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लक्षण और इतिहास,धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

Dharmendra Kumar Thakur

Dharmendra Kumar Thakur

।। छंद ।।

(लक्षण और इतिहास)

पिंगल ऋषि ने रच दिया, पावन छंद-विधान।

काव्य-नदी की धार में, भरे अनोखी जान॥

सात अंग इसके कहें, भेद चार सुखकार।

मात्रा-वर्ण नियमन जहाँ, छंद वही साकार॥

चौपाई (छंद के 7 अंग)

प्रथम अंग चरण कहलाता। चार भाग में जो बँट जाता॥

वर्ण-मात्रा दूजा अंग जानो। लघु को एक, गुरु दो मानो॥

संख्या-क्रम तीजा अंग भाई। गणना और व्यवस्था गाई॥

तीन वर्ण का गण है बनता। आठ रूप की इसमें समता॥

गति देती पढ़ने को लय है। यति पर रुकना सुंदर तय है॥

अंत चरण के तुक को लाओ। सुंदर काव्य-सुधा बरसाओ॥

चौपाई (छंद के 4 भेद)

मात्रिक छंद मात्रा की गिनती। दोहा-चौपाई जैसे बनती॥

वर्णिक में अक्षरों का मेला। सवैया छंद दिखाए खेला॥

वर्णिक वृत्त सम रूप सँवारे। क्रम और गण का नियम न हारे॥

मुक्त छंद बंधन से न्यारा। ‘निराला’ जी को सबसे प्यारा॥

 

           धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला

रानीगंज अररिया

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