वंदनवार सजे शारदा
जोगीरा सा र रररररररर
कुंडलिया
होली
मन-ऑंगन को रंग दो,भर दो दिल में प्यार।
हरे-भरे संसार में,स्वर्ग लगे निस्सार।।
स्वर्ग लगे निस्सार,धूम होली जो आई।
दौड़ रहे नर-नार,स्वयं पहचान मिटाई।।
कहते हैं”अनजान”,स्वर्ग में है वृंदावन?।
लूटो सुख का सार,सृष्टि सुखदा मन-ऑंगन।।**
पावन होली पर्व से,जीवन का है अर्थ।
राग-द्वेष-तम मिट गया,हर पूजा है व्यर्थ।।
हर पूजा है व्यर्थ,जमाना चढ़कर बोला।
करता जा कर्त्तव्य,बढ़ाकर अपना चोला।।
महल-झोपड़ी हाथ,साथ में मिलते दामन।
कहते हैं “अनजान”,तभी होली है पावन।।*
होली सच्ची आ गयी,वर्ग-भेद से रिक्त।
आज खुला आकाश है,लाल-लालिमा सिक्त।।
लाल-लालिमा सिक्त,रंग सब हैं आभारी।
करते राजा-रंक, सभी मिलकर तैयारी।।
सुर-नर-मुनि-गंधर्व,बनाते अपनी टोली।
तब कहते “अनजान”,श्रेष्ठ है मेरी होली।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’ मध्य विद्यालय दर्वेभदौर अवकाश प्राप्त शिक्षक

