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बादल-राम किशोर पाठक 

Ram Kishore Pathak

Ram Kishore Pathak

बदन ताप से मैं व्याकुल हूँ।

उनके दर्शन को आकुल हूँ।।

दर्श बिना हो जाऊँ पागल।

क्या सखि! साजन? न सखी! बादल।।०१।।

आस लगाए तकती रहती।

विरह आग में जलती रहती।।

मेरे मन बसता एक ऋषभ।

क्या सखि! साजन? न सखी! नीलभ।।०२।।

तृप्ति वही बेचैन हिया की।

प्राण बचाए कौन जिया की।।

उसके बिना हुई अब त्रासद।

क्या सखि! साजन? न सखी! शारद।।०३।।

विहँस उठूँ ज्यों ही वह आए।

उसका दर्शन भाग्य जगाए।।

देर करे क्यों होती हैरत।

क्या सखि! साजन? न सखी! रैवत।।०४।।

उसे देख मतवाली होती।

उससे ही खुशहाली होती।।

आलिंगन का बनता प्रेरक।

क्या सखि! साजन? न सखी! सेचक।।०५।।

 

रचनाकार:- राम किशोर पाठक 

प्रधान शिक्षक 

सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।

संपर्क- ९८३५२३२९७८

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