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आभासी दुनिया, बिखरते रिश्ते-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

रिश्तों से कोसों दूर हुए हम, आभासी गलियारों में,

कैसी ये तन्हाई आई, अपनों के त्योहारों में।

सामाजिक संचार का ऐसा मायाजाल ये फैला है,

चेहरा तो चमका स्क्रीन पर, पर अंतर्मन मैला है।

हर घर, आँगन, हर एक कोना आदतों से मजबूर हुआ,

पास बैठे हैं लोग मगर, हर शख्स बहुत ही दूर हुआ।

संस्कार सब लुप्त हो रहे, मर्यादाएँ टूट रहीं,

भौतिकता की इस अंधी दौड़ में, अपनी संस्कृति छूट रही।

माना कि ये दूरभाष ही, इस युग की मजबूरी है,

पर इसके कारण क्यों अपनों में, बढ़ती जाती दूरी है?

कोई आवश्यक काम हो तो, दूरभाष ही ढाल बने,

पर क्यों इस मायावी जग में, रिश्ते ही जंजाल बने?

‘मुखदर्शिका’ (Facebook) के पन्नों पर हम झूठी शान दिखाते हैं,

लाइक और कमेंट्स के पीछे, अपनी रूह सुखाते हैं।

‘इंस्टाग्राम’ की रील्स में खोकर, असली दुनिया भूल गए,

अम्युज़मेंट के चक्कर में हम, अपनों को ही निगल गए।

माता-पिता की मूरत रोई, भाई-बहन का प्यार मरा,

चाचा-चाची, दादा-दादी, सूना है अब आँगन पूरा।

नाना-नानी की वो कहानियाँ, रील और फीड्स ने खा ली हैं,

डिजिटल इस दुनिया ने देखो, कैसी आफत ला ली है।

जागो! अब भी वक्त है संभलो, इस पिंजरे से बाहर आओ,

छोड़ो ये आभासी दुनिया, अपनों को गले लगाओ।

ये दूरभाष बस साधन हो, ये जीवन का आधार नहीं,

रिश्तों से बढ़कर दुनिया में, कोई भी उपहार नहीं।

         

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

             

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला रानीगंज अररिया

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