। नये सपनों को देखें, उसे सही आकार दें। नीले- नीले आसमान में, सफलता की नयी उड़ान भरें। धरती मां सी सहनशक्ति, सरिता सी करूणामयी बने। शशि दिनकर के जैसे हम, कर्मपथ पर गतिमान रहें। पेड़ के - [अलाव-राम किशोर पाठक प्रधान शिक्षक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/alaw-ram-kishor-pathak/) - कुहासा है घना देखो, जलाने आग अब आओ। रहे हो कांँपते अबतक, जरा अब तापकर जाओ।। पता पथ का नहीं चलता, उजाला मिल न पाता है। चलें अब राह हम कैसे, कदम भी डगमगाता है।। कहे सूरज अभी सबसे, भला खुद को बचा पाओ। रहे हो कांँपते अबतक, जरा अब तापकर जाओ।।०१।। डसेगी नाग बनकरके, - [सावित्री बाई फुले-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/savitri-bai-fule-ram-kishor-pathak/) - तर्क कसौटी की थी दात्री। सावित्री शिक्षा की जात्री।। ज्योति जलाने जग में आई। नारी शिक्षा को फैलाई।। बनकर वह एक अधिष्ठात्री। सावित्री शिक्षा की जात्री।।०१।। पति से मिलकर कदम बढ़ाई। सामाजिक वह भेद मिटाई।। वह थी संकल्प अटल धात्री। सावित्री शिक्षा की जात्री।।०२।। भारत की शिक्षिका वहीं थी। दे दी जिसने सीख सही थी।। - [नए वर्ष की नयी उम्मीदें -रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ruchika-4/) - नए वर्ष की नयी उम्मीदें देखो, फिर ठिठुरते,कंपकंपाते दिसंबर की सर्द रातों संग ये वर्ष अपनी अंतिम साँसें ले रहा है और फिर हमारे सोचों का सिलसिला जनवरी से लेकर दिसंबर तक की गणित में उलझा यह हिसाब लगा रहा है। क्या था जो अधूरा रह गया क्या था जो पूरा होकर यादों में बस - [पशु अधिकार दिवस...नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pashu-adhikar-nitu-rani/) - विषय - अन्तर्राष्ट्रीय पशु अधिकार दिवस।******************आज है अन्तर्राष्ट्रीय पशु अधिकार दिवस,लेकिन सभी पशु हैं जीने को वेवश।उजड़ रहे हैं पेड़, पौधे, वन,कहाँ रहेंगे पशुओं के सभी जन।सभी पशुओं को है जीने का अधिकार,पशुओं के साथ करें अच्छा व्यवहार।सभी जीव हैं ईश्वर के अंश,न करो कोई इसको निर्वंश।मनुष्यों से ज्यादा होते पशु वफादार,कम खाकर भी बने - [दिल्ली में -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dilli-mai-nitu-rani/) - मैं आई हूँ दिल्ली नगर , यहाँ चल रहा शीतलहर। हवा बहुत है चल रही, ठंड बहुत है बढ़ रही। नल से गिरता ठंडा पानी, छूते याद आती है नानी। कभी धूप कभी छाँव हो रहे, फिर भी लोग खुशी से जी रहे। यहाँ फैला है प्रदूषण, हवा बह रही सन- सन- सन। आज निकली - [धन्यवाद टीचर्स ऑफ बिहार - एम० एस० हुसैन "कैमूरी"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dhanywad-teachers-of-bihar-m-s-husain/) - है कोटि-कोटि धन्यवाद ऐ टीचर्स ऑफ बिहार तेरे बदौलत हीं सबका होता है सपना साकार रचनाएं दब सी जाती थी होता न था प्रचार प्रसार लिखना शुरू मैंने किया तुने दिया है , इसमें धार लेखनी में होती जो त्रुटियां यहां सबका होता है सुधार टीओबी की प्रकाशन टीम सदैव ही , रहती है तैयार - [That one of the Worst feelings- Ashish Kumar Pathak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/that-one-of-the-worst-feelings-ashish-kumar-pathak/) - That one of the Worst feelings One of the Worst feelings in the world, is to see your parents age because nothing really prepares, You for that inevitable That one moment you look up to them, as strongest strongest people in your life, You look up to them for emotional safety and protection, those guidance - [हनुमान -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-41/) - हनुमान- कहमुकरी संग कभी भय नहीं सताता। साहस मुझमें भी उपजाता।। शंका का करता समाधान। क्या सखि? साजन! न सखि! हनुमान।।०१।। सबसे ज्यादा है बलशाली। तन पर डाले फिरता वाली।। रहता मुझसे है वह सहमत। क्या सखि? साजन! न सखी! हनुमत।।०२।। वह सुंदर ज्ञानी विज्ञानी। मैं बनकर उनकी दीवानी।। पूजन करती मानकर ईश। क्या सखि? - [मानवता -बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baikunth-bihari-9/) - मानवता दूसरों का सम्मान, करने का नाम है मानवता। परिजनों का सत्कार, करने का नाम है मानवता। याचक की याचना, सुनने का नाम है मानवता। कष्ट से जूझते की, मदद करने का नाम है मानवता। टूटते विश्वास को, जोड़ने का नाम है मानवता। बहते आंसुओं को, पोंछने का नाम है मानवता। विश्वास घात को विश्वास - [उदय होता वर्ष 2026-बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bindu-agrawal/) - उदय होता वर्ष 2026 वर्ष 2025 अपने उम्र के आखिरी पड़ाव पर है तमाम उम्र गुजार दी है इसने बस अब बची हुई है कुछ चंद साँसे बचे हुए हैं कुछ लम्हें। हाँ!बहुत बूढ़ा हो चला यह वर्ष। अब यह विश्राम चाहता है । कुछ जिम्मेदारिययाँ,कुछ दर्द, कुछ खुशी, ढोते-ढोते अब यह थक चुका है। - [नव वर्ष -जैनेन्द्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-16/) - नव वर्ष की शुभकामना आ गया है नया वर्ष, स्वागत करें सहर्ष, जीवन की हंसी-खुशी सबको नसीब हो। अपनों से कोई दूर, रहे नहीं मजबूर, जिसे आप चाहें वह, हमेशा करीब हों। किसी को ना हो अभाव, मिटे सारे भेदभाव, मिलजुल कर रहें, अमीर-गरीब हों। आपस की भूला द्वेष, उन्नत हो मेरा देश, प्यार से - [विदाई -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-10/) - विषय -विदाई। शीर्षक -पच्चीसवाँ साल केअ होय येअ विदाई। पच्चीवाँ साल केअ होय येअ विदाई, गाबू समदाउन हे दाई माई। बहुत घर में देलक सुख बहुत घर में देलक दुःख, बहुतों के लाए गेलै बाप- माई। गाबू सब मीलि समदाउन -२ पच्चीसवाँ साल केअ होय येअ विदाई, गाबू सब मीलि समदाउन --२। दियौ लाय, मुरही - [श्री जी -कुमकुम कुमारी काव्याकृति](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kumkum-kumari/) - श्री जी अद्भुत छवि है श्री जी तेरी, हटती नहीं नजरिया। माथे कुमकुम दमक रही है, नैनों में साँवरिया।। हो गई बावरी आके मैं, वृषभानु की नगरिया। शाश्वत चमक लुटा रही है, किशोरी की गगरिया।। पावन रज है बरसाने की, अलौकिक है डगरिया। सहस्त्रों सूर्य चमक रहे हैं, राधे की अटरिया।। राधे राधे बोल रही - [नव वर्ष -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-6/) - नववर्ष पर प्रार्थना हे प्रभु इस नववर्ष में हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि - संसार के समस्त चर -अचर प्राणी सुखी हों सभी निरोग रहें। हमारी अज्ञान रूपी अन्धकार को हरकर हमारे अंदर ज्ञान का प्रकाश भर देना, बुराई को हटाकर अच्छाई की राह पर चलने के लिए सदैव प्रेरित करना। षट विकार को - [नव वर्ष -हर्ष नारायण](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/harsh-narayan/) - विषय-नववर्ष प्रेषक-हर्ष नारायण दास फारबिसगंज,अररिया, बिहार नववर्ष तेरा अभिनन्दन है। बड़े-बुजुर्गों का वन्दन है। नववर्ष आपके जीवन में नव स्वर भर दे। नव गति ,नवलय नव लहर भर दे। सुभाष सी शक्ति, विवेकानन्द सी भक्ति भर दे। नवल चाह, नवल राह, जीवन में नव शक्ति भर दे। नवल गीत,नवलप्रीत, नवल जीवन का रीति कर दे। - [नव वर्ष -भावानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhwanand-singh/) - नववर्ष नये वर्ष का उत्साह, देखते ही बनता है, आओ करें सुस्वागत, सबको बधाई है। नाच रहे नर- नारी, ढोल नगाड़े संग है, खुशी मनाने की,सबपर मस्ती छाई है। विगत वर्ष में सभी, क्या खोया क्या पाया है, अब अवलोकन करने की वक्त आई है। नये वर्ष में हमने, सभी बुरी आदतों का, होलिका जलाने - [प्रिय जनवरी -अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/awadhesh-kumar-6/) - प्रिय जनवरी – स्वागत है तुम्हारा🌸 बाल कविता ठंडी हवाओं में नई गंध घुली, उम्मीदों की किरणें खिली, बीते पलों की याद समेटे , हमने नई सुबह की दहलीज छुई। प्रिय जनवरी, तुम मुस्कान बन कर आना, थकी ज़मीं पर हरियाली उगाना, थोड़ी धूप देना मेहनत के माथे को, थोड़ा सुकून देना व्यस्त जीवन को। - [नया साल -अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/awadhesh-kumar-5/) - नया साल – घर, स्कूल और मुस्कुराहटें सुबह की धूप ने जब आँगन छुआ, गुलाबी ठंड ने हौले से कहा — “नया साल आया!” घर में रौनक, खुशियों का मेला, बाजार में थी रौनक और शॉपिंग का मेला । स्कूल के गेट पर गायब थी बच्चों की कतार, कुछ बच्चों के चेहरों पर थी मुस्कान - [नव वर्ष -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-40/) - नववर्ष - सार छंद गीत शीत लहर से थर-थर कांँपे, हम-सब जरा विचारें। आंग्ल वर्ष अब बदल गया है, सब नववर्ष पुकारें।। जीव-जन्तु सब व्याकुल फिरते, खुशियाँ कैसी भाई। रीत सभ्यता पश्चिम की यह, देते सभी बधाई।। चलो ठीक है शुभद मनाएँ, पर चित में जरा निहारें। आंग्ल वर्ष अब बदल गया है, सब नववर्ष - [अलविदा 2025... शैलेन्द्र](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/alvida-2025-shalendra/) - *अलविदा_2025.*वर्ष के इस अंतिम पड़ाव पर,जब समय की पुरानी किताब का एक और अध्याय मुड़ रहा है,मैं हृदय की गहराइयों से सबके समक्ष नतमस्तक हूँ।जो शब्द अनजाने में काँटे-से चुभ गए,जिन आँखों में अनिच्छा से आँसू भर आए,जिन मनोभावों को अनजान में ठेस पहुँची,जिन अपेक्षाओं को अनजाने में कुचल दिया,जिन वादों को पूरा न कर - [क्या बदलाव लायेगा नया साल-विवेक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/what-changes-will-the-new-year-bring/) - बीते को भुलाना, नए को अपनाना, जो खोया उसका रोना, पाए पर इतराना, अच्छाई से दोस्ती, बुराई से घबड़ाना, खट्टी मीठी यादों का बीता सफर सुहाना, यादों के झरोखों से बज रहा तराना, गजब फलसफा है मेरे भाई, जेहन में मेरे पुनः एक बात दोहराई, अधूरी आस क्या इस वर्ष होगी पास, नववर्ष के आगमन - [भारत में शिक्षा घोटाला](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/भारत-में-शिक्षा-घोटाला/) - भारत में शिक्षा घोटाला शिक्षा के पवित्र गलियारों में अब सम्मान बिकने लगा है। पहले शिक्षक के कानों में मीठे शब्द फुसफुसाए जाते हैं— “आप अद्भुत हैं, आप प्रेरणा हैं, आप ही बदलाव हैं…” और फिर उसी भावनात्मक क्षण में एक ईमानदार शिक्षक के हाथों में चुपचाप थमा दी जाती है— रिश्वत, जिसे रजिस्ट्रेशन शुल्क - [रजिस्ट्रेशन के नाम पर सौदा? - ओम प्रकाश](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/रजिस्ट्रेशन-के-नाम-पर-सौद/) - रजिस्ट्रेशन के नाम पर सौदा? सम्मान के बदले भुगतान? पुरष्कार खरीद रहे हैं आप? कहाँ है आपका आत्मसम्मान? काग़ज़ी ट्रॉफियाँ, खरीदे गए मंच, मतलबी तारीफ़ों के साथ गुरु नहीं, ग्राहक खड़े हैं। शिक्षा के आँगन में, नकली दीपक जला रहे हैं, रोशनी कम, धुआँ ज़्यादा फैला रहे हैं, सच्चे प्रयासों की शक्ति को धूमिल करते - [भोर हुआ..रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bhor-hua-rampal-sinh-3/) - बिंदु छंद 10 वर्ण।211 211 2 222**********************भोर हुआ अरु लाली छायी।पंकज नैनन है हर्षायी।।नाच रहे खग डाली-डाली।हाथ अथाह बजाए ताली।।मारुत पश्चिम से है आया।भाव सुवासित गाना गाया।।हर्षित हैं तरुओं की डाली।झूम उठें बगियों के माली।।देख सरोवर योगी दौड़े।स्नान किये कर छाती चौड़े।।बोल रहे बम भोले-भोले। बंद किए नयनों को खोले।।राह बनी अब जो थी खाई।चाह - [मुझे मत मारो न पापा..अवनीश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mujhe-mat-maaro-n-papa/) - मुझ प्यारी बिटिया के लिए लोरी बनाओ न पापा।धीमे सुरों में मुझे सुलाओ न पापा,अपनी बाहों में भरकर झूला झुलाओ न पापा।गुनगुन गुनगुन गुनगुनाओ न पापा ।गुनगुन गुनगुन गुनगुनाओ न पापा ।प्यार भरी किस्से सुनाओ न पापा,मेरे सपनों में रंग भर जाओ न पापा।राजकुमारियों की कहानियों मेंमेरे हिस्से का राजकुमार भी लाओ न पापा।अपने मीठे-मीठे - [सम्मान या सौदा..विनोद कुमार विमल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/samman-ya-sauda-vinod-kumar-vimal/) - शिक्षा की देहरी पर दीप जले,आदर्शों में सपने पले।पर पावन उस प्रांगण में अबकुछ मौन-से मोल टँगे मिले।जिस मान का मूल चरित्र रहा,जिस गौरव की जड़ तप में थी—वह मान सिमटकर रह गयासूची, शर्त और पावती में ही।कहते हैं— “आप चुने गए”,स्वर मधुर, अर्थ संकोच भरे।पीछे कोई छाया चलती हैजो अनकहे संकेत धरे।जहाँ प्रतिभा ठहर-सी - [मुझे पढ़ाओ पापा..बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mujhe-padhao-papa-bindu-agrwal/) - मुझे आगे बढ़ाओ पापाहाँ मुझे पढ़ाओ पापा।न दो मुझे उंगली का सहारामुझे चलना सिखाओ पापा।किताबों का दो उपहार मुझे दहेज न तुम जमाओ पापा।मैं भी तो तुम्हारा हिस्सा हूँ ज्ञान से मुझे सजाओ पापा।सक्षम इतना बनाओ मुझेन औरत होने का कलंक मिलेन दहेज लोभियों के हाथों जलता शरीर जीवंत मिलेबेटी हूँ तो क्या हुआ ???मैं - [सर्दी का असर. .भावानंद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sardi-ka-asar-bhwanand-ji/) - ---- धनाक्षरी छंद -------------------------शीत का असर देखो,सब पे बराबर है,बिछावन पर दुबके, ओढ़े कम्बल है।सर्द हवा चल रही,ठिठुर रहा तन है,हो रहा बचाव उनका,जो सबल है।दिन दीनों के कटता,जिसे कपड़े कम है,ऐसे लोगों का,अलाव पर ही बल है।सड़कें वीरान पड़ी,धुंध का कहर बड़ी,लग रहा जैसे यह इलाका चम्बल है। भवानंद सिंह ( शिक्षक ) - [नववर्ष तुम्हारा स्वागत है..आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/navvrsh-tumhara-swagt-hai/) - कवितानववर्ष तुम्हारा स्वागत है,खुशियाँ मिले सबको बस यही चाहत है ।नया जोश, नया उल्लास छाया है,खुशियाँ लेकर अपार नववर्ष आया है ।तोड़कर नफरत भरी सब दीवारें अब,प्रेम और सद्भाव से जीवन को सवारें ।जो कुछ भी काम अधूरे रह गए हैं,संकल्प लेकर हम अब उसे पूर्ण करें ।जो कोई भी हमसे रूठ गए हैं,उनको सादर - [जिंदगी का सच ..अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jindagi-ka-sach-amarnath-trivedi/) - जिंदगी आज है कल नहीं मिलेगी ,दुनिया तो इसी तरह चलेगी ।बहकावे में न तू किसी के आना ,तभी तो बहारें खुशियाँ मिलेंगी ।जमाने महफ़िल शोर है ज्यादा ,भूलो न कभी तुम अपना वादा ।जिंदगी भर तो जीना पड़ेगा , न बदलो कभी अपना इरादा ।सारे जहां खुश तो खुशी भी सच्ची ,खुद की खुशी कभी होती नहीं अच्छी ।जमाने की रंगत जमाने की दौलत,मिलती प्रीति एक - सी नहीं सच्ची ।जीवन में कर लो सोच समझ के वादा , टलना उससे कभी नहीं है । फिकर न हो सूनी राहें तनिक भी,कभी मिलकर बिखरना सही - [माँ शारदे-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-sharde-ramkishor-pathak/) - धरणी छंद वर्णिक माँ शारदे, दया दिखलाओ। दे बुद्धि को, कृपा बरसाओ।।कोई कहे, तुम्हें बलशाली।मानें सदा, तुम्हें सब काली।।माता हमें, सही समझाओ।माँ शारदे, दया दिखलाओ।।०१।।कैसे कहूँ, नहीं कुछ आता।दो तृप्ति का, मुझे वर माता।।दो भावना, अभी रचवाओ।माँ शारदे, दया दिखलाओ। ।०२।।अज्ञानता, सदा खलता है। ज्ञानी जहाँ, मुझे छलता है।।है प्रार्थना, सुविज्ञ बनाओ।माँ शारदे, दया दिखलाओ। - [नव वर्ष -डॉ स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-6/) - नव वर्ष नव संकल्प ले नव विहान का , नूतन अभिनन्दन कर लो। जो विकृति हो आपसंस्कृति हो , उसका चलो शमन कर लो। नव संकल्प ले नव विहान का , नूतन अभिनन्दन कर लो। मन मंदिर मे राम चेतना का, अब सहज सृजन कर लो। मानव से अनुराग राग का, जीवन मे भी वरण - [बीर बाल दिवस -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-9/) - वीर बाल दिवस दो वीर बालक आज है वीर बाल दिवस का दिन आज का दिन है बड़ा महान, आज हीं दो छोटे-छोटे बालक हँसते-हँसते दी वो अपनी जान। एक का नाम था जोरावर सिंह दूसरे का नाम फतेह सिंह था, इन दोनों के पिता का नाम दसवें गुरु गोविंद सिंह जी था। दादाजी का - [शीतलहर -ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/beauty-kumari/) - शीतलहर सर्द हवा की कहर, चल रही शीतलहर। गात को कंपा रहा, दीन को सता रहा, सूना पड़ा है डगर। सर्द हवा की कहर, चल रही शीतलहर। छाया घना कोहरा, किसान खेत में मगर, ठंड से बचा रहा अनल। सर्द हवा की कहर, चल रही शीतलहर। सूरज का आभा हुआ कल्पना, धरा पर बिछा ओस - [चाहता चरण धूल -जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-15/) - चाहता चरण धूल नहीं मांँगता हूंँ धन, भरा पूरा परिजन, भावना सहित तन-मन हो समर्पित। पास नहीं फल-फूल, चाहता चरण धूल, श्रद्धा सुमन तुझको करता हूंँ अर्पित। तेरी करूणा कि आस, मन में लिए विश्वास, कभी तो दरस प्रभु, दोगे मुझे किंचित। नहीं देना पद-मान, जिससे हो अभियान, वही मुझे देना नाथ, जिसमें हो मेरा - [शुभ भोर -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-19/) - शुभ भोर हो गया उजियारा। मनमोर नाचता है प्यारा।। "अनजान"साॅंस भरपूर लिए। अनमोल ज्ञान भरपूर दिए।। खग जाग भाग कर गगन छुए। पशु दौड़ भाग कर मगन हुए।। कितना लहलह नभ भाल अरुण। कितना महमह खग बाल तरुण।। ऋषि देख गगन को नाच रहें उपदेश मगन हो वाॅंच रहें।। चल निकल चलें ब्राह्मीवेला। फिर देख - [बहाता नीर था कोई -एस. के. पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-k-poonam-5/) - ऊँ कृष्णाय नमः विधाता छंद। (बहाता नीर था कोई) कुसुम जैसा खिले यौवन, प्रफुल्लित था प्रणय पल से। नदी की धार सागर में, उगा था पुष्प हिय तल से। पगों के शोर से कंपन, नजाकत की मधुर वेला। मुझे मोहित करे चितवन, विदित मधुमास का मेला। 