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लघु तन, विराट संकल्प – धर्मेंद्र कुमार

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

“लघु तन, विराट संकल्प”

एक जंगल में छोटी सी चींटी रहती थी,

मेहनत की वो हरदम मीठी धुन कहती थी।

एक दिन मिला उसे भोजन का टुकड़ा भारी,

अकेले उठाने की उसने की कोशिश सारी।

पर वजन था ज्यादा, वो आगे बढ़ न पाई,

हार मानने की बात कभी मन में न लाई।

तुरंत बुलाई उसने अपनी सखियां सारी,

मिलजुलकर उठाने की अब थी तैयारी।

अनुशासन की मूरत हैं वो, एक कतार में चलती हैं,

मुश्किल कैसी भी आए, वो कभी नहीं विचलित होती हैं।

सबने मिलकर जोर लगाया, हिम्मत नहीं हारी,

बिल तक पहुंचा दी मिलकर वो वस्तु भारी।

पास बैठकर एक टिड्डा यह सब देख रहा था,

इतनी छोटी चींटियों की ताकत पे हैरान बड़ा था।

हंसकर बोला टिड्डा, “ये तुमने कैसे कर डाला?

इतने छोटे तन से, इतना बड़ा काम संभाला?”

चींटी बोली, “सुनो मित्र, यह खेल नहीं है काया का,

यह तो अद्भुत संगम है, सच्ची लगन और साया का।

आकार में हमारी ताकत नहीं समाती,

जब हम सब मिल जाती हैं, तो एकता रंग लाती।”

अकेला चना भला कब भाड़ फोड़ पाता है,

पर संगठन में आ जाए, तो पर्वत भी हिल जाता है।

टिड्डा भी रह गया दंग, देखकर उनका विश्वास,

जब सब मिलकर करते हैं प्रयास, हर मुश्किल काम बन जाता है खास।

मत समझो खुद को छोटा तुम, यह जग को दिखलाना है,

संकल्प अगर हो सीने में, तो अंबर को भी झुकाना है।

बाधाएं चाहे कितनी हों, तुम मिलकर कदम बढ़ाते चल,

सच्ची एकता के बल पर, हर मुश्किल राह बनाते चल!

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला

रानीगंज अररिया

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