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क्रोध की विभीषिका-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

क्रोध की सीमा न होती है,

जब यह उमड़ आती है,

इसकी ज्वाला धधक-धधक कर,

विवेक मानव खा जाती है।

यह वह अंधड़ है जीवन का,

जो पल में सब कुछ ढहाए,

सोचने-समझने की शक्ति को,

क्षण भर में यह निगल जाए।

वाणी बन जाती है खंजर,

रिश्तों पर घाव लगाती है,

अपनो के पावन बंधन को,

पल भर में तोड़ गिराती है।

जब आँख पे पर्दा पड़ता है,

तब सही-गलत का ज्ञान नहीं,

क्षण भर के इस उन्माद में फिर,

रह जाता कोई मान नहीं।

यह सुलगती ऐसी आग है जो,

दूसरों से पहले खुद को जलाती है,

इंसान के भीतर के इंसान को,

यह धीरे-धीरे खा जाती है।

शांत करो इस ज्वाला को तुम,

धैर्य का शीतल जल बरसाओ,

खो न जाए विवेक कहीं,

मन को बस इतना समझाओ।

जीत लो इस बैरी को आज,

तभी मानवता मुस्कुराएगी,

जब शांत रहेगा मन अपना,

तभी जीवन में शांति आएगी।

 

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला 

रानीगंज अररिया 

                                           

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