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प्रभाती पुष्प -जैनेंद्र प्रसाद

Jainendra

Jainendra prasadRavi

प्रभाती पुष्प

विविध त्योहार
मनहरण घनाक्षरी छंद


मानते हैं लोग साथ, लोहड़ी पोंगल बिहू,
मकर संक्रांति जैसे, विविध त्योहार हैं।

प्रयाग में कल्पवास, पातक का करे नाश,
जाने से बदल जाता, आचार विचार है।

तीर्थ में गंगासागर, आस्था का भरे गागर,
जीवन में कभी लोग, जाते एक बार हैं।

स्नेह पुष्प खिलाकर, राग द्वेष भूलाकर ,
सीखाता त्योहार हमें, प्रेम व्यवहार है।

जैनेन्द्र प्रसाद रवि

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