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जीवन और मृत्यु – गिरींद्र मोहन झा

Girindra Mohan Jha

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जीवन और मृत्यु

जीवन जीवन ही होता है,
जीवन का ध्येय भी जीवन होता है,
जन्म-मृत्यु के है जीवन कर्म-प्रधान,
उज्ज्वल जिसका कर्म है, जीवन वही महान,
जीवन और कर्म के विषय में सोचना सहज और स्वाभाविक है,
जीवन वही महान होता है, जो आत्मप्रगति के साथ परोपकारार्थ हो,
जीवन वही महान है, जिसमें अपने कर्त्तव्य पालन के साथ नया कुछ देने, दूसरों के लिए कुछ करने की भावना हो,
जीवन वही महान होता है, जिसमें अपनी जीवन-यात्रा पर ध्यान केंद्रित किया जाय,
जीवन वही महान होता है, जो सहज और पवित्र है, अर्थपूर्ण, परोपकारमय हो,
जीवन वही महान होता है, जो राष्ट्र-हित व लोक-हित की भावना से परिपूर्ण हो,

मृत्यु – ढाई अक्षर का पवित्र शब्द !
मृत्यु की आयु ही कितनी !
एक क्षण की !
बांकी सारा तो जीवन ही है।
मृत्यु का ख्याल आता भी है बस इतने के लिए कि मैं किन बातों के लिए याद किया जाऊंगा या फिर मेरी मृत्यु हो, तो राष्ट्र-हित अथवा लोक-हित में हो !
मृत्यु वही महान है, जो अमर बना दे !
……गिरीन्द्र मोहन झा,
+२ भागीरथ उच्च विद्यालय, चैनपुर-पड़री, सहरसा

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