विश्वनाथ मम नाथ मुरारी।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।।
कौशल्या नंदन बन रघुकुल आये,
नीर निधि के बीच द्वारिका बसाये,
कोई कहे रघुवर कोई गिरधारी।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।।
इन्द्र को व्यापा जब तेरी माया,
वृंदावन को था पल में डुबाया,
गोपों को बचाया बन गिरधारी।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।।
करन चहत प्रभु पद कर सेवा,
और न कछु मन इच्छा मम देवा,
जीवन बीते मेरी शरण तिहारी।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।।
अपनायनी निज भक्ति दै दीजै,
अपराध क्षमा कर शरण लै लीजै,
स्वीकार करो यह अरज हमारी।
त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी।।
जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
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