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शिक्षक तुम सृजन हो-कार्तिक कुमार

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शिक्षक तुम सृजन हो, ज्ञान की अमर निशानी हो,
शिक्षक तुम विनाश की अकथ कहानी हो।
अज्ञान के अंधेरों का तुम अंत कर देते हो,
सत्य के दीप जलाकर जीवन भर देते हो।

तुमसे ही संस्कारों की खुशबू महकती है,
तुमसे ही हर मंज़िल की राह चमकती है।
कलम तुम्हारा शस्त्र है, शिक्षा तुम्हारी शान,
तुमसे ही ऊँचा होता भारत देश महान।

गिरते हुए मन को तुम फिर से उड़ान देते हो,
सूने से जीवन में नई पहचान देते हो।
हर बच्चे के सपनों का तुम आधार बनते हो,
संघर्ष की राहों में दृढ़ विचार बनते हो।

जहाँ अंधविश्वास हो, वहाँ विज्ञान जगाते हो,
जहाँ निराशा हो, वहाँ विश्वास जगाते हो।
तुम राष्ट्र के भविष्य के सच्चे निर्माता हो,
मानवता के मंदिर के श्रेष्ठ पुजारी हो।

शिक्षक तुम सृजन हो, नवयुग के प्रहरी हो,
चरित्र, करुणा और कर्म के सच्चे धुरी हो।
शिक्षक तुम विनाश हो केवल अज्ञान का,
तुम ही हो उज्ज्वल भारत के स्वर्णिम अभियान का।

कार्तिक कुमार

मध्य कटरमाला गोरौल वैशाली
7004 318121

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