बीसवीं शताब्दी का था मैं बालक।
स्कूल में जाना पड़ता था बैलगाड़ी से।
दूर-दराज़ स्कूल था, मेरे पास भाड़ा नहीं रहता था।
सुन बैलों के तरन की आवाज़, कान खड़े हो जाते।
गाड़ीवान बोलता—
“तेज़ चल, मेरे बंधु! चलना है दूर-दराज़।”
पुस्तक लिए झोले में, लटक जाते बैलगाड़ी पर।
कुछ दूर तक मस्ती करते, उस बैलगाड़ी पर बड़े आराम से।
फिर टप-टप आवाज़ें आतीं;
हिनहिनाते, गर्दन ताने,
धूल उड़ाता, वेग से चलता वह घोटक महान।
भेड़-बकरियाँ रास्ता घेर लेतीं;
मेमना करता नाटक महान।
छोटे-छोटे जंतुओं से खेलते, होते आनंदित हम।
रास्ते में लड़के गिल्ली-डंडा खेलते;
ठिठक जाते मेरे पैर।
कहीं पतंग की लड़ाई हो जाती,
कटकर छू लेती गगन को।
पीछे भागती बालकों की टोली।
फिर स्कूल की कक्षा करके,
शाम को घर लौट आते।
पता ही नहीं चलता,
रास्तों में कब स्कूल आया और कब घर।
काका, चाचा, भैया, बाबा,
काकी, चाची, भौजी, दादी—
सभी से रिश्ते जोड़कर बातें करते।
बदले में “बेटा”, “बबुआ” आदि
प्रेम की भाषा सुनते।
चिट्ठी लिखवाने जब आतीं काकी और दादी,
चिट्ठी लिखवाकर जब मुझे शाबाशी देतीं,
तो मन गदगद हो जाता।
जब डाकिया को देने को कहतीं,
बड़ी खुशी से पोस्ट ऑफिस जाते।
लिफाफा, पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र पाते।
मोबाइल ने बंद करवा दी चिट्ठी-पत्री।
अब मोबाइल ने सबको अपना दास-दासी बना दिया है।
सार्थक उपयोग कोई नहीं करता;
बस मोबाइल से चिपका रहता है।
सारे गृहकार्य छुड़वा देता है,
बड़े-बुजुर्गों को दुख पहुँचाता है।
जो इसका सार्थक उपयोग नहीं करते,
वे अपने जीवन को स्वयं धोखा देते हैं।
स्वरचित ,रचनाकार :-
उमेश कुमार सिन्हा निर्देशक
डिसेंट एकैडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर ,जिला – बक्सर