💐(2)💐 लताएँ भी चढ़ीं ऊपर, तभी प्रारब्ध ने रोका। - [कोहरा - उल्लाला छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kohara-ullala-chhand-ram-kishor-pathak/) - कोहरा - उल्लाला छंद गीत - राम किशोर पाठक सभी लोग हैं काँपते, सर्दी सबको खल रही। फैल गया है कोहरा, दृष्टि सभी की छल रही।। मुश्किल होता देखना, आस-पास में भी यहाँ। वाहन भी टकरा रहें, बढ़ जाती है गति जहाँ।। रेंग-रेंगकर गाड़ियाँ, देखो कैसे चल रही। फैल गया है कोहरा, दृष्टि सभी की - [नये साल कि ये नयी उम्मीदें - रवि कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/naye-saal-ki-ye-nayi-ummiden-ravi-kumar/) - नये साल कि ये नयी उम्मीदें - रवि कुमार नए साल में नई उमंगे, फिर से रौशनी ले आए हैं। उम्मीदों कि ये किरणे, सपनों के बागों में फूल सजाये हैं ।। अब शुरुआत करनी है एक नई राह । जिसमें चुनौतियों को स्वीकार करने कि है चाह ।। बीते साल जो रह गया था - [शहादत गीत- महा-शशिवदना छंद - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shahadat-git-maha-shashivandana-chhand-ram-kishor-pathak/) - शहादत गीत- महा-शशिवदना छंद - राम किशोर पाठक जुल्म विरोधी हूँ, सत्य बताता हूँ। गीत शहादत का, आज सुनाता हूॅं।। शासक मुगलों के, किए अत्याचार थें। खत्म हुए कितने, सभ्य परिवार थें।। औरंगजेब की, दुष्कृत गाता हूॅं। गीत शहादत का, आज सुनाता हूॅं।।०१।। जुल्मों की गाथा, होता अक्सर था। माह दिसम्बर था, रोता अम्बर था। - [अटल तेरी कहानी - ब्यूटी कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/atal-teri-yahi-kahani-buty-kumari/) - अटल तेरी कहानी - ब्यूटी कुमारी धरा पर चमकता सितारा अंबर से ध्रुवतारा आया । वह पत्रकार, लेखक, कवि राष्ट्र का प्रणेता प्रेरणास्रोत कारगिल युद्ध विजेता है। परमाणु शक्ति प्रदाता अमर अविचल अटल है। प्रखर वक्ता राष्ट्रभक्त ओजस्वी तेरी वाणी है। कविता का उद्गाता अटल तेरी कहानी है। कर में हो लेखनी जिसके वह शारदा - [यही वर दो हमें - सारिका छंद - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yahi-var-do-hame-sarika-chhand-ram-kishor-pathak/) - यही वर दो हमें - सारिका छंद - राम किशोर पाठक भगवान दया कर दान, यही वर दो हमें । विधि का समझूँ हर ज्ञान, यही वर दो हमें।। रचना हम सुंदर भाव, सदा करते रहें। हम हो प्रभु विज्ञ सुजान, यही वर दो हमें।। सुविधा सबके जब साथ, मिले खुशियाँ सभी। भर दूँ सबका - [अवध बिहारी - कुसुमविचित्रा छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/avadh-bihari-kusumavichitrachhand-git-ram-kishor-pathak/) - अवध बिहारी - कुसुमविचित्रा छंद गीत - राम किशोर पाठक भव भय हारी, प्रभु अवतारी। जनहित कारी, अवध बिहारी।। जगत सताए, समझ न पाऊँ। हर-पल कैसे, सरस बनाऊँ।। नमन करूँ मैं, सत व्रत धारी। जनहित कारी, अवध बिहारी।।०१।। दशरथ के मैं, कुँवर निहारूँ। हर विपदा में, विवश पुकारूँ।। प्रतिपल गाऊँ, भजन खरारी। जनहित कारी, अवध - [तुलसी पूजन- हंसगति छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tulsi-pujan-hansgati-chhand-git-ram-kishor-pathak/) - तुलसी पूजन- हंसगति छंद गीत - राम किशोर पाठक तुलसी है वरदान, समझने आओ। इसके गुण पहचान, इसे अपनाओ।। तुलसी के अब संग, जोड़ लो नाता। औषध है हर अंग, समझ जो जाता।। जीवन अपना धन्य, बना तुम जाओ। इसके गुण पहचान, इसे अपनाओ।।०१।। शमन करे कफ वात, पित को सुधारे। रखें नियंत्रित ताप, शक्ति - [रघुवर नमन- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/raghuwar-naman-ram-kishor-pathak/) - करता रघुवर नमन तुम्हारा। चंचल चितवन चमन हमारा।। कैसे सुलभ सहज सब पाऊँ। कैसे निषाद चरण पखारा।। करता रजकण शिला अहिल्या। दे दो प्रभु अब हमें किनारा।। पाया अतिशय दुख रघुराई। तब जाकर अब तुम्हें पुकारा। करिए दया कुछ दान हमको। रघुवर तुम्ही शबरी उबारा।। जैसे भरत हनुमान प्रिय हैं। वैसे रखकर हृदय पिटारा।। दे - [चित्रा छंद - रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chitra-chhand-rampal-singh-anjan/) - शुभ भोर देख कर खग जागे। डाली तरुवर पर से भागे।। विश्वास ध्यान अब है भू पर। खाद्यान्न प्राण भरते छूकर।। जब भूख विवश करता तन को। करते सहमत अपने मन को।। खाते खग मनभर उड़ जाते। दिखते पथ प्रियवर मुड़ जाते।। मस्ती दिन भर रहते करते। आगत सुख-दुख मिलकर सहते।। अतिशय ठिठुरन खल आ - [बचपन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बचपन/) - बचपन ना ही किसी की फिक्र है, ना ही किसी का जिक्र हैं, करते हरदम अपने मन की, यही उमर हैं बचपन की। तुरंत रूठना तुरंत मान जाना, लड़ना झगड़ना ओर मनाना, किसी बात को नहीं दिल से लगाते, यह वो फ़रिश्ते है, जो रोते हुए को भी हँसाते। करते हरदम अपने मन की, यही - [बाल दिवस बच्चा पार्टी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/बाल-दिवस-बच्चा-पार्टी/) - बाल दिवस बच्चा पार्टी बाल दिवस की खूब बधाई सुन लो मेरे छोटका भाई मैडम लाई बहुत मिठाई खेल कूद संग आज होगी पढ़ाई।। अपने प्रदेश में बहुत है पार्टी कुर्सी पकड़े ऐसे की कवाल माटी लोकतंत्र की जीत की पार्टी हम बच्चों की बच्चा पार्टी।। - [कविता *बाल मनुहार*](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/कविता-बाल-मनुहार/) - बाल मनुहार मां यह मुझे बता दे! आसमान क्यों है नीला कैसे उड़ लेती है चिड़ियां इस नील गगन में ऊपर झरनों में आता जल किधर से जो बहती है कल कल सूरज दादा क्यों चमकते इतनी दूर है फिर भी!! हां मां, यह भी कह दे,, - [रजाई- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rajai-ram-kishor-pathak/) - लिपट-लिपट मैं जिसके रहती। शीत लहर को हँसकर सहती।। संग मुझे लगता सुखदाई। क्या सखि? साजन! न सखि! रजाई।।०१।। रंग विरंगा रूप सलोना। भूलूँ संग शीत का रोना।। संग में आती अंगराई। क्या सखि? साजन! न सखि! रजाई।।०२।। लिपट गले हम रात बिताए। साथ हमेशा मन को भाए।। जिससे मिलकर मैं अलसाई। क्या सखि? साजन! - [जड़मति-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jadmati-ram-kishor-pathak-2/) - समझ न पाता, मन घबराता। जड़मति हूॅं मैं, कुछ कर माता।। अगर कृपा माँ, कर कुछ दोगी। हर दुविधा को, अब हर लोगी।। शरण तुम्हारी, सब सुख दाता। जड़मति हूॅं मैं, कुछ कर माता।।०१।। मन अब हारा, नयन निहारा। जगत सहारा, विलख किनारा।। सुध-बुध सारी, हर अब जाता। जड़मति हूॅं मैं, कुछ कर माता।।०२।। अचरज - [चल रही - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/चल-रही-राम-किशोर-पाठक/) - लड़खड़ाती जिंदगी यह, आज भी है चल रहीं। सामने है काल तो क्या, काल को भी खल रही।। हौसलों को देख मेरे, दंग रह जाते सभी। सोचते हैं बस हमेशा, वक्त कितना छल रही।। दौड़ उनके पास जाता, ज्यों बुलाया हो तभी। मानते बेकार मुझको, बात इतनी सल रही।। भीड़ का हिस्सा बनूँ मैं, है - [खुद ही राह बनाओ - अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/khud-hi-raah-bnao-amarnath-trivedi/) - जमाना सुनता सबकी बातें , सोच समझ करता निज मन की । बनेगी पहचान तो तभी उसे ही , निकलेगी बात ज़ब उसके दिल की । कदम - कदम पर मिलती नसीहत मिलते साथ देनेवाले मुश्किल से । इतनी भलमनसाहत - उतनी शराफत , न रहता सभी के सच्चे दिल से । जिनके मन, वचन , कर्म एक से होते , देते साथ वही खुश दिल से । समझनेवाले सच्चाई जीवन की मन के न काले होते किसी मुश्किल से । जीना है जिंदगी में ज़ब तो , कर्तव्य के - [हिल-मिल जाइए-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hil-mil-jaiye-ram-kishor-pathak/) - आज हुआ है तमस घनेरा, दीप जलाइए। फैलाकर उजियारा जग का, मित्र कहाइए।। स्वार्थ भावना को तजने से, खोते कुछ नहीं। करना क्योंकर तेरा मेरा, हिल-मिल जाइए।। दुनिया की दस्तूर यही है, सबको देख लो। कौन यहाँ रहने आया है, हमें बताइए।। दुर्लभ कुछ भी यहाँ नहीं है, करिए जो कर्म। मार्ग नया नित बन - [आजमाने के लिए-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aajmane-k-liye-ram-kishor-pathak/) - वक्त लोगों को बहुत है आजमाने के लिए। दाव सारे जानते हैं जो गिराने के लिए।। वक्त ने ऐसा सितम भी आज ढाया है यहाँ। दूर अपने हो गए दौलत कमाने के लिए।। कर रहा जख्मी हृदय जो शब्द क्यों वह बोलना। प्यार के कुछ बोल काफी जुल्म ढाने के लिए।। खास बनकर पास आते - [प्रेम पुजारी -जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-14/) - प्रभाती पुष्प प्रेम पुजारी सभी भक्त प्रेमियों की- करुण पुकार सुन, दुख देख द्रवित हो, जाता है ये कन्हैया। यमुना किनारे रोज- कदम की डाल पर, वसन चुराता कभी, बांसुरी बजईया। प्रेम वश खींचे चले, जाते ग्वाल- बाल संग, प्रतिदिन वृंदावन, चराने को गईया। मानव यदि कृष्ण को- सौंप दे जीवन डोर, भवसागर पार लग - [समृद्ध भारत -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-39/) - समृद्ध भारत - दोहा छंद गीत है समृद्ध भारत सदा, बौद्धिकता में खास। हमें गर्व होता रहा, है पावन इतिहास।। सत्य सनातन संत से, संशय सदा सुधार। हरपल जग को दे रहा, अनुभव का आधार।। पहचानें इस बात को, क्या है मेरे पास। हमें गर्व होता रहा, है पावन इतिहास।।०१।। हमने दुनिया को यहाँ, सदा - [ईश्वर से जुड़े तार -एस. के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-k-poonam-4/) - 🙏ऊँ कृष्णाय नमः🙏 रूपघनाक्षरी छंद। (ईश्वर से जुड़े तार) उत्कीर्णन पीत वर्ण, रश्मियों का शृंगार है, दिशा प्राची रवि खड़े,करते हैं इंतजार। वहाँ धुआँ उठ रहा, जल रहा अलाव है, नौका खड़ी गंगा तट,प्राण फंसी मझधार। पुकारते मंदिरों में, शिव-शिव हरि-हरि, काशी में बस कर,सह लेते हर वार। भस्म आरती श्रृंगार, गंगा की आरती कर, - [जाड़े की धूप.. मो आसिफ़ इक़बाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jade-ki-dhup/) - दुनिया के सारे इंसान बच्चे बूढ़े और जवान देखो कितनी ठंड पड़ी ठिठुर ठिठुर सब हैं परेशान।।अब तो एक ही आस है थोड़े जलावन जो पास है जला के इसको तापेंगे फिर तापमान मापेंगे।।फिर भी ठंड न जाएगी याद हमारी आएगी सूरज दादा अब आ भी जाओजाड़े की धूप से हमे गर्माओ।।कितना पीएं गर्म सूप - [राज को न खोलिए..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/raaz-ko-n-kholiye/) - राज को न खोलिए २१२-१२१-२राज को न खोलिए।और से न बोलिए।।प्रीति नैन में बसी।आप खास हो लिए।।शब्द-शब्द खास है।जो मिठास घोलिए।।पत्र प्रेम में लिखा।प्रेम को न तोलिए।।रात बीत ही गयी।आप बात को लिए।।दोष जो मिला नहीं।क्षुब्ध आप रो लिए।।मैं किया मजाक था।खास आप जो लिए।।जुल्म आप मानते।छोड़ हाथ धो लिए।।वक्त एक खास था।वक्त खास ढो - [आपस में प्यार हो.. जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aaps-me-pyar-ho/) - *आपस में प्यार हो*(मनहरण घनाक्षरी छंद)**********************कोई कहे लाख बुरा- करता बुराई नहीं, *अवगुण गुण बन-जाए सद्विचार हो*।यदि हो अभिन्न मित्र, दिल में बसा हो चित्र, *नहीं फर्क पड़ता है, जीत चाहे हार हो*।सच्चे प्रेमियों की बातें- छिपाने से छिपे नहीं, *खुलकर कभी चाहे, नहीं इज़हार हो*।चाहे दूर रहें भले,कभी नहीं मिलें गले,*रहता क़रीब यदि, आपस - [बम शिव कहके- मधुमति छंद वर्णिक - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bam-shiv-kahke-madhumit-chhand-varnik-ram-kishor-pathak/) - बम शिव कहके- मधुमति छंद वर्णिक - राम किशोर पाठक १११-१११-२ उपवन महके। खर खग चहके।। तन-मन बहके। बम शिव कहके।। पुलकित रहना। हिय निज महना।। अपयश दहना। सुख सब गहना।। प्रतिपल ढलता। निज कर मलता।। क्षण-क्षण गलता। जय शिव चलता।। अविरल बहना। मधुरिम कहना। सब-कुछ सहना। शिवमय रहना।। डम-डम बजता। भव भय तजता।। मृदुल - [गणेश- कहमुकरी - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ganesh-kahmukari-ram-kishor-pathak/) - गणेश- कहमुकरी पेट बड़ा हर-पल दिखलाता। लड्डू झट-पट चट कर जाता।। मोहित करता सुनहरा केश। क्या सखि? साजन! न सखी! गणेश।।०१।। छोटे-छोटे काले नैना। हर लेते मेरे चित चैना।। देता मुझको कुशल संदेश। क्या सखि? साजन! न सखी! गणेश।।०२।। बड़े कान हाथी के जैसे। खुसुर-फुसुर भी समझे जैसे।। हितकर उसके सभी उपदेश। क्या सखि? साजन! - [शिक्षा और समाज - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/शिक्षा-और-समाज-नीतू-रानी/) - शिक्षा और समाज बिना शिक्षा के मिटै न अंधकार। शिक्षा से समाज का होता अधिक विकास, पढ़-लिखकर शिक्षित होंगे हमारे देश के सभी समाज। हमारे समाज में बच्चे, बूढ़े, नर- नारी को निःशुल्क शिक्षा दे रही सरकार, किसी के जीवन में शिक्षा नही जाती कभी बेकार। एक शिक्षित पढ़ी लिखी बहू जब आती है ससुराल, - [रूपघनाक्षरी - शृंगार - एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rupghnakshari-sring-s-k-pinam/) - ऊँ कृष्णाय नमः विधा:-रूपघनाक्षरी। विषय:-शृंगार। उठती हैं सागर में, तरंगें हजारों बार, सिन्धु करे जल राशि,से शृंगार बार-बार। केवट है नैया पर, गाते गीत मलहार, झूम रहे संगी-साथी,पहुँचे हैं उस पार। सजनी प्रतीक्षा करे, लहराते काले कच, बाँहों में बाँहें डाल,पाई खुशियाँ अपार। चाहे तुम दूर रहो, रहोगी दिल के पास, मधुर पल में खोया,अपना - [सत्य अगर बोलूं..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/satya-agar-bolun-ramkishor-pathak/) - सत्य अगर बोलूँ- महा_शशिवदना छंद सत्य अगर बोलूँ, रूठ सभी जाते।झूठ कभी बोलूँ, संग चले आते।।मुश्किल होती है, सत की हर राहें।मान सहज लेते, उड़ती अफवाहें।।कौन बताएगा, काश समझ पाते।सत्य अगर बोलूँ, रूठ सभी जाते।।०१।।सच लगता कड़वा, मुख जब भी खोलूँ।बस खुश रखने को, मीठा क्यों बोलूँ।।कुछ तो शब्दों के, अर्थ बदल लाते।सत्य अगर बोलूँ, - [गणेश वंदना..राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ganesh-vandna-ramkishor-pathak/) - गणेश वंदना- सीता छंद देव तेरी वंदना जो, नित्य ही गाया करूँ। दिव्य तेरे रूप का मैं, दर्श जो पाया करूँ।। साधना कैसे करूँ मैं, विज्ञता दाता नहीं। याचना कैसे करूँ मैं, माँगना आता नहीं।। आपके आशीष से ही, नित्य हर्षाया करूँ। देव तेरी वंदना जो, नित्य ही गाया करूँ।०१।। दास तेरा मूढ़ता का, बोझ - [शब्दों के मोती..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shabdo-ke-moti/) - शब्दों के मोती- महा_शशिवदना छंद शब्दों के मोती, मैं चुनकर आऊँ।कैसे भी उनको, सुंदर कर जाऊँ।।उनसे है बनता, गीतों की माला।कानो में घुलती, बनकर मधुशाला।।गाकर जिसको मैं, नित चित बहलाऊँ।शब्दों के मोती, मैं चुनकर आऊँ।।०१।।सत्य बताता हूँ, शिल्प अनोखा है।कभी-कभी मिलता, मुझको धोखा है।।शिल्प नया लाऊँ, सबको हर्षाऊँ।शब्दों के मोती, मैं चुनकर आऊँ।।०२।।मन की पीड़ा - [मेरा जीवन..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mera-jiwan-ramkishor-pathak/) - मेरा जीवन- गौरा सवैया २१२*६+२२२+११जो हमें तू दिया नेह से हूँ लिया सर्व स्वीकार संजोया है मन।साथ देते रहा मैं सदा आज तो संग में है नहीं मेरा ही तन।।भावना में बहा कष्ट भी हूँ सहा और बाँधे रहा प्यारा सा धन।राम आओ जरा मैं बुलाऊँ जरा द्वार तेरे खड़ा सारा जीवन।।०१।।सामने राम के शीश - [तू बचा ले .रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tu-bcha-le-rampal-ji/) - सीता छंद वर्णिक 15 वर्ण 2122-2122=2122-212तू बचा ले डूबने से।**************************लूटती लज्जा हमारी,नैन क्यों ना खोलते।खो गया है धैर्य मेरा,हो तराजू तोलते।।तू कहाॅंं मैं हूॅं कहाॅं जी,हो गई दूरी कहीं।ऑंख मेरी बंद होती,लाज पर्दा में नहीं।।हाथ लज्जा नोचने को,है यहाॅं आगे बढ़े। वीर द्रष्टा सो गए या,मूक हैं बैठे खड़े।।भूल मैंने तो नहीं की,दंड मेरे को - [जीवन और जल..गिरिंद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jivan-aur-jal-girindr-mohan-jha/) - जीवन और जलकहते भी हैं, जल ही जीवन है,जीवन वही, जैसा तन-मन है,जीवन मानो तो ईश्वर का वर है,है यह जल के सदृश, चर-अचर है,तुम इसे जैसी आकृति देना चाहो, दे दो,तुम इसे जैसा भी बनाना चाहो, बना लो,कल्पना से, कर्म से, उद्योग से, दृढनिश्चयी प्रयास से,योग, ज्ञान, श्रेष्ठ अनुभव, विचार से, सतत अभ्यास से,जीवन - [योग दिवस..कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yog-diwas-kartik-kumar/) - 1️⃣ ताड़ासनसीधे खड़े हों तन को तान,ताड़ासन दे ऊँची पहचान।