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अंतस की जीत :- धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

 

जब राहों में बढ़ने लागे, गहरा घोर अंधेरा,

मेहनत पर हँसने लगे जब यह जग सारा फेरा।

लगने लगे कि कोशिश अपनी हर बेकार गई है,

मंजिल के बेहद पास आकर हिम्मत हार गई है।

तब मिट्टी के सीने में दबे उस बीज को याद तुम करना,

जो सहकर सब कुछ चुपचाप, सीखता है चुपके से बढ़ना।

बाहर तो सन्नाटा होता है, कोई हलचल नहीं दिखती,

पर भीतर ही भीतर उसकी एक नई भोर है लिखती।

वह रोता नहीं, वह थकता नहीं,

अंधेरों से डरकर वह कभी रुकता नहीं।

लड़ता है रोज़ वो माटी के उस काले, घने अंधियारों से,

ताकि मुकाबला कर पाए कल तीखे, तेज़ प्रहारों से।

वह पहले ऊपर अंबर में अपनी पत्तियाँ नहीं फैलाता,

वह चुपके-चुपके नीचे ही अपनी जड़ें बढ़ाता है।

क्योंकि वह भली-भांति जाने, गर नींव ज़रा कमजोर हुई,

तो आने वाले तूफ़ानों की आंधी होगी बहुत मुई।

जड़ें जितनी गहरी होंगी, पेड़ उतना ही तनेगा,

वही एक दिन शाखों का विशाल छत्रक बनेगा।

तो फिर क्यों घबराना तुमको दुनिया के इन तानों से?

क्यों डर जाना जीवन के इन क्षणभंगुर तूफ़ानों से?

चाहे व्यापार हो, पढ़ाई हो या कोई ख़्वाब नया,

वक्त इम्तिहान लेता ज़रूर, पर बदलता भाग्य नया।

हँसकर गले लगाओ तुम हर एक नई कठिनाई को,

ये मुश्किलें ही तो तराशती हैं तुम्हारी परछाई को।

परिणाम आज नहीं तो कल, एक दिन निश्चित ही आएगा,

तेरा यह मौन संघर्ष ही, कल भारी शोर मचाएगा।

रख खुद पर पूर्ण भरोसा तू, उस बीज सा ही बलवान है,

तेरी जड़ों की मजबूती ही, तेरे सुनहरे कल की पहचान है!

जो आज हँस रहे हैं तेरी इस सूनी वीरानी पर,

कल वो ताली बजाएंगे तेरी इस सफल कहानी पर।

ये रुकावटें कोई अंत नहीं, बस एक छोटा सा ठहराव हैं,

मंजिल की दिशा में बढ़ता हुआ एक नया झुकाव हैं।

चुनौतियों के हर एक वार पर तुम ज़रा मुस्कुरा देना,

अपनी इस गहरी खामोशी से ही तुम सारा ज़माना हिला देना।

शुरुआत भले ही आज मिट्टी के अंधेरे से हुई,

पर देखना, एक दिन तुम छू लोगे आसमान की ऊँचाई को भी।

डरना मत इस अकेलेपन से, ये तो बस एक तैयारी है,

तूफानों से टकराकर बाज़ी जीतने की, अब तुम्हारी बारी है!

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर 

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

रानीगंज अररिया 

15.10.2026

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