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श्री जी -कुमकुम कुमारी काव्याकृति

Kumkum

श्री जी
अद्भुत छवि है श्री जी तेरी,
हटती नहीं नजरिया।
माथे कुमकुम दमक रही है,
नैनों में साँवरिया।।

हो गई बावरी आके मैं,
वृषभानु की नगरिया।
शाश्वत चमक लुटा रही है,
किशोरी की गगरिया।।

पावन रज है बरसाने की,
अलौकिक है डगरिया।
सहस्त्रों सूर्य चमक रहे हैं,
राधे की अटरिया।।

राधे राधे बोल रही है,
मोहन की बाँसुरिया।
दसों दिशा में गूंज रही है,
राधे की पायलिया।।

नैन बिछाए खड़ी हूँ राधे,
खोलो अब किवड़िया।
दे दो दर्शन राधारानी,
पुनीत बने उमरिया।।

    कुमकुम कुमारी 'काव्याकृति'
  मध्य विद्यालय बाँक, जमालपुर
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