पैर जमें धरती के संग,आकाश छुए आत्मविश्वास रंग।रीढ़ बने मजबूत, स्थिर विचार,शरीर पाए संतुलित आकार।श्वास गहरी, मन हो शांत,योग करे जीवन सुशांत।सुबह-सुबह अभ्यास महान,स्वस्थ बने तन-मन-प्राण।कार्तिक कुमार का यह संदेश,ताड़ासन से बढ़े विशेष।---2️⃣ पद्मासनदोनों पाँव जाँघों पर आएँ,कमल समान हम खिल जाएँ।रीढ़ सीधी, नेत्र बंद,मन हो - [सर्द हवा-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sard-hawa-ram-kishor-pathak/) - सर्द हवाओं का झोंका है। अम्मा ने मुझको रोका है।। कहती बाहर में खतरा है। सर्दी का पग-पग पहरा है।। देखो छाया घना कोहरा। सूरज का छिप गया चेहरा।। बूँद ओस की चमक रही है। चिड़िया भी कम फुदक रही है।। आग जलाकर ताप जरा लो। तन पर चादर ओढ़ जरा लो।। ठिठुरन होती देखो - [जमाने में - गजल - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jamane-me-gazal-ram-kishor-pathak/) - जमाने में - गजल - राम किशोर पाठक कौन है जो कहे जमाने में। मौन सारे लगे बचाने में।। आज अपने बहुत यहाँ रिश्ते। है कई इस कदर दिखाने में।। आपको मैं नहीं बता सकता। कौन अपना यहाँ भुनाने में।। खास विश्वास था मुझे जिसपर। दोष मेरा वही गिनाने में।। साथ मैंने दिया यहाँ जिसको। - [अनुराग सवैया -  राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/anurag-savaiya-ram-kishor-pathak/) - अनुराग सवैया - राम किशोर पाठक गणेश महेश सुरेश दिनेश पुकार करूँ नित आस लगाएँ। विकार सुधार विचार प्रचार निखार रहा निज दोष गिनाएँ।। अबोध सदा यह बालक है प्रभु आप कृपा करके अब आएँ। भजे नित ध्यान लगाकर के प्रभु आप हमें कुछ ज्ञान दिलाएँ।।०१।। अलाप विलाप प्रलाप करे नित छंद रचे कुछ भाव - [गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-6/) - छोटी-छोटी उपलब्धियां मिलकर बड़े उपलब्धि का रूप ले लेती है। छोटे-छोटे कार्य, छोटे-छोटे सुधार, छोटी-छोटी प्रगति जीवन में बहुत मायने रखते हैं। विकास से बढ़कर सतत विकास होता है। कर्म के मूल में गुण और गुण के मूल में स्वभाव होता है। जिस काम और जितने काम को करके संतुष्टि मिलती है, वह हमारे लिए - [जुआ-रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/juaa-rampal-singh-anjan/) - छल सुयोधन संग लेकर,चल पड़ा दरबार में। माॅंगना है जो नियोजित,शेष अगली बार में।। पास राजा के पहुॅंचकर,चाल वैसी ही चली। दाव का विश्वास पाकर,ढाल संगत ही ढली।। हर्ष का गुब्बार लेकर,नाचते आया वहाॅं। साथ शकुनी है कुटिलता,पास में बैठी जहाॅं।। आ गए फौरन युधिष्ठिर,तात आज्ञा मानकर। देर फिर किस बात छाती,आ गए हैं तानकर।। - [छंद रचना को गहूँ-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chhand-rachna-ko-gahun-ram-kishor-pathak/) - विघ्न हर्ता देव हो तुम, कष्ट अपना मैं कहूँ। आज तुमसे आस मुझको, छंद रचना को गहूँ।। शब्द लाऊँ मैं कहाँ से, शिल्प कैसे मैं रचूँ। सत्य का बस हो सृजन अब, दोष गायन से बचूँ।। बुद्धि कर्ता आप सुन लो, मैं भँवर में क्यों रहूँ। आज तुमसे आस मुझको, छंद रचना को गहूँ।।०१।। जानता - [दोहा छंद...रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pryas-ramkishor-pathk/) - प्रयास- दोहा छंद गीत मिलता जिससे हैं उन्हें, जीवन में आराम।कर प्रयास हैं साधते, कर्मठ सारे काम।।मिल जाते भगवान है, होता जहाँ प्रयास।करने वाले ने किया, पूर्ण सभी निज आस।।मन में आए भाव तो, जपते प्रभु का नाम।कर प्रयास हैं साधते, कर्मठ सारे काम।।०१।।कर प्रयास जो देखते, कर लेते सब सिद्ध।संशय धारी को मगर, मन - [शरण गहूँ दिन-रात - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sharan-gahun-din-raat-ram-koshor-pathak/) - ध्यान लगा मैं कर सकूँ, रचना की बरसात। भजन करूँ नित मातु की, शरण गहूँ दिन-रात।। शब्द पुष्प के हार से, करूँ छंद श्रृंगार। सत्य सृजन करता रहूँ, पथ पाए संसार।। वाणी नि:सृत हो मधुर, करूँ प्रेम की बात। भजन करूँ नित मातु की, शरण गहूँ दिन-रात।।०१।। तेज सूर्य सम हो सदा, मैं दिखलाऊँ राह। - [ठंड का प्रभाव-जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/thandh-ka-prabhav-jainendra-prasad-ravi/) - तापमान गिरने से मौसम बदलने से *धीरे-धीरे ठंडक का, बढ़ता प्रभाव है।* पंछियाँ तो घोसले में- रहतीं दुबककर, *पशु छिप कर खुद, करते बचाव हैं।* अमीरों को हीटर व- गीजर सहारा देता, *गरीबों की झोपड़ी में, जलता अलाव है।* सुबह निकालने में- रखे थोड़ी सावधानी, *रोगियों-बुजुर्गों हेतु, हमारा सुझाव है। जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि' - [मैं राष्ट्र धर्म को अपनाया - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-rashtra-dharm-koapnaya-ram-kishor-pathak/) - मैं बहती बन जाऊँ सरिता मैं जीवन में लाऊँ ललिता मैं झुंड यहाँ देखूँ कितने मैं ढूँढ रहा खुद के सपने मैं उतर सकूँ गहराई में मैं अपनी ही परछाई में मैं कैसे तोड़ूँ भँवर-जाल मैं छोड़ दिया सारा मलाल मैं अपनों के खातिर बोलूँ मैं शब्दों में मधुरस घोलूँ मैं नित नूतन करना चाहूँ - [माँ वर दो-राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-var-do-ram-kishor-pathak/) - शीश नवाऊँ, माता के दर, माँ वर दो। रचना लाऊँ, नित्य नया कर, माँ वर दो।। शरण तुम्हारी, गहने वाले, यह कहते। वह हर्षाया, आकर दर पर, माँ वर दो।। मैं अज्ञानी, कर नादानी, हूँ दुख में। ज्ञान जरा भर, दोष सभी हर, माँ वर दो।। तुम ही माता, भाग्य विधाता, हो सबकी। करुणा करके, - [आसरा -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-18/) - पद्ममाला छंद 8 वर्ण आसरा पास बैठी है। खींचती मर्म की रेखा।। जन्म लेते जिसे देखा। आज माॅं खास बैठी है। आसरा पास बैठी है।। दर्द होने नहीं देती। मात रोने नहीं देती।। दौड़ती वो सदा आती। दुग्ध धारा सदा लाती।। साथ में स्नेह की छाया। बात ही बात में माया।। थाप धीरे लगाती है। - [याद उन्हीं की आती है -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-17/) - याद उन्हीं की आती है। निशि-वासर को चैन नहीं है,पीड़ा वाण चलाती है। छोड़ चले जाते हैं जग को,याद उन्हीं की आती है।। मेरी पीड़ा हरनेवाली,पीड़ा देकर कहाॅं चली। सिंधु बीच तू भाग गई रे,रोती छोड़ी एक लली।। अब जीवन में रहा शेष क्या,मुश्किल घड़ी रुलाती है। याद उन्हीं की आती है,,, तू जीवन का - [झलक दिखाएं कृष्ण -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-38/) - झलक दिखाएँ कृष्ण- रोला छंद गीत मिल जाए फिर चैन, उन्हें आँखों में भरके। छलक उठे है नैन, याद मोहन को करके।। क्षमा माँग लूँ आज, सभी पापों के अपने। करता पश्चाताप, लगा है जीवन तपने।। झलक दिखाएँ कृष्ण, सोचकर आँखें फरके। छलक उठे है नैन, याद मोहन को करके।।०१।। लेकर मन में आस, लगा - [रिश्ता रखें सच्चा -जैनेन्द्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-13/) - प्रभाती पुष्प रिश्ता रखें सच्चा संगी-साथी मित्र सच्चे, मिलते कहांँ हैं अच्छे, संबंध जो बन जाए, रिश्ता रखें सच्चा है। किसी से जो नाता जोड़ें उसको निभाना सीखें, वरना तो दुनिया में, अकेला ही अच्छा है। संबंध जो टूटेगा तो, साथ यदि छूटेगा तो, सभी लोग समझेंगे, अकल का कच्चा है। परिचित हजारों हों, पर - [आसरा पास बैठी है - रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aasra-paas-baithi-hai-rampal-singh-anjan/) - खींचती मर्म की रेखा।। जन्म लेते जिसे देखा। आज माॅं खास बैठी है। आसरा पास बैठी है।। दर्द होने नहीं देती। मात रोने नहीं देती।। दौड़ती वो सदा आती। दुग्ध धारा सदा लाती।। साथ में स्नेह की छाया। बात ही बात में माया।। थाप धीरे लगाती है। जल्द लोरी सुनाती है।। नींद में मैं - [चिंता है रहती -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-37/) - चिंता है रहती- महा-शशिवदना छंद गीत दुख की सब गाथा, औरों से कहती। धन दौलत की, चिंता है रहती।। राम नाम जपिए, याद उन्हें करिए।। नेह प्रेम सबसे, चित में ही धरिए।। बोल उठी मुनिया, नहीं दु:ख सहती। धन दौलत की, चिंता है रहती।।०१।। जान-माल सबकी, खूब ख्याल अबकी। याद रही अपनी, भूल गए रब - [राम राम गाइए रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-36/) - राम-राम गाइए- अनामिका छंद आप जो बता रहे। साथ में खता कहे।। रोष क्यों सदा गहे। दोष को यहाँ सहे।। आप तो उदार हैं। सत्य का विचार हैं।। भूल का सुधार हैं। मूल का प्रचार हैं।। प्रेम से बताइए। दोष को मिटाइए।। भाव को जगाइए। राह तो दिखाइए।। भक्ति-भाव रंग में। राम नाम संग में।। - [पंछी -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-16/) - दो पंछी क्यों विवश हुए हैं,बाहर जाने को। अपने हुए पराए मतलब,है समझाने को।। जीवन का हर पल सुखमय जब,तूने पाए थे। रहते संग परिवार में सबको,सुख पहुॅंचाए थे।। अब आप तो हुए बेगाने,दिखा जमाने को। अपने हुए पराए मतलब,है समझाने को।। सुख-सुविधा से वंचित होकर,जाते सिसक रहे। अपने ही हैं पाॅंव तुम्हारे,खुदसे विदक रहे।। - [स्कूल चलें हम- बाल कविता](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/स्कूल-चलें-हम-बाल-कविता/) - स्कूल चलें हम- बाल कविता शाला में सिखलाया जाता। खेल-कूद करवाया जाता।। खाने को भी मिलता सबको। प्यार सदा ही मिलता सबको।। फिर मुझको क्या होगा गम। क्योंकर होगी आँखें नम।। छँट जाए जीवन का तम। हर्षित होकर स्कूल चलें हम।। पढ़ने वाले आगे निकले। अनपढ़ तो जीवन भर मचले।। देखा मैंने आस-पास में। क्षमता - [संपूर्ण ज्ञान अश्मजा प्रियदर्शिनी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashmja-priydarshini/) - संपूर्ण ज्ञान प्रदाता पुस्तक है सरस्वती समान। यह सर्वश्रेष्ठ पर प्रदर्शक विज्ञता जीवन में प्रधान। शास्वत जग ब्रह्मांड का विवरण देता है, कालचक्र की समस्त घटना का मान्य करता बखान। पुस्तक में है दिव्य जोत जैसे ब्रह्मा, विष्णु महेश। नीतिशास्त्र का संग्रह और इतिहास के अवशेष। वेद-पुराण, विविध धर्म ग्रंथों का ये खजाना है, समग्र - [श्यामली सूरत - जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-12/) - श्यामली सूरत मनहरण घनाक्षरी छंद गगन सा श्याम वर्ण- सुध बुध खोया देख, चैन को चुराती तेरी, श्यामली सूरत है। मुरली तो अधरों से करता है अठखेली, दिल को लुभाती तेरी, मोहनी मूरत है। घुंघराले काले बाल, शुक जैसा ओठ लाल, 'रवि' जैसे प्रेमियों को, तेरी जरूरत है। सिर पे मुकुट मोर, गोपियों के चित्त - [आह -बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baikunth-bihari-8/) - आह पल पल प्रत्येक हृदय से निकलती आह, कभी कुछ पाने की आह, कभी कुछ खोने की आह, कभी स्वार्थ सिद्धि की आह, कभी परार्थ सिद्धि की आह, कभी विश्वास की आह, कभी विश्वासघात की आह, कभी तृष्णा की आह, कभी वितृष्णा की आह, कभी सुख की आह, कभी दुख की आह, कभी प्रेम की - [वाणी -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-35/) - वाणी- दोहे वाणी सबसे बोलिये, हर-पल सुंदर सत्य। मन को जो शीतल करे, सन्मुख रखकर तथ्य।। मधुर सरस वाणी सहज, रख-कर सुंदर सोच। व्यक्त करें शुभ भाव नित, भरे न जो उत्कोच।। वाणी से चित भाव का, होता सदा प्रवाह। शब्द अग्नि सम दे नहीं, जो देता हो दाह।। करता वाणी जब श्रवण, अंतस गढ़े - [दुआएं भी असर करता... एस.के. पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/duayn-bhi-asar-karta/) - 🙏ऊँ कृष्णाय नमः🙏विधा:-विधाता छंद।(दुआएं भी असर करता)चली ठंडी हवा साथी,रहें छुपकर निलय में ही।दिवाकर राह मोड़े हैं,गगनचर भी शरण में ही।रहे खुशहाल हर पल वह,ढका निर्धन गरम पट से।गरम थी चाय का प्याला,मिली गर्मी उसे झट से।(2)गरीबी ने रुलाया जब,बदन भींगा तुहिन से ही।खुले आकाश के नीचे,गुजारी रात भूखे ही।न गिरते अश्क आँखों से,दिये होते - [हमें नहीं डरना-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hamen-nhi-darna-ram-kishor-pathak/) - कभी नहीं रुकते, आगे है बढ़ना। सहज भाव कहते, हमें नहीं डरना।। आती है बाधा, अक्सर राहों में। ताकत कर पैदा, अपनी बाहों में।। दुश्मन कोई हो, डँटकर है लड़ना। सहज भाव कहते, हमें नहीं डरना।।०१।। चुभते कंटक भी, फूल अगर चाहें। धीरज रखते हैं, भरें नहीं आहें।। शूल चुभे फिर भी, क्यों आँसू झरना। - [कान्हा..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kah-mukri-ramkishor-pathak/) - कहमुकरी ख्वाब सजाकर रखती हूॅं नित।उन्हें छुपाकर रखती हूॅं चित।।रहती फिर भी जग में तन्हा।क्या सखि? साजन! न सखी! कन्हा।।०१।।याद उन्हें ही कर मैं खोयी।चरणों में सिर रखकर सोयी।।करे न कोई सन्मुख दोहन।क्या सखि? साजन! न सखी! मोहन।।०२।।हृदय बसाकर रूप सलोना।पुलकित रहता मन का कोना।।रखते वे ही मुझे सम्हाल।क्या सखि? साजन! न सखि! गोपाल।।०३।।बसते वे - [नशा छोड़िए..राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nsha-chhodiye-ramkishor-pathk/) - नशा छोड़िए- गीतिका २१२२-२१२२-२१२२-२१२ त्यागिए खुद ही नशा को गर्त में मत खोइए। हो रहे बर्बाद क्यों आबाद भी तो होइए। देखिए उनको जरा करते नहीं हैं जो नशा। देखकर सुख को किसी की आप तो मत रोइए।। आपके इस कृत्य से होती परेशानी सदा। टूटता परिवार सारा नेह उनमें बोइए।। मार्ग बदला आपने वह - [समय -बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baikunth-bihari-7/) - समय समय है सबसे शक्तिशाली, समय है बड़ा बलवान, समय की हर एक घड़ी का, करना है सम्मान, समय ही किसी को राजा बनाता, समय ही किसी को रंक बनाता, समय है सर्वश्रेष्ठ, समय ही किसी को प्राण देता, समय ही किसी के प्राण लेता, इस पूरे ब्रह्मांड का, ऑक्सीजन है समय, समय न किसी - [मंजिल बुला रही है मोहम्मद आसिफ इकबाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aashif-ikbal/) - | मंज़िल बुला रही है | क्यों मुरझाए बैठे हो? शीष झुकाए बैठे हो! देखो मंजिल बुला रही है, बाँध कमर तुम दौड़ लगाओ । समय गंवाए बैठे-बैठे किस सोच में डूबे रहते हो? उत्थान की अपनी फिक्र करो, नसीब को क्यों कुछ कहते हो? राह तक रही उन्नति तुम्हारी कदम बढ़ाओ अपनी आगे, हिम्मत - [छुआछूत-जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-11/) - छूआछूत कोई नहीं छोटा बड़ा, सबको समान गढ़ा, आमिर-गरीब होना, तो मात्र संजोग है। ईश्वर की रचना में- विविध प्रकार जीव, तुलसी के सभी दल, का होता प्रयोग है। ऊंँच-नीच का रिवाज- मानव ने बनाया है, छुआछूत दुनिया का, सामाजिक रोग है। कहते हैं जिसे छूत, वह भी ईश्वर पूत। स्वयंभू मठाधीशों का, यह तो - [विदाई -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-34/) - विदाई - महा-शिववदना छंद गीत नम आँखों में है, प्यार भरा कैसा। छलक रहा मोती, सागर के जैसा।। पल सुंदर आया, हर्ष लिए सब है। द्रवित सभी काया, धन्य हुआ अब है।। पावन निर्मल है, गीत यहाँ ऐसा। छलक रहा मोती, सागर के जैसा।।०१।। बचपन की यादें, लगी अभी आने। थें अबतक अपने, होंगे बेगाने।। - [ऊंचाई भी क्या चीज-गिरिंद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-5/) - ऊंचाई भी क्या चीज होती है, आकाश की ऊंचाई से देखो, धरती पर के शिला-गिरि छोटे दिखाई देते हैं, धरती पर से देखो तो तारे छोटे दिखाई देते हैं, ऊंचाई पर से कुछ चीजें जस का तस दिखाई देती है, हमारा शरीर, हमारा जमीर, हमारे कर्म, हमारे विचार, ऊंचाई पर जाना, ऊंचा जाना बहुत अच्छी - [बचपन-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bachpan-girindra-mohan-jha/) - खेलना, मस्ती करना, बड़े-बड़े ख्वाब देखना, पढ़ाई करना, जिज्ञासु प्रवृत्ति का हो जाना, बड़े-बड़े सपने देखना, पर धरातल से सदा जुड़े रहना, समय पर पढ़ाई-लिखाई करना, सहयोग भावना रखना, अच्छी बातों का अनुसरण करना, स्वावलंबी बनना, घर के छोटे-छोटे काम करना, छोटे-छोटे दायित्व उठाना, पढ़ाई, खेल आदि में अव्वल आने की तीव्र स्पर्धा रखना, ईश्वर - [तन्हा तन्हा..राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tanha-tanha-ramkishor-pathak/) - कुण्डलिया तन्हा-तन्हा है आज-कल, यहाँ सकल संसार।कारण इसका क्या भला, करिए जरा विचार।।करिए जरा विचार, कभी खुद को भी झाँके।बना बहाना काम, नहीं औरों को ताके।।होते सभी समान, नहीं कोई कभी नन्हा।बदली जिनकी सोच, वही रहते यहाँ तन्हा।।०१।।सुविधा की बस होड़ ले, दौड़ रहे हर लोग।समय किसी के पास में, मिलता बस संयोग।मिलता बस संयोग, - [वाह रे इंसान.. जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/wah-re-insan-janendar-kumar-ravi/) - वाह रे इंसान *****************धन-दौलत सब माल-खजाना यहीं धरा रह जाएगा,खाली हाथ तू आया बंदे खाली हाथ ही जाएगा।मूर्ति की पूजा करता है माता-पिता से प्यार नहीं, पद-पैसा पा इतराता है भाई से उचित व्यवहार नहीं।जिस डाल ने दिया सहारा उसी डाल को काट दिया,स्वार्थ की खातिर धर्म-जाति में इंसानों को बांँट दिया।