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डर-रूचिका

Ruchika

अपने ही मन में पनपते कुछ ख़्याल,

कुछ परिस्थितियां जन्म लेती,

औऱ जन्म लेते कुछ विचार

थाम लेते हमारे बढ़ते कदमों को

और रोक देते हर बार

कोई अनहोनी की आशंका

डर ये कैसा उठता हर बार।

तमाम उजालों के बीच 

अँधेरा हावी होता जाता

रास्ते भी पथरीले लगते चुभते हर बार

घुटन बढ़ती रहती मन के अंदर

बाहर के शोर पर हावी होता

मन का शोर

नकारात्मकता की घनी दीवारें ये

डर से मजबूत होती हर बार।

डर से जीतने के लिए कोशिश 

करनी होगी स्वयं ही

अँधेरों में भी राह अपनी बनाकर

पथरीले रास्ते को पार करना होगा।

नियति को स्वीकार कर चलना होगा

घुटन कम होगी फिर देखना

डर का बादल छँटेगा फिर इस बार।

रूचिका 

प्रधान शिक्षक

राजकीय प्राथमिक विद्यालय कुरमौली गुठनी सिवान बिहार

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