मनोरम छंद
2122 2122
धूप से तन-मन जले हैं।
लाल-पीले फल ढले हैं।।
सर्व सुंदर बाग प्यारा।
राहगीरों का सहारा।।
दुख मगर इस बात का है।
दुख मगर उस रात का है।।
काट जंगल हम बसे थे।
दाब से बिल्कुल कसे थे।।
खोजते हैं लोग छाया।
पूर्व में जो बाँट खाया।।
वक्त आगे बढ़ गया है।
दर्द सब पर मढ़ गया है।।
जो कभी के छिन्न धागे।
जोड़ने”अनजान”जागे।।
रेत पर छत हो रही है।
नींद निर्गत हो रही है।।
फट रही चादर पुरानी।
दिख रही रफ्फू निशानी।।
गर्म मौसम हो रहा जब।
तर्क आपस हो रहा तब।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
सेवानिवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवे-भदौर
ग्राम पोस्ट थाना -भदौर
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