संसार की माता बन
संतानों को पालती हैं,
सृष्टि की कीमती रत्न, दुनिया में नारी है।
घर हो या राजनीति
तालमेल बैठाती है,
जीवन सफ़र पर, कभी नहीं हारी है।
महिलाएंँ जहांँ जाती
परचम लहरातीं,
अबला-निरीह नहीं, रही सुकुमारी है।
समय के अनुरूप
खुद को बदल लेती,
पत्नी व बहन बेटी ,जैसी होती बारी है।
भाग -२
मित्र बन देती साथ
हमेशा बंटाती हाथ,
जीवन संवारती है, पत्नी बन प्यारी है।
रक्षाबंधन के दिन
करते हैं इंतजार,
आंँगन की रौनक तो, बहन हमारी है।
जहांँ नहीं बेटी होती
अजीब उदासी छाती,
इससे आबाद घर, रूपी फुलवारी है।
अनेक लड़ाईयों में
गवाह है इतिहास,
योद्धाओं पे अकेले ही, रही सदा भारी है।
जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’
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