कर्त्तव्य बोध
अधिकार जताने से पहले कर्त्तव्य हमें समझाना होगा,
अमृत रस पाने से पहले विष का प्याला पीना होगा।
जो अधिकारी बनना चाहे, पहले वह दासत्व निभाए,
शीश कटाकर रणभूमि में, तब जाकर गौरव को पाए।
सिंहासन का मोह तजकर, काटों के पथ पर चलना होगा,
मातृभूमि की बलिवेदी पर, अंगारों में जलना होगा।
बिन त्याग कहाँ अधिकार मिला? बिन लड़े कहाँ संसार मिला?
तप की धधकती ज्वाला में, खुद को प्रतिपल तपना होगा,
अधिकार जताने से पहले कर्त्तव्य हमें समझाना होगा।
गंगा को भू पर लाने को, भगीरथ सा तप करना होगा,
सागर के गहरे मंथन में, हलाहल को कंठ में धरना होगा।
अमरत्व सहज मिलता किसको? यहाँ मरकर ही जीना होगा,
अमृत रस पाने से पहले विष का प्याला पीना होगा।
जो कायर हैं वे अधिकारों की केवल भीख मँगा करते,
वीर तो अपने पौरुष से, इतिहास नया लिखा करते।
जब तक न चुकाओगे कीमत, तब तक न कोई सम्मान यहाँ,
कर्त्तव्य निभाए बिन जग में, मिलता न कभी स्थान यहाँ।
उठो, जागो, पहचानो खुद को, यह मोह-पाश अब तजना होगा,
अधिकार जताने से पहले कर्त्तव्य हमें समझाना होगा,
अमृत रस पाने से पहले विष का प्याला पीना होगा।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
07.10.2026

