Site icon पद्यपंकज

डरता हूं -पुरुषोत्तम कुमार 

Purushottam Kumar

Purushottam Kumar

बेटी,तुझे पाने से डरता था

आज पाकर खो जाने से डरता हूं।

कल तक तेरा बोझ उठाने से डरता था,आज खुद तेरा बोझ बन जाने से डरता हूं।

मैं सोया रहा तू जागी रही,

आज मैं सो जाने से

 डरता हूं।

करती थी मेरा इंतजार घर आने का तू कल तक आज तेरे घर से बाहर जाने से डरता हूं।

दी तूने मुझे खुशियां अपार

आज तेरी खुशियों के खो जाने से डरता हूं।

तेरे फूल से कोमल मुखड़े को देख मैं मुस्काता था,

आज उस फूल के मुरझाने से डरता हूं।

तूने अपनी मुस्कुराहट से मेरी बगिया सजाई है,

आज तेरी बगिया के उजड़ जाने से डरता हूं।

सोचा था स्वयंवर रचाएंगे तेरे लिए,उस स्वयंवर में रावण के आ जाने से डरता हूं ।

आज नहीं है कोई लक्ष्मण जो खींचे तेरे लिए लक्ष्मण रेखा,राम के न रहने पे लक्ष्मण के आ जाने से डरता हूं।

तूने तो अपना धर्म निभा दिया,अपना धर्म न निभाने से डरता हूं।

कल तक तुझे पाने से डरता था, आज पाकर खो जाने से डरता हूं।

पुरुषोत्तम कुमार 

प्रधान शिक्षक 

उर्दू प्राथमिक विद्यालय लोदीपुर

गोलघर अंचल पटना

1 Likes
Spread the love
Exit mobile version