Site icon पद्यपंकज

खामोशी रुचिका

खामोशी

जब बोलना बेअसर होने लगे
तो रास आने लगी खामोशी।
खामोशी जो थी अपने में समेटे
न जाने कितनी बातें
कितने अरमान,कितनी चाहतें
कितनी शिकायतें,कितनी मोहब्बतें।

ख़ामोशी सदा ही भारी पड़ी
शोर पर।
क्योंकि शोर अनसुना कर दिया गया
या फिर वह मात्र शब्द बनकर रह गए।
खामोशी बनी अर्थ उन शब्दों की
और करने लगी प्रतिनिधि भावनाओं की।

खामोशी रहीं वैसी आवाजें
जिनको कहने के लिए शब्द कम पड़ गए
या फिर पड़ गयी हिम्मत कम
या फिर उसके परिणाम के भविष्य
को सोच
मन हुआ सशंकित या भयाक्रांत।

कुछ भी खामोशी रहीं
सदा से ही शब्द पर भारी।
असरदार
गहरी
मन के परतों को खोलने वाली।

रूचिका
राजकीय प्राथमिक विद्यालय कुरमौली गुठनी सिवान बिहार

0 Likes
Spread the love
Exit mobile version