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कविता

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।। तुम हो मेरी रागिनी सी ।।

तुम्हारी बोली जैसे मीठी रागिनी सी,
अंधेरी रातों में हो तुम मेरी चाँदनी सी।।

मैं चकोर, तुम हो पूनम की रात,
जैसे मैं एक कविता, तुम हो मेरी किताब।।

ग्रीष्म ऋतु की ठंडी पवन हो तुम,
मेरी बगिया की खिलती चमन हो तुम।।

मस्ती में मचलती हो दिशाहीन तरणी सी,
जैसे मेरे गीतों में चलती हो मेरी संगिनी सी।।

मैं नदी, तुम हो किनारा मेरा,
मैं बरखा, तुम हो फुहारा मेरा।।

तेरी मुस्कान जब खिलखिलाती है,
फलक पर घनघोर घटा छा जाती है।।

जब करती हो तुम प्रश्नों से वार,
हाय! मैं हो जाऊँ उस पर बलिहार।।

जब होठों पर हल्की-सी मुस्कान भरती हो,
मेरी सारी खुशियों की तुम दुकान लगती हो।।

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संजीत कुमार निगम

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