चाँद की यात्रा
अंधकार की चादर ओढ़े, सोया था वह शून्य में,
कोई निशा न साथ थी, खोया था वह मौन में।
पर मन में एक आस थी, इक रूप नया पाना है,
इस घने स्याह सागर से, बाहर निकल कर आना है।
पहले दिन इक पतली सी, चांदी की लकीर बनी,
काली रात के सीने पर, वो नन्हीं सी उम्मीद सजी।
आगे बढ़ा तो राहों में, तूफानों ने घेरा था,
काले-कड़वे बादलों का, हर तरफ़ बसेरा था।
तेज हवाएं डराती थीं, राहों को भटकाती थीं,
उसकी कोमल काया को, पल-पल वो तड़पाती थीं।
पर रुका नहीं वह पथिक कभी, हर रोज आकार बढ़ाता गया,
सूरज से लेकर रोशनी, खुद को वह सजाता गया।
कभी आधा कटा, कभी खंडित हुआ, पर हिम्मत उसने हारी नहीं,
कठिनाइयों के आगे उसने, मानी अपनी लाचारी नहीं।
दाग लगे थे सीने पर, पर उनको ही सम्मान किया,
अंधेरी इस कायनात को, धीरे-धीरे प्रकाश दिया।
और फिर आई वो पावन रात, जब तप पूरा हुआ उसका,
नभ के नीले आँगन में, रूप निखर उठा उसका।
अमावस्या का वो खोया चाँद, आज पूर्णिमा बन मुस्काया है,
अपनी शीतल किरणों से, उसने जग को महकाया है।
कठिनाई से जो लड़ा निरंतर, वही पूर्ण हो पाता है,
अंधकार को चीर के ही, जग में प्रकाश फैल पाता है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