थोड़ी सी लालच में - [संस्कार-गिरीन्द्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sanskar-inra-mohan-jha/) - कहता हूं, व्यक्ति अपने संस्कार का ही होता है गुलाम, सुसंस्कारवश अच्छा काम करता, कुसंस्कार से बुरा काम, अच्छा संस्कार सत्कर्मों, सद्विचारों के चिंतन से ही बनता है, कुकृत्यों, बुरे विचारों के चिंतन से कुसंस्कार का होता निर्माण, संस्कार अपने कर्मों, विचारों से बनते, पूर्वजों से हैं आते, परिवेश और संगति से भी संस्कार को - [गौरव..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gaurav-ramkishor-pathka/) - नाभा छंद २११-१११, २२२-२२गौरव क्षणिक, पाना क्यों चाहें।कौन बरबस, फैलाता बाहें।।चाहत अगर, मैला हो तेरा।अंतस गरल, फैलाए डेरा।।सुंदर सृजन, होते हैं ज्यों ही।वंदन नमन, पाते हैं त्यों ही।।भक्ति भरकर, गाते गीतों में।जीवन सरस, ढोते रीतों में।।सत्य हितकर, भावों को ढाले।तथ्य मनहर, शब्दों में पाले।।चिंतन शुभद, होता जो न्यारा।काव्य कवि कृति, होता है प्यारा।।रचयिता:- राम किशोर - [मैं ईर्ष्या हूँ  -  मोहम्मद आसिफ इकबाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mai-ershayalu-hun-md-asfaq-iqbal/) - मैं ईर्ष्या हूँ, मैं ऐसा ही हूँ। मनुष्य के मन में वास करता हूँ, संबंधों का सत्यानाश करता हूँ। हाँ मैं दोस्तों को भी नहीं छोड़ता, छोड़ता नहीं मैं दुश्मनों को, मनुष्य से मनुष्य का विनाश करता हूँ। मैं ईष्या हूँ, मैं ऐसा ही हूँ। भाई को भाई से लड़ाया, हंसते परिवार में कलह कराया। - [सर्दी का मौसम... आसिफ़ इक़बाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sardi-ka-mausam-asif-iqbal/) - देखो ठंडी हवा चली,गाँव-शहर के गली गली।सर्दी का मौसम है आया,प्रकृति का संदेशा लाया।दृढ न रहो, अटल न रहो,रहो न एक जैसा हर बार।तुम भी खुद को बदलो ऐसे,मौसम बदले जिस प्रकार।सदा न गर्मी रहती है, न रहता बसात।अभी तो सर्दी आयी है, अभी हम देंगे इसका साथ।चलो निकाले उनी कपड़े, कम्बल और रजाई,ठंडी शीत - [भजन..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prabhu-naam-ka-ramkishor-pathak/) - प्रभु नाम का कर ले - विधाता छंद गीत फलेगा काम सब तेरा, शरण अब राम तुम धर ले।मिटेगा पाप सब तेरा, भजन प्रभु नाम तुम कर ले।।चलो राहें जिधर चाहो, फलाफल तो नहीं टरता।दिलासा लाख देते हैं, मदद कोई नहीं करता।।मिले शुभता सदा तुमको, जगत हित काम तुम वर ले।मिटेगा पाप सब तेरा, भजन - [रुख हवाओं का बदल दूं..](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rukh-hawao-ka-ramkishor-pathk/) - गजल२१२२-२१२२नैन तेरे कर सजल दूँ।आज लिखकर मैं गजल दूँ।।कौन तेरा है बता दो।आज रिश्तें कर अटल दूँ।।यूँ न फेरों नैन हमसे।लग रहा खुद को गरल दूँ।।चाहता हूँ आज भी मैं।तुम कहो तो फिर पहल दूँ।।मंद दिल का आग हो तो।मैं तुम्हें फिर से अनल दूँ।।प्रेम फिर से कर सको तो।जख्म को यूँ ही मचल दूँ।।राह - [कर्म हमें ऐसा करना है- सरसी छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/karm-hamen-yesa-karna-sarti-chhand-ram-kishor-pathak/) - कर्म हमें ऐसा करना है- सरसी छंद गीत कर्म हमें ऐसा करना है, जिससे मिले सुकून। जीवन मूल्य लक्ष्य को पाना, रखिए सदा जुनून।। चलते रहना काम हमारा, मन में रख विश्वास। विचलित होना नहीं कभी भी, करना सदा प्रयास।। ध्यान रहे संकल्प हमारा, चित में हर-पल धून। जीवन मूल्य लक्ष्य को पाना, रखिए सदा - [मत कर मेरी अभी ब्याह री मेरी मैया - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mat-kar-meri-abh-byah-ri-meri-maiya-nitu-rani/) - मत कर मेरी अभी ब्याह री मेरी मैया - नीतू रानी मत कर अभी मेरी,ब्याह री मेरी मैया, अभी न हुई ब्याह की लायक री मेरी मैया। मुझे अभी स्कूल पढ़ने जाना है मुझे भी पढ़ना है भाई-बहनों को पढ़ाना है , ये नैया लगादो किनार री मेरी मैया मत कर अभी ----------2। पढ़-लिखकर कर - [मत करना तू ब्याह अभी - मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mat-karna-ti-byahavhi-manu-kumari/) - जी भर कर अभी खेल ना पाई सखियों के संग मैया। मेरे ब्याहने के खातिर तू बेच रही क्यों गैया।। अपने हक का लाड़ प्यार मुझको री मैया दे दो। शादी की इतनी क्या जल्दी है तुझको मैया कह दो।। अभी खेलने के दिन अपने और स्कूल है जाना। पढ़ लिखकर दुनिया में मुझको नाम - [प्रभाती पुष्प - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prabhati-pusp-jainendra-ravi/) - श्याम वंशीवाला सिर पे मुकुट मोर, गोपियों के चित्तचोर, होंठ लाले-लाल किये, खड़ा बंसी वाला है। कहते हैं ग्वाल-बाल, मित्र मेरा नंदलाल , कन्हैया की माता बड़े, नाजों से हीं पाला है। भक्त सुदामा के मीत, पहने वसन पीत, कानों में कुंडल गले, मोतियों की माला है। भक्तों को ये लुभाता है, प्रेमियों को नचाता - [नशे में युवा पीढ़ी - बिंदु अग्रवाल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nashe-me-youva-padhi-bindu-agrwal/) - नशे के गर्त में डूब रही है, आज की युवा पीढ़ी। कर्णधार कहलाते देश के, विकास की है जो सीढ़ी। नशे की कालाबाजारी का, धूवाँ घर-घर फैला। तन मैला,मन भी मैला, हर खून हो रहा मैला। कहाँ से आता नशे का जत्था, कौन है घर-घर लाता। पुलिस प्रशासन, नाकाबंदी, कोई रोक न पाता। नशा ना - [हे सखी! - पथिका छंद - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/he-sakhi-pathika-chhand-ram-kishor-pathak/) - हे सखी! - पथिका छंद - राम किशोर पाठक हे सखी! मुझे बतलाओ। कैसे रहूँ बिना साजन के, बैठी घर सदा अकेली। उठते कितने भाव हृदय में, जैसे हो एक पहेली। मन की हालत समझ न पाई, कैसी हो सखी सहेली। सुखमय कैसे रहूँ गेह में, कुछ तो ऐसा समझाओ।।०१ हे सखी! पास में आओ। - [पगडंडी पर भागे ऐसे - रामपाल प्रसाद सिंह अनजान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pagdandi-pr-bhage-yese-rampal-prasad-singh-anjan/) - पगडंडी पर भागे ऐसे, बालक सुलभ सलोने हैं। नन्हीं-नन्हे साथ-साथ हैं, अनुभव नए पिरोने हैं। पगडंडी भी स्वागत करने, हरियाली के बीच खड़ी खड़ी फसल ललकार रही है, शक्ति और संजोने हैं नन्हीं-नन्हे साथ-साथ हैं, अनुभव नए पिरोने हैं। लक्ष्य नहीं लेकर चलते हैं, सुबह लिए शुभ शाम ढली। कल क्या होगा पता नहीं है, - [संविधान- लावणी छंद - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sanvidhan-lacni-chhand-ram-kishor-pathak/) - संविधान- लावणी छंद - राम किशोर पाठक नीति नियम का ग्रंथ यही है, जिसके सन्मुख समरस रहते। देश चलाते हैं हम जिससे, संविधान उसको कहते।। आजादी जब हमने पायी, हमको देश चलाना था। लोकतंत्र की परिभाषा को, जन-जन तक पहुंँचाना था।। कैसे आएगी समता अब, मार्ग नया कैसे गहते। देश चलाते हैं हम जिससे, संविधान - [जिए जा रहा हूॅं- गजल  राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jiya-ja-raha-hun-mai-gazal-ram-kishor-pathak/) - १२२-१२२-१२२-१२२ उदासी छुपाकर जिए जा रहा हूँ। तभी तो लबों को सिए जा रहा हूँ।। निगाहें जिन्हें ढूँढती है हमेशा उन्हें बेनजर अब किए जा रहा हूँ।। उधारी चुकाना जिसे था हमारा। उसी को अभी तक दिए जा रहा हूँ।। कभी शौक मेरा रहा संग रहना। मगर गम अकेले पिए जा रहा हूँ।। जमाना - [जीवन में शिक्षा का स्थान - अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jivan-me-shiksha-ka-mahtov-amarnath-trivedi/) - मन से न कभी भाग पाएँगे, सदा शिक्षा का अलख जगाएँगे। जीवन से शिक्षा का इतना नाता, इसके बगैर न हम कुछ कर पाएँगे। शिक्षा ही मनुष्य को पशु से विलग करती, शिक्षा से जीवन में उमंग है बढ़ती। इसी कारण सारी दुनिया में, रज रज में रंग खुशी के भरती। शिक्षा पाने - [सर्दी आई](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sardi-aayi-ashis-amber/) - सर्दी आई । सर्दी आई, सर्दी आई ,लेकर कंबल और रजाई ।स्वेटर , कोट और शॉलों ने,सबको दी पूरी गरमाई । पर्वत - पर्वत बर्फ गिराती,ठंडी - ठंडी हवा चलाती ,बगिया - बगिया फूल खिलाती ,अंग - अंग सबका ठिठुराती । गरम हवाओं, रिमझिम वर्षी को ,देकर चुपचाप विदाई ,सर्दी आई, सर्दी आई ,लेकर कंबल - [राम विवाह..रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ram-vivah-ramkishor-pathak/) - राम विवाह - सरसी छंद गीत संग सभी भ्राता भी उनके, परिणय को तैयार।सिया वरण करने को आयें, सजे-धजे सुकुमार।।अगहन शुक्ल पंचमी आयी, होता राम विवाह।झूम रहे हैं सब नर-नारी, खुशियाँ मिली अथाह।।जगमग-जगमग मिथिला नगरी, सजा हुआ घर द्वार।सिया वरण करने को आयें, सजे-धजे सुकुमार।।०१।।श्यामल मनहर रूप सलोना, चित को हरते राम।दृष्टि पड़ी ज्यों ही - [बाल मनुहार..अमृता कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baal-manuhar-amrita-kumar/) - *बाल मनुहार*मां यह मुझे बता दे!आसमान क्यों है नीला कैसे उड़ लेती है चिड़ियां इस नील गगन में ऊपरझरनों में आता जल किधर से जो बहती है कल कल सूरज दादा क्यों चमकते इतनी दूर है फिर भी!!हां मां, यह भी कह दे,,चंदा मामा ही क्यों कहलाते काका, बाबा नहीं क्यों!तारे टिम टिम आसमान में - [आप संग रहें -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-33/) - आप संग रहे- छंद वार्णिक २१२-११२, २२१-२१ अंग-अंग कहे, पाया निखार। आप संग रहे, भाया विचार।। भूल चूक किया, स्वीकार नित्य। नेह युक्त अदा, आभार कृत्य। चाहते हम है, लाना सुधार। आप संग रहे, भाया विचार।।०१।। अंश दंश लिया, चित्कार भाव। क्षुब्ध जीवन में, आसान घाव।। लो विनोद करे, आया खुमार। आप संग रहे, भाया - [आभूषण -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prashad-singh/) - मनहरण घनाक्षरी आभूषण कंदरा गुफाओं बीच,नारी रही नर खींच, कल्पना में डूबा नर ,नारी को सजाने में। पत्थरों को घिसकर,भावना से प्रेमभर, पहला ही आभूषण,आया था जमाने में। बना प्यार का आधार, चाहे बना कंठहार, आभार जताती नारी,लज्जा को बचाने में। सोने की चिड़िया कभी,भारत को कहे सभी, आभूषित देव-देवी,मंदिर ठिकाने में। रामपाल प्रसाद सिंह - [आभूषण -जैनेन्द्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-10/) - आभूषण मनहरण घनाक्षरी छंद सदियों से मानव को, लुभाता है चकाचौंध, नर-नारी सभी को ही, आभूषण भाता है। सभी धनवान लोग, करते हैं खरीदारी, जान से भी ज्यादा प्यारा, जैसे पत्नी-माता है। दुनिया में पहचान, हमारी बढ़ाये शान, धातुओं में अनमोल,बनाया विधाता है। धातु की अहमियत दिनों दिन बढ़ रही, लोगों की दीवानगी-हमझ नहीं आता - [श्यामला सवारियां -जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-9/) - श्यामला सांवरिया एक दिन श्यामा प्यारी, साथ में सहेली सारी, पानी भरने को गई, गोकुल नगरिया। पहले तो घबराई, फिर थोड़ी सकुचाई, पकड़ लिया जो हाथ , सांवला सांवरिया। हार गई राधा गोरी, नज़र झुकी जो थोड़ी, झटके से छुट गई, हाथ की गगरिया। सारी सखियों को छोड़,भागी बरसाने ओर, हवा लहराने लगी,लाली रे चुनरिया। - [ॐ कृष्णय नमः -एस के पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-k-poonam-3/) - ॐ कृष्णाय नमः विधा:-मनहरण स्वयं भूखे रह कर, पूत का भरतीं पेट, शयन में सोचती हूँ,कहाँ से अन्न लाऊँ। श्रम पथ पर जाती, संतति को छोड़कर, श्रम की चक्की में पीस,संध्या घर को जाऊँ। घोसला बनाई एक, पाई-पाई जोड़ कर, बच्चों संग उसे प्रीत,के रंगों से सजाऊँ। उम्र मेरी ढल रही, रहो अब मेरे पास, - [सुरभित हो संसार -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-32/) - सुरभित हो संसार - दोहा छंद चित विकार से मुक्त हो, निर्मल रहे विचार। पावन मन निज राखिए, सुरभित हो संसार।। परहित का नित भाव रख, करिए सारे काम। चैन मिले चित को सदा, जीवन हो अभिराम।। करिए ऐसे कर्म जो, दे सबको आधार। पावन मन निज राखिए, सुरभित हो संसार।।०१ हरिए पीड़ा और की, - [मुझको कान्हा आज बनाओ -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mujhko-kanha-aj-banao-ram-kishor-pathak/) - अम्मा कुछ मुझको बतलाओ। मुझको कान्हा आज बनाओ। जो चाहूँ वह दे दो मुझको। ऐसे कभी नहीं तड़पाओ।। मैं भी मुरली बजा सकूँगा। मुरली तो मुझको दिलवाओ।। साँपों का फन कुचल सकूँ मैं। अपना डर तुम दूर भगाओ।। मैं अभी खेलकर आता हूॅं। गेंद नया कोई मंँगवाओ।। लाल तुम्हारा भी अद्भुत है। बस अपनी विश्वास - [ग्रामीण परिवेश-जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gramin-pariwesh-jainendra-prasad-ravi/) - सुबह सवेरे जाग, कबूतर और काग, धूप सेकने को बैठी, पक्षियांँ मुंडेर पर। फसलें खेतों से जब किसानों के घर आए, पड़ते नजर झूमे, अनाजों के ढेर पर। काम से फुर्सत पा के बुजुर्ग जवान मिल, आपस में बातें करें, बैठ छांँव तरूवर । जब कभी मौका मिले, जुट एक छत तले, उत्सव मनाते सभी, - [भरकर आस है -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-31/) - भरकर आस है - मनहरण घनाक्षरी लाल मुख प्राची किए, मोह रही जैसे प्रिय, भाव को जगाती हिय, भरकर आस है। शांत चित्त सौम्य लगे, जग सारा अब जगे, तिमिर न अब ठगे, हो रहा उजास है। खग सारे गान करे, कलियाँ मुस्कान भरे, दिनकर दोष हरे, वही एक खास है। संग-संग जो भी चला, - [मन उड़ान जब भरे हृदय से -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-30/) - मन उड़ान जब भरे हृदय से - गीत (१६-१४) तन सुवास भी उड़े गगन में, मन में सुंदर आस जगे। मन उड़ान जब भरे हृदय से, सुरभित हर अहसास लगे।। रहे चतुर्दिक सब आशाएँ, पुष्पित जीवन बाग सदा। मंद-मंद मुस्कान अधर पर, इठलाती है मस्त अदा।। आ जाती विश्वास रश्मियाँ, लगते हैं फिर सभी सगे। - [आप ही खास हैं -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-29/) - आप ही, खास हैं- अरूण छंद गीत २१२-२१२-२१२-२१२ हो सके, तो कभी, पास में आइए। आप ही, खास हैं, मान भी जाइए।। आपका, काम तो, रंग लाया अभी। आपसे, जख्म जो, अंग पाया कभी।। आपने, जो किया, याद में लाइए। आप ही, खास हैं, मान भी जाइए।।०१।। फाँसलें, हो नहीं, लाख हो दूरियाँ। आस हो, - [पुकारिए उसे सदा रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-28/) - पुकारिए उसे सदा - पंचचामर/नराच/नागराज छंद गीत १२१-२१२-१२१-२१२-१२१-२ लखे कभी विकार तो, सवाल जो तजा करे। पुकारिए उसे सदा, विचार शुद्ध जो भरे।। सखा किसे कहें यहाँ, सवाल आज है यही। जिसे निहारते रहे, हतास भी करे वही।। सुधारना पसंद हो, निहार दोष को हरे। पुकारिए उसे सदा, विचार शुद्ध जो भरे।।०१।। प्रबुद्ध भाव संग - [बच्चो को सिखाइए-जैनेन्द्र प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-singh/) - बच्चों को सीखाइए जल हरण घनाक्षरी छंद खलिहान छत पर- जहांँ भी जगह मिले, बागवानी करने को, बच्चों को भी सीखाइए। हवा व पानी के लिए , खुशी से जीने के लिए, पेड़-पौधे लगाकर, प्रदूषण घटाइए। तापमान दुनिया में- दिनों दिन बढ़ रहा, आने वाली पीढ़ी की, जिंदगी को बचाइए। बढ़ेगी जो हरियाली, पछियाँ बैठेगीं - [होकर मगन -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-15/) - होकर मगन गगन के नीचे, दौड़ रहे ये बच्चे हैं। जिन्हें देखकर वयोवृद्ध सब,अंतर मन से नच्चे हैं।। हरियाली के बीच निरंतर,कोयल की मीठी बोली, विहग सरीखे उड़ते जो हैं,डाल लिपटते पत्ते हैं। जिन्हें देखकर वयोवृद्ध सब,अंतर मन से नच्चे हैं।। पुहुप खिले मौसम में लेकिन,सदा खिले ये हैं बच्चे, मंदिर-मस्जिद गए नहीं ये,देव तुल्य - [हृदय की पुकार -बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baikunth-bihari-6/) - हृदय की पुकार हे मानव। सुन हृदय की पुकार, प्रकृति से मित्रता कर, प्रकृति का सम्मान कर, पेड़ पौधे जीव जंतु का सम्मान कर। हे मानव। सुन हृदय की पुकार, मानवता का सम्मान कर, परस्पर प्रेम का विचार कर, काम का तिरस्कार कर, क्रोध का तिरस्कार कर, मद का तिरस्कार कर, लोभ का तिरस्कार कर, - [बाल कविता - रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baal-kavita-rampal-prasad-singh-anjaan/) - होकर मगन गगन के नीचे, दौड़ रहे ये बच्चे हैं। जिन्हें देखकर वयोवृद्ध सब,अंतर मन से नच्चे हैं।। हरियाली के बीच निरंतर,कोयल की मीठी बोली, विहग सरीखे उड़ते जो हैं,डाल लिपटते पत्ते हैं। जिन्हें देखकर वयोवृद्ध सब,अंतर मन से नच्चे हैं।। पुहुप खिले मौसम में लेकिन,सदा खिले ये हैं बच्चे, मंदिर-मस्जिद गए नहीं ये,देव तुल्य - [पुरुष होना आसान नहीं...मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/purush-hona-nhin-manu-kumari/) - जिम्मेदारी का बोझ उठाए।अपने नींद और चैन गंवाए।वो मेहनत करें आराम नहीं ।पर मिलता उसे सम्मान नहीं ।सुनो!पुरुष होना आसान नहीं।मिलते हैं उसे कई उपनाम ।बुजदिल,नकारा,जोरू का गुलाम। डरपोक,नालायक , मातृभक्त सुनकर भी,होता वह कभी परेशान नहीं ।पुरुष बनना आसान नहीं।बहन का रक्षक बनकर रहता ।