आदमी से कहीं ज्यादा
पशु होता वफादार,
मानव को त्याग हम, पालते हैं स्वान को।
माता-पिता से भी ज्यादा
करते हैं देखभाल,
है घट गई कीमत, जहां में इंसान को।
जमाना बदल रहा
लोग भी बदल रहे,
कैक्टस को रोप काटे-फूलों के बागान को।
जिनसे है पहचान
उनसे हैं अनजान,
“,रवि’ कोई नहीं चाहे,ऐसे में संतान को।
( 2)
हथेली पे जान रख
सीमा निगरानी करे,
उचित सम्मान नहीं, मिलता जवान को।
हजारों शूरवीरों ने
जान की आहुति दिया,
देश आज भूल गया, त्याग- बलिदान को।
कथनी और करनी में
जिनकी अंतर होती,
रोज होता जय कारा लोभी- धनवान को।
कुछ बहुरुपिए जो
घूमे संत भेष धर,
आरती उतारें लोग, छोड़ भगवान को।
जैनेन्द्र प्रसाद रवि’
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