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संकल्प- मनु कुमारी

संकल्प (कविता)

संकल्प जगे जब अंतर में, तो पथ स्वयं बन जाता है।
साहस के चरण जहाँ पड़ें, भय वहीं मिट जाता है।।

साक्षी है यह इतिहास स्वयं, हर युग, हर परिवर्तन का।
जो झुका नहीं वह अमर हुआ, सत्यपूर्ण आचरण का।।

समानता की ज्योति जले, हर मन, हर अधिकार में।
भेद मिटें, मानव दिखे, मानव के व्यवहार में।।

समय न रुकता, न थमता, बस कर्मों को तौलता है।
जो जागा, जो लड़ा, वही इतिहास में बोलता है।।

सत्य कठिन है, पथ दुर्गम है, फिर भी यही आधार।
इसी पर टिकती सभ्यताएँ, इसी से चलता संसार।।

सुंदर वही जो करुणा से, चरित्रसे उज्ज्वल हो।
जो स्वार्थ नहीं, समाज जिए, ऐसा ही निर्मल हो।।

समाज तभी महान बने, जब चेतना जाग्रत हो जाए।
जब हर जन साक्षी बनकर भी, अन्याय से टकराए।।

संकल्पित हो हर पीढ़ी जब, युग स्वयं निखर जाए।
‘मनु’ की लेखनी कहती है ,मानवता अमर हो जाए।

स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी, विशिष्ट शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर, सुपौल

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