पढ़ाई लिखाई संग शादी ब्याह का,हँसकर वो हर फर्ज निभाता - [काम का महत्व-जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kaam-ka-mahatv-jainendra-prasad-ravi/) - सीखाते कुरान-गीता, गुरुजन माता-पिता, हमें ये जीवन नहीं, मिला है आराम को। मजदूर किसानों को मिलता विश्राम नहीं, सुबह सबेरे जाग, चल देते काम को। कोई काम छोटा-बड़ा होता है खराब नहीं, पर अधिकांश देते, महत्व तो दाम को। अनुचित उचित का हमेशा विचार कर, कर्तव्य निभाएंँ सदा, ध्यान धर राम को। जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि' - [लेखनी-एस.के.पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/lekhani-s-k-punam/) - सोच रही है लेखनी, कहाँ से प्रारंभ करुँ, फँस गया विचारों में,हो न जाए परिहास। तूलिका भी डर रही, कागज है निष्कलंक, शब्दों की बुनाई ऐसी,पाठक को आई रास। डंठल से जन्म हुआ, चारु बनी तराश से, संकल्पना के भाव मेंं,लिख रहा सदा खास। जड़ित है स्वर्ण हीरा, मिल गई पहचान, सोचा नहीं कभी कोई,रहेगा - [शिक्षक - कहमुकरी राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shikshak-kahmukari-ram-kishor-pathak/) - शिक्षक - कहमुकरी सबके हित को तत्पर रहता। अपने हक में कभी न कहता।। दोष गिनाते बने समीक्षक। क्या सखि? साजन! न सखी! शिक्षक।।०१ भूली बिसरी याद दिलाए। रोज नया वह राह दिखाए।। दोष मिटाए जैसे पावक। क्या सखि? साजन! न सखि! अध्यापक।।०२ प्रेम सुधा चित में है बहता। नैनों से ही है कुछ कहता।। - [राष्ट्र भक्त हम, कहलाएँ- वासुदेव छंद गीत  राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rastra-bhakt-hum-kahlayen-ram-kishor-pathak/) - राष्ट्र भक्त हम, कहलाएँ- वासुदेव छंद गीत राष्ट्र हेतु हम, मिट जाएँ। राष्ट्र-भक्त हम, कहलाएँ।। आओ मिलकर, पले यहाँ। कदम मिलाकर, चले जहाँ।। गीत संग हम, यह गाएँ। राष्ट्र-भक्त हम, कहलाएँ।।०१।। कोई दुश्मन, बचे नहीं। चक्र नया अब, रचे नहीं।। वीर देश हित, बलखाएँ। राष्ट्र-भक्त हम, कहलाएँ।।०२।। धन्य वही नर, हो आगे। शीश लुटाकर, जो - [पायल से मन -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-26/) - पायल से मन, डोल रहा- वासुदेव छंद गीत मन ही मन कुछ, बोल रहा। पायल से मन, डोल रहा।। करती छन-छन, हर-पल है। होती तन-मन, हलचल है।। कानों में रस, घोल रहा। पायल से मन, डोल रहा।।०१।। भ्रमित हुए हम, अगर कहीं। भूल गए गम, खबर नहीं।। कोई चितवन, खोल रहा। पायल से मन, डोल - [शिव बम भोले -राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-27/) - शिव बम भोले- भुजंग शिशुसुता छंद वार्णिक शिव-शिव बम भोले हैं। मधु रस मन घोले हैं।। जब-जब हम बोले हैं। सुनकर शिव डोले हैं।।०१।। पशुपति त्रिपुरारी हैं। समरस शुभकारी हैं।। जन-जन हितकारी है। शिव हर अघहारी हैं।।०२।। बम शिव करने आओ। पग सिर धरने आओ।। शुभ यश गहने आओ। शुचि वर लहने आओ।।०३।। पग नमन - [ॐ कृष्णय नमः एस के पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-k-poonam-2/) - 🙏ऊँ कृष्णाय नमः🙏 विधाता छंद। (विलोचन में दिखी लाली) चुनावों ने विचारों का, दिये थे खोल जब ताले। ललक ने हस्त फैलाया, अधर पर थे कई प्याले। प्रचारों से जगी जनता, मची थी होड़ पाने की। प्रधानो की परेशानी, कहीं जमघट जुटाने की। (2) दिखे नेता लगे मेला, तनी भौहें झुकी नजरें। मनाने को गए - [ॐ कृष्णय नमः एस के पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/s-k-poonam-2/) - 🙏ऊँ कृष्णाय नमः🙏 विधाता छंद। (विलोचन में दिखी लाली) चुनावों ने विचारों का, दिये थे खोल जब ताले। ललक ने हस्त फैलाया, अधर पर थे कई प्याले। प्रचारों से जगी जनता, मची थी होड़ पाने की। प्रधानो की परेशानी, कहीं जमघट जुटाने की। (2) दिखे नेता लगे मेला, तनी भौहें झुकी नजरें। मनाने को गए - [वाह रे इंसान -जैनेन्द्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-8/) - वाह रे इंसान पितरों को पानी देते हैं, जिंदा को सम्मान नहीं, गली-गली इंसान भटकता, क्या उसमें भगवान नहीं? मूर्ति की पूजा होती है, फूल चढ़ाए जाते हैं, कुछ जाति को छोटा कहकर, छूत बताए जाते हैं। घर में जो यदि सर्प निकलता, लोग दुश्मन बन जाते हैं , शिव मंदिर में उसी को ताजा - [फिर क्यों करती है माँ हल्ला-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/fir-kyon-krti-hai-maa-halla-ram-kishor-pathak/) - कहती अम्मा मुझको लल्ला। फिर क्यों करती है माँ हल्ला।। कान्हा थें कितना ही नटखट। माखन मिसरी खाते चटपट।। घूमा करते सदा निठल्ला।। फिर क्यों करती है माँ हल्ला।।०१।। फिर भी सबके सदा दुलारे। मैया के आँखों के तारे।। रखे छुपाकर अपने पल्ला। फिर क्यों करती है माँ हल्ला।।०२।। मैं तो बातें सबकी मानूँ। तंग - [बिरसा मुंडा की जयंती-रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/birsa-munda-ki-jayanti-rampal-prasad-singh/) - आजादी आधार, मिली जब से भारत को। दौड़ पड़े सबलोग,विनत हुए सु-स्वागत को।। सुनकर विस्मित मान,रहे हैं खुद को प्राणी। कितने तन बलिदान,हुए हैं जग कल्याणी।। श्रेष्ठों में से एक,आज उनकी है पारी। बिरसा मुंडा नेक,पुरुष अद्भुत अवतारी।। इनके गौरव गान,गुॅंथें हैं इतिहासों में। इनकी शुभ पहचान,बसी है हर साॅंसों में।। इनके दृढ़संकल्प,देखकर भारत जागा। - [रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/रामपाल-प्रसाद-सिंह-अनजान/) - बोल अरे क ख या ग घ,घोल मिठापन डाल रही है। बैठ गई जब सम्मुख माॅं तब,बालक ज्ञान प्रक्षाल रही है।। जीवन में सुविचार प्रवेशित,बालक में अब ढाल रही है। माॅं सुविचारित हो जग में तब,स्वर्ग जमीं पर पाल रही है।। बाल स्वभाव लुभावन पाकर,माॅं हर बात न टार रही है। खेल रहा पढ़ता वह - [बाल दिवस-वासुदेव छंद गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-25/) - बाल दिवस पर, वारा है- वासुदेव छंद गीत प्रेम मुदित पल, सारा है। बाल दिवस पर, वारा है।। आओ मिलकर, बच्चों से। वादा कुछकर, सच्चों से।। आँखों का वह, तारा है। बाल दिवस पर, वारा है।।०१।। संग खेलकर, खुश करिए। बाँह पकड़ कर, दम भरिए।। प्रेम सुधा रस, धारा है। बाल दिवस पर, वारा है।।०२।। - [विजयोत्सव दिवस -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-8/) - विषय -विजयोत्सव दिवस। शीर्षक -अंग्रेजों से लड़ते रहे। बाबू वीर कुंवर सिंह वीर कुंवर सिंह का असली नाम बाबू वीर कुंवर सिंह था, पिता का नाम बाबू शाहबजादा माता का नाम पंचरत्न कुंवर था। इनका जन्म १३ नवंबर १७७७ ई० को बिहार के जगदीश पुर में हुआ, २६ अप्रैल १८५८ को वीर सिंह जी का - [बाल दिवस -गिरिंद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-4/) - बाल दिवस - १४ नवंबर खेलो-कूदो, खूब पढ़ो, बच्चों तुम जिज्ञासु बनो, मोबाइल से तुम दूर रहो, हो सके तो सदुपयोग करो, सब काम करना सीखो, माता-पिता, मित्रों के साथ, तुम अपना थोड़ा वक्त बिताओ, घर का थोड़ा-थोड़ा काम करो, थोड़ा-थोड़ा दायित्व उठाओ, खुद को जिम्मेदार नागरिक बनाओ, सच्चरित्र, स्वावलंबी, कर्त्तव्यनिष्ठ बनो, देशभक्ति का महान - [बाल दिवस -डॉ स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dr-snehlata-dwivedi-5/) - बाल दिवस कर लें थोड़ा हम सद्विचार बच्चों को देख मेरे मन का, संताप सहज खो जाता है। बच्चों के साथ में जीने का, सहचर्य अविरल हो जाताहै। बच्चा बन पल रस पीने का, आनंद तो अद्भुत होता है। खुद अंतर्मन में बच्चे का, स्वभाव अहर्निश होता है। हम लाख करें अब चतुराई, बच्चों का - [आओ हे बनवारी- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aao-he-banwari-ram-kishor-pathak/) - आओ हे बनवारी- गीत हरने कष्ट हमारी। आओ हे बनवारी।। मेरा धर्म बचाना। करना नहीं बहाना।। आस रखी दुखियारी। आओ हे बनवारी।।०१।। जीवन बहुत कठिन है। लेकिन निर्मल मन है।। दया करो गिरधारी। आओ हे बनवारी।।०२।। कुछ तो भूल हुई है। जीवन धूल हुई है।। मति गई है मारी। आओ हे बनवारी।।०३।। प्रेम सदा सिखलाया। - [बाल दिवस - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baal-diwas/) - बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ आप सबों को। विषय- बाल दिवस।शीर्षक -नेहरु जी। आज है 14 नवंबर का दिनआज के दिन हैं बड़े महान,आज हीं जन्म लिए नेहरू जीगाते हम-सब उनके लिए जय गान। जब आप थे माता के गर्भ मेंमाता-पिता पहुॅ॑चे गंगा तट के किनार,आपके पिताजी एक ज्योतिषी से बोलेज्योतिष जी कैसा होगा मेरे - [मोबाइल - नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mobile/) - शीर्षक -बच्चों को भाता मोबाईल। 1 बच्चों को भाता मोबाईल ,मोबाईल मेरी सखियाबच्चों को ------------२। 2 . स्कूल से आए तो खाना पर बैठे ,हाथों में लेकर मोबाईल।मोबाईल मेरी सखिया बच्चों ---२। 3 .पढ़ने जब बैठे तो टास्क के बहाने,लुका छिपी देखे मोबाईल।मोबाईल मेरी सखिया बच्चों --२। सोने जब जाए तो कंबल के अंदर,साउंड कम - [शोर मचा - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shor/) - शोर मचा- वासुदेव छंद गीत सुरभित है सब, कली-कली।शोर मचा अब, गली-गली।। आया मौसम, सर्दी का।पीते हैं पय, हल्दी का।।सर्द हवा जब, चली-चली।शोर मचा अब, गली-गली।।०१।। लगता मनहर, धूप खिला।फूलों का नव, रूप मिला।।सरसों सुंदर, पली-पली।शोर मचा अब, गली-गली।।०२।। बैठ गये छुप, संशय में।बच्चे हैं चुप, इस भय में।।बने कहाँ कब, खली-खली।शोर मचा अब, गली-गली।।०३।। - [छंदों को भी गढ़ना चाहूंँ - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chhand-4/) - छंदों को भी गढ़ना चाहूँ- गीत गीत गजल मैं पढ़ना चाहूँ।छंदों को भी गढ़ना चाहूँ।। पर मुझको कुछ ज्ञान नहीं है।शब्द शक्ति का भान नहीं है।।कविता पथ पर बढ़ना चाहूँ।छंदों को भी गढ़ना चाहूँ।।०१।। लिंग भेद में उलझा रहता।कहीं वचन का दोष निकलता।।उत्तरोत्तर चढ़ना चाहूँ।छंदों को भी गढ़ना चाहूँ।।०२।। दुनिया में विद्वान अधिक हैं।विरले ही - [आस में(ग़ज़ल)- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aas-me/) - आस में - गजल क्या रखा है किसी की हर आस में। सफलता होनी चाहिए पास में।। बेशक मुझे दुनिया नहीं जानती। किसी के लिए मैं भी हूँ खास में।। कद्र मेरी भले ही आप न करें। फिर दर्द क्यों है हर एहसास में।। है गिला तो खुलकर बताओ मुझे। कोई गाँठ न हो इस - [सत्य की ज्योति- कार्तिक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/satya-ki-jyoti-kartik-kumar/) - जब सब ओर अंधियारा छा जाए जब झूठ का शोर बढ़ जाए, जब लोग सत्य को मौन कर दें — तब भीतर की ज्योति को जलाए रखना। यह ज्योति बाहर की नहीं, यह तो आत्मा का दीपक है, जो आँधियों में भी मुस्कुराता है, क्योंकि उसे विश्वास है — “सत्य अमर है।” लोग ठुकराएँ, समय - [ये तो प्यारे बच्चे हैं - आशीष अंबर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bachhe/) - ये तो प्यारे बच्चें है,मन के बड़े ही सच्चें है । ये बच्चें है देश की शान,चाचा नेहरु का यही अरमान । फूलों का उनमें है रंग,तितलियों सा है भरा उमंग । भोले - भाले दिखते हैं,लेकिन करते रहते हैं हुड़दंग । इसकी हर अदा है निराली,सबके मन को मोहने वाली । सबको वो भा - [गुणगुणी धूप - जैनेन्द्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dhoop-2/) - गुण गुणी धूपमनहरण घनाक्षरी छंद सूरज निकलने कारहता है इंतजार,सुबह की धूप हमें, लगती तो प्यारी है। दूर तक दिखती हैमखमली बिछी हुई,घास पर ओस बूंदें, मोती जैसी न्यारी है। पंछियाँ भी घोसले सेजातीं है बाहर नहीं,जब तक आती नहीं, रवि की सवारी है। जल्दी बिछावन नहींछोड़ने को मन करे,रजाई-गरम चाय, हो गई दुलारी है। - [प्रकाश..राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/prakash-ramkishor-pathak/) - प्रकाश- अनंद छंद गीत (मात्रिक १२-१२-१२-१२, १२-१२-१२)सुमन यहाँ विछा रहें, पथिक चलो अभी।प्रदीप हम जला रहे, उदास क्यों सभी।।प्रयास लक्ष्य साधता, कदम बढ़ा जरा।सफल वही बना सदा, कभी न जो डरा।।तुम्हें विजय तिलक लगे, उठो अगर कभी।प्रदीप हम जला रहे, उदास क्यों सभी।।०१।।उदित रहा जला सदा, हुआ न पस्त है।सुखी वही यहाँ रहा, न रोग - [शिक्षा का दीप...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shiksha-ka-deep-ramkishor-pathak/) - शिक्षा का दीप जलाना है- गीत अब सबको राह दिखाना है। शिक्षा का दीप जलाना है।। चाहत सबकी नभ को छूना । शंकाओं का हल हो दूना।। अनपढ़ का रोग मिटाना है । शिक्षा का दीप जलाना है।।०१।। प्रश्नों का हल पाना सबको। जीवन सफल बनाना सबको।। अब सुरभित राह बनाना है। शिक्षा का दीप - [सर्दी- कहमुकरी- राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sardi-ram-kishor-pathak/) - सर्दी - कहमुकरी स्पर्श सदा कंपित है करती। रोम-रोम में सिहरन भरती।। जैसे वह हमसे बेदर्दी। क्या सखि? साजन! न सखी! सर्दी।।०१।। कभी डरूँ तो छुप मैं जाऊँ। दिन-भर जमकर चाय पिलाऊँ।। पहने रहूँ सदा ही वर्दी। क्या सखि? साजन! न सखी! सर्दी।।०२।। घर में कैदी बनकर रहती। प्रेम मुदित मैं सब कुछ सहती।। होने - [बलहीनन का बस पीड़ हरो-रामपाल प्रसाद सिंहअनजान ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/balhinan-ka-bas-pid-haro-rampal-prasad/) - हम जान रहे कर क्या सकते, तुम तो न मुझे इनकार करो। शुभ कर्म किए शुभ धर्म किए,मम श्वेत मकान मत कार करो।। चरणों पर मैं नत हूॅं कब से,प्रभु जी अब तो उपकार करो। बस केवल है मम चाह यही,झटसा भव सागर पार करो।। कुछ पाप कपाट प्रवेश करें,मन अंतस में शुभ सार भरो। - [तोटक छंद वर्णिक-रामपाल प्रसाद सिंहअनजान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/totak-chhand-varnik-rampal-prasad-singh-anjan/) - तोटक छंद वर्णिक(112) 112-112-112-112 दो चरण सम तुकांत दिन में दिखते मन के सपने। हिय में रहने लगते अपने।। रचने लगते शुभ भाव यहाॅं। भरने लगते मन घाव यहाॅं।। सजने लगते मन मंच हरा। बहने लगते मन छंद धरा।। तब सुंदर स्वर्ग नहीं लगता। जब अंतस में शुभता भरता।। रामपाल प्रसाद सिंहअनजान प्रभारी प्रधानाध्यापक मध्य - [भोलेनाथ हमारे - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bholenath-hmare-ram-kishor-pathak/) - भोलेनाथ हमारे । तेरे भक्त पुकारे ।। आएँ हैं सब द्वारे । तू ही कष्ट उबारे।। आओ हे त्रिपुरारी। नैना नीर हमारी।। हे भोले अघहारी। शोभा सुंदर न्यारी।। नैनों को जब खोले । माया का मन डोले।। हौले पाठक बोले । प्यारे हैं बम भोले ।। रचयिता:- राम किशोर पाठक प्रधान शिक्षक प्राथमिक विद्यालय कालीगंज - [किसान - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kisan-ram-kishor-pathak/) - खेतों का है रंग सुनहरा। जैसे सोना रहता बिखरा।। फसल धान की है खेतों में। श्रम का प्रतिफल है रेतों में।। गर्व किसानों पर होता है। बीज आस की जो बोता है।। पेट भरे यह सालों सबका। बहुत कठिन है जीवन जिसका।। भारत सोने की है चिड़िया। सदा कहा करती है दुनिया।। खेत हमारे सोना - [दुविधा...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/duvidha-ramkishor-pathak/) - मनहरण घनाक्षरी दुविधा में हम पड़े,अपनी ही जिद अड़े,अधिकारी पास खड़े, होते परेशान हैं।साथी सारे कह रहे,लेन-देन कर कहे,चैन आप सब गहे, बने क्यों नादान हैं।रास मुझे आती नहीं,राज यह भाती नहीं,आस बन पाती नहीं, सारे ही हैरान हैं।कठिन डगर यह,हँसते हैं सब कह,नहीं पाएँ आप रह, ऐसा ही विधान है।०१।।खर्च कुछ लेते नहीं,घुस हम - [घर में आकर.. राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ghar-me-aakar-ramkishor-pathak/) - घर में आकर- वासुदेव छंद गीत अपनों से जब, नैन मिले।घर में आकर, चैन मिले।।दौड़ लगाकर, थक जाते।दुनिया की सुन, झल्लाते।।आकर आँगन, रैन मिले।घर में आकर, चैन मिले।।०१।।धन का संचय, करते हैं।धन का भय मन, भरते हैं।।जिससे हर सुख, सैन मिले।घर में आकर, चैन मिले।।०२।।घर में जो पल, सुख सारा।मिलता सम्बल, है प्यारा।।लगता है तब, - [पहिले करु मतदान..मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/pahile-karu-matdan-manu-kumari/) - भैया ग्यारह नवंबर कय मतदान करू यौ ।पहिले करू मतदान तखन जलपान करू यौ।लोकतंत्र के ई अछि पाबनि महान।परिवार संग मिली करू मतदान ।भैया राष्ट्र सुरक्षा पर धिआन धरू यौ।पहिले करू मतदान तखन जलपान करू यौ।अहीं भारत के छी भाग्य विधाता ।अपन भविष्य के छी अहीं निर्माता।भैया नव भारत के निर्माण करू यौपहिले करू मतदान - [चुनाव कराते हैं...](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chunav-kraate-hain-om/) - चलो एक बार फिर सेनई सरकार से मिलाते हैं,लोकतंत्र के इस पर्व कोउत्सव की तरह मनाते हैं,चलो... चुनाव कराते हैं!प्रकृति के दो सुंदर चक्रों में,जहाँ आदि है और अंत भी है,कर उस आदि से आरंभ सफर,अनजानों को अपना बनाते हैं,चलो... चुनाव कराते हैं!अजीब सी दास्तां है ये,हर बार नया कुछ अनुभव है,नए साथियों से मिलकरसफल - [युग का प्रभाव..जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yug-ka-prabhav-janendra/) - मनहरण घनाक्षरी छंद में *******************मूर्ति को तो माता कह- आरती उतारते हैं,अपनी माता को कटु, बोलते वचन हैं।