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माटी के बोली,मन के हिंदी

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*माटी के बोली, मन के हिन्दी*

मइया के ममता जइसन, मीठ हई हमर बोली,
गाँव के गली-गली में, गूँजे रस के टोली।
माटी के सोन्ह महक हई, खेतन के हरियाली,
मगही के हर एक बोल में, बसल हई खुशहाली।

**“का हो?” में अपनापन हई, “आइं” में नेह अपार,
दुःख में कंधा दे देवे, सुख में बाँटे प्यार।

नदिया जइसन निर्मल हई, पीपर जइसन छाँव,
मगही बोलत मुस्काए जब, खिल उठे पूरा गाँव।

हिन्दी हमर पहचान हई, माथे के बिंदिया,
शब्द-शब्द में संस्कार बसल, भावन के गहना।

मगही हमर माटी हई, हिन्दी हमर सम्मान,
दूनो मिलके सजवले हई, हमर देश महान।
नाहीं भाषा छोट-बड़ होवे, ना बोली के मान,
हर बोली में धड़कत हई, भारत के अरमान।

मगही के मीठ सुर लेके, हिन्दी के विस्तार,
अपन शब्दन से जोड़ब हम, दिल से दिल के तार।
**हिन्दी दिवस के पावन दिन, एगो बात कहई,
अपन भाषा, अपन बोली से, नाता कबहूँ न टूटई।
माटी के गंध बचल रहे, बचल रहे संस्कार,
हिन्दी-मगही संग-संग चमके—
भारत माँ के प्यार।
सुनील कुमार प्रजापति, प्रधान शिक्षक
नव प्राथमिक विद्यालय इमामगंज, ओबरा, औरंगाबाद

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सुनील कुमार प्रजापति

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