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ज से म तक – धर्मेन्द्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

जन्म से मरण: महाकाल का असीम चक्र

सृष्टि के आदिम सन्नाटे को चीर कर,

जब ‘ज’ का पहला स्पंदन गूंजा था,

ब्रह्मांड के विशाल अंतहीन गर्भ में,

एक अजन्मा सितारा पहली बार जागा था।

‘म’ की अंतिम राख की ढेरी बनने तक,

यह अनंत यात्रा चलती ही रहती है,

काल के निर्दयी, प्रचंड और बहते प्रवाह में,

हर सांस एक नया इतिहास लिखती है।

वह क्षण! जब आत्मा धरा पर कदम रखती है,

उसी पल मृत्यु अपनी बाहें पसार लेती है,

पालने की पहली किलकारी के साथ ही,

श्मशान की शांत चिता भी सुलगने लगती है।

जीवन की पहली सांस ही अंतिम सांस का बुलावा है,

यह संसार केवल एक छलावा और दिखावा है,

जन्म और मरण के इस महासमर के बीच,

हर जीव केवल एक कठपुतली का परछावा है।

हम बंधे हैं कर्मों की उन वज्र-कठोर जंजीरों में,

जो काल के पहिए को निरंतर घुमाती हैं,

अदृश्य हाथों से बुने गए इन भाग्य के जालों में,

युगों-युगों की सदियां घुटने टेक जाती हैं।

ये बीच के सारे कालखंड, ये सुख-दुख के चक्रवात,

दसों दिशाओं को हिलाने वाले हमारे कर्मों के हैं प्रपात,

एक पल में ब्रह्मांड को मुट्ठी में भींच लेने का भ्रम है,

पर सत्य केवल यही—कि हम सब महाकाल के आधीन हैं।

इस छोर से उस छोर तक फैली है जो माया,

वह ‘ज’से ‘म’ के बीच की केवल एक छाया है,

कर्मों के इस विराट और भयानक चक्रव्यूह में,

देवता भी रोए हैं, जब-जब उन्होंने शरीर पाया है।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला रानीगंज अररिया

08.10.2026

 

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