मिलकर नैना खिल-खिल जाए।
अँखियों में मैं रखूँ बसाए।।
है मेरे मन का वह रंजन।
क्या सखि? साजन! न सखी! अंजन।।०१।।
नैन बसाकर मैं इठलाऊँ।
बलिहारी मैं बलि-बलि जाऊँ।।
उससे पाती मैं मुख उरमा।
क्या सखि? साजन! न सखी! सुरमा।।०२।।
नहीं मिले तो अँखिया सूनी।
उसे मिले तो चमके दूनी।।
उसके लिए रहूँ मैं पागल।
क्या सखि? साजन! न सखी! काजल।।०३।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८
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