हरि गीतिका छंद
बागेश्वरी माॅं श्वेतपद्ममा,ज्ञानदा या भारती।
आकार सबके एक जिनकी,हम उतारे आरती।।
शुभ भोर सुंदर पूर्व से ही,देव जागे हैं यहाॅं।
दिनकर सजाकर रश्मियाॅं पर,संग भागे हैं यहाॅं।।
पगडंडियों पर शुभ्र मोती,जो दिखे कमजोर हैं।
जो शीत भय के थे हृदय पर,ले रहे अब कोर हैं।।
संभावना पावन लिए जो,पंक से पंकज खिला।
आशीष माता दे रही है,द्वार हर स्वागत मिला।।
ये बेर गजरे अन्य श्रीफल,स्वच्छ सुखद प्रसाद हैं।
गीर्वाणवाणी स्वर्ग सुंदर,बह रहे सुखनाद हैं।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
मध्य विद्यालय दर्वेभदौर
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