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गाँव मेरा

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गांव मेरा भी अब मुस्कुराता नहीं ( ग़ज़ल)

गांव मेरा भी अब मुस्कुराता नहीं।

आह भरता मगर गुनगुनाता नहीं।।

शब्द सोहर के जाने कहां खो गए।

अब ये विरहा पराती सुनाता नहीं।।

खेत में कंक्रीटों की उगती फसल।

धान गेहूं कोई अब उगाता नहीं।।

अजनबी बन गए गांव के लोग भी।

कोई भी अपने सर को झुकाता नहीं।।

भावनाएं अहिल्या हैं अर्जुन हुईं।

राम कोई नजर आज आता नहीं।।

 

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ARJUN PRASAD SINGH PRABHAT

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