बदन ताप से मैं व्याकुल हूँ।
उनके दर्शन को आकुल हूँ।।
दर्श बिना हो जाऊँ पागल।
क्या सखि! साजन? न सखी! बादल।।०१।।
आस लगाए तकती रहती।
विरह आग में जलती रहती।।
मेरे मन बसता एक ऋषभ।
क्या सखि! साजन? न सखी! नीलभ।।०२।।
तृप्ति वही बेचैन हिया की।
प्राण बचाए कौन जिया की।।
उसके बिना हुई अब त्रासद।
क्या सखि! साजन? न सखी! शारद।।०३।।
विहँस उठूँ ज्यों ही वह आए।
उसका दर्शन भाग्य जगाए।।
देर करे क्यों होती हैरत।
क्या सखि! साजन? न सखी! रैवत।।०४।।
उसे देख मतवाली होती।
उससे ही खुशहाली होती।।
आलिंगन का बनता प्रेरक।
क्या सखि! साजन? न सखी! सेचक।।०५।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८
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