चलने खाली पैर न देता।
ठोकर सारे वह सह लेता।।
रखे शूल से पाँव अछूता।
क्या सखि? साजन! न सखी! जूता।।०१।।
मेरा हर-पल शान बढ़ाए।
उसके संग न मन घबराए।।
रक्षक जैसे फल का सरही
क्या सखि? साजन! न सखी! पनही।।०२।।
लिपट संग में जब चलता है।
ठोकर शूल हाथ मलता है।।
लगे नहीं पथ कभी भयावह।
क्या सखि? साजन! न सखि! उपानह।।०३।।
उसके संग सदा इठलाऊँ।
पथ बाधा से नहीं घबराऊँ।।
निर्भीक त्वरित दौड़ लगाऊँ।
क्या सखि? साजन! न सखि! खड़ाऊँ।।०४।।
मेरे कदमों को जब चूमे।
हर्षित होकर मन तब झूमें।
घूम सकूँ बेझिझक तालुका।
क्या सखि? साजन! न सखि! पादुका।।०५।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८
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