गाय -बैलों को भूलकर,
कुत्ते के पीछे भागते,
गंवार से संभ्रांत बनने की चाहत में।
भूलते बिसरते अतीत !
खुले दरवाजे से ,अहाते में सिमटकर,
पेड़ों को काटकर, गमले तक अटककर,
प्राणवायु ढूंढ़ रहे अस्पतालों में,
ढूंढ रहे चैन ,सुकून और शांति ,
छोड़करअपने,परायों की खोज में !
परिस्थितिके झंझावातों से जूझकर ,
खट्टे मीठे अनुभव रखनेवाले दादाजी,
अब,अप्रासंगिक हो गए ।
हम पी रहे हैं गम,द्वेष और ईर्ष्या,
एकाकीपन में,
अब न रही नानी ,दादी और बुआ,
चाचा,चाची और फ़ुआ,
जरूरत है,आत्मचिंतन की,
रिश्तों के अभिनंदन की।
विजय शंकर ठाकुर
वि शि
म वि गोगलकटोल
प्रखंड बोखरा
जिला सीतामढ़ी
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