घर पर कमरे में- पेड़ पौधे लगाते हैं, कारखाने हेतु रोज, कटते चमन हैं।दरवाजे-खिड़कियों- में पर्दे तो लगाते हैं,तन पर रोज कम, हो रहे वसन हैं।पत्नी की संबंधियों से- बढ़ रही नजदीकी,भाई की पराई हुई, अपनी बहन है।भाग-२भाई-पुत्र-भतीजे - [वंदे मातरम् - गीत - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/वंदे-मातरम्-गीत-राम-किशोर/) - वंदे मातरम् - गीत भारत वासी दिल के अच्छे, चाहत सदा स्वच्छंद है। वंदे मातरम् गीत सुंदर, गाना सबको पसंद है।। वंदे मातरम्। वंदे मातरम्। बंकिम चन्द्र चटर्जी इसकी, रचना करने वाले हैं। देशभक्ति के हित में अपने, सुर को देने वाले हैं।। जिसको गाकर सदा हौसलें, होते सबके बुलंद है। वंदे मातरम् गीत सुंदर, - [याद बहुत वह आती है](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/याद-बहुत-वह-आती-है/) - याद बहुत वह आती है- गीत (१६-१४) मस्ती में जो कुछ पल बीते, अब हमको तड़पाती है। बचपन बीता जिन गलियों में, याद बहुत वह आती है।। सुबह-सवेरे बगिया जाकर, गुल्ली-डंडा जो खेला। दो रुपए में खुश होकर हम, आते थें घुमकर मेला।। वक्त नहीं अब मिलता है तो, चित चिंतित हो जाती है। बचपन - [मतदान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/मतदान/) - मतदान - गीत (१४-१२) सुबह-सुबह ही जाएँगे, करते सब तैयारी। करना है मतदान हमें, सोच रहे नर-नारी।। भोर हुई जागे सारे, काम सभी निपटाएँ। आस पास को बोल रहे, चलो घूमकर आएँ।। तत्पर सारे आएँ हैं, भीड़ जुटी है भारी। करना है मतदान हमें, सोच रहे नर-नारी।।०१।। पंक्ति बद्ध होकर सारे, अनुशासन दिखलाते। बड़े प्रेम - [रचना- कुंडलिया - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-24/) - रचना - कुंडलिया रचना मनहर हो तभी, दे सुंदर संदेश। मात शारदे की कृपा, भरती भावावेश।। भरती भावावेश, शब्द शुभ अंतस आते। लिखना हो आरंभ, पूर्ण सहसा हो जाते।। मौन अचंभित रोज, नहीं चाहूँ मैं बचना। माता का आशीष, कराए जो नित रचना।।०१।। रचना करना है हमें, मन में ऐसा भाव। जो सबको पुलकित करे, - [आओ मिलकर मतदान करें -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-5/) - आओ मिलकर मतदान करें आओ मिलकर मतदान करें । 11 नवंबर की सुबह - सुबह, देश का करके जयगान चलें । आओ मिलकर मतदान करें।। है मतदान अधिकार हमारा। वोट देना है कर्तव्य हमारा । हम कर्तव्यों का निर्वहन करें। आओ मिलकर मतदान करें। सुबह सबेरे करके स्नान । राष्ट्र का मन में लेकर नाम। - [मतदाता -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-7/) - विषय -मतदान। शीर्षक -सब मिलकेअ मतदान हे हे बहिना चलअ करै लय सब मिलकेअ मतदान हे, तब करिहअ जलपान हे ना। ग्यारह केअ करबै सब मतदान सबसे बरका छीयै ई दान, हे बहिना गरीब अमीर सबके हेतै कल्याण हे तब करिहअ जलपान हे ना। पाँच साल बाद आबै ई चुनाव चुनिहअ ईमानदार सरकार, हे बहिना - [मतदाता जागरूकता मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mrityunjay-kumar-2/) - मतदाता जागरूकता....आओ मतदान करे हम। आओ मतदान करे हम, लोकतंत्र का सम्मान करे हम। वोट डालना है अधिकार हमारा, इसको नही है जाया करना। छोड़ो सब काम-धाम,बूथ पर पहुंच करो मतदान, वोट देकर करो लोकतंत्र का सम्मान। जाति-धर्म में कभी न बंटना, निर्भय होकर तुम मतदान करना। वोट देने हम सब जाएंगे, जिम्मेदार नागरिक का - [कार्तिक पावन पूर्णिमा - गीतिका- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kartik-purnima-ramkishor-pathak/) - कार्तिक पावन पूर्णिमा, महिमा कहे बखान।कट जाता है पाप सब, कर गंगा में स्नान।।भीड़ उमड़ती घाट पर, मनहर लगता आज।दान-पुण्य भी कर रहे, कर्म सभी निज मान।।आओ हम भी चल चलें, माँ गंगा के घाट।जाने अनजाने में किए, पापों का कर ध्यान।।पतित पावनी जल जहाँ, धोता सबका पाप।हमको भी चलना वहीं, करने को कुछ दान।।देव - [भारत मांँ की बेटियांँ...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bharat-maa-ki-ramkishor-pathak/) - भारत माँ की बेटियांँ- प्रदीप छंद गीत धरती से अंबर तक फैली, जिसकी गाथा खास है। आज बेटियाँ भारत माँ की, रचती नव इतिहास हैं।। आँगन की कोमल कलियों ने, महक बिखेरा आज है। संग हवाओं से मिलकर जो, करती जग में राज है।। उनके करतब के आगे तो, अम्बर हुआ उदास है। आज बेटियाँ - [देव दिवाली...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dev-diwali-ramkishor-pathak/) - कुंडलियांदेव दिवाली आज है, जगमग सारे लोक।पावन क्षण है आ गया, हरने सबके शोक।।हरने सबके शोक, देव नारायण आते।गंगा में कर स्नान, पाप सारे कट जाते।।आलोकित सुरलोक, लगे भूलोक निराली।हर्षित सुरपति आज, मनाते देव दिवाली।।रचयिता:- राम किशोर पाठक प्रधान शिक्षक प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला, बिहटा, पटना, बिहार।संपर्क - 9835232978 - [गाँधी की दरकार है - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gandhi-ki-darkar-hai-jainendra-prasad-ravi/) - भारत की चुनावों में धन की है बोलबाला, पैसे से ही आज यहांँ, होती जीत- हार है। अधिकांश लोग एक जाति की ही नेता होते, कैसी भी हो छवि पर, होती जयकार है। सभी धर्म जातियों को साथ ले के चले सके, गांँधी जैसा सर्वमान्य, नेता दरकार है। बिना नजराना दिए होता कोई काम नहीं, - [मतदान करें - अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kavita/) - मतदान करें मतदान करें , स्वकार्य करें,तरक्की का मार्ग प्रशस्त करें।पाँच वर्ष में क्या खोया - पाया,इस बात का जरूर संज्ञान करें। मत से ही सरकार है बनती,आपके मत से ही विकास होता।आपके मत से सृजन की तान बनती,आपके मत से ही कल्याण होता। मत को देकर खुद अपने को,जागरूक नागरिक कहलाएँ ।मतदान अवश्य करके - [इच्छा..बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ichcha-baikhunth-bihari/) - संसार में आते ही शुरू होती है... इच्छाबड़े बुजुर्गों,सगे-संबंधियों के बीच पनपती है यह इच्छा...समाज में जाकर फलती फूलती है यह इच्छा भोग विलासिता को जन्म देती है यह इच्छा।काम- क्रोध-मद-लोभ-मोह और मत्सर की जड़ है यह इच्छा।राग द्वेष का भी मूल है यह इच्छा।स्वयं का कल्याण का स्रोत है यह इच्छा। परस्पर कल्याण का - [कुंडलिया.रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chhand-rampal-singh-anjan/) - भाषा अच्छी बोलना,मुख का है शृंगार।संधारित जिसने किये,लूट लिए संसार।।लूट लिए संसार,स्वर्ग सुंदर मुस्काया।अवतारण की चाह,देव मानस पर छाया।।कहते हैं 'अनजान',सदा रखना अभिलाषा।करके ही अभ्यास, सुधारो अपनी भाषा।।**************************रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान'मध्य विद्यालय दर्वेभदौर - [भाग्यशाली जेमिनी -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-14/) - कुंडलिया भाग्यशाली जेमिनी। मंदिर के चौखट खड़े,पूजा में हो बाध। ॲंखियों से ऑंसू गिरे,पूरी हुई न साध।। पूरी हुई न साध, हार नारी ना मानी। अवसर मिलते खास,ऑंख से झड़ते पानी।। कहते हैं 'अनजान॔,चित्त जो रखते स्थिर। मिले विधाता साथ,बिना जाए ही मंदिर।। रामपाल प्रसाद सिंह अनजान मध्य विद्यालय दरवेभदौर प्रखंड पंडारक पटना - [खुशी में झूमा भारत -रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-13/) - कुंडलिया खुशी में झूमा भारत भारत के इतिहास पर,गर्वीले नर-नार। विजय तिरंगा हाथ में, झुके शीश सौ बार।। झुके शीश सौ बार, जगत को है हैरानी। भारत महिला टीम, उतारी सबका पानी।। कहते हैं 'अनजान',हुआ है दुश्मन आहत। डोला पाकिस्तान, खुशी में झूमा भारत।। ✍️✍️रामपाल प्रसाद सिंह 'अनजान' दरवेभदौर प्रखंड पंडारक पटना - [मत देना मतदान -स्नेहलता द्विवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/snehlat-dwivedi/) - मतदान मत दान करना मतदान, यह तो है जागरुकता की पहचान. प्रजातंत्र का मान और अपना स्वाभिमान. शांति विकास कानून का सम्मान. मत दान करना मतदान, पूछो स्वयं से, क्या चाहिए किस से, मान सुरक्षा शिक्षा विकास या विनाश, जांचों परखों समझो निशान, मत दान करना मतदान, . चुक अगर गए गलती हो गई,. अफसोस - [फिर रचा इतिहास है -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-4/) - फिर रचा इतिहास है विश्व कप का खिताब जीतकर , फिर रचा इतिहास है । बेटियों ने हीं बताया, चाँद कितना पास है।। मां पिता के स्वप्न को वह ,कर रही साकार है। नभ में पंछी बनके हरपल, उड़ने को तैयार है।। साहसी , दृढनिश्चयी वो, ऊर्जा की अंबार है। कभी गंगा मां सी शीतल, - [इतिहास कौन रचता है -गिरिंद्र मोहन झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/girindra-mohan-jha-3/) - इतिहास कौन रचता है? धरातल से जुड़कर जो वर्तमान से भविष्य की ओर निरंतर चलता है, इतिहास वही रचता है, महाजनो येन गत: स पन्था: का अनुसरण जो अपने ही भावों से करता है, इतिहास वही रचता है, जिनके विचार श्रेष्ठ, जिनके कर्म श्रेष्ठ, जो निरंतर श्रेष्ठता का वरण करता है, इतिहास वही रचता है, - [जीवन में शिक्षा का महत्व -मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mrityunjay-kumar/) - जीवन में शिक्षा का महत्व..! शिक्षा बिना जीवन लगता बेकार, शिक्षा है हम सब का मूल अधिकार। चाहे कोई हो मजदूर,किसान या आम इंसान, शिक्षा बिना सबका जीवन विरान। पढ़े-लिखे को हर जगह मिलता मान-सम्मान, शिक्षा ही बनाता सबके जीवन को महान। खेलकूद के साथ साथ पढ़ाई है जरूरी, बिन पढ़ाई जीवन हो जाती है - [भक्ति भाव मन -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-23/) - भक्ति भाव मन- वासुदेव छंद गीत पावन अब तन, करना है। भक्ति भाव मन, धरना है।। भोग रहे सब, कृत अपने। देख रहे बस, नित सपने।। पाप बोझ तज, मरना है। भक्ति भाव मन, धरना है।।०१।। जन्म लिए हम, मानव में। ढोते हैं गम, आनव में।। आज सकल दुख, हरना है। भक्ति भाव मन, धरना - [नेता के उपनाम -रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-22/) - नेता के उपनाम- कहमुकरी इर्द-गिर्द मँडराते रहता। जुल्म-सितम सहने को कहता।। नखरा भी करता है प्रत्यक्ष। क्या सखि? साजन! न सखि! अध्यक्ष।।०१ बहलाता फुसलाता हमको। सपने खूब दिखाता हमको।। कहता मैं हूॅं तेरे लायक। क्या सखि? साजन। न सखी! नायक।।०२ सुख सुविधाओं का वह भोगी। कहता मुझको हर सुख होगी।। हमको समझा सदा नादान। क्या - [साक्षात अमरनाथ है -जैनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-7/) - साक्षात अमरनाथ है मनहरण घनाक्षरी छंद में चारों धाम घुम आया, कहीं नहीं मन भाया, तीर्थ राज बनकर, गुरुदेव साथ हैं। भाव पास कट गया, अंधकार मिट गया, जब से पकड़ लिया, गुरुवर हाथ हैं। भेदभाव भुलाकर- जब से हैं अपनाये, मैं भी इन्हें मान लिया, बाबा बैजनाथ हैं। जिनको न माता-पिता, पुत्र-भाई संगी-साथी, दयालु - [मैं चाहूं भईया का प्यार -मनु कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/manu-kumari-3/) - मैं चाहूँ भईया का प्यार ! बहुत प्यारे हैं मेरे भईया, माँ पापा के दुलारे हैं मेरे भईया । ईश्वर उनकी रक्षा करना, वो सुख से खेवे जीवन नैया। । मैं चाहूँ भैया का प्यार, नहीं चाहूँ मंहगा उपहार। रिश्ता अटूट रहे सदियों तक, भईया को खुशियाँ मिले अपार। । खुशियों से आंगन है गुलजार, - [प्यारा स्कूल - निवेदिता कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/school/) - प्यारा स्कूल मैं ये कहाँ आ गई हूँ,ये सवाल मन में आया है,माँ के साथ जब पहली बार,अनोखे जगह पर पाई हूँ,पढ़ ना पाई मैं नाम कुछ था,बड़़े अक्षरों में लिखा हुआ,सुनने में आया कि यह तो,सरकारी विद्यालय प्यारा है,एक ही रंग के कपडों में क्यूँ?सारे बच्चे खेल रहे हैं,छोटे से एक कमरे में,जाने कुछ - [चौसर - रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chausar/) - चौसर जिंदगी के चौसर पर हम रहेंबस एक मोहरेंचाल ऊपर वाला चलता रहा।कभी शह, कभी मात वह देताऔर दर्प इंसानों के मन मेंबढ़ता रहा। जिंदगी के चौसर पर हम रहेंबस एक मोहरेंसंबंधो के वजीर,प्यादे,अपने खाने में चलें अपनी चालेंचाल उनकी समझ न पाएंकभी शह, कभी मातइसमें दिल ये उलझता गया। जिंदगी के चौसर पर हम - [अक्टूबर - रुचिका](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/october-ruchika/) - देखो,कैसे आ गया अक्टूबर थोड़ी सी ठंडी हवा लेकर, थोड़ी सी सूरज की गर्मी चुराकर थोड़ी सी सूरज में नर्मी लाकर जैसे करने को आतुर है शीत का स्वागत देखो कैसे आ गया अक्टूबर। बारिश भी धीरे-धीरे विदा ले रही है, धान की बालियां खेतों में झूम रही हैं, बागों में भी हरियाली छाई है - [दीपों की गरिमा अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/amarnath-trivedi-2/) - दीपों की गरिमा दीप उम्मीद की किरण है , जो सपनों को जगाती । दिल मे प्रकाश भरकर , मन मे उजास लाती । कभी नफरत नही सिखाती , जहाँ तक प्रकाश जाए । मन मे उजास भरकर , घर खुशियों से सजाए । प्रकाश की मति ही ऐसी , वह कहीं छिपने तनिक न पाए । जीवन मे प्रकाश भरकर , हिया खुशियों से जगमगाए । दिवाली के दिन हम - [देव दया कर ...रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dev-daya-kar-ramkishor-pathak/) - वासुदेव छंद आश नया मन, सर्जन दो।देव दया कर, दर्शन दो।।भव भंजन तुम, कष्ट हरो।जीवन का दुख, नष्ट करो।।पाप हुआ अब, वर्जन दो।देव दया कर, दर्शन दो।।०१।।अविनाशी तुम, हम जानें।भक्तों के बल, सब मानें।।अब तो आकर, वर्णन दो।देव दया कर, दर्शन दो।।०२।।सत्य सनातन, समरस हो।रहते हर-पल, अंतस हो।।मैं मेरा तुम, मर्दन दो।देव दया कर, दर्शन - [जाति-वर्ण लोकतंत्र पर भारी - राम किशोर पाठक ](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jati-varn-loktantra-par-bhari-ram-kishor-pathak/) - है लोकतंत्र की महिमा न्यारी। चलती जिससे संविधान प्यारी।। सबने बदली अब दुनियादारी। लूट रहे धन कहकर सरकारी।। लेकर सारे धन-बल की आरी। कुर्सी पाने की है तैयारी।। जनता बनती रहती बेचारी। अक्ल सभी जब जाती है मारी।। नेता ढूँढें कोई उपहारी। चाहे देखे वह सुंदर नारी।। कुछ को लगी है नयी बीमारी। जाति-वर्ण लोकतंत्र - [गृह लक्ष्मी पत्नी - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/patni/) - गृह लक्ष्मी पत्नी - कुंडलिया लक्ष्मी है पत्नी सदा, सुखकारी लो जान।जिसको मैंने वर लिया, रखती सबका ध्यान।।रखती सबका ध्यान, वही लक्ष्मी है घर की।मेरा यह वरदान, नहीं पाऊँ अब कड़की।।उससे पैसे माँग, करूँ मैं सबको जख्मी।पीहर उसका आज, नहीं कह पाएँ लक्ष्मी।।०१।। पत्नी मनभावन रहे, जब-तक रहती मौन।ज्यों ही निज मुख खोलती, मैं हो - [सामा गीत -नीतू गीत](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-6/) - सामा गीत तर्ज -दुल्हिन धीरे-धीरे चलियौ ससुर गलिया--- सामा खेलूँ हे बहिना भैया के अंगना सामा कौने भैया जेता काशी बनारस कौने भैया जेता शहर पटना सामा बरका भैया जेता काशी बनारस छोटका भैया जेता शहर पटना सामा बरका भैया लौता रेशमी बनारसी छोटका भैया लौता सोना के कंगना सामा खेलूँ बड़की बहिन पहिरथु रेशमी - [निद्रा -बैकुंठ बिहारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baikunth-bihari-5/) - निद्रा कभी वास्तविक कभी काल्पनिक होती है यह निद्रा। कभी प्रसन्नता कभी निराशा देती है यह निद्रा। कभी साहस कभी भय देती है यह निद्रा। कभी सन्मार्ग कभी कुमार्ग दिखाती है यह निद्रा। कभी सहिष्णु कभी असहिष्णु बनाती है यह निद्रा। कभी विवेक कभी अविवेक देती है यह निद्रा। कभी दृढ़ संकल्पी कभी किंकर्तव्यविमूढ बनाती - [तुलसी विवाह -नीतू रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/nitu-rani-5/) - विषय -तुलसी विवाह विवाह गीत मंगल मय दिन आजु हे छीयैन तुलसी के विवाह, परल नग्र हकार हे मन कमल फुलाओल। मंगलमय---------2। द्वार पर आओल वर -बरियाती संग में वर के बाप हे , हुनका गरियाएब मंगलमय ------------2। वर केअ परिछेअ गेली तुलसी के अम्मा संग में सखियाँ हजार हे , देखी मन हर्षाओल मंगलमय - [निष्पक्ष चुनाव को -जैनेन्द्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-6/) - निष्पक्ष चुनाव को मनहरण घनाक्षरी छंद में कुशल हो चाहे मांँझी, चाहे नहीं चले आंँधी, छोटा सा भी एक छेद, डूबा देता नाव को। गोदामों में जमाखोरी, अथवा कालाबाजारी, हमेशा ही बढ़ा देता, अनाजों के भाव को। जाति धर्म ऊंच-नीच, लोभ जनता के बीच, पिछड़ापन दर्शाता, शिक्षा के अभाव को। प्रलोभन सौदेबाजी, राजनीति गुटबाजी, करता - [आओ उठकर - रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-21/) - आओ उठकर - बाल कविता (वासुदेव छंद) अम्मा हँसकर, बोल गयी। मन में मधुरस, घोल गयी।। उठ आओ अब, भोर हुआ। चिड़ियों का अब, शोर हुआ।। देखो आकर, नभ अपना। सपनों का घर, सब अपना।। दौड़ रहे सब, राहों में। आ जाओ अब, बाहों में।। अम्मा हर्षित, तांँक रही। मुन्ना को बस, झाँक रही।। कहती - [अधूरे प्रेम कहानी की किताब - चित्तेश्वर झा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/adhure-prem-khani-ki-kitab-chitteshwar-jha/) - अधूरे प्रेम कहानी की किताब : हम वो किताब हैं जिसके आखिरी पन्नों पर दिल दस्तक देती है और मांगती है हिसाब किताब के एक एक पन्नों का मेरे शब्द अधूरे रह गए इस इंतज़ार में, तुम लौट कर आओगी किसी दिन ये लिखा था, जज्बातों ही नही अकेलेपन में खोया था। मुझे हिसाब - [शुभकामना संदेश - जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shubhkamna-sandesh-jainendra-prasad/) - शुभकामना संदेश मध्य विद्यालय दरबे भदौर*प्रखंड पंडारक के प्रधानाध्यापक *भाई रामपाल सिंह अनजान जी का दिनांक ३१,१०,२०२५ को विद्यालय से सफल व निर्विघ्न सेवा समाप्ति के अवसर पर पेश है शुभकामना स्वरूप दिल का उद्गार:- दिल की दुआ हमेशा ही मस्त रहें, और सदा स्वस्थ रहें, दिल से दुआएं भाई, दे रहा हूँ साथ - [संस्मरण गीत   -  राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/sansmaran-git-ram-kishor-pathak/) - संस्मरण गीत - राम किशोर पाठक चंद पैसों में भली वह, जिंदगी जीते हुए। आ रही है याद हमको, आज दिन बीते हुए।। बैठ चौपालें लगाकर, बात होती थी तभी। आप आ जाते सभी थे, हाल लेने को सभी।। दर्द सारे भूलते थे, जख्म कुछ सीते हुए। आ रही है याद हमको, - [तुम मुझको नारी रहने दो... डॉ स्वराक्षी स्वरा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tum-mujhko-naari-rahne-do-swara-3/) - गीततुम मुझको नारी रहने दोअपनी अधिकारी रहने दो ।।