प्रकृति की कहानी
कर्त्तव्य पथ पर लगन, निष्ठा, प्रतिबद्धता के साथ,
हर कोई निरंतर चलता ही रहता है निर्विघ्न, अबाध,
सूर्य, चंद्र चलता है, न ग्रहण का भय, न किसी का साथ,
तथापि कर्त्तव्य-पथ पर सतत चलता रहता है अबाध,
वृक्ष फलते हैं, नदियां चलती हैं, सागर रहते हैं शांत,
प्रकृति में हर कोई कर्त्तव्य में लीन, कर रहे संग्राम,
कर्त्तव्य की रोशनी में वे करते जाते हैं परोपकार,
दूसरों को सुख पहुंचाते, न रखते कोई अभिमान,
प्रकृति की कहानी धन्य है, धन्य है इसकी दास्तान,
प्रकृति में हर कोई शिक्षक है, हर कोई है महान।
…..गिरीन्द्र मोहन झा
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