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धैर्य का मीठा फल – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

धैर्य का मीठा फल

 

एक दिन ठंडी और मंद पवन,

बहती हुई आई पाकर मन।

छुआ बीज को ऐसे प्यार से,

जाग उठा वह एक दुलार से।

आसमान से नीलम जैसी,

गिरीं बूंदें अमृत के जैसी।

मिट्टी ने झट प्यास बुझाई,

नन्हे बीज को गोद सुलाई।

सूरज ने तब धूप फैलाई,

प्यार भरी एक सीख सिखाई।

बोला, “खोलो आलस की आँखें,

देखो बाहर सुंदर पाँखें!”

सुनकर उसकी प्यारी बानी,

बीज ने मन में हिम्मत ठानी।

ली अंगड़ाई, छोड़ी सुस्ती,

भीतर जागी नई चुस्ती।

मिट्टी को धीरे से चीरा,

बदला रूप जैसे हो हीरा।

बनकर एक कोमल सा अंकुर,

आया बाहर रूप मनोहर।

नीला अंबर, चंदा-तारे,

फूल खिले थे सुंदर सारे।

देख नजारा दुनिया का वह,

झूम उठा खुशियों में खुद वह।

पवन संग फिर लगा मचलने,

ऋतुओं के सांचे में ढलने।

बढ़ता गया वह धीर-गंभीर,

बदली उसने अपनी तक़दीर।

आज खड़ा वह बनकर तरुवर,

शीतल छांव लुटाता सब पर।

पंछी गाते जिस पर गाना,

सीख गया वह फर्ज निभाना।

तपते सावन, कड़कती ठंड में,

खड़ा रहा वह इस ब्रह्मांड में।

सहे थपेड़े तेज हवा के,

गहरे घाव भी हँसकर चाखे।

जड़ को अपनी गहरे गाड़ा,

मुश्किल का हर पर्दा फाड़ा।

मीठे फल सबको हैं बांटे,

चुने स्वयं राहों के कांटे।

सांसें देता हर प्राणी को,

रक्षित करता जग के पानी को।

जीवन का जो धर्म निभाया,

सच्चा वीर वही कहलाया।

धैर्य और मेहनत का फल है,

धीरज में ही सुंदर कल है।

छोटी सी शुरुआत जो होती,

इक दिन बनती सच्ची मोती।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला

रानीगंज अररिया

 

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