लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है
राहों में कांटों को चुनकर, फूल खिलाना कब मना है
जीवन में रस सूख गए हों , हो स्नेह का धार बहाना
मन के शुष्क धरातल पर हो , हरे-भरे पौधे विकसाना
नवीन विचारों को सींचकर , वृक्ष बनाना कब मना है ।
लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।
संकट के हों बादल छाये , निराशा की उष्ण तपिश हो
हो ध्येय पर ध्यान निरंतर भटकावों पर निज बंदिश हो
उग्र तूफानों को चीरकर , बढ़ते जाना कब मना है ।
लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।
सारे सपने टूट गए हों , सुप्त हो मन की अभिलाषा
आशा की इक चिंगारी को , पल-पल पलती हो जिज्ञासा
उस स्फूर्ति को ढाल बनकर , राह बनाना कब मना है ।
लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।
अति विवश व लाचारों को , दु:ख-संकट में बने सहारा
डूबते व उतराते को मिल , जाए एक सुखद किनारा
निज स्वार्थ से ऊपर उठकर , हाथ बढ़ाना कब मना है ।
लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।
राह नई बनाने वाले इस जग में नाम कमाते हैं
चुनौतियों का डट करें सामना निर्भय बढ़ते जाते हैं
मन में साहस , हिम्मत रखकर , मंजिल पाना कब मना है ।
लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।
- रत्ना प्रिया – शिक्षिका (11 – 12) , हिन्दी
उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर
चंडी ,नालंदा
