यह केवल एक तारीख नहीं,
यह आत्मा का मौन है।
आज भारत सिर झुकाकर कहता है—
बापू, आप अमर हैं,
कौन है जो आपको मौन कर सके?
न तलवार की धार से इतिहास बदला,
न सिंहासन की चाह ने मार्ग चुना।
नंगे पाँव चले सत्य की राह,
और साम्राज्य काँप उठा, थर्रा उठा।
एक लाठी थी, एक चरखा था,
और था विश्वास —
प्रेम से बड़ा कोई अस्त्र नहीं,
और सत्य से ऊँचा कोई
शिखर नहीं।
जब अंतिम क्षण में गिरी काया,
तो लगा—जैसे भारत रुक गया।
पर उसी पल हर दिल में,
एक गांधी और उग गया।
आज भी जब अन्याय सिर उठाता है,
जब नफरत ज़हर बन फैलती है,
तब-तब आपकी तस्वीर नहीं,
आपके विचार हमें थाम लेते हैं।
बापू, तुम अतीत नहीं हो,
तुम हर सवाल का जवाब हो।
जब तक इंसानियत ज़िंदा है,
तब तक गांधी अमर है।
आज पुण्यतिथि पर फूल नहीं,
हम वचन अर्पित करते हैं—
सत्य बोलेंगे, अन्याय से लड़ेंगे,
और गांधी विचारधारा जिंदा रखेंगे।
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विवेक कुमार


