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हिंदी—शब्दों , वाक्यों का सुंदर संसार – उमेश कुमार सिन्हा

हिंदी पर अभिमान ही नहीं,
पूरा गौरव एवं स्वाभिमान है l

हिंदी हमारी अपने जन्म की भाषा,
हिंदी में ही जन्मे, हिंदी में ही पले-बढ़े, इसकी महत्ता का क्या ?कहना
जब कोई दूसरी भाषा आती,
उसका अर्थ भी हिंदी में ही समझते।

हिंदी भारत की राजभाषा बनी,
चौदह सितंबर उन्नीस सौ उनचास में,
तभी से हिंदी दिवस मनाते हैं,
गर्व और सम्मान के उल्लास में।

हिंदी का परिवार संयुक्त है,
सभी मिल-जुलकर रहते हैं,
एक-दूसरे के स्थान पर आकर
शब्द-वाक्य के भाव सँवारते हैं।

हिंदी के स्वर स्वावलंबी हैं,
व्यंजन भी इनसे सजते हैं,
स्वर के बिना व्यंजन बेचारे
शब्दों में कैसे ढलते हैं?

बारहखड़ी में दोनों मिलकर
बड़े प्रेम से रूप सँवारते,
मिल-जुलकर शब्दों को गढ़ते,
उनके सुंदर अर्थ निखारते।

व्याकरण भाषा का रक्षक है,
वर्णमाला की करता रखवाली,
भाषा को शुद्ध और सुंदर रखकर
बनती हिंदी सबसे निराली।

अलंकार, छंद और रस से
हिंदी खूब विभूषित रहती,
प्रत्यय, उपसर्ग के संग मिलकर
शब्दों में नव-अर्थ कहती।

हमें गर्व है हिंदी भाषा पर,
जिसमें भावों का अमृत-रस है,
पढ़े-लिखे हों या अनपढ़ जन,
सबके लिए इसका सहज स्पर्श है।

आज हिंदी दिवस आया है,
मन में गर्व जगाया है,
अपनी प्यारी हिंदी पर
हमने शीश नवाया है।

हिंदी केवल भाषा नहीं,
भारत की पहचान है,
जन-जन के मन को जोड़ रही,
यह देश की आत्मा-समान है।

आओ, हिंदी का मान बढ़ाएँ,
इसके प्रति सम्मान जगाएँ,
हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर
हिंदी का जयगान सुनाएँ!

स्वरचित मौलिक रचना:-
उमेश कुमार सिन्हा
डिसेंट एकैडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
अंचल- ब्रह्मपुर, जिला – बक्सर

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