Category: Karun

एक वृक्ष की करुण व्यथा-प्रीतिएक वृक्ष की करुण व्यथा-प्रीति

एक वृक्ष की करुण व्यथा छोटा सा मैं नन्हा पौधा, सड़क किनारे पनप रहा था। आते जाते मुसाफिरों को देख देख घबड़ा जाता था कुचल न दे कोई मुझको सोच सोच मुरझा जाता था। बारिश के आते ही फिर से हर्षित हो मुसका लेता था। शनैः शनैः दिन बीत रहे थे मैं भी हर पल […][...]

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भूकंप-लवली कुमारीभूकंप-लवली कुमारी

भूकंप तेज आंधी और सुनामी हुद हुद जैसे तूफान  भूकंप आई है लेकर  अपने साथ कितने सामान। जहां बिखर कर रह गए हैं सबके अरमान  कैसा तू लाया है  अपने साथ यह मेहमान। तिनका तिनका जोड़कर जो आशियाना बनाया  एक कहर जैसा पहरेदार  जो ऐसा आया। पलभर में ही शोर मचाकर  जो खामोश हो गया  […][...]

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जाते हुए ऐ लम्हें-सुरेश कुमार गौरवजाते हुए ऐ लम्हें-सुरेश कुमार गौरव

जाते हुए ऐ लम्हें विदा हो रहे ऐ वक्त फिर लौटकर, यह दिन मत दिखलाना ! कोरोना काल के इस भया भय इतिहास को मत दुहराना !! 🕰️ कितने हो गए काल कवलित, छोड़ गए वह अपना घराना ! लाव-लश्कर सब रह गए, अब तो रहने दो इनका ठिकाना !! ⏱️ जाते वक्त भी न दे […][...]

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वीरहन के बसंत-आर. पी. ‘राज’वीरहन के बसंत-आर. पी. ‘राज’

वीरहन के बसंत गलवान घाटी के वीरहन के आँसु में, वसंती बहार बह़ गईल। कइसे हो स्वागत बसंत के हीयरा के सगरी अरमान ऑंसुअन मे द़ह गईल। छुट्ल न महा़वर के रंग, सेनुर सुहाग के दह़ गईल। हीयारा के सगरी अरमान, ‘भारती’ पर कुरबान भईल शहीद वीरहन के आँसु में, वसंती बहार बह़ गईल। देख […][...]

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शरद पवन-मनोज कुमार दुबेशरद पवन-मनोज कुमार दुबे

शरद पवन यह शरद पवन मतवाली है चहूं ओर कुहासा धुंध लिए दिखता नही सूरज किरण लिए अग्नि के लपटों से सटकर जीवन की साथ बस खाली है यह शरद पवन मतवाली है।  सरसों पीले सब खेत हरे जब हवा चले झूमे लहरे इस मधुर धूप में हिल-मिलकर धरती की छँटा निराली है यह शरद […][...]

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विद्यालय में-विजय सिंह नीलकण्ठविद्यालय में-विजय सिंह नीलकण्ठ

विद्यालय में बिन बच्चों के मन नहीं लगता गुरुजी को विद्यालय में खाली बैठकर समय बिताना पड़ता है विद्यालय में। कोरोना ने बंद कर दिया बच्चों का स्कूल आना बैठ बैठकर समय बिताने पड़ता है स्कूल जाना। सुनसान पड़ा है शिक्षालय चहल पहल न दिखती है सभी विवश हैं बीमारी से प्रकृति ने जो लिख […][...]

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क्यों रोती है बेटियाँ-भोला प्रसाद शर्माक्यों रोती है बेटियाँ-भोला प्रसाद शर्मा

क्यों रोती है बेटियाँ जन्म लेकर क्या गुनाह किया पापा की बेटियाँ, दो आँगना की फुलवारी है फिर भी क्यों रोती है बेटियाँ। दो कुल को रौशन किया पापा की बेटियाँ कहीं ममता की कली तो कहीं सुन्दर सी परी है  है बेटियाँ। जब वह लक्ष्मी का रूप लेकर धन बरसाया बेटियाँ, बन कोकिला, चेनम्मा, […][...]

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अन्तर्व्यथा-जैनेन्द्र प्रसाद रविअन्तर्व्यथा-जैनेन्द्र प्रसाद रवि

अन्तर्व्यथा हे प्रभु! है अर्ज हमारी ऐसा समय न आए फिर से। आस पास रहकर भी हम मिलने को आपस में तरसे।। हाथ में पैसा रखा रह गया मिला न हमको दवाई।। दवाखाना सब बंद पड़े थे केवल बीमारी के डर से।। भूखे बच्चे बिलख रहे थे माँ के आँचल में छिपकर।। भय के मारे […][...]

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दीन हीन आँखें-देव कांत मिश्रदीन हीन आँखें-देव कांत मिश्र

दीन-हीन की आँखें मैंने इस लॉकडाउन में एक दीन-हीन व्यक्ति को देखा पहले जैसा हँसमुख नहीं ख़ामोश व ग़म के आँसू पिए चेहरे पर उदासीनता की रेखा उसकी आँखें कह रही थीं कोई सहारा तो मिल जाए इस गरीब बेचारे को कोई तो दीनों के दुखहर्ता इस लाचार, असहाय के लिए, कुछ तो कर जाए […][...]

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अत्याचार-प्रभात रमणअत्याचार-प्रभात रमण

अत्याचार माता की ममता हार गई हारा पिता का प्यार है भाई का स्नेह भी हार गया बहन तो सर का भार है ये कैसा अत्याचार है ? जो घर की राजकुमारी थी सबकी राजदुलारी थी ना कभी किसी से हारी थी वो चली सजाने अब गैरों का संसार है ये कैसा अत्याचार है ? […][...]

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