सत्ता का लोभ नहीं मुझकोन दौलत की ही चाहत है पैरों के बंधन तोड़ मेरे निर्बन्धता में राहत है चालें तेरी बहुत हो चुकी,अब मेरी पारी रहने दो।।तुम मुझको नारी...नारी से ही नारायण है,नारी कर्तव्य परायण हैफिर भला क्यों नारी हृदय मेंसंताप का उठता गायन है अधरों - [चुनावी जुमले बाज़ी -  जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chunabi-jumle-baji-jainendra-prasad-ravi/) - चुनावी जुमले बाज़ी जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि' जंगल राज कह कर सबको डराते हैं, विकास-भ्रष्टाचार के, मूद्दे हुए गौण है। युवाओं का पलायन,रोके नहीं रूक रहा, मंहगाई के नाम पे, साध लेते मौन हैं। मुफ्त के अनाज पैसे, कब तक बांटेंगे ये, बेरोज़गारी से निजात, दिलाएगा कौन है। नेताओं की फ़ौज रोज, - [आमोद हारी मुरारी- सर्वगामी/ अग्र सवैया छंद - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aamod-hari-murari-sarvgami-agra-savaiya-chhand-ram-kishore-pathak/) - आमोद हारी मुरारी- सर्वगामी/ अग्र सवैया छंद - राम किशोर पाठक आमोद हारी मुरारी सुनो भक्त का, भक्त तेरा तुझे ही पुकारा। राधा बिहारी धरूँ ध्यान तेरी सदा, आज कोई नहीं है सहारा।। गोपाल तेरी कहानी पुरानी हुई, आप आओ यहाँ जो दुबारा। आओ बताओ दिलाओ भरोसा यहाँ, दर्श पाए पुनः लोक प्यारा।।०१।। - [शब्दों का संसार-राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shabdon-ka-sansar-ram-kishor-pathak/) - शब्दों का संसार (१६-१४) शब्दों का संसार अनोखा, होंठ चूमता है रहता। कुछ बसते हैं संग रगो में, कुछ को खंजर सा सहता।। प्रेम पाश में बँध जाते भी, जब यह आलिंगन करता। प्यारा लगता छूना इसका, नैनों में रस है भरता।। कोमल-कोमल कलियों सी यह, मनहर बन जब आती है। नैनों में फिर जाने - [राष्ट्रीय एकता दिवस - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rastriya-ekta-diwas-ram-kishore-pathak/) - राष्ट्रीय एकता दिवस दिवस राष्ट्रीय एकता वाला। लेकर समरसता का माला।। आओ इसकी कथा सुनाएँ। सरदार पटेल से मिलवाएँ।। जन्म दिवस उनका है आज। संघटित भारत करने का काज।। गुजरात में जन्म हुआ था। सबको दिल को जो छुआ था।। इकतीस अक्टूबर को जन्में थें। अंग्रेज भी जिनसे सहमे थें।। लौह-पुरुष का उपमा पाया। - [बारिश और पकौड़े : बाल कविता - अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/barish-our-pakoure-awadhesh-kumar/) - बारिश और पकौड़े : बाल कविता - अवधेश कुमार बाहर हो रही थी झमाझम बारिश, मन मे हो रही थी पकौड़े की ख्वाहिश। डर लग रहा था कैसे कहूँ माँ से, सामने से आयी दादी अपने कमरे से। दादी माँ! दादी माँ! मेरी एक बात सुनो, मौसम हो गया सुहाना नाश्ते में पकौड़ी चुनो। - [शब्द साधना...रामकिशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shsbad-sadhna-ramkishor-pathak/) - मरहठा माधवी छंद शब्द साधना अगर, सब्र साधना, स्वयं साधा करे।शिल्प देखिए सहज, और सीखिए, मौन बाधा हरे।।अर्थ जानिए सदा, हर्ष मानिए, गर्व आधा धरे।यत्न कीजिए सरल, आज कीजिए, ज्ञान राधा वरे।।०१।।शब्द का अर्थ ज्ञान, स्थान का ध्यान, धैर्य से देखिए।काव्य की कला सरल, शब्द से तरल, सौम्यता सीखिए।।ध्यान रख लिंग वचन, लक्ष्य भी सघन, - [मैहर वाली मैं हर दें गर- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maa-7/) - गीत सुख में जाए दिन-रात गुजर।मैहर वाली मैं हर दें गर।। सुंदर मनहर गीत लिखा है।माता से निज प्रीत लिखा है।।शब्दों का नवनीत लिखा है।भक्ति भावना रीत लिखा है।।आनंदित करता जो अंतर।मैहर वाली मैं हर दें गर।।०१।। अपना दुखड़ा रोया मैंने।बतलाया क्या खोया मैंने।।सपने कुछ संजोया मैंने।चित का भाव पिरोया मैंने।।रचना में आए तेज प्रखर।मैहर - [हर पल मर्यादा में रहना - राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maryada/) - हर-पल मर्यादा में रहना - गीत शब्दों की कर हेराफेरी, नित्य नया कुछ चाहूँ कहना।मन को अपने समझाता हूॅं, हर-पल मर्यादा में रहना।। अक्सर देखा है दुनिया में, अहम भाव को पलते मैंने।सृजनकार का तमगा लेकर, निज भाषा को छलते मैंने।।अपने शब्दों से बस चाहूँ, मिलकर सबके रग में बहना।मन को अपने समझाता हूॅं, हर-पल - [ज्योति-पर्व दीपावली- गीत](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ज्योति-पर्व-दीपावली-गीत/) - ज्योति-पर्व दीपावली- गीत हर्षित आज सभी नर-नारी, सुंदर सुखद तराना है। अगणित दीप जलाकर भू का, सारा तिमिर मिटाना है।। आज अमावस हार गया है, नहीं तिमिर टिकने वाला। फैला यह नभ तक उजियारा, आज नहीं थमने वाला।। गगन भेदती दीप-रश्मियाँ, नाश तिमिर का करती है। अँधियारा तो जैसे छुपकर, डर-डर आहें भरती है।। आया - [कब तक कोई अपना- राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ramkishor-pathak-20/) - कब-तक कोई अपना- गीत छोटे-छोटे शब्दों से मन टूटेगा। कब-तक कोई अपना हमसे रूठेगा।। अपनों में तो खिच-खिच होती रहती है। खट्टी-मीठी यादें बनती रहती है।। मन का हर गुब्बारा भी तो फूटेगा। कब-तक कोई अपना हमसे रूठेगा।।०१।। शब्द-शब्द के अर्थ बहुत गहरे होते। प्रेम भरे चित में भी कुछ पहरे होते।। शब्दों के कुछ - [नहीं विश्वाश होता है -रामपाल पाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/rampal-prasad-singh-12/) - गीत(विधाता छंद) नहीं विश्वास होता है सनातन धर्म अभ्यागत,धरा को लहलहाया है। नहीं विश्वास होता है,कि मानव ने बनाया है।। रहा पूरब सदा उज्ज्वल,सभी यह ग्रंथ कहते हैं। कुटुंबी भाव शुभ स्वागत,हृदय के साथ रहते हैं।। सनातन धर्म है ऐसा,जहाॅं हर सुख समाया है। नहीं विश्वास होता है,कि मानव ने बनाया है।। दिखी है सभ्यता - [दीप पर्व - मनहरण घनाक्षरी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/दीप-पर्व-मनहरण-घनाक्षरी/) - दीप पर्व - मनहरण घनाक्षरी दीप पर्व अनुपम, आया हरने को तम, रहे नहीं कोई गम, दीप को जलाइए। करें गणेश वंदन, लक्ष्मी पूजन-अर्चन, हर्षित हो तन-मन, नवगीत गाइए। शुभता की यह बेला, रहे न कोई अकेला, बनकर लक्ष्मी चेला, धन-धान्य पाइए । राग- द्वेष मिटाकर, भक्ति का बल पाकर, अंत: दीप जलाकर, दिवाली मनाइए। - [दीप पर्व - मनहरण घनाक्षरी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/दीप-पर्व-मनहरण-घनाक्षरी/) - दीप पर्व - मनहरण घनाक्षरी दीप पर्व अनुपम, आया हरने को तम, रहे नहीं कोई गम, दीप को जलाइए। करें गणेश वंदन, लक्ष्मी पूजन-अर्चन, हर्षित हो तन-मन, नवगीत गाइए। शुभता की यह बेला, रहे न कोई अकेला, बनकर लक्ष्मी चेला, धन-धान्य पाइए । राग- द्वेष मिटाकर, भक्ति का बल पाकर, अंत: दीप जलाकर, दिवाली मनाइए। - [मेरी पोषण वाली थाली - अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/meri-poshan-wali-thali/) - माँ ने सजाये थाली में अनोखे रंग , पोषण थाली अब करेगी कुपोषण से जंग । मोटे अनाज देंगे हमें बल, गेहूँ, चावल भरें संबल। दाल हमें दे प्रोटीन प्यारा, शक्ति का यह सच्चा सहारा। हरी पत्तियाँ विटामिन लाएँ, पालक, मेथी रक्त बढ़ाएँ। खीरा, टमाटर, गाजर प्यारे, विटामिनों के सागर सारे। फलों में रस, विटामिन - [हम शिक्षक हैं राष्ट्र निर्माता- मृत्युंजय कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/hum-shikshak-hain/) - हम शिक्षक हैं राष्ट्र निर्माता, बच्चों के हैं भाग्य विधाता। बच्चों को देते शिक्षा,संस्कार और अनुशासन का ज्ञान, हम शिक्षक बनाते उनका जीवन मूल्यवान। पढ़-लिखकर ये बच्चे बनेंगे महान, तभी होगा हम शिक्षकों का सपना साकार। हम शिक्षक हैं राष्ट्र निर्माता, बच्चों के हैं भाग्य विधाता। बच्चों को शिक्षित बनाएंगे, हम अपना कर्तव्य निभाएंगे। समाज - [बेटा का अधिकार - जैनेन्द्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/beta/) - बेटा का अधिकाररूप घनाक्षरी छंद में जनता है आती याद,हर पांँच वर्ष बाद,नेता की है आस टीकी, आपके इंसाफ पर। कहते हैं माई-बाप,मलिक हैं मेरे आप,कृपा कर एक वोट, दे दें इस छाप पर। आपकी कृपा से मिले-एक मौका और मुझे,हमारी तो जीत-हार, निर्भर है आप पर। हमें नालायक कहें-अथवा कुपुत्र सही,बेटा का तो अधिकार, - [कोशी के पार लौटती नाव- अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kosi/) - कोसी के पार लौटती नाव : नाविक की दर्द भरी दास्तान नाविक चल पड़ा धीरे-धीरे,हवा के संग, उम्मीदों की ओरगहरे जल की गोद में छुपे,वापसी की आस हर छोर। सालों चले हैं सफर में,पैरों तले दरारें गिनते,हौसले के घाव पहनकर,मुस्कान संभालते रहते। आत्माएँ रंग बुनती रहीं,आँखों ने देखे नए सपने,अपनों ने दी उड़ान हमें,जीवन मिले, - [दीपक- सत्येन्द्र गोविन्द](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/deepak/) - दीपक बनकर अँधियारों को हरने वाले शिक्षक हैं हर बच्चे का जीवन रौशन करने वाले शिक्षक हैं वरना तो वंचित रह जाते कितने बच्चे शिक्षा से बच्चों का दामन शिक्षा से भरने वाले शिक्षक हैं काम अगर हो बढ़िया तो फिर देते हैं शाबाशी भी हर ग़लती पर कान हमारे धरने वाले शिक्षक हैं अपने - [आओ मिलकर दीप जलाएं- आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aao-milakar-deeo-jalaye/) - आओ घर - घर दीप जलाएं जाति धर्म सब भूल कर, आओ जलाएं मिलकर एक दीप प्यार का, खुशियों की संसार का, सरल - समरस व्यवहार का, रोशनी के त्योहार का । प्रदेश की सीमा तोड़कर आओ जलाएं मिलकर एक दीप न्याय का, बुद्धि - विवेक के पर्याय का समुचित उपाय का, जो मदद करे - [गाय हमारी संस्कृति की धरोहर- अंजू कुमारी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/gay-hamari-sanskriti-ki/) - गाय हमारी संस्कृति की धरोहर, गाय हमारी पालनहार। देती दूध अमृत के जैसा, भर देती घर में प्यार अपार। गाय हमें देती है गोबर, गोबर से बनती खाद महान। खाद अगर पहुँच जाए खेतों में, तो बंजर भूमि भी हो कल्याण। गाय का गोमूत्र औषधि अमृत, रोग मिटाए, तन हो निर्मल। सेवा उसकी पुण्य का - [लड्डू- रीतु प्रज्ञा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/laddu/) - गोल-गोल लड्डू, खूब खाता गुड्डू । खाता चार-चार, खाता बार-बार, फिर भी ललचाए, छुप कर वो खाए। गोल-गोल लड्डू, खूब खाता गुड्डू। आठ-आठ खाया, दर्द उसे रूलाया। पास मांँ के गया, हाल वो बताया। गोल-गोल लड्डू, खूब खाता गुड्डू। पेट मांँ सहलायी, वैद्य पास लायी। डाक्टर चकराया, कैसे ये खाया? गोल-गोल लड्डू खूब खाता गुड्डू - [देवता साक्षात् नभ से...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dewata-saksahat-ramkishor-pathak/) - गीत (गीतिका छंद)कष्ट हरना है जगत का, आज यह समझा गए।देवता साक्षात नभ से, पूछने हैं आ गए।।पर्व पावन है सदा ही, प्रेम महिमा कह रही।भाव की सरिता जहाँ पर, भाव में ही बह रही।।शुद्धता का मान इसमें, सीख यह उपजा गए।देवता साक्षात नभ से, पूछने हैं आ गए।।०१।।चार दिन व्रत में रहें तो, दोष - [विनय गीत...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vinay-geet-ramkishor-pathak/) - आइए अब तो हमारे, साथ में कुछ बोलिए।आप कर दो चार बातें, प्रेम रस को घोलिए।।और नेकी है भला सा, आप जो पथ दे रहे।शब्द गाथा का अकिंचन, भार भी है ले रहे।।मानिए कहना हमारा, आप मेरे हो लिए।आप कर दो चार बातें, प्रेम रस को घोलिए।।०१।।कह रहा हूं सत्य शायद, आपका दिल साफ है।नेह - [सजा है घाट- गीतिका...राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/saji-hai-ghat-ramkishor-pathak/) - सजा है घाट उपवन सा, जहाँ आए लिए डाला।भरी फल से सभी डाला, हुआ मोहक नदी नाला।।सभी हैं हाथ को जोड़े, नहीं छोटा बड़ा कोई।सदा पावन लगे भावन, लिए सारे व्रती माला।।रहा निर्जल किया व्रत जो, किया पूजन सभी फल से।रखा है मान भी सबका, पढ़ाया पाठ बन शाला।।दिवाकर को नमन करते, मनाते हैं छठी - [ताका ..राम किशोर पाठक](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/taka-ramkishor-pathak/) - ताका ५-७-५, ७-७१.सौम्य प्रसंग धरे नव उमंग रचना संग।साधना अंग-अंग शब्द दृष्टि विहंग।।२.सपने आते कुछ कह भी जाते क्या हम पाते।जो कदम बढ़ाते सब-कुछ है पाते ।।३.एक सपनामिलकर रहना मेरा अपना।कुछ मत कहना चुप रह सहना।।४.धर्म का मानसबको हो सम्मान सुखी जहाँन। सर्वत्र भगवान समता का विधान।।५.हो अध्यापकसमाज सुधारक ज्ञान वाहक।बनकर पाठककर्म से कथानक।।रचयिता:- राम - [वापस कर दो सुखी बनाकर...RPS अनजान](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/wapis-kar-do-sukhi-bnakar-rps-anjan/) - अरिल्ल छंद चार चरण में 16 16 मात्रा पदांत 211/122वापस कर दो सुखी बनाकर।@@@@@@@@@@बादल छाए नभ के ऊपर।सोनू मोनू भाग चलो घर।।मौसम कितना है मनभावन। फिर से लौट गया है सावन।।आई है छठ पूजा पावन।डॅंसंती नभ से बादल नागन।।पता नहीं होगा अस्ताचल।देखूॅंगा कैसे उदयाचल।।नजरें सबकी अटकी नभपर।भाग्य विधाता दाता दिनकर।।भाव लिए जो आए निश्छल।वरदहस्त रख - [बस थोड़ी देर पहले...अवनीश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/bas-thodi-der-pahle-awnish-kumar/) - बस थोड़ी ही देर पहले तो...बस थोड़ी ही देर पहले तो —एक रंगीन तितलीफूलों की क्यारी में नाच रही थी,मैं तितली.... मै तितली ....गा रही थी सूरज की किरणों से लिपट रही थी ।हवा की सरसराहट में...पत्तियों की खड़खड़ाहट में....अपने पंखों की छाया से खेल रही थी।जीवन की मासूम प्रतीकता का पर्याय लग रही थी - [मौन संगीत.. डॉ अजय कुमार "मीत"](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/maun-sangit-ajay-kumar-mit/) - मौन पड़ी मन वीणा को भावों ने झंकृत कर डालाजग उठे मौन से संगीत। कोरे कागज पर लेखनी दौड़ीआड़े-तिरछे अक्षर उभरेनिकल पड़े भावों से गीत। हृदय जाग भावों को छूआमिल गए परस्पर दोनोंछाया गुंजन से फिर प्रीतफिर, खोती गई हर चीजगूंज-अनुगूंज में खो गईबज(बच)रहा सिर्फ मौन संगीत। डॉ०अजय कुमार "मीत" - [किसानों की बेचैनी..जनेंद्र प्रसाद रवि](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kisano-ki-baichani-janendar-prasad-ravi/) - कार्तिक है बीत रही,रबी अभी लगी नहीं,आसमां में काले घन, दिखा रहे नैन हैं।खेतों में तैयार धान, आती नहीं खलिहान,तब तक हलधर, रहते बेचैन हैं।डर है बादल कहीं- पानी नहीं बरसा दे,सोच-सोच कर नींद, आती नहीं रैन है।खेती के सहारे ही तो- जीवन यापन होता,फसल-अनाज बिना, मिलता न चैन है?जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि' - [आह्वान...विजय शंकर ठाकुर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vijay-shankar-thakur/) - सवेरे उठकर जल्दी जाओ,लोकतंत्र का पर्व मनाओ। भैया भौजी, चाचा आओ, दादा दादी को भी लाओ।मतदाता पर्ची को लेकर,कतार में सभी खड़े हो जाओ। वोट प्रतिशत को तो बढ़ाओ, संशय के बादल को मिटाओ।चुनकर के अपनी सरकार,लोकतंत्र करना है साकार। लोकतंत्र से न हो इनकार, संविधान से हमें है प्यार।विजय शंकर ठाकुर विशिष्ट शिक्षक म - [प्रभाती पुष्प -जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/jainendra-prasad-5/) - प्रभाती पुष्प सूर्य देव से प्रार्थना मनहरण घनाक्षरी छंद नर-नारी संत-यति, उपवास रख ब्रती,! धन बल पुत्र हेतु, करते उपासना। छठ माता करें दया, मांँगते निरोगी काया, जल बीच खड़े रह, करते आराधना। भरा रहे घर-द्वार, खुश रहे परिवार, सुख-रोजगार खातिर करते प्रार्थना। दिल में न छल रहे, छवि उज्जवल रहे, भावना निर्मल रहे, करते - [गर्व से हिंदू कहे तो..