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क्या छूट रहा है प्रकृति प्रेम – अवधेश कुमार

क्या छूट रहा है प्रकृति प्रेम ?

​वो पीपल की ठंडी छाँव, अब बस यादों में बसती है,
विकास के इस भागदौड़ में, सांसें अब बहुत सस्ती हैं।
वो गौरैया का चहचहाना,
वो भोर का सुहाना मौसम,
सब कंक्रीट के जंगल में खो गया अब?
गमलों में खिलते हरियाली को, हम प्रकृति प्रेम मान बैठे हैं,
प्लास्टिक के फूलों में, हम अपना लगाव मान बैठें हैं।
एसी और फ्रिज को अपना स्टेटस सिंबल मान बैठें हैं ।
हमने समंदर को कचरे से भर दिया,
बादलों का रास्ता धुएँ से डरा दिया।
आजकल मछलियाँ अब पानी में नहीं, एक्वेरियम में तैरती हैं,
लैदर और प्लास्टिक के फैशन में युवाओं को प्रकृति से दूर करती है ।

ये जो छूट रहा प्रकृति प्रेम हमारा, इसे फिर से जगाना होगा,
बच्चों और नई पीढ़ी को सतत हरित विकास के मंत्र को अपनाना होगा ।

जन जागरूकता और प्रकृति प्रेम से बनेगी मिशाल ,
जिससे देश में होगा जन जीवन खुशहाल ।
आखिरी सवाल हर साल किसी दिन विशेष को मन मे आता है ,
क्या छूट रहा प्रकृति प्रेम ?

प्रस्तुति – अवधेश कुमार
उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय रसुआर , मरौना , सुपौल

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