विश्व गौरैया दिवस- 20 मार्च
गौरेया दरवाजे पर आकर अपना घोंसला बना लेती थी,
अनाज के दानों पर आकृष्ट हो आंगन की शोभा बढ़ा देती थी,
पुराने लोग कहते थे, गौरेया लक्ष्मी का ही स्वरूप है,
उसे एकत्र देख आंगन में, कदाचित् मनोरंजन अनूप है,
एक गौरेया को दो अनाज के दाने, झुंड बुला लेती थी,
साथ मिल दाने चुगती, निज एकता का परिचय देती थी,
जाने कहां गये वो दिन, गौरेया समूह आंगन में ही आ जाती थी,
थोड़ी देर रहकर वह मनोरंजन के साथ बहुत कुछ बता जाती थी,
पक्षियों के लिए पिंजरे की क्या आवश्यकता, जब वृक्ष है पास,
वृक्ष खूब लगाइए अवसरों पर, सभी पक्षी खुद ही आ जाएंगे पास,
इन प्रजातियों के गायब होने पर मानव जाति कब करेंगी चिंतन,
चिंतन से ही सदुपाय मिलेगा, करना होगा इस पर सतत मनन ।
…..गिरीन्द्र मोहन झा
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