रामपाल प्रसाद सिंह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/garv-se-hindu-kahe-to-ram-p-singh/) - सुमेरु छंद (10,9)1222 12, 22 122 गर्व से हिंदू कहे तो। घटा घनघोर नभ,छाई कहाॅं से।गई थी लौट कर,आई कहाॅं से।।हजारों रश्मियाॅं, लाचार अब हैं।लगा सूरज जरा,बीमार अब हैं।।मगर तय राह पर,चलती गई माॅं।सनातन सत्य में,फलती गई माॅं।।सुखी संसार हो, कहती चली है।तपस्या क्लिष्ट को,लेकर पली है।।सहज वह वन गमन,स्वीकार करती।हृदय में देवता,साकार करती।चले हम - [बाल कविता आओ मिलकर छठ करें..अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/aao-milakr-chhath-kren-awdhesh-kumar/) - अस्ताचल सूरज को, हम सब ही प्रणाम करें,उगते सूरज और छठ माता की पूजा, सच्चे मन से करें।संध्या अर्घ्य की रौशनी, जीवन में लाएँ,मन की सारी इच्छा, छठ में पूरी हो जाएँ।उषा अर्घ्य से मिल जाए समृद्धि अपार,बुरी शक्तियाँ भागें, हो जीवन गुलजार।मिलकर छठ करें, प्रेम और सोहार्द मन में रखें,लोक आस्था से हम सब, - [चुनावी जुमला..जनेंद्र प्रसाद 'रवि'](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/chunavi-jumla-janendr-prasad-ravi/) - वादे करते हैं सभी, पूरा करते न कभी,जुमला साबित होता, आया हर बार है।धर्म का सहारा ले के,जाति की दुहाई दे के,सामने से हाथ जोड़े, आता उम्मीदवार है।नौकरी उधार दूंँगा, शिक्षा रोजगार दूंगा,कहते हैं हमारी बना दें सरकार है।मतदान की ताकत,समझते नहीं हैं लोग,स्वेच्छा से मतदान का, मिला अधिकार है।जैनेन्द्र प्रसाद 'रवि'म.वि. बख्तियारपुर, पटना - [आओ छठ पर्व मनाएं शैलेन्द्र कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/shailendra-kumar/) - आओ छठ पर्व मनाएं एकता, भाईचारा, सौहार्द फैलाएं आओ छठ पर्व मनाएं।। नहाए खाए, सहना, खड़ना रस्म निभाएं आओ छठ पर्व मनाएं।। त्याग, संयम, सात्विकता अपनाएं आओ छठ पर्व मनाएं। सुबह ठेकुआ का प्रसाद बनाएं सूरज देव को अर्घ्य चढ़ाएं आओ छठ पर्व मनाएं। शाम को कोसी, फल, दौरा सजाएं आओ छठ पर्व मनाएं। छठी - [छठ मैया की महिमा निराली आशीष अम्बर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/ashish-amber-2/) - छ्ठ मैया की महिमा निराली खड़ें है हर घाटों में , हैं सूप हाथों में लेकर । लगा रहे हैं जयकारे , जय हो छ्ठ मैया तुम्हारी । देउरा भरे ठेकुआ से, सेब नारंगी केला से । मन्नत पूरी करती सब, जय हो छठ मैया तुम्हारी । नारियल , सिंघाड़ा और गन्ना, तुमको अर्पण करते - [छठ की गरिमा -अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/amarnath-trivedi-4/) - 2 छठ पर्व की गरिमा वंश परम्परा चलती रहे , सुख से जियें लोग सभी । कामना करते छठ व्रती यही , बन जाए सबकी बात सभी । जन जन मे ऐसी ज्योति जली है , जो भावों को निर्मल सदा बनाता है । कार्तिक मास का यह पावन पर्व , दिल मे ढेरों सुकून ले आता है । बच्चे , बूढ़े सभी तत्पर दिखते , सब मे भाव प्रवणता लाता । - [छठ की महिमा -अमरनाथ त्रिवेदी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/amarnath-trivedi-3/) - 1 छठ की महिमा तन ,मन, धन , श्रद्धा ,भक्ति , एक साथ हो जिस पर्व मे । भक्ति का यह अनुपम पर्व , दिखता हो जब भारतवर्ष मे । ख्याल शुद्धता का जिसमे , सबसे अधिक रखा जाता । यही छठ पर्व वर्ष बाद आकर , जीवन मे अतुलित आनंद लाता। जीवन मे शुद्धता की ऐसी - [मर्द -दीपक कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/dipak-kumar/) - मर्द - क्या मर्द को दर्द नहीं होता ? होता जरूर है । पर वह बयां नहीं करता। जिम्मेदारियां! चुप करा देती है उसे , पूर्ण विराम की तरह। घर की जरूरतें, बीवी - बच्चों की ख्वाहिशें ! गुम हो जाते हैं उसके अपने शौक, उन्हें पूरा करने में। ऑफिस की थकान, बॉस की झल्लाहट। - [विवशता में सिसकते हैं -एस के पूनम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/vyangya/) - विधा:-विधाता छंद।व्यंग।(विवशता में सिसकते हैं ) चुनावों के समय पर ही,प्रजा की याद आती है। करे वादें सभाओं में,प्रजा सुनकर लुभाती है। बिछाया जाल शब्दों का,ललक जो खींच लाती है। प्रगति की बात करते हैं,प्रजा को यूँ झुकाती है।(2)भिखारी बन कहे नेता,मुझे ही वोट तुम देना। जगी है आस तुम से ही,खुशी का अंश तुम - [मतदान है लोकतंत्र की जान - अवधेश कुमार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/election/) - जनता की ताकत, जनता की शान,मतदान है लोकतंत्र की जान। हाथों में है शक्ति अपार,एक वोट बदल दे देश का जनाधार । लोकतंत्र का मंदिर यही,जहाँ होती जनता की जवाबदेही सही । कभी न छोड़ो मतदान का कर्म,यही है नागरिकता का धर्म। सच की राह, विवेक से चुनो,कभी न डगमगाओ और आगे बढ़ो। जो जागे ## Pages - [बालपन की कविता- एक राष्ट्रीय पहल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/baalpan-ki-kavita/) - ( स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय के तत्वावधान में) स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण पहल “बालपन की कविता” के अंतर्गत बुनियादी स्तर (Foundational Stage) के बच्चों के लिए भारतीय भाषाओं में लोरियाँ, बाल गीत, खेल गीत एवं बाल कविताएँ आमंत्रित की जा रही हैं। इस पहल का उद्देश्य शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार एवं NCERT के तत्वावधान में “बालपन की कविता” पहल के अंतर्गत बिहार की लोकभाषाओं में लोरियाँ, बाल गीत एवं बाल कविताएँ आमंत्रित। अपनी स्वरचित या पारंपरिक रचनाएँ 8 से 12 अप्रैल 2026 तक पद्यपंकज वेबसाइ - [युग का प्रभाव -जैनेंद्र प्रसाद](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/yug-ka-prabhav-jainendra-prasad/) - युग का प्रभाव रूप घनाक्षरी छंद गुरुजनों की भी नहीं, छूते हैं चरण कभी, कहीं दूर जाने वक्त, कहते हैं गुड-वाय। बड़ों को प्रणाम हेतु जोड़ते हैं हाथ नहीं, एक दूसरे को लोग, करते हैं हेलो-हाय। माता-पिता की भी लोग करते हैं सेवा नहीं, कुत्ता-बिल्ली घर पर, पालते हैं छोड़ गाय। इसी को तो कहते - [विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस 2025 कविता लेखन प्रतियोगिता परिणाम](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/world-menstrual-hygiene-day-2025-poem-writing-competition-result/) - विषय: विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस 2025 के अवसर पर रचनात्मक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन आयोजक: टीचर्स ऑफ़ बिहार एवं यूनिसेफ आयोजन की तिथि: 28-31 मई 2025 परिचय: टीचर्स ऑफ़ बिहार एवं यूनिसेफ द्वारा “विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस” के उपलक्ष्य में एक राष्ट्र स्तरीय “रचनात्मक लेखन प्रतियोगिता” का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता का उद्देश्य माहवारी - [विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस 2025 कविता लेखन प्रतियोगिता](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/mhm-poem-competition/) - विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस 2025 के कविता लेखन प्रतियोगिता में भाग लेने हेतु आए सभी प्रतिभागियों का स्वागत है। निम्नलिखित खाली स्थानों में वांछित विवरण भरें और अच्छी से अच्छी रचना प्रेषित कर प्रतियोगिता में अव्वल स्थान प्राप्त करें। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है। नोट- रचना स्वरचित (अधिकतम 100 शब्द)ही होनी चाहिए। किसी दूसरे रचनाकारों - [काव्य-संग्रह - FlipBook](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kaavy-sangrah-flip/) - [काव्य-संग्रह](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/kaavy-sangrah/) - [Thank You!](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/thank-you/) - धन्यवाद! आपकी पोस्ट सफलतापूर्वक जमा हो गई है। सत्यापन प्रक्रिया के बाद इसे जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा। कृपया नियमित रूप से वेबसाइट पर जाकर अपडेट्स चेक करते रहें। अधिक अपडेट्स के लिए, आप यहाँ क्लिक कर के WhatsApp Group में शामिल हो सकते हैं। - [स्वरचित कविता का प्रकाशन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/svarachit-kavita-ka-prakaashan/) - स्वरचित कविता का प्रकाशन अपनी कविताओं को प्रकाशित करने का तरीका निम्न है ➡️ अपना नाम, अपना ईमेल, कविता का टाइटल, पोस्ट टैग लगाएं। ➡️ अपने विद्यालय या संस्थान का नाम लिखें ➡️ कैटेगरी का चुनाव करें ➡️ अपनी कविता को कॉपी पेस्ट करें। ➡️ अपना फोटो लगाएं, टर्म कंडीशन एक्सेप्ट करें और सबमिट कर - [विश्व स्तनपान सप्ताह दिनांक 1 अगस्त से 7](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/world-breastfeeding-week-1st-august-to-7th-august/) - विश्व स्तनपान सप्ताह दिनांक 1 अगस्त से 7 2021 के कविता लेखन में भाग लेने हेतु आए सभी प्रतिभागियों का स्वागत है। निम्नलिखित खाली स्थानों में वांछित विवरण भरें और अच्छी से अच्छी रचना प्रेषित करें। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है। नोट- रचना स्वरचित (अधिकतम 200 शब्द)ही होनी चाहिए। किसी दूसरे रचनाकारों की रचना किसी - [Team](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/team/) - Become a Team Member - [योग दिवस पर योग से संबंधित स्वरचित कविता का प्रकाशन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/publication-of-poetry-related-to-yoga-on-yoga-day/) - इस 21 जून को विश्व योग दिवस पर आईए जुड़िए "टीचर्स ऑफ बिहार" के साथ और कीजिये इस योग दिवस पर कुछ खास। इसमें किसी उम्र के कोई भी व्यक्ति भाग लें सकते हैं। अपना नाम, संस्था का नाम, मोबाइल नंबर पोस्ट के अंत में जरुर डाले और हैशटैग #IamYogdoot #मैंहूँयोगदूत लगाना ना भूलें। - [Top 10 Padya](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/top-10-padya/) - Note*: टॉप 10 कविताओं का चयन वेबसाइट द्वारा किया जाता है। वेबसाइट पर यह सुविधा 15 जुलाई 2020 को डाला गया था अतः 15 तारीख के बाद की व्यू और कमेंट टॉप टेन में दिख रही हैं | - [About](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/about/) - Welcome to the newly launched portal of poetry section of Teachers of Bihar - "Padhya Pankaj". It is a portal associated with poems where teachers can play with their creativity and artistry of words and imagination combined with emotions and rhythm to form poems. "Padhya Pankaj" is a platform for teachers designed in a way - [Contact](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/contact/) - Teachers of Bihar पद्य पंकज team Happy for you're suggestion. [wpforms id="31" title="false" description="false"] ## Categories - [Uncategorized](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/uncategorized/) - [padyapankaj](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/padyapankaj/) - Through Padyapankaj, Teachers Of Bihar give you the chance to read and understand the poems and padya of Hindi literature. In addition, you can appreciate different tastes of poetry, including veer, Prem, Raudra, Karuna, etc. - [sandeshparak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/sandeshparak/) - Sandeshparak poems are poems that are used to convey a message with feelings. Through poems, statements related to the country, the world, and society are transmitted to the people. Teachers of Bihar give an important message through the Sandeshparak of Padyapankaj. - [Watsalya](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/watsalya/) - [Prem](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/prem/) - Love has no definition, and it is a feeling that comes within the heart. The meaning of love can be different for different people, different age groups, and different relationships, but the surface is the same for everyone. Love comes from knowledge, and for this, one needs to understand oneself. - [Veer](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/veer/) - [Karun](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/karun/) - [Raudra](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/raudra/) - [Bhakti](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/bhakti/) - For the attainment of God in the world, for the welfare of the person, one has to do spiritual practice for salvation. For this, Bhakti is the best. Therefore, devotion to God and having prayer and meditation is called Bhakti. - [Khushi](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/khushi/) - [Manorajak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/manorajak/) - [Manoranjak](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/manoranjak/) - [Parichay](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/parichay/) - [Wedna](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/wedna/) - [Shakshanik](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/shakshanik/) - [Kamna](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/kamna/) - [Jiwan parichay](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/jiwan-parichay/) - [Shaikshnik](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/shaikshnik/) - [Aasha Ichchha](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/aasha-ichchha/) - [Utsah](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/utsah/) - [Aashcharya](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/aashcharya/) - [Sahas](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/sahas/) - 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[Hall of Fame March 2026](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/hall-of-fame/hall-of-fame-march-2026/) - [बालपन की कविताओं का संकलन](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/baalpan-ki-kavitaon-ka-sankalan/) - बिहार अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के लिए जाना जाता है। यहाँ की लोकभाषाएँ— भोजपुरी, वज्जिका, मगही, मैथिली, अंगिका, बज्जिका, कुरमाली, खोरठा, पंचपरगनिया आदि—न केवल हमारी पहचान हैं, बल्कि हमारी परंपराओं, भावनाओं और जीवन शैली की जीवंत अभिव्यक्ति भी हैं। इन्हीं लोकभाषाओं को संरक्षित और समृद्ध करने के उद्देश्य से NCERT द्वारा बाल साहित्य (विशेषकर बाल कविताओं) के संकलन की एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है, जिसमें Teachers of Bihar सक्रिय भूमिका निभा रहा है। - [प्रकृति प्रहरी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/प्रकृति-प्रहरी/) - [Hall of Fame April 2026](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/hall-of-fame/hall-of-fame-april-2026/) - [Hall of Fame May 2026](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/hall-of-fame/hall-of-fame-may-2026/) - [Hall of Fame June 2026](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/hall-of-fame/hall-of-fame-june-2026/) - [Hall of Fame July 2026](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/category/hall-of-fame/hall-of-fame-july-2026/) ## Tags - [Kawitawali](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/kawitawali/) - [kawitawalitob](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/kawitawalitob/) - [Tobkawitawali](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/tobkawitawali/) - [टीचर्स ऑफ बिहार](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/टीचर्स-ऑफ-बिहार/) - [शिक्षा](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/शिक्षा/) - [शशिधर](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/शशिधर/) - [अनाज](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/अनाज/) - [अमृत](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/अमृत/) - [शशिधर उज्ज्वल](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/शशिधर-उज्ज्वल/) - [तितली रानी](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/तितली-रानी/) - [ख़ुशबू](https://padyapankaj.teachersofbihar.org/tag/ख़ुशबू/) - 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