कविता- (माॅ!)तूॅ क्यों? गगन की सितारा हो गई ।
-नूतन झा ।
जुगनुओं के महफिल की,
तूॅ एक तारा हो गई,
हमें जमीं पर छोड़ अकेला,
तूॅ क्यों?
गगन की सितारा हो गई ।
कहती थी,तुम्हे चमकना है
चान्द तारों की तरह,
बिखेरनी है खुशबू
फूल गुलजारों की तरह,
पर अपनी आँगन छोड़ तूॅ,
नभ के आँगन की प्यारा हो गई ।
हमें जमीं पर छोड़ अकेला,
तूॅ क्यों?
गगन की सितारा हो गई ।।
जन्नत दिखती थी हमें,
तुम्हारी बाँहों में,
वात्सल्य लुटाती थी,
ममता की छाँव में,
हमें सपने दिखाकर,
तूॅ सिर्फ,
सपनों में आनेवाली रानी बन गई ।
हमें जमीं पर छोड़ अकेला,
तूॅ क्यों?
गगन की सितारा हो गई ।
माना कि मैं बहुत जिद्दी थी,
अकल से थोड़ी पिद्दी थी,
पर ऐसी भी क्या मजबूरी थी,
की तेरे संग,
मेरी ये दूरी हो गई ।
हमें जमीं पर छोड़ अकेला,
तूॅ क्यों?
गगन की सितारा हो गई ।
माँ जब भी तेरी,तस्वीर देखती हूँ,
आँख मेरी भर आती है,
भूली बिसरी बातों की,
यादें उभर जाती है,
यादों की दीवारों में लटकाकर हमें,
तूॅ खुद,खामोश दीवार की तस्वीर बन गई ।।
हमें जमीं पर छोड़ अकेला,
तूॅ क्यों?
गगन की सितारा हो गई ।
करती थी पूजा,मैं अपने इष्ट देव का
माँगती थी मन्नते,तेरी आयु का
पर तुम्हे मौत के मुँह में
जाने से बचाने में,
शायद मेरी पूजा में ही कोई कमी रह गई ।
हमें जमीं पर छोड़ अकेला,
तूॅ क्यों?
गगन की सितारा हो गई ।।
Nutan Kumari


