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जंग अभी बांकी है -धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

दशकों बीते, सदियां बदलीं, पर जंजीरें चटक न पाईं,

महलों में शहनाई गूंजी, कुटिया में परछाईं आई।

तुम कहते हो भोर हो गई, पर ये घोर अंधेरा है,

सूरज की किरणों पर देखो, अब भी गिद्धों का डेरा है।

कैसी ये आज़ादी है, कुछ समझ नहीं आता है!

धरती से अंबर तक देखो, लपटें भयानक उठती हैं,

ये देश अग्नि में झुलस रहा, सब सांसें घुटती हैं।

नदियों में पानी के बदले, खौलता हुआ अंगारा है,

हर गली, डगर और चौराहे पर, लाचारी का नजारा है।

कैसी ये आज़ादी है, कुछ समझ नहीं आता है!

जनता का धीरज टूट गया, अब हाहाकार मचाती है,

भूख और बेबसी की ज्वाला, रूह को आज जलाती है।

हर छाती में इंकलाब का, एक समंदर मचल रहा,

शासक के ऊंचे तख्तों को, जन-आक्रोश निगल रहा।

कैसी ये आज़ादी है, कुछ समझ नहीं आता है!

मत समझो शांत समंदर को, ये तूफानों की झांकी है,

हक की खातिर लहू बहेगा, जंग अभी बांकी है!

जब तक हर आंसू अंगारा बनकर, जुल्म को न जलाएगा,

तब तक इस जलते भारत में, कोई चैन न पाएगा।

ये न्याय व्यवस्था सोई है, या अंधा कानून चला है,

सच्चाई की इस धरती पर, बस छल का जाल ढला है।

सोने की चिड़िया कही जाने वाली, अब पिंजरे में रोती है,

हर रात यहां की रोती है, हर सुबह सिसकती होती है।

कैसी ये आज़ादी है, कुछ समझ नहीं आता है!

सिंहासन के अंधे बहरे, इस दर्द को सुन न पाएंगे,

जब तक ये भूखे नंगे पांव, संसद तक न धाएंगे।

ज्वालामुखी फटने वाला है, धरती का सीना कांप रहा,

हर शोषित और पीड़ित मानव, अब काल रूप है भांप रहा।

कैसी ये आज़ादी है, कुछ समझ नहीं आता है!

ये कागजी तरक्की के वादे, अब और न झेले जाएंगे,

हम अपनी किस्मत के पन्ने, अपने ही लहू से गाएंगे।

जब तक अधिकार नहीं मिलता, ये कदम नहीं रुकने वाले,

हम इंकलाब के बेटे हैं, शासक के आगे न झुकने वाले।

मत समझो शांत समंदर को, ये तूफानों की झांकी है,

हक की खातिर लहू बहेगा, जंग अभी बांकी है!

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला

 रानीगंज अररिया 

                                        

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