अक्षर – अक्षर बाँध सके,
नहीं कोई है ऐसी भाषा!
व्यक्त करे माँ की ममता को,
ऐसी कोई नहीं परिभाषा!
एक अलौकिक भाव है ममता,
जैसे ईश्वर का निज रूप।
होकर स्वयं पर न्योछावर जिसने,
हो रच डाले भाव अनूप।
पीयूष स्रोत बहती कल – कल में,
लिए हृदय में ममता धार।
कर न्योछावर निज ममत्व,
संवारती सरिता धरा रूप अपार।
संतानों के हित स्वयं अवनि,
चादर ममता की ओढ़े रहती।
सहती हृदय पर वज्र प्रहार,
क्या कभी ‘उफ’ भी है करती ?
तिल-तिल मरकर पोषण करती,
सींचती रक्त से नौ माह !
जन्म मनुज को देती वह,
पाती बदले में है बस आह!
देवों ने भी जिस ममता का,
कर्ज उतार नहीं पाए ।
सुन! मानव माँ की ममता का,
काश! तुम्हें तनिक भी समझ आए !!
डॉ उषा किरण
प्रधान शिक्षक
Nps बवरिया,पहाड़पुर
पूर्वी चम्पारण

