Site icon पद्यपंकज

एक दिन बिना बिजली – विकास कुमार साव

vikash kumar saav

एक दिवस जब बिजली रूठी, सुख-सुविधा की डोरी टूटी।

ठिठक गया है सब जन-जीवन, थमा हुआ सा लगता आँगन।।

मौन पड़ा है अब तो पंखा, मन में जागी कई आशंका।

शोर न करती कोई स्क्रीन, हुए सभी अब सुर से विहीन।।

अलार्म का भी स्वर है सोया, समय कहीं अँधियारे खोया।

गर्मी की जो तपन बढ़ी है, मुश्किल की यह घड़ी खड़ी है।।

नल हैं सूने मोटर मौन, प्यास बुझाए अपनी कौन।

रसोई भी अब थमी खड़ी है, संकट की यह घड़ी बड़ी है।।

पढ़ाई की भी लौ है मद्धम, कामकाज के रुके कदम।

अस्पतालों की बढ़ी फिकर है, जीवन अब तो बेअसर है।।

किंतु अँधेरा यह सिखलाए, संयम ही पथ दीप जलाए।

सौर ऊर्जा का करें संज्ञान, नव-विकल्प का रखें ध्यान।।

अपनों संग जब हँसी बिखेरी, टूटी तब तो मोह-अँधेरी।

प्रकृति संग अब प्रीत बढ़ाई, सादगी ही है असल कमाई।।

सुविधा का जो लोभ बढ़ा है, निर्भरता का जाल खड़ा है।

चुनौतियों से जो लड़ पाएगा, वही जगत में पथ पाएगा।।

 

विकास कुमार साव
प्राथमिक विद्यालय, चान्दोडीह,बेलहर
बांका

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version