नारी- मत्तमयूर छंद गीत वर्णिक
२२२२, २११-२२१-१२२
मैं नारी हूंँ, प्रेम दया की अवतारी।
गंगा जैसी, पावन हूँ कल्मषहारी।।
मैं ही तो हूँ, देवनदी की जलधारा।
मेरा ही तो, रूप रमा का अति प्यारा।।
मैं ही दुर्गा , शक्ति शिवा उपकारी।
मैं नारी हूंँ, प्रेम दया की अवतारी।।०१।।
मैं ही छाया, प्रेमिल सारे उर में हूँ।
मैं ही माया, जो बस आया उर में हूँ।।
देवी वाणी, रूप अनोखा रस धारी।
मैं नारी हूंँ, प्रेम दया की अवतारी।।०२।।
भार्या बेटी, प्यार लुटाती रहती है।
मर्यादा का, पाठ पढ़ाती रहती है।।
जैसी भी हूँ, दूँ दुनिया को सुख सारी।
मैं नारी हूंँ, प्रेम दया की अवतारी।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८
0 Likes

