भक्त प्रह्लाद की रक्षा में होलिका का हुआ दहन,
पर्व होली का तब से ही जाना जाता है आरंभन,
लोग खेलते हैं जमकर मिट्टी, रंग, गुलाल, अबीर,
मन-आत्मा हो जाता प्रसन्न, रंगों से भींगता शरीर,
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हम यह पर्व मनाते हैं,
पहले दिन धूरखेल, दूसरे दिन रंग-गुलाल उड़ाते हैं,
धूरखेल के दिन हर छोटे-बड़े को मिलता है समान स्थान,
होली में रंग-अबीर से ही मस्ती, हर छोटे बड़ों का करते सम्मान,
बड़े छोटों को आशीष देते, देव, पितर् का होता अबीर से सम्मान,
जे जीबे से खेले फाग यह लोकोक्ति हर्ष, आनंद का परिचायक है,
होली में खूब मस्ती, भजन-संगीत, कहीं श्रोतागण तो कहीं गायक है,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही भारतीय नववर्ष मनाया जाता है,
प्रकृति भी गीत गाती, सर्वत्र हर्ष-उल्लास मनाया जाता है।
….गिरीन्द्र मोहन झा
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