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दो जून की रोटियां – मनु कुमारी

दो जून की रोटियां

यूं हीं नहीं मिलती दो जून की रोटियां,
पूछो उन गरीबों से, लाचारों से और जरूरतमंदों से।
संघर्ष की आग में जलते हैं जिनके हाथ,
मेहनत करते हुए टूटते हैं कमरें और फटती है एड़ियां।
यूं हीं नहीं मिलती है किसी को दो जून की रोटियां..

आधी रात को हीं उठकर चलते हैं वो काम पर,
पैसे वाले रखना चाहें कम किफायत दाम पर।
कभी सड़कों पर,कभी पटरी पर
कभी कारखानों मीलों पर,
जलते देखा धूप में है अपने मुंह को सीलकर।
जकड़ती हैं उनको हरदम असमानताओं की बेड़ियां
यूं नहीं मिलती किसी को दो जून की रोटियां।

पत्थरों को तोड़कर जो राह देता है बना।
ऐसे सच्चे कर्मवीरों को धरती मां ने है जना।
उसके हीं मेहनत से घर – घर,संगीत सरगगम राग है,
उसकी ही मेहनत से सबके बच्चे खेलें फाग है।
संतोष धन से भरते हैं जो अपने घर की कोठियां,
यूं हीं नहीं मिलती किसी को दो जून की रोटियां।

श्रम की रोटी जो भी खाए स्वस्थ रहता हर घड़ी,
खाने में है स्वाद आता, नींदे भी आतीं बड़ी।
श्रमहीन व्यक्ति नहीं करता कभी कोई काम है।
रौब से बस सिर उठाकर लेता अपना नाम है।
दीन हीनों को सुनाता रहता है खरी- खोटियां..
यूं हीं नहीं मिलती किसी को दो जून की रोटियां।

स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी, विशिष्ट शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर, सुपौल

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