“अब तो दीवारें बोलतीं हैं ”
गायब हो गई गाँव की वो पगडंडियाँ, जो सीधे स्कूल को जाती।
वासंती बयार एक नई ऊर्जा लिए हमें कर्तव्य पथ पर अग्रसर करती।
तरु झूमकर हमारा अभिवादन करते।
मन मोर-सा- नर्तन करने को कहता।
सरसों के खेत में लगी अलसी चार चाँद लगाती।
प्रकृति की वो सुन्दरता अब देखते नहीं बनती।
अब तो दीवारें बोलतीं हैं।
फाल्गुन की वो उमंग,
जब अनंग मधु लेकर आता।
जेठ-बैशाख में दिन आम्र वृक्ष के नीचे गुजर जाता।
सजीला सावन हरियाली लिए मंद-मंद मुस्काता।
इंसान तो नहीं,रास्ता पानी पानी हो जाता।
प्रकृति की वो सुन्दरता अब देखते नहीं बनती।
अब तो दीवारें बोलतीं हैं।
पाहुन जब गाँव में शहर से आते,
पड़ोसियों का भी मन उमंग से भर उठता।
कभी चाची मीठी खीर दे जाती,
कभी पड़ोसी रामू मेहमानों का दिल बहलाता।
आगे-आगे नाचती किशोरी जामाता के आने की सूचना देती।
सुख -दुख बाँटने को भी कोई तैयार हो जाता।
इंसान तो क्या, पड़ोसी भी अब बात नहीं करते ।
अब तो दीवारें बोलतीं हैं।
नीरज कुमार झा
विद्यालय अध्यापक (11-12)
उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय भवानीपुर, नारायणपुर, भागलपुर
नीरज कुमार झा


