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दीप जलाना कब मना है रत्ना प्रिया 

लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है

राहों में कांटों को चुनकर, फूल खिलाना कब मना है

 

जीवन में रस सूख गए हों , हो स्नेह का धार बहाना

मन के शुष्क धरातल पर हो , हरे-भरे पौधे विकसाना

नवीन विचारों को सींचकर , वृक्ष बनाना कब मना है ।

लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।

 

संकट के हों बादल छाये , निराशा की उष्ण तपिश हो

हो ध्येय पर ध्यान निरंतर भटकावों पर निज बंदिश हो

उग्र तूफानों को चीरकर , बढ़ते जाना कब मना है ।

लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।

 

सारे सपने टूट गए हों , सुप्त हो मन की अभिलाषा

आशा की इक चिंगारी को , पल-पल पलती हो जिज्ञासा

उस स्फूर्ति को ढाल बनकर , राह बनाना कब मना है ।

लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।

 

अति विवश व लाचारों को , दु:ख-संकट में बने सहारा

डूबते ‌व उतराते को मिल , जाए एक सुखद किनारा

निज स्वार्थ से ऊपर उठकर , हाथ बढ़ाना कब मना है ।

लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।

 

राह नई बनाने वाले इस जग में नाम कमाते हैं

चुनौतियों का डट करें सामना निर्भय बढ़ते जाते हैं

मन में साहस , हिम्मत रखकर , मंजिल पाना कब मना है ।

लाख अँधेरा हो जीवन में , दीप जलाना कब मना है ।

 

उच्च माध्यमिक विद्यालय माधोपुर

चंडी ,नालंदा

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