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मानव के सहयोगी बनें -कार्तिक कुमार

मानव के सहयोगी बने
कार्तिक कुमार की प्रस्तुति
100 में 80 आदमी, जग में हुए कठोर,
स्वार्थ की इस भीड़ में, खो गया है छोर।
चेहरे पर मुस्कान है, मन में भरा विषाद,
अपनों से ही दूर हैं, कैसा यह संवाद।
20 ऐसे लोग भी, मानवता के दीप,
दुखियों का सहारा बनें, मन में प्रेम अतीव।
वे ही बाँटें प्यार को, करते सच्चा काम,
उनके कारण जगत में, बचा हुआ है नाम।
80 लोग जलाते हैं, ईर्ष्या की चिंगार,
20 जन बरसाते हैं, दया प्रेम की धार।
कठोर वचन से टूटते, रिश्तों के सब तार,
मीठे बोल सजाते हैं, जीवन का संसार।
20 जन के कारण ही, धरती सुंदर आज,
उनसे ही मुस्काता है, मानवता का ताज।
कार्तिक कुमार का कहना, सुन लो मेरे यार,
अच्छे कर्मों से बनता, जीवन का आधार।
80 जैसे मत बनो, छोड़ो झूठा घमंड,
20 जैसे बन जाओ, मिलेगा सच्चा आनंद।

कार्तिक कुमार मध्य विद्यालय कटरमाला गोरौल वैशाली
7004318121

व्यक्तिगत जीवन के अनुभव के आधार पर
हीप रिप्लेसमेंट के कारण प्रतिदिन कुछ ना कुछ आवश्यकता पड़ती है सहयोग की 20 लोगों को सहयोग के लिए करता हूं तो कोई दो लोग खड़े होते हैं स्कूल तक पहुंचाने के बाकी किसी के पास समय नहीं
कुरुर हृदय कहिए या मन की मालीनता व्यक्तिगत जीवन के अनुभव के आधार पर उपरोक्त कविता
मध्य विद्यालय पत्र मालपुर रेलवे स्टेशन

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