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राष्ट्रीय बालिका दिवस – मनु कुमारी

आज मत पूछो,
क्यों आई है बेटी—
आज पूछो,
कैसे बची है बेटी?

गर्भ की देहरी पर
हर बार सवालों से जूझती,
मौन की चादर ओढ़े
अपने होने का प्रमाण खोजती—
वही है बेटी।

उसकी किलकारी
घर की दीवारों को
सपनों से भर देती है,
और उसकी चुप्पी
समाज के माथे पर
सबसे बड़ा प्रश्न लिख देती है।

मत तौलो उसे
दहेज की तराजू में,
मत बाँधो उसे
परंपराओं की बेड़ियों में।
वह बोझ नहीं,
वह तो भविष्य की
सबसे हल्की—और सबसे मजबूत
नींव है।

जिस दिन बेटी मुस्कराती है,
उस दिन घर नहीं—
पूरी सृष्टि उजली होती है।
जिस दिन बेटी डरती है,
उस दिन कानून नहीं—
मानवता हारती है।

उसे पढ़ने दो,
लिखने दो,
गलत पर प्रश्न करने दो।
उसे सपने चुनने दो,
रास्ते बदलने दो,
और गिरकर
खुद को फिर से
खड़ा करने दो।

कभी वह किताबों में इतिहास बने,
कभी प्रयोगशाला में विज्ञान,
कभी सीमा पर साहस,
कभी आँगन में संवेदना।

आज राष्ट्रीय बालिका दिवस पर
बस इतना ही संकल्प लो—
बेटी को
सिर्फ़ जन्म नहीं,
सम्मान भी देंगे।
सिर्फ़ सुरक्षा नहीं,
स्वतंत्रता भी देंगे।

क्योंकि
जिस समाज में बेटी निर्भय है,
वहीं समाज
सच में सभ्य है।

स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी,विशिष्ट शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर सुपौल

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